श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपंचम अध्याय १२३
व्यवस्था की। धर्मपत्नी बनाने के लिये पाणिग्रहण करना हो तो सजातियों में ही विवाह होना चाहिये ऐसा
निश्चित किया गया है। उसमें भी स्वगोत्र में विवाह नहीं करना चाहिये और परगोत्र में भी सप्तम पंचम छोड़कर
(बाप की सात तथा माँ की पाँच पीढ़ियाँ त्याग कर) विवाह करना चाहिये। तीन वर्ण और तीन वेद छोड़कर
अर्थात् उनमें मिश्रता न उत्पन्न हो इसका ध्यान रखकर सवेद तथा सवर्ण में ही विवाह करना चाहिये ऐसा निश्चय
वेदों ने कर रखा है। जो सवेद और सवर्ण हो और जिसे अभी रजोदर्शन न हुआ हो ऐसी कन्या उसके पिता से
माँग कर ही यथाविधि विवाह करना चाहिये। धर्म, अर्थ और काम किसी अन्य स्त्री के साथ नहीं करूँगा यह
शपथ लेकर ही वेदोक्त रीति से विवाह करना पड़ता है। वधुवर द्वारा पाणिग्रहण करते समय ब्राह्मण, देवतागण
तथा अग्नि साक्षी के रूप में रहते हैं इसलिये अन्य स्त्रियों को माता के समान मानना चाहिये। वेदों ने पुरुष के
लिये स्वस्त्रीगमन ही निश्चित कर रखा है। इस प्रकार विवाह की व्यवस्था कर वेदों ने यह आज्ञा दी है कि अन्य
सभी स्त्रियों को त्याग कर केवल अपनी स्त्री के साथ ही रमण करना चाहिये। दिन में स्त्रीसंग नहीं करना
चाहिये, रात्रि में भी पहला और अन्तिम पहर छोड़ कर मध्यरात्रि में ही संभोग करना उचित है। अपनी स्त्री से
संग करना चाहिये यह निश्चित होने पर भी रातभर संग करना उचित नहीं है। केवल सन्तानोत्पत्ति के ही लिये
स्त्रीसंग करना चाहिये और वह भी उस समय जब ऋतुकाल चल रहा हो। जो पुरुष ऋतुकाल में स्वस्त्री से भोग
करते हैं वे सचमुच ब्रह्मचारी ही हैं। वेद निवृत्ति की ही संस्तुति करते हैं। उन्होंने त्याग के साथ भोग का नियमन
किया है। 'आत्मा वैपुत्रनामासि' पुत्र के रूप में हम स्वयं ही जन्म लेते हैं। इसलिये स्त्री को पुत्रोत्पत्ति होने पर
उसके साथ सहवास नहीं करना चाहिये। यह कहकर वेद धीरे-धीरे विषय का त्याग कराता है। अब मांस खाने
पर वेदों ने किस प्रकार प्रतिबन्ध लगाया जरा देखें। पशु हिंसा न हो इसलिये उन्होंने उसमें अनेक संकट और
प्रतिबन्ध पहले से ही लगा रखे हैं। जिह्वा की रुचि के लिये अथवा स्वर्ग प्राप्ति की आशा से जो कोई पशु का
वध करेंगे उन पुरुषों को नरक प्राप्त होता है। निष्काम कर्म के लिये पशु का वध किया लेकिन वह निष्काम
कहाँ हुआ ? इसलिये वेदों का यह कहना है कि सभी धर्मों में अहिंसा प्रमुख है। रोज-रोज मांसभक्षण न कर
सके इसलिये वेदों ने यज्ञ में बचा हुआ अवशेष ग्रहण करने के लिये कहा है और वह भी बिलकुल परिमित
मात्रा में कह कर वेदों ने मांसभक्षण का निषेध ही किया है। अब मद्यपान के नियंत्रण के सम्बन्ध में बताते हैं।
'सौत्रामणि' नामक यज्ञ कर फिर मद्यपान करना चाहिये ऐसी वेद की आज्ञा को जो मानता है वह स्वधर्म से च्युत
हो गया ऐसा समझना चाहिये क्योंकि जिस कर्म में मद्यपान होता है उसे यदि स्वधर्म कहा जाय तो जीभ टूट कर
गिर जायेगी। बेचारे लंपट बने हुए लोग वेदों को विषयवासना की ओर घसीटते हैं। 'सौत्रामणि' यज्ञ यदि किया
हो तो भी स्वयं मद्यपान नहीं करना चाहिये, यज्ञ में बचा हुआ मद्य केवल सूँघना चाहिये लेकिन मुँह में नहीं
डालना चाहिये। मैथुन, मांस भक्षण तथा सुरापान ये विषयों के तीन प्रकार हैं, उनका त्याग करना चाहिये यही
निश्चित अर्थ है। त्याग ही वेदों का वास्तविक उद्देश्य है। वर्णाश्रम धर्म के माध्यम से वेद विषयों से निवृत्त होने
की ही बात कहते हैं। वह कभी भी विषयासक्ति की बात नहीं करता। अपना धन खर्च कर विवाह के लिये यज्ञ
करने तथा मद्य, मांस और मैथुन की बात वेद करें यह सम्भव ही नहीं है।
धनं च धर्मैकफलं यतो वै ज्ञानं सविज्ञानमनुपशान्ति।
गृहेषु युञ्जन्ति कलेवरस्य मृत्युं न पश्यन्ति दुरन्तवीर्यम् ॥ १२ ॥
ज्ञानाभिमानी लोग भगवान की कथा न सुनने के कारण त्रस्त रहते हैं। वास्तव में वह धन से परमार्थ की