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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

१०४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
इत्थं ब्रुवत्यभयदे नरदेव देवाः सव्रीडनम्रशिरसः सघृणं तमूचुः ।
नैतद् विभो त्वयि परेऽविकृते विचित्रं स्वारामधीरनिकरानतपादपद्मे ॥ ९ ॥
इस प्रकार अभय देते हुए नारायण ने अपने मुख से कहा, इससे काम, क्रोध, वसंत और अप्सरा आदि
लोगों ने लज्जा से गर्दन झुका ली। नारायण की निर्विकार पूर्ण क्षमा देखकर वसंतादिक लोगों ने समझ लिया कि
यह कोई ऋषि नहीं अपितु साक्षात परमात्मा है और वे स्वयं उसकी महिमा का वर्णन करने लगे। हे महाराज
चक्रवर्ति ! सार्वभौम विदेह ! सुनो। कामादि मण्डली अत्यन्त भक्तिभाव से नारायण की स्तुति करने लगी। जो
सर्वकाल लोगों को छलते थे, उन्होंने जब नारायण की परिपूर्ण शान्ति देखी तो वे उस शान्ति की स्तुति करने लगे
जिससे नारायण को संतोष प्राप्त हो, उसके मन में पूर्ण कृपा उत्पन्न हो, इस प्रकार वे परमार्थ बुद्धि से उनका
स्तवन करने लगे। उन्होंने कहा, "देवाधिदेव ! तुम्हारी जय हो। तुझ जैसी कामक्रोधरहित निर्विकार स्थिति
देवताओं में या मानवों में नहीं दिखायी देती। मेरे काम के वश में ब्रह्मदेव भी कन्या को पकड़ने के लिये गया
और पराशर ने क्या किया ? उन्होंने दिन में ही दुर्गंधा का उपभोग किया। योगी जिनका शिरसा वन्दन करते हैं, जो
तपस्वियों में शिखर पर है वह शंकर भी मोहिनी के पीछे आसक्त हुआ उस समय उसका लंगोटी में वीर्यस्खलन
हुआ। '' विषयग्लानि से विष्णु भी वृंदा के श्मशान में धरना देकर बैठा था। अहिल्या की कथा तो वेदों और
पुराणों में भी प्रसिद्ध है। नारद ने मेरी नहीं सुनी लेकिन उसे भी साठ पुत्र हुए। मेरा प्रहार सह सके ऐसा समर्थ
पुरुष संसार में कोई नहीं है। ब्रह्मचारियों का राजा मारुति अपने ब्रह्मचर्य का बड़ा अभिमान करता था लेकिन
उससे बिना संग किये मैंने मकरध्वज को जन्म दिया। चन्द्र को मैंने कलंकयुक्त किया, इन्द्र के शरीर में छिद्र
किये और शंकर के लाडले पुत्र कार्तिक स्वामी को गुफा में बन्द कर दिया। मेरे मदन का प्रहार देवदानवों को
भी सहन नहीं होता फिर मानव उसे कैसे सहन कर पायेंगे ? शंकर ने मुझे जलाया लेकिन मैंने उसे पागल कर
दिया। लेकिन तुम्हारे जैसा आश्चर्यकारी धैर्य त्रिभुवन में कहीं भी देखने को नहीं मिलेगा। तुमने मुझ जैसे
प्रभावशाली मदन को पराजित किया। शान्ति के कल्याण का उदय हुआ। इतना यश तुम अकेले ने सम्पादित
किया। अपनी शान्ति से हमारे स्वभाव को जीत लिया। मुझ काम को जीत कर क्रोध का भी घमण्ड चूर कर
दिया। वासना की मस्ती भी हमेशा के लिये क्षीण कर दी। हे नारायण ! कितने ही बड़े तपस्वी क्यों न आयें
लेकिन उनसे तुम्हारी यह निष्ठा अर्थात् आत्मस्थिति की बराबरी नहीं की जायेगी। अपने स्वानुभव को
सार्वजनिक कर तुमने शान्ति का साम्राज्य स्थापित कर दिया। पहले भी अनेक तपस्वियों के कामक्रोध को जीतने
का वर्णन आता है। लेकिन उन्हें भी हमने पूरी तरह छला, उसे अब सबके सामने बताता हूँ। कपिल जैसी महान
