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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 147, कुल 869 में से

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पृष्ठ 147

पंचम अध्याय १३१
जाने योग्य ही हैं। भगवद्भक्तों के लिये उसके जैसा निर्भय स्थान नहीं है। भक्त को जरा भी दुःख हो जाय तो
वह भगवान को सहन नहीं होता। प्रह्लाद के असहनीय दुःख का उसने स्वयं ही निवारण किया। दावाग्नि को
उदर में रखकर वन में गोपालों की रक्षा की। पाण्डव जब लाक्षागृह में जल रहे थे उस समय उन्हें वहाँ से बाहर
निकाला। जो अपने सर्वांग से निरन्तर भक्तों की पीड़ा दूर करता रहता है, जो भक्तों के प्रेम के कारण रणभूमि में
उनके रथ को हाँकता है ऐसे उस भगवान के चरणों को प्रणाम करने से वह अपने भक्तों को गोद में बिठाकर
उनकी सेवा करता है। शरणागत की रक्षा करने वाला दयाशील संसार में अन्य कोई नहीं है। प्रचण्ड संसारसागर
को पार करने के लिये हरिचरणों की ही अटल नौका है। जो भी शरण आता है उन सबको वह चरणकृपा से पार
लगा देता है। शरणागत-को आश्रय देने वाले उस महापुरुष के चरणों का सनकादिक भी स्वयं ध्यान और
अभिनन्दन करते हैं। ऐसे उन चरणों की अगाध महिमा का वर्णन करते समय वेद भी मौन हो गये, ब्रह्मदेव और
शंकर भी स्तवन करते-करते मौन हो गये। उस श्रीकृष्ण के चरण अतर्क्य तथा अगम्य हैं। यह जानकर ब्रह्मदेव
और ईशान अर्थात् शंकर आदि साष्टांग दण्डवत कर उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगे।
त्यक्त्वा सुदुस्त्यजसुरेप्सितराज्यलक्ष्मीं धर्मिष्ठ आर्यवचसा यदगादरण्यम्।
मायामृगं दयितयेप्सितमन्वधावद्वन्दे महापुरुष ते चरणारविन्म्॥ ३४॥
जिस राजवैभव के लिये देवता भी लार टपकायें ऐसे राज्य को श्रीरामचन्द्र ने पिता के वचन के कारण
त्याग दिया। श्रीराम वास्तव में सच्चा धर्मनिष्ठ तथा पिता के वचनों का पालन करने वाला था इसलिये इतना बड़ा
राज्य छोड़ कर वनवास पर चल पड़ा। वनवास में पैदल जाते हुए भी प्रिय सीता को साथ में लिया इसलिये उसे
स्त्रीलंपट नहीं समझना चाहिये क्योंकि सीता केवल स्त्री नहीं अपितु भगवान की असीम भक्त थी। इसलिये सारे
राजभोग छोड़कर केवल श्रीराम की सेवा के स्वार्थ से उसने श्रीराम के साथ वनवास स्वीकार किया। राजा
रामचन्द्र ने अपनी सेवा का कार्य समस्त सेवकों में उनके अधिकार के अनुसार बाँट दिया था, वे सारे कार्य वन
में मैं अकेले करूँगी ऐसा हेतु मन में रखकर सेवा भी होगी और इसी प्रकार मैं कृतार्थ हो जाऊँगी इसी उद्देश्य से
वह सचमुच पैदल चलकर वनवास में गयी थी। श्रीराम के सुख का वर्णन किन शब्दों में किया जाय ? पैदल
चलते समय उसे दुःख का भान भी नहीं हुआ। प्यारे मैके को भी वह भूल गयी। सेवा में उसे अत्यधिक आनन्द
आ रहा था। मन में परिपूर्ण भक्ति के कारण ही वह वन में सेवाभाव से आयी हुई थी। भक्त की वह भक्ति केवल
रामचन्द्रजी ही जानते थे, अन्य देवतागण या दानव उसे नहीं जान सकते। निजभक्तों का मनोरथ रघुनाथ ही जानें
उसी प्रकार उसकी सेवा का स्वार्थ उसके भक्त ही जानें। भगवद्भजन का सुख केवल भाविक भक्त ही जानते हैं।
रघुनाथ ने जान लिया था कि सीता पूर्णरूप से भाविक भक्त है इसीलिये वे उसके कहने से मृग के पीछे भागे।
उस मायावी मृग के मिथ्या सुनहलेपन के बारे में वे जानते थे किन्तु भक्त का हठ पूरा करने के लिये वे मृग के
पीछे दौड़ गये। बालक का हठ पूरा करने के लिये जिस प्रकार माँ तत्पर रहती है उसी प्रकार अपने भक्त के
कहने से राम भी उस मायावी मृग के पीछे दौड़ गये। वानर की बातें सुनकर भी जिस रामचन्द्र के मन
में कभी कोई विकल्प नहीं आया वे सीता के कहने से मृग के पीछे दौड़ गये इसमें आश्चर्य की क्या बात है ?
भक्त की बात को फिर वह कैसी भी हो, रामचन्द्रजी झूठ नहीं समझते थे इसलिये वे स्वयं दौड़कर मृग के
पीछे-पीछे गये। जो अपने भक्त के कहने से तत्काल मृग के पीछे दौड़ कर गया, उसके पैरों की धूल
शंकरादि देवतागण अपने मस्तक पर लगाते हैं। मृग के पीछे दौड़ते समय उसने पाषाण को भी पवित्र कर दिया।