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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 149, कुल 869 में से

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पृष्ठ 149

पंचम अध्याय १३३
शूद्रों से उसने बात नहीं की। वह मौन अभी भी कायम है। वेद की यह बहुत बड़ी कमी इस हरिकीर्तन ने ही
पूरी की। क्योंकि हरि के नाम से स्त्री, शूद्र अथवा अंत्यज लोगों का भी उद्धार हो जाता है। कीर्तन से स्वधर्म
जुड़ता है, कीर्तन से स्वधर्म बढ़ता है, कीर्तन से ही परब्रह्म प्राप्त होता है। अधिक क्या कहें? मुक्ति भी कीर्तन
के सामने शर्मा जाती है। कीर्तन के आनन्द के कारण ही चारों मुक्तियाँ हरिभक्तों को वरने आती हैं लेकिन भक्त
उन्हें दूर भगा देते हैं। लेकिन वे दासी बनकर उनके चरणों पर लग ही जाती हैं। हे राजा! कलियुग में ऐसा
साक्षात्कार है। कीर्तन की महिमा इतनी महान है इस सम्बन्ध में मन में जरा भी विकल्प न रखो। चाहे कृतयुग
हो, त्रेतायुग हो या द्वापरयुग हो नामस्मरण के लिये कभी भी निषेध नहीं है। लेकिन कलियुग में चारों मुक्तियाँ
नाम के पास स्वयं दासी बन कर रहती हैं।
न ह्यतः परमोलाभो देहिनां भ्राम्यतामिह।
यतो विन्दत परमां शान्तिं नश्यति संसृति ॥ ३७॥
हे राजेश्वर! जो लोग जन्म-मरण के भँवर में फँस कर संसार में चक्कर खाते रहते हैं, उन प्राणियों को
कलियुग में कीर्तन से ही सद्गति प्राप्त होती है। कलियुग में कीर्तन से ही सांसारिक बन्धन टूट कर शान्ति सुख
के अनुभव से परमानन्द से भेंट होती है। ऐसे कीर्तन में बहुत बड़ा लाभ है। देवताओं को अथवा मानवों को
(दूसरे युगों में) कष्ट करने से भी वह प्राप्त नहीं होता लेकिन कलियुग में वह सुलभ हो गया है। इसीलिये
भाग्यशाली लोग हरिकीर्तन की आशा करते हैं। कीर्तन के कारण चारों मुक्तियाँ भक्त के गले लग जाती हैं। कोई
कहेगा कि ऐसा नहीं होगा। तो हे राजा! उसकी स्थिति अर्थात् उपपत्ति बताता हूँ, सुनो। कीर्तन में हरिनाम का
घोष होता है, उसे सुनकर भगवान को अत्यन्त संतोष प्राप्त होता है, और वह वैकुण्ठ छोड़कर तीव्र गति से
दौड़कर आता है। देवता हरिकीर्तन से अत्यन्त लुब्ध होते हैं, वह वैकुण्ठ लौटना ही भूल जाते हैं। भक्त की भक्ति
देखकर उसे वही स्थान अधिक अच्छा मालूम होता है अर्थात् यदुनायक जहाँ रहता है वहीं वैकुण्ठ भी आ जाता
है। इस प्रकार भक्त कीर्तन से ही 'सलोक' मुक्ति प्राप्त कर लेते हैं। नामसंकीर्तन के गजर से ही श्रीहरि भक्तों के
समीप दौड़ कर आता है। यही 'समीपता' मुक्ति है। हरिकीर्तन से ही वह भक्तों के हाथ लगती है। कीर्तन से जब
भगवान प्रसन्न हो जाता है तो वह भक्त को साक्षात दर्शन देता है। उसका श्यामसुन्दर पीताम्बरधारी ध्यान भक्त के
मन में सहज ही अंकित हो जाता है। जिस ध्यान का भक्त कीर्तन करता है वही ध्यान उसके मन में अंकित हो
जाता है। उस समय भगवान के वही रूप लक्षण भक्त को प्राप्त होते हैं। श्यामसुन्दर, चतुर्भुज, पीताम्बर धारण
कर, शंखचक्रादि आयुध हाथ में ली हुई सरूपता कीर्तन से लुब्ध होकर भक्त को माल्यर्पण करती है। उस समय
भगवान और भक्त एक समान हो जाते हैं। दोनों के अवयव एक समान और दोनों के आयुध तथा अलंकार भी
एक जैसे। भक्तिभाव से हरिकीर्तन करने से हरिभक्तों को इतनी महिमा प्राप्त होती है। लक्ष्मी जब दोनों को एक
स्थान पर देखती है तो उसमें देवता कौन है और भक्त कौन है यह वह भी नहीं पहचान पाती। ब्रह्मदेव भी
नमस्कार करते समय चौंक जाता है। शुद्ध भाव से हरिकीर्तन करने से जनार्दन को संतोष होता है। देवता और
भक्त आलिंगन में बँध जाते हैं और वह बन्धन कभी ढीला नहीं होता। तब बाह्यांतर में चराचर में देवता प्रकट हो
जाते हैं। उसे संसार में अन्य कुछ दिखायी ही नहीं देता। इस प्रकार जब वृत्ति स्वानंद में मग्न हो जाती है और
कभी उससे भिन्न नहीं होती तो उसी को 'सायुज्य मुक्ति' कहते हैं। उसमें भिन्नभाव रहता ही नहीं है। इस प्रकार
पूर्ण सायुज्यता प्राप्त कर जब वह हरिकथा करने लगता है उस समय उस कथा की तल्लीनता सभी प्राणियों को