तेजोराशि उसे भी क्रोध ने छला, सगर को शाप देते समय वह भी क्रोध के वश में आ गया। नारद को भी क्रोध
आया और उसने नलकूवर को वृक्ष बनाकर छोड़ा। गौतम ने तो क्रोध में अहिल्या को वनवासी शिला बनाकर
छोड़ा। जो सदा लोगों के विघ्न दूर करता है उस विघ्नेश को भी क्रोध ने छला तब क्रोध में आकर उसने चन्द्रमा
को तत्काल शाप दिया। दुर्वासा को भी क्रोध आया और उसने अंबरीष को शाप दिया और भगवान को गर्भवास
दिलाया। इस प्रकार क्रोध ने अनेक ऋषियों को छला। जो प्रतिसृष्टि निर्माण कर सकते हैं वे भी कामक्रोध के
चक्कर में फँस जाते हैं। इन्द्र की सम्पत्ति समुद्र में गिर गयी यह क्रोध कथा पुराणों में प्रसिद्ध ही है। औरों की
बात क्या की जाय ? क्रोध ने शंकर को भी छला। उसने यज्ञदीक्षा लेकर बैठे हुए दक्षद्विज का वीरभद्र से शिरच्छेद
कराया। मैं काम जहाँ रहता हूँ वहाँ क्रोध भी धीरे-धीरे आ ही जाता है। लेकिन हे नारायण ! आपने तो काम और
क्रोध का मानों अस्तित्व ही नष्ट कर दिया। तुम्हारा यह सामर्थ्य आश्चर्यजनक है। इतना धैर्य औरों में नहीं है।

चतुर्थ अध्याय १०५
इसीलिये बड़े-बड़े ऋषि भी तुम्हारे चरणों की सेवा करते हैं। हे देवाधिदेव ! शान्ति की इच्छा से जो तुम्हारी नित्य
सेवा करते हैं वे तुम्हारे नामस्मरण से ही कामक्रोध आदि के स्वभाव को सहज ही जीत लेते हैं। जहाँ सम्मान के
साथ काम अर्थात् इच्छा पूर्ण होती है वहाँ आदरपूर्वक अनुग्रह किया जाता है लेकिन जहाँ सम्मानपूर्वक काम तृप्त
नहीं हो पाता वहाँ क्रोध लाल होकर शाप देता है। इस प्रकार शापानुग्रह करने में समर्थ पुरुष सदा कामक्रोधयुक्त
रहते हैं लेकिन तुमने अपनी महानता के अनुकूल ही कार्य किया यह कौतुक की बात है। अपनी शान्ति और
स्वरूपनिष्ठा से कामक्रोध को अंकित कर दिया। फिर इतना सब कुछ करने पर भी गर्व न होने का अहंकार भी
नहीं ! छल करनेवालों को हलका साबित करने अथवा उनकी उपेक्षा करने का भी तुम्हारा विचार नहीं दिखायी
देता। लोग पृथ्वी को गोड कर उसे दुःखी करते हैं लेकिन वह अन्न पैदा कर उन्हें सुखी करती है। इस प्रकार
अपकार करने वाले पर जो उपकार करता है वह मोक्ष के सिर पर का मुकुट है। हे कृपामूर्ति ! तुझ में निर्विकार
शान्ति का होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। तुम्हारे स्वरूप की सच्ची स्थिति हमें निश्चित रूप से आज ही
मालूम हुई। तुम निर्गुण, निरुपम, मायातीत, पूर्णब्रह्म हो। सहज ही यदि कोई तुम्हारा नामस्मरण करे तो सकाम
को भी काम स्पर्श नहीं कर सकता। जो सर्वकाल तुम्हारा नामस्मरण करता है, उसे मैं काम ही निष्काम कर देता
हूँ और क्रोध ही क्रोध का शमन करता है और जो मोह है वही परमबोध होकर रहता है। जो निजशान्ति के योग
से धीर वीर होकर परमानन्द में ही निरन्तर तृप्त रहते हैं ऐसे मुक्तजनों की असंख्य पंक्तियाँ तुम्हारे चरण छूती हैं।
तुम्हें नमस्कार करने के लिये महासिद्धों का समुदाय आगे बढ़ता है लेकिन उन्हें मौका नहीं मिल पाता। आप ऐसे
परात्पर गुरु महात्मा हैं। तुम्हारे सेवकों के निकट यदि विघ्न जाने का प्रयास करता है तो वह दीन हीन हो जाता
है। तुम्हारे सामने वह किस बल बूते पर आयेगा ?
