श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
हंसः सुपर्णो वैकुण्ठो धर्मो योगेश्वरोऽमलः।
इश्वरः पुरुषोऽव्यक्तः परमात्मेति गीयते॥ २३॥
हंस, सुपर्ण, वैकुण्ठ, अव्यक्त और परमात्मा इन नामों का वे जप करते हैं। उस काल के बड़े-बड़े भक्त
इन्हीं नामों का पाठ कर उच्च स्वर में गायन करते हैं तथा इस प्रकार संसारभय का विनाश करते हैं। कृतयुग की
यह उपासना तुम्हें सविस्तार बतायी। अब त्रेतायुग का भजन और मूर्ति का ध्यान सुनाता हूँ।
त्रेतायां रक्तवर्णोऽसौ चतुर्बाहुस्त्रिमेखलः।
हिरण्यकेशस्त्रय्यात्मा स्रुक्स्रुवाद्युपलक्षणाः॥ २४॥
त्रेता युग में पुरुषोत्तम यज्ञमूर्तिस्वरूप में रहता है। उसका वर्ण अग्नि की ज्वाला की तरह रक्तवर्ण, केश
लालिमायुक्त भूरे रंग के और हाथ चार होते हैं। उस निर्मल यज्ञपुरुष को त्रिगुणों की त्रिमेखला तथा तीन वेदों के
सम्पूर्ण ऐक्य का स्वरूप होने के कारण उस मूर्ति की शोभा तद्रूप ही रहती है। हाथ में स्रुक्, स्रुवा आदि
यज्ञपात्र लिये हुए, यही उस यज्ञमूर्ति का लक्षण होता है। त्रेतायुग में भक्तगण नारायण के इसी स्वरूप का ध्यान
करते हैं।
तं तदा मनुजा देवं सर्वदेवमयं हरिः।
यजन्ति विद्यया त्रय्या धर्मिष्ठाब्रह्मवादिनः॥ २५॥
उस काल के लोग तीन वेदों से नारायण का भजन करते हैं। श्रीहरि पूर्ण रूप से सर्वदेवस्वरूप होने के
कारण त्रेता युग का भजन इस प्रकार का होता है। त्रेतायुग के समस्त लोग वेदवचनों पर परम श्रद्धा रखने वाले
तथा भजनशील और धर्म पर श्रद्धा रखने वाले धर्मनिष्ठ होते हैं। वे धार्मिक जन आठ प्रकार के नामों से प्रतिदिन
नामस्मरण करते हैं। हे राजा! वे नाम सुनो।
विष्णुर्यज्ञः पृश्निगर्भः सर्वदेव उरुक्रमः।
वृषाकपिर्जयन्तश्च उरुगाय इतीर्यते॥ २६॥
विष्णु, यज्ञ, पृश्निगर्भ (सुतपा प्रजापति की पत्नी 'पृश्नि', उसका पुत्र होने के कारण पृश्निगर्भ), सर्वदेव,
उपक्रम, वृषाकपि, जयंत, उरुगाय, इन श्रेष्ठ नामों से उसका स्मरण किया जाता है। अब द्वापरयुग में भक्तगण
भगवान का ध्यान, नामस्मरण तथा भजन किस प्रकार करते हैं उसे सुनो।
द्वापरे भगवान्छ्यामः पीतवासा निजायुधः।
श्रीवत्सादिभिरङ्गैश्च लक्षणैरुपलक्षितः॥ २७॥
द्वापर में मेघ जैसी नीलकांति, सरसों के फूल जैसी आभा, पीताम्बर परिधान किये हुए और श्रीवत्स चिह्न
से अंकित, उसी प्रकार शंख, चक्र, गदा, पद्म ये चार आयुध धारण किये हुए ऐसे लक्षणों से युक्त भगवान श्रीहरि
का सदासर्वदा ध्यान करते हैं।
तं तदा पुरुषं मर्त्या महाराजोपलक्षणम्।
यजन्ति वेदतन्त्राभ्यां परं जिज्ञासवो नृप॥ २८॥
चन्द्रमा की तरह श्वेत छत्र तथा रत्नजड़ित चामर आदि राजलक्षणों से युक्त राजोपचार अर्पित कर द्वापर