श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 142, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ें१२६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
विश्वास करने से उन्हें मोक्ष प्राप्त होता है। किन्तु जो अज्ञानी भी नहीं हैं और ज्ञानी भी नहीं हैं, जिन्हें केवल ज्ञान
का घमण्ड रहता है उनका मन विषय के प्रति क्षुब्ध होता रहता है। ऐसे ये पुरुष आत्मघाती हैं ऐसा समझना
चाहिये। केवल अर्थ और काम साधने के लिये जो अभिचार कर्म अर्थात् जारण-मारण आदि कर्म करते हैं वे
त्रैवर्णिक (द्विज) होते हुए भी उनका वही कर्म उनके लिये आत्मघाती सिद्ध होता है। हे राजा ! शरीर के सुख के
लिये जो व्यभिचार करते हैं, वे अपने उस कर्म से ही आत्मघात कर लेते हैं। जिस डाली पर बैठा है उसे जो
स्वयं ही तोड़ता है वह जिस प्रकार उस डाल के साथ गिर पड़ता है उसी प्रकार काम्यकर्म की आसक्ति से
उसका तत्काल अधःपात होता है।
एत आत्महनोऽशान्ता अज्ञाने ज्ञानमानिनः ।
सीदन्त्यकृतकृत्या वै कालध्वस्तमनोरथाः ॥ १७ ॥
अत्यधिक कामी, अत्यन्त क्रोधी तथा क्रूर कर्म करने वाले लोग स्वयं ही अपना विनाश और अकल्याण
कर लेते हैं। स्वयं अविधि से कर्म करते हैं और उसे ही शुद्ध विधि कहते हैं। अज्ञान का 'ज्ञान' के रूप में
प्रतिपादन करते हैं। जो काम्य कर्मों से छले गये, जिन्हें महामोह ने जकड़ लिया जो घमण्ड तथा दंभ से जकड़े
गये और जिन्हें कालसर्प ने निगल लिया है, गर्व आदि के ज्वर से जिसका मुँह कड़ुआ हो गया है वे विष का
सममारक विषय सुख का आनन्द से सेवन करते हैं। साथ ही अपने विषय के लिये अपने देह को ही सगा
मानकर युक्तिपूर्वक धन संग्रह करते हैं।
हित्वाऽत्यायासचरिता गृहापत्यसुहृच्छ्रियः ।
तमा विशन्त्यनिच्छन्तो वासुदेवपराङ्मुखाः ॥ १८ ॥
मृत्यु का सामना करते हुए अमीर लोग धन प्राप्त करते हैं, मकान, स्त्रियाँ, बच्चे तथा ऐसी अनेक वस्तुओं
का संग्रह करते हैं। कष्ट से प्राप्त किये हुए सारे भोगविलास छोड़कर अपने ज्ञान पर घमण्ड करने वाले लोगों को
उनका ज्ञानाभिमान 'अधतमस' नामक नरक में ढकेल देता है जहाँ अन्धकार की आँखें भी अन्धी हो जाती हैं
वहाँ मोहरूपी रात्रि का अन्धकार उस अधतम में मिलकर और भी भयंकर हो उठता है। उस अन्धकार को
प्रकाशित करने के लिये यदि सूर्य भी आये तो वह भी काला हो जायेगा। जहाँ गहरी मूढावस्था अत्यधिक मूढ़ता
को प्राप्त होती है, जहाँ सुषुप्ति भी सो जाती है, जहाँ आलस्य भी अलसा जाता है वहाँ निन्दा और क्रोध भी
स्थायी रूप से डेरा लगा कर बैठ जाते हैं। वहाँ भजन से विन्मुख होने वाले पुरुषों का अभिमान के कारण
अधःपतन होता है। गहरे पानी में डूबा हुआ पत्थर जिस प्रकार कभी भी बाहर नहीं निकल सकता उसी प्रकार वे
भी वहाँ से बाहर नहीं आ सकते। जो सदा वासुदेव से विमुख रहते हैं, जिन्हें हरि भजन में संतोष नहीं प्राप्त होता
उनकी इस प्रकार अधोमुख अवस्था होकर वे दुःख में छटपटाते रहते हैं। ऐसे अभक्तों की कथा सुनाने की
अपेक्षा मूक रहना अच्छा है। राजा ! तुमने पूछा ही था इसलिये उनकी स्थिति के बारे में आज इतना बोलना पड़ा
अन्यथा आज तक हममें से किसी ने भी अभक्तों के वर्णन से अपनी जिह्वा को अपवित्र नहीं किया। हे
राजाधिराज ! अब हम दोनों अर्थात् मैं वक्ता और आप श्रोतागण मिलकर 'राम राम राम राम' कहकर वाणी का
प्रायश्चित्त करें। अभक्तों की दशा सुनकर राजा को अत्यन्त दुःख हुआ, वह मन ही मन थक सा गया और उसके
निवारण के लिये मन में हरि के नाम का स्मरण करने लगा। जिस हरि का उन्होंने स्मरण किया, उस हरि के बारे
में ही उनसे पूछें इसलिये हरि के भक्त युग-युग में किस प्रकार भजन करते हैं यह प्रश्न किया।