श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
प्रकार जो अभिमान के नशे में रहते हैं उन्हें पाप बुद्धि की बाधा होती है। वे सहज बात भी करते हैं तो उसमें
हमेशा साधुओं की निन्दा ही भरी रहती है। जो श्रीहरि के प्रिय हैं वे सदा हरि की भक्ति करते हैं उनका वे
हमेशा उपहास करते हैं, उनके गुणों की चर्चा भी दोषों के ही रूप में करते हैं। ब्राह्मण जब हरि का नामस्मरण
करने लगते हैं तो उसे 'अधर्म' कहते हैं। नामसंकीर्तन का गजर सुन कर ये उसे 'महापाप' कहते हैं। जो इस
प्रकार हरिनाम की निन्दा तथा उसके प्रति दुर्बुद्धि रखने वाला होगा उसे वास्तव में दुष्ट और भजन वैरी चांडाल
समझना चाहिये।
वदन्ति तेऽन्योन्यमुपासितस्त्रियो गृहेषु मैथुन्यसुखेषु चाशिषः ।
यजन्त्यसृष्टान्नविधानदक्षिणं वृत्त्यै परं घ्नन्ति पशूनतद्विदः ॥ ८ ॥
स्त्रीकाम में बेचैन, मैथुन के सिवा अन्य कहीं सुख नहीं है इस भ्रमात्मक कामासक्ति से मूर्ख बने लोग
निश्चय ही स्त्रियों की ही उपासना करते हैं। इस प्रकार मूर्ख लोग शब्दचातुरी से अपनी मूर्खता का वर्णन करते हैं
कि विविध प्रकार की भोगविधि से स्त्रियों का उपभोग करने में ही मनुष्य जन्म की सिद्धि है। स्त्री समागम में जो
प्रत्यक्ष सुख मिलता है उसे जो छुड़ाना चाहते हैं वे महामूर्ख हैं। उन महामूर्खों ने वैराग्य के नाम पर अनेक लोगों
को ठगा है। घर के अनेक भोगविलास और सुन्दर स्त्री को छोड़कर जिन्हें वैराग्य की उत्कट इच्छा होती है, उन्हें
उनका कर्म ही सजा देता है और उनका भाग्य ही उनका सर्वस्व लूट कर उन्हें जंगल में भेजता है। क्या
गृहस्थाश्रम में भगवान नहीं हैं? इसीलिये पागल की तरह जंगल की ओर दौड़ते हैं ? ईश्वर यदि जंगल में ही
होता तो हिरन, खरगोश और व्याघ्र क्यों नहीं तर जाते ? आसन पर बैठ कर ध्यान करने से ही यदि ईश्वर की
प्राप्ति होती तो शुतुरमुर्ग के झुण्डों का क्यों नहीं उसी क्षण उद्धार हो जाता ? एकान्त गुफा में रहकर यदि ईश्वर
की प्राप्ति सम्भव होती तो बिल में रहने वाले चूहे भवसागर पार न कर चीं-चीं करते क्यों फिरते ? ईश्वर बहुत
बड़ा सर्वज्ञ है। उसने पशु-पक्षियों के युगल ही बना दिये हैं लेकिन लोगों ने उस परमेश्वर को ही पागल बनाकर
सर्वसंगपरित्याग की महिमा इतनी बढ़ा दी है। 'आनन्द का स्थान जननेन्द्रिय है' यह ईश्वर का ही वेद में वचन
है लेकिन अज्ञानी लोग उसकी परवाह न कर त्याग को ही महिमामण्डित करते हैं। ईश्वर ने ही मैथुन में
परमानन्द भर दिया है लेकिन मूर्ख लोग उसका भी त्याग कर वैराग्य लेकर संन्यासी बनते हैं। संसार में जो पागल
हैं वही स्वयं संन्यासी होते हैं। भगवान ही उन्हें दण्ड देकर घर-घर भिक्षा माँगने के लिये भेजता है। अपनी स्त्री
को त्याग कर जो कर्म छोड़कर संन्यासी बनते हैं उन्हें स्त्री शाप की बाधा होकर पेट भर भीख भी नहीं मिलती।
उन्हें यह दण्ड मिला है। मूंछे और सिर मुंडवा कर भगवा वस्त्र लपेट कर घूमना यह विडम्बना भी स्त्री शाप के
ही कारण है। दोनों हाथों में ढेर सारी मिट्टी लेकर वे गुदा में लगाते हैं और तीनों पहर गोता लगाते हैं। ऐसा
दण्ड उन्हें स्त्रीशाप के ही कारण मिला है। चूतड में लंगोटी लगा दी, हाथ में झोली लटका दी, तिस पर हाथ में
दण्ड देकर स्त्री शाप के कारण भीख माँगने के लिए भेज दिया। स्त्री सुख जैसा कोई सुख नहीं है और स्त्री त्याग
जैसा कोई पातक नहीं है यही न समझने के कारण अनेक मूर्खों ने वैराग्यरूप से सर्वसंगपरित्याग कर स्वयं दण्ड
भुगत लिया है। स्त्री संग के सिवा अन्य कितने ही सुख क्यों न हों लेकिन वे उद्वेगरूप ही हैं। सौभाग्य से जो
भाग्यसम्पन्न हैं वही स्त्री संगति से अनेक प्रकार के सुख विलास भोगते हैं। सदासर्वदा इच्छित भोग प्राप्त होना
यही ईश्वर का प्रसाद है और उसका त्याग करना यही ईश्वर का क्षोभ है। प्रत्यक्ष दिखायी देने वाले स्त्रियादि
भोग छोड़ कर मोक्ष की बात करना ही झूठ है। वेदों के वैराग्यवाद ने बेचारे भोले-भाले लोगों का विनाश कर