श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 145, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंपंचम अध्याय १२९
युग के लोग अत्यन्त भक्तिभाव से पूजा करते हैं। परात्पर परमात्मा को शीघ्र पाने की दृष्टि से वे उसकी वैदिक
तथा तांत्रिक इस प्रकार मिश्रपूजा करते हैं। तत्वजिज्ञासु पुरुष इस प्रकार भगवान का भजन करते हैं। जिससे
कलिमल दहन हो ऐसे उस काल में नामस्मरण कैसे होता था उसके प्रकार बताता हूँ।
नमस्ते वासुदेवाय नमः संकर्षणाय च।
प्रद्युम्नायानिरुद्धाय तुभ्यं भगवते नमः॥ २९॥
हे वासुदेव! तुम्हें साष्टांग प्रणाम करता हूँ, हे 'संकर्षण' तुम्हें नमन करता हूँ, 'प्रद्युम्न' तुम्हें प्रणाम करता
हूँ, अनिरुद्ध तुम्हें अभिवादन करता हूँ। उसी प्रकार—
नारायण ऋषये पुरुषाय महात्मने।
विश्वेश्वराय विश्वाय सर्वभूतात्मने नमः॥ ३०॥
"हे ऋषीश्वर नारायण! हे सुरेन्द्र महापुरुष! हे विश्वरूप! हे विश्वेश्वर! हे महात्मा श्रीवर! तुम्हें प्रणाम
करता हूँ। हे सर्वभूतात्मन् पुरुषोत्तम! तुम्हें नमस्कार है।" हे राजाधिराज! द्वापर युग में इन नामों से उसका नित्य
स्मरण करते हैं। इन नामों के घोष से उसे परम संतोष प्राप्त होता है और वह अकस्मात वैकुण्ठ छोड़कर उस
नाम संकीर्तन में दौड़ा चला आता है।
इति द्वापर उर्वीश स्तुवन्ति जगदीशवरम्।
नानातन्त्रविधानेन कलावपि यथा श्रृणु॥ ३१॥
द्वापर के लोग इन्हीं नामों से स्तुति स्तवन करते हैं। अब हे राजा! कलियुग के भजन तथा तंत्रयुक्त विधि के
सम्बन्ध में बताता हूँ।
कृष्णवर्णं त्विषा कृष्णं साङ्गोपाङ्गास्त्रपार्षदम्।
यज्ञैः संकीर्तनप्रायैर्यजन्ति हि सुमेधसः॥ ३२॥
कलियुग के देवता श्रीकृष्ण हैं इसलिये उस कृष्णकांति के प्रभाव का वर्णन करें। उसकी कांति इन्द्रनील
मणियों की कांति की तरह दमक रही थी। उसकी मूर्ति सभी अवयवों से परिपूर्ण थी तथा मुरली, श्रृंग आदि
उपांगों से युक्त थी। चारों भुजाएँ अत्यन्त पराक्रमी तथा उन चारों हाथों में शंख-चक्रादि सुन्दर आयुध
शोभा देते हैं। पीछे नन्द सुनंदादि सेवक सशस्त्र खड़े हैं। कलियुग के ज्ञानी इस प्रकार श्रीकृष्ण का सदैव चिन्तन
करते हैं। कलियुग के श्रीकृष्ण को रोज के कीर्तन के आगे मधुपर्कादिक विधानों से की गयी यथाविधि पूजा
गौण लगती है। हे राजाधिराज! कैसा आश्चर्य है कि श्रीकृष्ण को कीर्तन ही पूजा मालूम होती है। कृष्ण को
कीर्तन से इतना प्रेम है। इसी कारण से गरुड़ ध्वज को सदैव प्रसन्नता मालूम होती है। श्रीकृष्ण को कीर्तन प्रिय
है इसीलिए वह नारद को इतना सम्मान देता है। नारद निरन्तर श्रीकृष्ण का ही गुणगान करता है और उसके ही
नाम का घोष करता रहता है। नाम संकीर्तन करने के कारण ही उसने प्रह्लाद की संकटों से रक्षा की। कीर्तन से
श्रीकृष्ण को संतोष प्राप्त होता है और वह भक्तों के भवबन्धन तोड़ डालता है। गजेन्द्र ने नामस्मरण करते ही
उसे नारायण की प्राप्ति हुई। उसका संसार बन्धन तोड़ कर उसे स्वयं वैकुण्ठ में ले गये। नीचों में नीच, अत्यन्त
पापी वेश्या थी। एकाएक उसके मुख से रामनाम निकला। उस नामोच्चार के कारण श्रीहरि ने उसकी वैकुण्ठ में
रहने की व्यवस्था की। समस्त पापों की साक्षात मूर्ति अजामिल को भी नामस्मरण के कारण पवित्र कर दिया।