त्वां सेवतां सुरकृता बहवोऽन्तरायाः स्वौको विसृज्य परं व्रजतां पदं ते।
नान्यस्य बर्हिषि बलीन् ददतः स्वभागान् धत्ते पदं त्वमविता यदि विघ्नमूर्ध्नि ॥ १० ॥
हे नारायण ! तपस्वी लोगों के लिये विघ्न उत्पन्न करना, उन्हें कष्ट देना तथा उनके तप में बाधा डालना यह
हमारा स्वभाव ही है इसमें कोई आश्चर्य नहीं है। लेकिन जो हृदय के काम को छिपा कर, बाहर से जप-तप तथा
भक्ति का ढोंग करने वाले महाठग होते हैं उन पर ही विघ्न का प्रभाव पड़ता है। हमारी विघ्न उत्पन्न करने की
शक्ति तुम्हारे सच्चे भक्तों के आगे काम नहीं करती। भक्ताभिमानी भक्तों के रक्षक होने के कारण, वहाँ विघ्नों की
गति उलटी हो जाती है। मेरे भक्तों के लिये विघ्न किस बात के ? तो देवाधिदेव उसका भी अभिप्राय तुम्हें बताता
हूँ, सुनो ! आत्मपद प्राप्ति की आकांक्षा मन में होने के कारण जो स्वर्गसुख को ठोकर मार कर निरन्तर
निष्कामबुद्धि से तुम्हारा भजन करते हैं उनके देवता अनेक प्रकार के विघ्न उत्पन्न करते हैं। 'हमारा उल्लंघन कर
ये अटल पद तक पहुँचते हैं' यह कहकर देवेन्द्रादिक उनके लिये अनेक विघ्न उत्पन्न करते हैं। हमें हविर्भाग
दिये बिना ये पूर्ण पद तक पहुँचना चाहते हैं इस क्रोध से इन्द्रादि देव उनके लिये अनेक प्रकार के विघ्न खड़ा
कर देते हैं। उनके भजनों में बाधा पहुँचाने के लिये विघ्न तत्काल पहुँच जाते हैं। लेकिन उन विघ्नों से उनका
कुछ नहीं बिगड़ता क्योंकि तुम हृषीकेश उनकी सुरक्षा के लिये तत्पर रहते हो। सकाम कल्पना छोड़कर जो
तुम्हारे चरणों में रममाण होते हैं, उनकी तुम नारायण ! आठों पहर सुरक्षा करते रहते हो। विघ्नों से घबराकर 'हे
भगवान् ! दौड़ो, दौड़ो कहते हैं और तुम उनकी पुकार पुकार सुनकर दौड़ जाते हो। नारायण ! तुम कभी निष्ठुर
नहीं होते हो। भक्तों के निकट विघ्न पहुँचे इससे पहले ही तुम उनकी चारों ओर से सुरक्षा के लिए तत्पर रहते
हो। विघ्न कुपित होकर छलने के लिये दौड़ता है तभी उस विघ्न में ही तुम्हारा रूप प्रगट होता है। इसलिये

भक्तों को विघ्न कोई बाधा नहीं पहुँचा सकते। काम हरिभक्तों को छलने जाता है तो काम के हृदय में भी श्रीहरि
का ही वास्तव्य उन्हें दिखायी देता है और जो विघ्न रहता है वही उनके लिये निर्विघ्न हो जाता है। सारांश भक्तों
को स्वप्न में भी विघ्न का भय नहीं रहता। विघ्न विरोध उत्पन्न करता है लेकिन विघ्न के भीतर बाहर श्रीहरि ही
होने के कारण जो विरोध है वही निजभक्तों के लिये महाबोध तथा स्वानन्द का कन्द होता है। जिन्हें तुम्हारे
चरणों पर श्रद्धा होती है उनके लिये विघ्न में से ही परमार्थ प्रगट होता है। इस प्रकार भावबल के साथ सर्वसमर्थ
तुम अपने भक्तों के लिये निरन्तर सहायक बनते हो। इस प्रकार भक्त सभी विघ्नों को पराजित कर इन्द्रपद के
पाथे पर पैर रख, तुम्हारी कृपा से परमार्थ पद तक पहुँचते हैं। भगवान जिसकी सुरक्षा के लिये तत्पर रहते हैं,
