सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 141, कुल 869 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 141

पंचम अध्याय १२५
चाहिये। इसी का नाम 'आलभन' है और यही निष्काम यज्ञाचरण है। हरिश्चन्द्र के यज्ञ में (वरुण को बलि देने
के लिये) 'शुनःशेप' नामक एक ऋषिपुत्र को लाया गया था उस समय (विश्वामित्र ने) उस पर शस्त्र से प्रहार
न कर केवल वेदोक्त विधि से ही यज्ञसिद्धि की गयी। वेदोक्त मंत्रों से समस्त देवताओं को प्रसन्न कर शुनःशेप
मुक्त हो गया ऐसी कथा ऋग्वेदार्थ ऐतरेय ब्राह्मण में आती है। इसलिये यज्ञ में पशु का वध बिलकुल नहीं करना
पड़ता। हरिश्चन्द्र ने यज्ञ के लिये पशु हिंसा वर्जित कर दी थी। इस पर मीमांसकों का ऐसा मत है कि देवताओं
के लिए पशु का वध करने को ही 'आलभन' कहना चाहिये और स्वर्ग प्राप्त करने के लिये यह आवश्यक ही
है। जो केवल मांसभक्षण के लिये पशु का वध करते हैं उन्हें ही हिंसा का पाप लगता है ऐसा मीमांसकों का मत
है किन्तु देवताओं के प्रीत्यर्थ पशु का वध करने से स्वर्गप्राप्ति भले ही हो लेकिन वह स्वर्गभोग कुछ काल के
बाद कर्मक्षय के साथ नष्ट हो जाता है। इसलिये यज्ञ करने वाले को भी हत्या का पाप लगता है। अब
'सौत्रामणि' यज्ञ करने पर पुरोणाश अर्थात् यज्ञ के अवशेष को केवल सूँघने के लिये कहा गया है किन्तु मद्य का
सेवन करने का विधान वेदों में नहीं है। सारांश, जिसमें पशु का वध होता है वह कर्म दोषपूर्ण है। उससे यज्ञ
करने वाले का अधःपतन होता है। वेदों ने पाणिग्रहण अर्थात् विवाह का विधान किया है। लेकिन वह केवल
संतानोत्पत्ति के लिये अपनी स्त्री के साथ गमन करने के लिये है। इसलिये केवल रतिसुख के लिये प्रतिदिन
स्त्रीसंग किया जाय इसकी आज्ञा वेदों ने नहीं दी है। मद्य, मांस और मैथुन इनका कोई स्वेच्छा से जी भर कर
उपभोग न करे अर्थात् स्वच्छंद भोग पर नियंत्रण करने के लिये वेदों ने विवाह विधि तथा यज्ञविधि की योजना
की है। ऐसे शुद्ध धर्म को न जान मूर्ख लोग यज्ञ का बहाना कर अधर्म की ओर प्रवृत्त होते हैं और काम्य कर्म
कर भ्रमयुक्त भोगों में प्रवृत्त होते हैं।
ये त्वनेवंविदोऽसन्तः स्तब्धाः सदभिमानिनः।
पशून् द्रुह्यन्ति विस्रब्धाःप्रेत्य खादन्ति ते च तान्॥ १४॥
ये लोग घमण्ड के अतिरेक के कारण स्वयं को अधिक बुद्धिमान समझ कर वेद का क्या विधान है इसका
विचार न कर अविधि से पशु की हिंसा करते हैं। केवल जारण मारण के घृणित प्रयोग से सारे भोग प्राप्त होते हैं
ऐसा मन में विचार कर स्वेच्छा से पशु की हिंसा करते हैं। इस प्रकार वे चोर रास्ते से, अकारण ही पशुओं का
वध करते हैं। ये यज्ञकर्ता जब मरते हैं तो यही पशु तेज छुरी लेकर उन्हें मारने के लिये आते हैं। सारांश, जिस
प्रकार प्राणी द्वारा खाया हुआ विष उसके प्राणों को ग्रस लेता है, उसी प्रकार जब यज्ञ करने वाले मर जाते हैं उस
समय जिन प्राणियों का उन्होंने भक्षण किया है वही पशु परलोक में उनका भक्षण करते हैं।
द्विषन्तः परकायेषु स्वात्मानं हरिमीश्वरम्।
मृतके सानुबन्धेऽस्मिन् बद्धस्नेहाः पतन्त्यधः ॥ १५॥
श्रीहरि जो परमात्मा है वह सभी के शरीर में अंतर्यामीरूप से निवास करता है इसलिये जो दूसरे का द्वेष करते
हैं वे एक तरह से हृदयस्थ परमात्मा का ही द्वेष करते हैं। सारांश जो दूसरों का विनाश करते हैं वे स्वयं ही अपना
नाश करते हैं तथा सपरिवार अधःपतन कीं ओर जाते हैं तथा उन्हें रौरव नरक प्राप्त होता है।
ये कैवल्यमसम्प्राप्ता ये चातीताश्च मूढताम्।
त्रैवर्गिका ह्यक्षणिका आत्मानं घातयन्ति ते ॥ १६ ॥
जो ज्ञानी हैं वे स्वयं ही तर जाते हैं और अज्ञानी ज्ञानियों की शरण में आते हैं इसलिये उनके वचन पर