श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२० श्रीमद् एकनाथी भागवत
कौन ? और कहीं सौभाग्य से सुवर्ण, मोती, रत्न आदि मूल्यवान चीजें भण्डारगृह में आ जाएँ और घर के परिसर
में हाथी, घोड़े, पालकी आदि आ जाएँ तो फिर और क्या चाहिये ? वह घमण्ड के कारण इन्द्र के मस्तक पर
लात मारने के लिए भी तैयार हो जाता है। "यज्ञयाग में स्वाहाकार प्राप्त करने के लिए इन्द्र मुझ से आशा करता
है तो फिर उसे मुझसे श्रेष्ठ क्यों समझा जाय ? इसके उपरान्त शिष्य, सगे-सम्बन्धी, सज्जन एवं सेवकजन उसके
चारों तरफ इकट्ठा हो जाएँ तो फिर त्रिभुवन में मुझ जैसा कोई समर्थ नहीं है ऐसा ही वह समझने लगता है।
काँटों से भरे पेड़ के चारों ओर जिस प्रकार हरियाली लिपटी रहती है उसी प्रकार अपने चारों ओर शिष्यों का
जमावड़ा देखकर घमण्ड में वह ध्रुवमण्डल को भी अपने पैरों तले ही समझता है। बिच्छू में विष कम रहता है
लेकिन उसका दर्द भयंकर रहता है उसी प्रकार इसके पास विद्या कम लेकिन घमण्ड मानों बहता रहता है।
जुगनू जिस प्रकार अँधेरे में अपने तेज की चमक दिखाता है, उसी प्रकार वह अज्ञानी लोगों में अपनी सर्वज्ञता
तथा प्रतिष्ठा प्रदर्शित करने लगता है। पर निकली हुई चिउंटी जिस प्रकार गरुड़ के मस्तक पर पैर धरने का
प्रयास करती है उसी प्रकार यह अल्पज्ञ अपनी अल्प विद्या के घमण्ड में बृहस्पति की भी परवाह नहीं करता।
ताँबे के पैसे का एक सिक्का दान में देकर वह उदारता में बली को भी अपने से कम मानता है। वह कहता
है—दानियों में कर्ण को महान समझा जाता है लेकिन हमारे सामने वह नहीं टिक सकता। कर्ण को हर रोज
८०००० तोला सुवर्ण दान के लिये मिलता था, उसकी और हमारी बराबरी कैसी ? जिसके हाथ से हमेशा
अपकार ही होता है उसके हाथ से कभी-कभी उपकार भी हो जाता है लेकिन इतनी सी बात से उसे
गलतफहमी हो जाती है और वह अपना सारा संचित पुण्य खो बैठता है। इस प्रकार जरा से दान से दातृत्व की
शेखी बघारते हुए अपने ही मुँह से मेघ की तरह गर्जना करने लगता है। अपने सौन्दर्य के अभिमान में वह
साक्षात मदन का भी उपहास करने लगता है। सौन्दर्य केवल मुझ में ही है और मेरी बराबरी करने वाला कोई
दूसरा नहीं है ऐसी भाषा वह बोलने लगता है। कौआ अपने सौन्दर्य के आगे राजहंस को भी हेय समझता है
अथवा कछुई अपने को सीता से भी सुन्दर समझती है या जिस प्रकार सामने हरा भरा जंगल देखकर भैंसा
उन्मत्त हो जाता है उसी प्रकार अपने सौन्दर्य के गर्व से वह फूल जाता है और इसके बाद यदि उसके हाथों कोई
पराक्रम हो जाय तो फिर क्या पूछना ? कहता है मेरे सामने श्रीराम, परशुराम और बलराम क्या हैं ? मानों गोग्रहण
के युद्ध में उत्तराने किये हुए पराक्रम का वर्णन हो रहा हो। या फिर जिस प्रकार शारीरिक बल के उन्माद से
जंगली सुअर किसी को कुछ नहीं समझता उसी प्रकार वह शरीर सामर्थ्य की घमण्ड में मदमाता रहता है। ऐसे
लोग प्रारम्भ से ही अपने को ज्ञानी समझते हैं, और अब 'याज्ञिक' कहला कर प्रसिद्ध होते हैं। इसलिए स्वयं
यज्ञकर्म कर लोगों को विस्मित कर देते हैं। मिलने के लिये आने वाले लोगों के सामने अपने कार्यों की बड़ाई
करते हैं तथा अपनी कीर्ति बढ़ाने के लिये अनेक उपाय कर लोगों को बताते हैं। उसके ऐसे मिथ्या कर्माचार में
भी ज्ञातृत्व का अभिमान भरा रहता है। जिस प्रकार उल्लू अँधेरे में बाहर निकलता है उसी प्रकार ये अज्ञजनों के
बीच आत्मस्तुति से विचरते रहते हैं। बकरी की लेंडी जलने पर प्रकाश नहीं देती लेकिन धुआँ फैलाती है, उसी
प्रकार अनेक प्रकार के दंभ तथा गर्व के उन्माद से उनकी सद्बुद्धि अन्धी होकर वह केवल साधुओं की ही नहीं
बल्कि ईश्वर की भी निन्दा करता फिरता है। जिस प्रकार पीलिया होने पर सब कुछ पीला ही दिखायी पड़ने
लगता है उसी प्रकार निन्दावृत्ति तथा घमण्ड के अतिरेक से उसकी बुद्धि की प्रखरता मन्द होने लगती है। वे
निर्दोषी को भी दोष लगाने लगते हैं और निष्पाप को भी पापी समझने लगते हैं। वे कहते हैं—जो समस्त
योगियों का मुकुटमणि है, जिसे धूर्जटी अर्थात् शंकर कहते हैं, उसका व्यवहार देखने पर वह नितांत मलिन