उसे छलने के लिये भी जब विघ्न दौड़ पड़ते हैं तो फिर गरीब सकाम लोगों की क्या कथा है? तो हे राजा
जनक ! उनकी भी कथा सुनाता हूँ। मन में विषय कामना रखकर जो इन्द्रादि देवों को बलिदान देने के लिये यज्ञ
आदि के चक्कर में पड़ते हैं उन्हें भगवान कोई विघ्न नहीं पहुँचाते। इन्द्र याज्ञिकों का राजा है और सकाम यज्ञ
करने वाले ये देवताओं की प्रजा है। वे उन्हें उत्तमोत्तम यज्ञभाग अर्पण करते हैं। वह बलिपूजा मिलते ही वे उन्हें
विघ्न नहीं करते। लेकिन काम आदि उन्हें कष्ट नहीं देते क्योंकि वे निष्काम को कभी स्पर्श नहीं करते। वे सहज
ही काम के वश में रहते हैं क्योंकि वे सदा सकाम कर्मों को ही करते हैं। अब जो मुझ काम के वश में होते हैं वे
अपना तप खर्च कर भोग भोगते हैं, लेकिन जो क्रोध के चक्कर में फँसते हैं वे व्यर्थ ही तप से हाथ धो बैठते हैं।
क्षुत्तृट्त्रि कालगुणमारूतजैह्वशैस्यानसमानपारजलधीनतितीर्य केचिंत।
क्रोधस्य यान्ति विफलस्य वशं पदे गोर्मजन्ति दुश्चरतपश्च वृथोत्सृजन्ति॥ ११॥
प्राणायाम से प्राणापान की गति का निरोध कर, निजप्राण को वश में कर वायु, वर्षा, जाड़ा, धूप आदि
सहन कर जो अनुष्ठान में व्यस्त रहते हैं, क्षुधा और तृष्णा का संयमन कर जिह्वा और शिश्न पर नियंत्रण कर मुझ
काम को जीत लिया यह मानकर अहंकार से उन्मत्त होते हैं। वे क्षुद्र अपमान से क्रुद्ध होकर क्रोध के अधीन
होकर शाप देते हैं और अपनी निष्ठा और तपसम्पत्ति व्यर्थ ही खो देते हैं। सकाम अनुष्ठान कर मुझ काम की
संगति से पुष्पमाला, चन्दन (इत्र आदि) तथा स्वर्ग की अप्सराओं के भोग भोग कर अमृत का भी प्राशन करते
हैं। लेकिन ऐसे भोग देने वाले मुझ काम की उपेक्षा कर जो क्रोध के वश में हो जाते हैं वे एकाध प्रखर शाप
देकर अपने सारे तप पर पानी फेरते हैं। विराट समुद्र तैर कर पार करने वाला कोई जैसे गाय के पैरों में एकत्र
पानी में डूब जाय उसी प्रकार मुझ काम को जो जीत लेते हैं वे भी अपने क्रोध के कारण दुःख भोगते हैं। मुझ
काम की अतृप्ति में जो स्थिति है वही क्रोध के लिये सुदृढ़ स्थिति है। लेकिन काम, क्रोध ये अभक्तों का छल
करते हैं, हरिभक्तों के आगे उनकी कुछ नहीं चलती। तुम्हारे भक्तों को भी जब काम क्रोध का बन्धन नहीं बाँध
सकता तो फिर तुम भक्तपति नारायण को हमारे काम की कैसे बाधा हो सकती है? तुम्हारी महिमा न मालूम होने
के कारण हम अपना धर्म चलाने के लिये यहाँ आये। लेकिन हे कृपालु पुरुषोत्तम ! तुम्हारे पास तो सर्वदा क्षमा ही
वास कर रही है।
इति प्रगृणतां तेषा स्त्रियोऽत्यद्भूतदर्शनाः।
दर्शयामास शुश्रूशां स्वर्चिताः कुर्वतीर्विभुः॥ १२॥
अपकारी पर उपकार करना इसी को 'निर्विकार शान्ति' कहते हैं। उसी शान्ति की पूर्णावस्था विघ्नकर्ता को
हरी ने (नारायण ने) दिखला दी। कामादिकों ने अपनी स्थिति निवेदन कर अनेक प्रकार से नारायण की स्तुति

चतुर्थ अध्याय १०७
की। इतने में उन्हें वहाँ एक अद्भुत चमत्कार दिखायी दिया। चमत्कार यह कि वहाँ अनेक उत्पन्न से उत्तम
