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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 135, कुल 869 में से

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पृष्ठ 135

पंचम अध्याय १९९
दिया है। इस प्रकार की परस्पर चर्चा करने के बाद वे कहते हैं " 'गोविन्दा ! हमें कभी त्याग करने की बुद्धि न
देना। सर्वस्व का त्याग कर भीख माँगने से मर जाना अच्छा है। मुक्ति तो किसी ने नहीं देखी है लेकिन आज की
विपत्ति तो अभी दिखायी पड़ती है। किसी को मुक्ति प्राप्त हुई दिखायी देती, कहीं दिखायी पड़ती तो उसे सच
माना जा सकता था, लेकिन वैसी बात नहीं है, इसलिये वैराग्य से सर्वस्व का त्याग करने की बात व्यर्थ है।' ' इस
प्रकार त्याग की निन्दा कर वे हमेशा भोग की ही बात करते हैं और परस्पर इसी प्रकार का आशीर्वाद देते हैं।
स्त्रीसुख को ही अत्यन्त श्रेष्ठ मानकर हमेशा स्त्रैण बन कर रहते हैं। फिर क्या पूछना ? जागृति में, स्वप्न में तथा
सुषुप्तावस्था में सदा स्त्री का ही ध्यान करते हैं। न सद्गुरु का भजन करते हैं, न बड़ों की पूजा, न अतिथि को
अन्नदान, हमेशा स्त्रियों के अधीन रहते हैं। कहीं स्त्री के मन को ठेस न लगे, कभी स्त्री के वचन का उल्लंघन न
हो, नित्य स्त्री का ही अनुसंधान कर उसके अनुसार आचरण करते हैं। हमेशा सद्भाव से स्त्री की ही आराधना
करना। न कुलदेवता का ध्यान, न कुलवृत्ति की चिन्ता, न माता, पिता अथवा सद्गुरु की भक्ति। रुपया, पैसा सब
कुछ पत्नी के अधीन सौंप कर स्वयं उसके अधीन होकर रहते हैं। ऐसे ये स्त्रीलंपट लोग स्त्रीभोग भोगने के
उद्देश्य से द्रव्यार्जन करने के लिये केवल अहंकारवश उदरभरण के लिये ही यज्ञयाग का प्रारम्भ करते हैं। यज्ञ से
मुझे सभी प्रकार की सिद्धि प्राप्त हो ऐसा विचार भी उस दंभी के मन में नहीं रहता। केवल तात्कालिक निर्वाह
का साधन मिले इसी युक्ति की योजना की रहती है। यज्ञ की दीक्षा लेकर हाथ में यज्ञ का कंगन पहनने से
समाज में मेरी प्रतिष्ठा बढ़ेगी, मैं बड़े-बड़े लोगों के बीच पूजनीय बनूँगा, मुझे अग्रपूजा का सम्मान प्राप्त होगा
ऐसी उत्कट इच्छा मन में रखकर ही वह यज्ञ का प्रारम्भ करता है। निर्वाह तथा प्रतिष्ठा के अनेक विचारों की
योजना मन में पहले से ही करके रखता है और फिर यज्ञयाग की शुरुआत करता है। लेकिन इस काम में भी धन
कमाने का ही उसका दृढ़ निश्चय रहता है। विधिविधान की ओर उसकी दृष्टि नहीं रहती। शुद्ध मंत्रोच्चार के प्रति
आदर नहीं रहता। अन्न को बिना पकाये, सूखे अनाज से ही वह हवन करता है। मैं स्वयं यज्ञ कर रहा हूँ इस
प्रकार वह जनता में प्रचार करता है और यज्ञ के बहाने अपने कुशल मंगल को देखता है। स्वयं तो विधि विधान
नहीं जानता लेकिन जो जानते हैं उनसे भी नहीं पूछता। लेकिन ऐसे शठ, ढोंगी लोग पशु को मारने के लिये
उद्यत हो जाते हैं। फिर यज्ञ का पुरोडाश अर्थात् पशु के मांस का हवन द्रव्य शेष मजे में ग्रहण करते हैं और
अपने पवित्र होने की, निर्दोष होने की घोषणा करते हैं। जहाँ देवता के आवाहन और विसर्जन का ही ठिकाना
नहीं है वहाँ पूजा और दक्षिणा किसे दी जाये ? हाँ, अपने ज्ञान के अभिमान से सत्पात्र का अनादर और अवहेलना
अवश्य करते हैं। केवल उपजीविका के लिये पशु की हिंसा करने लगते हैं और स्वयं याज्ञिक-यज्ञकर्ता होने का
ढिंढोरा पीटते हैं। केवल जीविका के उपार्जन के लिये अविधि से हिंसा करते हैं। इससे मुझे पाप लगेगा ऐसी
चिन्ता भी उसके मन को नहीं छूती।
श्रिया विभूत्याऽभिजनेन विद्यया त्यागेन रूपेण बलेन कर्मणा।
जातस्मयेनान्धधियः सहेश्वरान् सतोऽवमन्यन्ति हरिप्रियान् खलाः ॥ ९॥
ऐसा क्रम चलता रहता है। तिस पर यदि और सम्पत्ति मिल जाय तो फिर क्या पूछना ? मदमस्त हाथी की
तरह वह घमण्ड में चूर होकर डोलने लगता है अथवा नाले में बाढ़ आने पर वह जिस प्रकार सूखे पेड़ों को
बहा ले जाता है अथवा वानर के मुँह में शराब लगने पर वह जिस प्रकार बहक कर बड़बड़ाने लगता है उसी
प्रकार सच्चा ज्ञाता मैं हूँ, यह समझ कर वह उलटा-सीधा नाचने लगता है। मेरे सामने दूसरा कोई ज्ञानी है ही