श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपंचम अध्याय ११७
का झूठा अभिमान रखते हैं। उन्हें विधान की कोई जानकारी नहीं रहती और जानकार से भी वे नहीं पूछते। लोगों
के बीच प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिये अपने ही मत से कर्म करते हैं। मीठे-मीठे किन्तु झूठे शब्दों से वाचाल बनने का
प्रयत्न करते हैं तथा भोग में जरा भी सुख नहीं है ऐसा कहने वालों को अप्सरादिक भोगों के लिये लालायित
लोगों को इहलोक और परलोक का लालच दिखाते हैं। यहाँ अच्छे से अच्छे भोगों का आनन्द लिया जाये और
भविष्य में स्वर्गसुख तो रखा ही है इस आशा से बेचारे यज्ञ-याग करने के पीछे दौड़ते-फिरते हैं। कर्ता भले ही
खर्च करके डूब जाय लेकिन मुझे आचार्यत्व मिले ऐसी उनकी बुद्धि रहती है। ऐसी बुद्धि से वे यज्ञ के लिये
प्रयत्न करते हैं। अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिये अनेक प्रकार की कर्मचेष्टायें करते हैं और कर्मारम्भ का बहुत
बड़ा समारोह करने का भारी-भरकम प्रयास करते हैं। जिस प्रकार शराबी शराब को अमृत समझता है और
उसकी बात मधुर समझ कर अन्य लोग स्वाद लेने की इच्छा से मद्यपान की ओर प्रवृत्त होते हैं। लेकिन उससे
क्या होता है ? एक तो शरीर पर अपना संयम टूट जाता है और तत्काल दारिद्र्य और पिशाचातत्व का संचार होता
है। उसी प्रकार अधःपतनात्मक सुख को ही स्वर्गसुख मान लेते हैं और जो फल की आशा से लंपट हो जाते हैं वे
जान-बूझ कर उस काम की ओर प्रवृत्त होते हैं। कीड़ा दीवार फाँद तो नहीं सकता लेकिन उस पर चढ़ने का
प्रयत्न तो करता ही है और अपने आप गिर पड़ता है। उसी प्रकार स्वर्ग सुख के लिये भी पतन निश्चित है। कर्म
की आसक्ति से काम और लालच की अत्यधिक वृद्धि होती है जिससे ढोंग करना आवश्यक हो जाता है और
उस ढोंग में क्रोध भी अचानक बढ़ता है।
रजसा घोरसंकल्पाः कामुका अहिमन्यवः।
दाम्भिका मानिनः पापा विहसन्त्यच्युतप्रि यान्॥ ७॥
लेकिन इसके लिये बेचारे वे भी क्या करेंगे ? उनका शुद्ध सत्त्व ही नष्ट हुआ रहता है इसलिये वे रजोगुण
से काम की ओर आकर अत्यन्त कामासक्त हो जाते हैं। उस समय अप्सराओं के भोग की इच्छा बलवती होकर
स्वर्गसुख की प्रीति बढ़ने लगती है इसलिये यज्ञ आदि प्रारम्भ कर पुण्य बढ़ाने का प्रयास शुरू हो जाता है। तब
वे तंत्र-मंत्र, शुद्धि, द्रव्यशुद्धि अथवा यज्ञयाग का विधि भी नहीं देखते जिससे स्वर्ग प्राप्ति तो नहीं ही होती,
उलटे इस अविधि कृति से वे ठगे अवश्य जाते हैं। जिस प्रकार अंबील अथवा माँड पूरी तरह पकने के बाद
कड़ुई हो जाती है, उसी प्रकार कामी पुरुषों की इच्छा अर्थात् काम तृप्त न होने से उनके शरीर में क्रोध भड़क
उठता है। या जिस प्रकार घीकुआर पकने पर उसकी कडुवाहट बढ़ती जाती है, उसी प्रकार काम का भंग होने
पर क्रोध भड़क उठता है। क्रोध सचमुच ही कालसर्प है। वे द्वेष की फुफकारें छोड़ता रहता है। वह पूज्यता की
कुण्डली बना कर बैठता है और साधु निन्दा की हवा बहाता है। तो यही क्रोध का निवास है। इस स्थान पर तम
की पंचायत बैठती है और देश के खोटे सिक्के वहाँ बिकने के लिये आते हैं। फिर जो भी राह में मिलता है उसे
जन्म-मरण के प्रयोग की लत लगाकर खेचरी, भूचरी आदि बाह्य मुद्रा दिखाकर पापकर्म से पाप की प्रवृत्ति
बढ़ाता है। मुँह से स्वधर्म का पाठ अवश्य पढ़ता है लेकिन अधर्म की खदान खोल कर शुद्ध झूठ कर्माचरण
करता है। इससे पापाचार की फसल पक कर गगन को छूने लगती है। उस समय अच्छे और बुरे एक ही बाट
से अधर्म की तराजू में तौले जाते हैं। अभिमान को आश्रय देकर ज्ञानाभिमान बढ़ाते हैं और फिर साधुजनों की
निन्दा करते हैं, और सज्जनों का उपहास करते हैं। संसार में वे सबमें दोष ही देखना शुरू करते हैं। यदि उसमें
कोई निर्दोष दिखायी देता है तो उसका मजाक उड़ाते हैं और उस पर अनेक प्रकार के आरोप मढ़ते हैं। इस