स्त्रियाँ उत्पन्न हो गयीं। रूप, वैभव, अलंकार इत्यादि में वे लक्ष्मी से भी सुन्दर दिखायी दे रही थीं। ऐसी वे
स्त्रियाँ सेवा और आदरभाव में अत्यन्त तत्पर दिखायी दे रही थीं। नारायण की यह लीला भी कितनी विचित्र थी।
उसने कितना बड़ा चमत्कार दिखला दिया। उन स्त्रियों को देखते ही आगत स्वर्ग की अप्सरायें जैसे सूर्य के
सामने जुगनू निस्तेज दिखायी देते हैं वैसी निस्तेज दिखायी देने लगीं।
ते देवानुचरोदृष्ट्वा स्त्रियः श्रीरिव रूपिणीः।
गन्धेन मुमुहुस्तासां रूपौदार्यहतश्रियः ॥ १३ ॥
इन (नारायण निर्मित) स्त्रियों को देखते ही मदन मूर्च्छित होकर गिर पड़ा। वसन्त के मुँह में पानी आ गया
और क्रोध तो आँखें फाड़ कर बस देखने लग गया। भ्रमर गुंजार करना भूल गये, कोकिलायें जैसे पंचम स्वर ही
भूल गयीं प्राणवायु का संचार रूक गया इस प्रकार देवताओं के वे सेवक पागल जैसे हो गये। उन स्त्रियों का
स्वरूप देखकर अप्सरायें किसी दासी की तरह दिखायी देने लगीं। वे लज्जित हो उठीं। उन स्त्रियों के शरीर से
निकलने वाले परिमल से वसन्त तो बौरा गया। उसी प्रकार उनके शरीर की सुगन्धित वायु शरीर में लगते ही
मलयानल संभ्रम में पड़ गया। नारायण की इस विधा का क्या वर्णन किया जाय ? जो उसे सम्मोहित करने आये
थे वही उसके मोहजाल में फँस गये। सौन्दर्य में रंभा और तिलोत्तमा प्रमुख हैं लेकिन समुद्र मंथन के समय
उत्पन्न हुई लक्ष्मी ने अपने सौन्दर्य से उन दोनों पर विजय प्राप्त की। उस लक्ष्मी की अपेक्षा आज नारायण ने
उत्पन्न की हुई स्त्रियाँ अधिक सुन्दर थीं।
तानाह देवदेवेशः प्रणतान् प्रहसन्निव।
आसामेकतमां वृङ्ग्ध्वं सवर्णां स्वर्गभूषणाम्॥ १४॥
यह आश्चर्य देखकर काम आदि सारे मूर्च्छित होकर गिर पड़े। (वे होश में आते ही) नारायण ने हँस कर
कहा, हम आपकी पूजा करें, आपका सत्कार करें तथा आपको कोई भेंट दें यह उचित ही है। इसलिये इन्द्र को
सन्तोष हो इसलिये इनमें से कोई एक दासी आप स्वीकार करें। यदि इनका सौन्दर्य अधिक हो तो जो इनमें से
आपके लायक हो उसे ही आप स्वीकार करें। शायद आप यह कहें कि इनमें से कोई भी स्त्री कम सुन्दर नहीं है,
सभी सौन्दर्य से परिपूर्ण हैं तो आप इनमें से किसी एक का अंगीकार करें, ताकि वह स्वर्ग के लिए एक भूषण ही
होगा। नारायण का यह भाषण सुनकर सबको बड़ा ही सन्तोष हुआ और उन्होंने उसे साष्टांग दण्डवत कर उसका
भाषण शिरसा वंद्य किया।
ओमित्यादेशमादाय नत्वा तं सुरवन्दिनः।
उर्वशीमप्सरःश्रेष्ठां पुरस्कृत्य दिवंययुः॥ १५॥
इन्द्रायानम्य सदसि शृण्वतां त्रिदिवौकसाम्।
ऊचुर्नारायणबलं शक्रस्तत्रास विस्मतः ॥ १६॥
नारायण का भाषण सुनकर उसके चरणों पर मस्तक रखकर स्त्रियों में जो उर्वशी थी उसे साथ लेकर
कामादि सारे लोग बड़ी फुर्ती से वहाँ से निकले। वह नारायण के ऊरु से अर्थात् जाँघ से सट कर खड़ी थी
इसलिये उसका नाम उर्वशी पड़ा और कालान्तर में वह देवांगन में भी इसी नाम से पहचानी जाने लगी। इस प्रकार

