श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३० श्रीमद् एकनाथी भागवत
इस प्रकार नाम की महिमा अद्भुत है। नामस्मरण से गोविन्द के स्वरूप में लीन होने वाली द्रौपदी को संकट से
छुड़ाया। सचमुच नाम भक्तों की व्याधियों को दूर कर देता है। अंतःकरण की शुद्धि के लिए मुख्य रूप से
हरिकीर्तन ही उपाय है। चित्तशुद्धि के लिये नाम जैसा कोई अन्य साधन नहीं है। कीर्तन में हरि को कैसी रुचि
रहती है ? उसी प्रकार जैसे गाय बछड़े को या मधुमक्खी छत्ते को एक क्षण के लिये भी नहीं छोड़ती। उसी
प्रकार नामस्मरण करने वाले भक्त की श्री हरि को चाह रहती है। भक्त को यदि जरा भी दुःख होता है तो वह
स्वयं ही उसका निवारण करता है। इसलिये जिसे हरिकीर्तनसे लगन लग गयी उसे अन्य साधनों के फेर में
पड़कर संकट में पड़ने की क्या आवश्यकता है ? जिसे हरि के नामसंकीर्तन तथा हरि के गुणानुवाद सुनाने में
चौगुना आनन्द होता है उसका सारे साधन करने की तरह उद्धार होता है। इतना ही नहीं अपितु उसके कारण
सारी पृथ्वी ही पवित्र हो जाती है। यदि एक राम का ही नाम वाणी में रह जाय तो वह समस्त पापों का पर्वत
चूर कर परमानन्द का सुख प्रदान कर सकता है। प्रेमपूर्वक हरिकीर्तन करने से श्रीहरि प्रकट होता है। उससे
श्रेष्ठ साधन और कोई नहीं है। श्रीहरि को कीर्तन से बड़ा सुख प्राप्त होता है। कीर्तन निष्ठा से भगवान सन्तुष्ट
होता है। कीर्तन से और हरिनाम से भोले भाले लोग तर गये हैं। इसलिये कीर्तन से श्रेष्ठ और प्रबल कोई साधन
नहीं है। फिर किस उद्देश्य से नीच लोग उसकी निन्दा करते हैं ? इस प्रकार जो नाम कीर्तन से विन्मुख होते हैं
उन्हें स्वप्न में भी सुख नहीं प्राप्त होता है। अलबत्ता मूर्ख लोग कीर्तन का द्वेष कर अत्यन्त विपत्तियों का सामना
करते हैं। जिसके हृदय में द्वेष ने संचार किया है उसके आचार को धिःकार है। द्वेष करने वाले लोग सदासर्वदा
अत्यन्त असहनीय दुःख ही भोगते रहते हैं। कलियुग में जो बुद्धिमान पुरुष होते हैं वे हमेशा नामसंकीर्तन में ही
मग्न.रहते हैं। वे अत्यन्त आनन्द से उस नाम का ही गौरव करते हुए अत्यन्त प्रेम से उसका स्मरण करते हैं।
अनेक महान अवतार हैं लेकिन उनमें श्री रामचन्द्र और भगवान श्रीकृष्ण का ही चरित्र अत्यन्त पवित्र है। उन्हीं
के चरणों का वन्दन करना चाहिये। कहा भी है—
ध्येयं सदा परिभवघ्नमभीष्टदोहं तीर्थास्पदं शिवविरिञ्चनुतं शरण्यम् ।
भृत्यार्तिहन्प्रणतपाल भवाब्धिपोतं वन्दे महापुरुष ते चरणारविन्म् ॥ ३३ ॥
समाधि आदि ध्यान लक्षण देवी-देवताओं का ध्यान, सगुण-निर्गुण ध्येय आदि समस्त उपायों को एक
हरिचरण स्मरण ने तत्काल तृणप्राय कर दिया। इसलिये ध्यान करने के लिये वही हरिचरण श्रेष्ठ हैं। वह कल्पना
आदि के सारे कष्ट दूर कर भक्तों का अभीष्ट सारे मनोरथ सदा पूर्ण करते हैं। हे राजा! नित्य हरिचरणों का ध्यान
करने से केवल भक्त के दैहिक दुःखों का ही निवारण नहीं होता बल्कि भवरोगों का भी दुःख दूर होता है। वह
भक्तों का मनोरथ पूर्ण करता है इसका अर्थ यह नहीं है कि वे मनोरथ विषयासक्त होते हैं। हरिचरणामृत किसी
भगवद्भक्त को विषयहीन परमानन्द से तृप्त कर देता है। उन चरणों की पवित्रता का किस तरह वर्णन किया
जाय ? उसका तीर्थ साक्षात शंकर भी अपने मस्तक पर धारण करते हैं। हरि के चरण तो वास्तव में समस्त तीर्थों
की जन्मभूमि ही है। इसलिये उन चरणों के ध्यान से भक्त को भी पवित्रता प्राप्त होती है। अचानक चरण लगने
के कारण पाषाण भी पवित्र हो गये। फिर जो प्रयत्नपूर्वक उनका ध्यान करते हैं उनकी पवित्रता का कितना वर्णन
किया जाय ? जिस रावण ने सदैव शत्रुता का व्यवहार किया जो उसकी स्त्री को चुरा ले गया उसका भाई शरण
आयां तो उसे उसने निजभाव से आत्मीय बना लिया। हे राजा! उसे केवल आत्मता ही प्रदान नहीं की बल्कि उसे
सुवर्ण नगरी सौंप कर उसे वहाँ अटल रूप से स्थापित कर दिया। इसलिये हरि के चरण शरणागत के लिये शरण