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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 140, कुल 869 में से

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पृष्ठ 140

१२४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
आशा करता है लेकिन वह स्वधर्म के अनुसार धन का विनियोग नहीं करता, विषयोपभोग की ही ओर करता है।
वही धन यदि धर्म के लिये खर्च करना हो तो एक कौड़ी के लिये भी उनके प्राण छूटने लगते हैं। धन के रूप में
साक्षात धर्म ही स्वयं प्रकट होता रहता है। जिस प्रकार भाग्यवान के सहारे निधि हाथ लगती है। उसी प्रकार धन
से धर्म की प्राप्ति होती है। जहाँ बीज रहता है वहाँ वृक्ष के साथ-साथ फल भी उपस्थित रहता है। जहाँ चन्दन
रहता है वहाँ परिमल भी रहता है। उसी प्रकार जल में समस्त स्वाद उपस्थित रहते हैं। जहाँ देह है वहाँ कर्म
रहता है, जहाँ रूप है वहाँ नाम रहता है उसी प्रकार जहाँ धन है वहाँ अच्छे से अच्छे धर्म निवास करते हैं।
एकादशीव्रत के बहाने गीत नृत्य करते जागरण करने से सन्तुष्ट होने वाले देवता द्रव्य के ही कारण भक्तों को
प्राप्त होता है। इस प्रकार धन के साथ-साथ परम धर्म भी पल्ले पड़ता है और जहाँ धर्म हो वहाँ ज्ञानसहित
विज्ञान प्राप्त होता है। चन्द्रमा के कारण ही कलाएँ बढ़ती हैं, जीवन के कारण वात्सल्य बढ़ता है उसी प्रकार
धर्मशील मनुष्य के घर में धन के कारण धर्म का अनुष्ठान दिखायी देता है। जहाँ धर्म रहता है वहाँ शुद्ध ज्ञान
उपस्थित रहता है, ज्ञान जहाँ रहता है वहाँ विज्ञान का निवास रहता है और जहाँ विज्ञान रहता है वहाँ शान्ति और
समाधान का निवास रहता है। इतना फल जिस धन से प्राप्त होता है उसे मूर्ख लोग भोग विलास में उड़ा देते हैं।
देह के आकर्षण से लोग पागल हो जाते हैं और अपनी मृत्यु को भी भूल जाते हैं। वेदों के अनुसार जलते घर में
देह रखने वाला तथा मरने वाले देह को शृंगार करने वाला डूब जाता है, लेकिन वेद की यह बात कोई नहीं
सुनता। जन्म लेते ही काल देह को ग्रसित करता रहता है। पता नहीं देह के आकर्षण में लीन होकर लोग नित्य
आने वाली मृत्यु को कैसे भूल जाते हैं ? सबकी आँखों के सामने काल बाल्यावस्था को ग्रस लेता है और फिर
युवावस्था की गर्दन मरोड़ कर उसे भी निगल लेता है। यौवन को निगलने के बाद वह थर-थर कँपाने वाला
वार्धक्य दे देता है। काल का यह कार्य-कौशल ब्रह्मदेवादि देवताओं के लिये भी दुर्धर है। उसकी एक चपेट में
जहाँ अमर देवताओं को भी मृत्यु आ जाती है वहाँ मूर्ख लोग निश्चयपूर्वक अपने जीवन को अक्षय मान लेते हैं।
जब देह ही शाश्वत नहीं है तो उसके भोग किस तरह शाश्वत हो सकते हैं ? लेकिन विषय के लिये लोग धन
खर्च कर भ्रांत हो गये हैं। इस प्रकार सांसारिक भोग नाशवान हैं इसलिये उनका भोग करने के लिये स्वर्ग में जाने
की इच्छा से वे यज्ञ करने लगते हैं। सुख प्राप्त करने के लिये जिस प्रकार पतंगा आग में कूद पड़ता है उसी
प्रकार ये लोग इस लोक और परलोक के भोग की आसक्ति से अधःपतन की ओर अग्रसर होते हैं। "स्त्री, मांस
और मद्यपान ये भोज जब वेदोक्त हैं तो उनके कारण पतन कैसा ?" यह कहने वाले मूर्खों को वेद का विधान ही
समझ में नहीं आता।
यद् घ्राणभक्षो विहितः सुरायास्तथा पशोरालभनं न हिंसा।
एवं व्यवायः प्रजया न रत्या इमं विशुद्धं न विदुः स्वधर्मम्॥ १३॥
वेदविहित कर्माचरण करने से उससे पतन कभी नहीं होगा लेकिन यदि वेद विधान में कोई त्रुटि हो जाय
तो बड़ा ज्ञानी होने पर भी उसका पतन होता है। वेदों का अर्थवाद (स्तुतिवाद) सुनकर मन में सुखविलास की
आशा करते हैं और भोग की आशा से यज्ञ के बहाने पशु हिंसा के लिये तत्पर हो उठते हैं। वेदों ने जिस
'आलभन' कहा है उसे ये लोग 'पशुहनन' कहते हैं। यह सकाम लोगों का ही विधान है। निष्काम लोग कभी
भी पशुहिंसा नहीं करेंगे। निष्काम स्वधर्म के लिये यज्ञायाग करते हैं उसमें पशु का केवल आलभन करना होता
है, वध कभी नहीं किया जाता। पशु का वध नहीं किया जाता केवल देवता के प्रीत्यर्थ उसका स्पर्श करना