१०८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
वे सारे देवताओं के दूत स्वर्ग पहुँचे और उन्होंने नारायण की अद्भुत शक्ति का इन्द्र की सभा में वर्णन किया।
उन्होंने नारायण का अत्यन्त पवित्र चरित्र उन्हें सुनाया जिसे सुनकर देवतागण आश्चर्य चकित हो गये। इन्द्र ने
उर्वशी को देखा तो वह रात दिन उसके साथ लंपट होकर रहने लगा। बाहर आकर सभा में बैठने का उसे होश ही
नहीं रहा। वर्षों तक उसे साथ लेकर वह अंतगृह में रहने लगा। नारायण की यह कथा प्रथम दृश्य सगुण अवतार
की कथा है। अब हे राजराजेश्वर ! अगला अवतार सुनो। राजा, कितनी विचित्र बात है। समस्त छलवादियों की
स्वतः पूजा करने का ही नाम है 'पूर्णानुभव'। सद्भाव से भगवद्भजन करते समय इन्द्र उसमें अनेक प्रकार के
विघ्न उत्पन्न करता है। नारायण चैतन्यधन होने के कारण उन्होंने समस्त विघ्नों की पराजय कर डाली लेकिन
भोले भाले यदि भक्ति करने लगें और उनके भी मार्ग में ऐसे ही विघ्न आये तो उन्हें भगवदप्राप्ति कभी नहीं होगी
ऐसा विकल्प तुम मन में न लाओ। क्योंकि ब्रह्मादिक समस्त प्राणिमात्रों का जो केवल भौं उठाकर ही नियंत्रण
करता है उस श्रीनारायण का केवल भक्तिपूर्वक भजन करने से विघ्नों की बाधा कभी नहीं हो सकती। उसके
कारण ही इन्द्र का इन्द्रपद कायम है, उस श्रीनारायण का भक्तिभाव से भजन करने पर भक्तों को कौन विघ्नों की
बाधा खड़ी करेगा ? वह श्रीहरि ही अपने भक्तों की सुरक्षा करता रहता है। यह सच है कि कामादिक सबका छल
करते हैं लेकिन जब उनका चालक भी नारायण ही है तो वह अपने भक्तों का स्पर्श कैसे करने देगा ? सारे विघ्नों
को जिसने भुलावे में रखा उस नारायण का नित्य स्मरण करने से केवल उसके भय से ही विघ्न भाग जाते हैं। हरि
के नामस्मरण से ही भक्त की सुरक्षा होती रहती है। अपने भक्तों की रक्षा करने के लिये ही देवता अनेक प्रकार के
अवतार धारण करता है। उसके अवतारों का अत्यन्त अद्भुत चरित्र तुम श्रवण करो।
हंसस्वरूप्यवददच्युत आत्मयोगं दत्त: कुमार ऋषभो भगवान् पिता नः।
विष्णुः शिवाय जगतां कलयाऽवतीर्णस्तेनाहता मधुभिदा श्रुतयो हयास्ये ॥ १७॥
ब्रह्मदेव के सनकादिक पुत्रों ने जब पिता से प्रश्न किया तो 'हंसावतार' लेकर उन्होंने उस प्रश्न के उत्तर
के बहाने ब्रह्मज्ञान कथन किया। हरिनाम का नित्य भजन करने से महादुर्धर विघ्न भस्म हो जाते हैं। ऐसे उस
हरि के अवतार का उत्तम वर्णन सुनो। जिसका नाम सुनकर यम भी भाग जाता है, जिसके नाममात्र से जन्म-
मरण का नाश हो जाता है वह 'श्रीदत्त' का अवतार अर्थात् साक्षात परब्रह्म है। जो निष्ठापूर्वक ब्रह्मचारी हैं,
स्वप्न में भी जिनका वीर्यपतन सम्भव नहीं है और इसी कारण जिन्हें 'कुमार' कहते हैं वे सनकादिक भी
अवतार मूर्ति ही हैं। उसी प्रकार हमारे ज्ञानसम्पन्न पिता ऋषभनारायण को भी तुम भगवान का अवतार ही जान
