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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 143, कुल 869 में से

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पृष्ठ 143

पंचम अध्याय १२७
राजोवाच
कस्मिन्काले स भगवान् किं वर्णः कीदृशो नृभिः ।
नाम्ना वा केन विधिना पूज्यते तदिहोच्यताम् ॥ १९॥
राजा ने कहा—सचमुच, जिसके स्मरण से कर्माकर्म सर नहीं उठा सकते, उस भगवान की कथा मेरे लाभ
के लिये सुनायें। वह परमात्मा श्रीहरि सृष्टि के प्रारम्भ में, .युग युगान्तर में किस नाम से, किस रूप से तथा किस
वर्ण में प्रकट होते हैं ? उसी प्रकार भक्तगण किस रूप में उसकी पूजा करते हैं ? उसी प्रकार तत्कालीन लोग उस
अधोक्षज का किस विधि से यजन करते हैं ? हे योगीराज ! यह सब आप मुझे बतायें। आपके मुख से सुने भाषण
के आगे अमृत भी फीका लगेगा। आपके भाषण से सम्पूर्ण आनन्द प्राप्त होकर जन्म-मरण की बाधा दूर हो जाती
है। उसमें भी हे स्वामी ! युगधर्म के अनुसार आचरण करने वाला नारायण, उसका गुणानुवाद तथा उसे भजन
पूजन की विधि कृपया मुझे सुनायें। राजा का यह भाषण सुनकर सभी को परम सन्तोष प्राप्त हुआ। यह हरिगुणों
का प्रश्न है यह जानकर कनिष्ट भ्राता 'करभाजन' योगी बोलने लगा।
करभाजन उवाच
कृतं त्रेता द्वापरं च कलिरित्येषु केशवः ।
नानावर्णाभिधाकारो नानेव विधिनेज्यते ॥ २० ॥
कृत, त्रेता तथा द्वापर इन युगों में भक्त नाना वर्णों से, नाना नामों से तथा नाना प्रकार के उपचारों से केशव
का यजन करते रहते हैं। 'क' कार का अर्थ है ब्रह्मदेव, 'श' कार का अर्थ है शंकर तथा 'च' कार का अर्थ है
'विष्णु'। वास्तव में निर्गुण 'केशव' इन तीनों का पूर्ण प्रकाशक है। केशव तो अर्धमात्रा है उसका व्यक्ताव्यक्त
उच्चार नहीं हो सकता। बाह्यानंतर एकत्व से वह सचमुच अव्यापक व्याप्त करता है। वही हरयुग में भिन्न-भिन्न
नामों से नाम और रूप धारण करता है। भक्तगण उस पुरुषोत्तम की नाना प्रकार की भजनविधि तथा क्रियाधर्म से
पूजा करते हैं। उनका क्रमध इस प्रकार है—
कृते शुक्लश्चर्बाहुर्जटिलो वल्कलाम्बरः ।
कृष्णाजिनोपवीताक्षान्विभ्रद्दण्डकमण्डलून् ॥ २१ ॥
कृतयुग में गौरवर्ण, जटाधारी, चतुर्भुज, वल्कल परिधान किया हुआ, हाथ में दण्डकमण्डल धारण करने
वाला, मृगचर्म, यज्ञोपवीत, हाथ में रुद्राक्ष की माला, कठोर ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला, इन लक्षणों से युक्त
मूर्तिमंत परमात्मा का कृतयुग के भक्तगण पूजन करते हैं।
मनुष्यास्तु तदा शान्ता निर्वैराः सुहृदः समाः।
यजन्ति तपसा देवं शमेन च दमेन च ॥ २२ ॥
उस काल में सभी लोग हमेशा शान्त, वैरभावरहित, सदा समदृष्टि रखने वाले तथा परस्पर सुहृद एवं
मित्रवत रहते थे। उस काल में तप करके ही देवता की उपासना करते थे। उस ताप का प्रमुख लक्षण यह था कि
शम-दम पूरी तरह साध कर स्वयं भगवद्भजन किया जाता था। हे राजा ! उस समय दस नामों से भगवान का
नामस्मरण करते थे। वे दस नाम तुम्हें बताता हूँ, सुनो।