श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 148, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ें१३२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
उसके चरणों में अनन्यभाव से शरण जाकर परमभक्ति से वन्दन किया जाय। इस प्रकार उस महापुरुष के चरणों
का अभिवादन कर समस्त देवतागण उसका वन्दन करने लगे। कलियुग में लोग कीर्तन से ही परम पावन होकर
मुक्त होते हैं।
एवं युगानुरूपाभ्यां भगवान् युगवर्तिभिः।
मनुजैरिज्यते राजम् श्रेयसामीश्वरो हरिः ॥ ३५ ॥
इस प्रकार कृतयुग से कलियुग तक के लोग स्वहित के लिये श्रीहरि का इन नामों से, इन रूपों से तथा इन
अवतार लीलाओं का गायन कर भक्ति के अनुसार भजन करते हैं। उसमें भी बड़े-बड़े ऋषियों ने कलियुग की
महिमा का वर्णन किया है क्योंकि इस युग में चारों मुक्तियाँ दासी बनकर रहती हैं।
कलिं सभाजयन्त्यार्या गुणज्ञाः सारभागिनः ।
यत्रसंकीर्तनेनैव सर्वः स्वार्थोऽभिलभ्यते ॥ ३६ ॥
हे सर्वज्ञ राजा! सुनो, कलियुग धन्य है कि उसमें हरिकीर्तन तथा नामस्मरण से सारे मनोरथ पूरे हो जाते
हैं। कलियुग में पाप बहुत होते हैं इसलिये केवल कीर्तन से स्वार्थसिद्धि किस प्रकार होती है ? तो जो दोषों का
त्याग कर गुण ही ग्रहण करते हैं वे हरिकीर्तन से मुक्त होते हैं। हरिकीर्तन से चित्त शुद्ध हो जाने के कारण दोषों
का त्याग कर केवल गुण ग्रहण किया जाता है। इस प्रकार सार ग्रहण करने वाले लोग कलियुग में हरिकीर्तन से
ही परममुक्त होते हैं। कलि के गुण जानने वाले लोग, नाम से ही मोक्ष प्राप्त होता है यह ध्यान में रखकर कीर्तन
ही करते हैं और वे सचमुच ही नित्ययुक्त होते हैं। कलियुग में निरन्तर नामस्मरण करना चाहिये यही सार है। हे
राजेन्द्र! जो पुरुष नित्य नाम का घोष करते हैं, पुरुष मुक्ति प्राप्त करते ही हैं।
सम्मत श्लोक १
ध्यायन्कृते यजन्यज्ञैस्त्रेतायां द्वापरेऽर्चयन् ।
यदाप्नोति तदाप्नोति कलौ संकीर्त्य केशवम् ॥ १ ॥
सं० श्लोक—कृतयुग में शमदमादि साधन, त्रेतायुग में वेदोक्त यज्ञ तथा द्वापरयुग में आगमोक्त तंत्रविधि
से युक्त पूजन यही साधन है। इस प्रकार तीनों युग के लोगों को, परम संकट के साधनों का प्रयोग करने पर भी
मन को रत्तीभर भी शान्ति नहीं प्राप्त होती। लेकिन कली ने कीर्तन के द्वारा उन सभी साधनों को लज्जित कर
दिया। परमात्मा को कीर्तन में नाच, गाकर वश में किया जा सकता है। गाँव के बाहर जहाँ मवेशी एकत्र होते हैं,
यमुना किनारे की बालू में गोपालों के साथ हुंबरी हमाम का खेल खेलते समय तथा प्रेम के गीत सुनकर भगवान
विभोर हो जाते हैं और उनके साथ आनन्दपूर्वक नाचने लगते हैं। कृष्णा, कान्हा, गोपाल ! ऐसे लाडले किन्तु
उलटे-सीधे नामों से वे गोपाल बार-बार गर्जना करते हैं, उसे सुनकर उस घनश्याम को सुख प्राप्त होता है। उस
सुख के कारण भगवान को परमानन्द का उफान आता है। सारांश, इस प्रकार कलियुग में कीर्तन के माध्यम से
भक्तों का अनायास ही उद्धार हो जाता है। कीर्तन के आवर्तन प्रारम्भ होते ही पापों की राशियों का बडवानल
जलने लगता है और भक्तों का तत्काल उद्धार हो जाता है। हरिनाम के कारण कलि का महत्त्व बढ़ गया है।
कलियुग की यही विशेषता है कि नामसंकीर्तन के कारण चारों वर्णों की मुक्ति प्राप्त होती है। फिर स्त्रियाँ तथा
शूद्र जैसा विचार शेष नहीं रहता। वेद अत्यन्त कंजूस हो गया कि उसने केवल तीन वर्णों की ही बात सुनी, स्त्री,