लो। उपर्युक्त नामों से और रूपों से अवतार लेनेवाला वह एक नारायण ही है। जगत् का पालन करने वाला जो
श्रीकृष्ण है वही अपने अंश से अवतार लेता रहता है। वही श्रीकृष्ण स्वयं मधुकैटभ दैत्य का संहार कर
'मधुसूदन' नाम से प्रसिद्ध हुआ। 'हयग्रीव' को अवतार लेनेवाला भी वही है। उसी ने बाद में शंखासुर का वध
कर डूबे हुए वेदों को निकाल कर उन्हें ब्रह्मदेव के हाथ में दिया। इस प्रकार वेदों की रक्षा उसी ने की यह
निश्चित रूप से जान लो।
गुप्तोऽप्यये मनुरिलौषधयश्च मात्स्ये क्रौडे हतो दितिज उद्धरताऽम्भसःक्ष्माम्।
कौर्में धृतोऽद्रिरमृतोन्मथने स्वपृष्ठे ग्राहात् प्रपन्नमिभराजममुञ्चदार्तम् ॥ १८ ॥
उसी ने मत्स्यावतार धारण कर प्रलयकाल की बाढ़ में पृथ्वी का मनु तथा वनस्पतियों के साथ संरक्षण
किया। उसी ने कूर्मावतार धारण कर मंदर पर्वत को अपनी पीठ पर लादकर क्षीरसागर का मन्थन कर देवताओं

चतुर्थ अध्याय १०९
को अमृतपान कराया। जिस समय हिरण्याक्ष दैत्य पृथ्वी को रसातल तक ले गया था उस समय उस प्रभु ने
'वराह' अवतार धारण किया। उस श्वेत वराह मूर्ति की पृथ्वी देवी ने पूर्ण निष्ठा से भक्ति की। उस समय उस
दैत्य का वध कर पृथ्वी का उद्धार किया और परम शान्ति प्रदान की। उसी ने दीनों का संकट निवारण करने के
लिये वैकुण्ठ से छलांग लगायी और गजेन्द्र का नक्र ने पकड़ा हुआ पैर छुड़ा कर उसका प्रेमपूर्वक उद्धार किया।
संस्तुन्वतोऽब्धिपतिताञ्छ्रममाणानृषींश्च शक्रं च वृत्रवधतस्तमसि प्रविष्टम्।
देवस्त्रीयोऽसुरगृहे पिहिता अनाथा जघ्नेऽसुरेन्द्रमभयाय सतां नृसिंहे ॥ १९॥
किसी समय अकस्मात हुए जलप्रलय में मार्कण्डेय ऋषि डूबने लगे थे उस समय उन्होंने श्रीकृष्ण का
स्मरण किया। तत्काल 'वटपत्रशायी' भगवान ने उसे बचाया (यही बालमुकुन्द है) ऋषि शालिग्राम की पूजा कर
रहे थे उस समय नल नामक वानर ने अपने स्वभाव के अनुसार उनकी देवपूजा उध्वस्त कर देवता को समुद्र में
फेंक दिया। यह देखकर उस ऋषि ने क्रोध से 'तुम्हारे हाथ से शिला पानी में नहीं डूबेगी' ऐसा शाप दिया। तभी
उन्हें समुद्र में शालिग्राम तैरते हुए दिखायी दिये। उन्हें निकालने के लिये ऋषि ने जल में प्रवेश किया। वे समुद्र
की भीषण लहरों के बीच फँस गये और उनकी साँस फूलने लगी। तब उस ऋषि ने उस संकट का निवारण
करने के लिए आर्तिहरण श्रीहरि की प्रार्थना की। इससे प्रसन्न होकर श्रीहरि वहाँ प्रकट हुए और उन्होंने उस ऋषि
की पूजा के साथ बाहर निकाला। वज्राघात से वृत्तासुर को मारने के कारण इन्द्र को ब्रह्महत्या का पातक लगा
जिसके कारण वह अंधतम नामक नरक में डूब रहा था। उस समय कृपालु श्रीअनंत ने अवतार धारण किया तथा
कृपादृष्टि से इन्द्र को उस ताप से मुक्त किया। मुर नामक दैत्य ने अमरपुर जीतकर देवताओं के जनानखाने की
स्त्रियों को बन्द कर रखा था। श्रीहरि ने उस 'मुर' नामक दैत्य का वध किया इसलिये उसका नाम 'मुरारी' हो
गया। उसने देवताओं की सभी स्त्रियों को मुक्त कर उन्हें पुनः देवताओं के सुपुर्द किया। जो राक्षसों का राजा
और दुष्टों में अग्रगण्य, जो हरि का नाम सुनते ही क्रोध से संतप्त होकर मन ही मन जलने लगता था वह क्रोध
का महासागर, अविवेक की अपार निधि, जो गर्व से उन्मत्त होकर मदोन्मत्त होकर हरिनाम का स्मरण करने वाले
अपने पुत्र का छल करता था उस हिरण्यकश्यपु का साधुओं को अभय देने वाले स्वभक्त हितकारी 'नरसिंह' ने
नाखूनों के अग्रभाग से वध किया।
देवासुरे युधि च दैत्यपतीन् सुरार्थे हत्वान्तरेषु भुवनान्यदधात् कलाभिः।
भूत्वाऽथ वामन इमामहरद्बलेः क्ष्मां याञ्छाछलेन समदाददितेः सुतेभ्यः ॥ २०॥
समुद्रमंथन के अन्त में क्षीरसागर के तट पर देवदानवों के बीच अमृत के लिये जब बहुत कलह मच गया
था उस समय जिसके सामने अमृत भी फीका लगे ऐसा 'मोहिनी' अवतार लेकर उन्होंने राक्षसों को मेद्य प्राशन
करने के मद्य लिये दिया और देवताओं को अमृत दिया। उस समय चुराकर अमृत प्राशन करने के कारण राहु का
शिरच्छेद किया और उसके धड़ पर म्हालसा के स्वरूप में स्वयं नेवासे में वास्तव्य किया। देवताओं की सहायता
करने वाले नारायण ने द्वारका में कुश का निर्दलन कर तथा लवणासुर का वध कर स्वयं 'कुमार' रूप में अवतार
धारण किया। इस प्रकार भक्त कार्य का पक्ष लेने वाला श्रीहरि ने एक के बाद दूसरे मन्वंतर में देवताओं के कार्य
से स्वयं अनेक अवतार लिये। देवताओं का सहायक जगजीवन स्वयं बौना वामन बनकर याचक धर्म स्वीकार
कर देवताओं के अपमान का बदला लेता है। अपने दान के पुण्य से राजा बली समर्थ था, उसके साथ युद्ध करना
देवताओं के लिये कठिन था। इसलिये त्रिविक्रम रूप से अर्थात् त्रैलोक्य व्यापक रूप धारण कर उसने बली का

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छल किया। लेकिन बली का प्रभाव प्रबल होने के कारण उसने देवता को द्वारपाल बना दिया। इस प्रकार विष्णु
भक्तों की परीक्षा लेने के लिये उनका काफी छल करते हैं लेकिन अन्त में वह दयानिधि स्वयं ही दासों का दास
बन जाता है। इस प्रकार बली का छल कर वामन ने सारा दिगमण्डल अपने अधिकार में कर लिया और उसे
देवताओं को अर्पित कर उन्हें सुखी किया।
निःक्षत्रियामकृत गां च त्रिःसप्तकृत्वो रामस्तु हैहयकुलाप्ययभार्गवाग्निः।
सोऽब्धिं बबन्ध दशवक्त्रमहन्सलङ्कं सीतापत्तिर्जयति लोकमलघ्नकीर्तिः ॥ २१ ॥
वही देवदेवोत्तम देवाधिदेव स्वयं 'परशुराम' बना और उसने अपने प्रताप से समस्त क्षत्रियों का पराक्रम
व्यर्थ कर दिया। वह गो ब्राह्मणों का महान हितैषी था। उसने सहस्रार्जुन का वध कर उसके सहस्रबाहु के अनेक
टुकड़े कर डाले और दैत्यों के समस्त कुलों को रसातल तक पहुँचाया। जमदग्नि का क्रोध परशुराम के तेज से
प्रज्ज्वलित होकर उसने हैहयकुल को भस्म कर क्षत्रियों की पृथ्वी को भून डाला। उसने इक्कीस बार वीररस
देकर क्षत्रियों का उन्माद रोग नष्ट किया तथा भूदेवता को धरती का आधिपत्य सौंप दिया। इसके बाद सभी
अवतारों में जो श्रेष्ठ था, जिसकी वीरवृत्ति अत्यन्त उज्ज्वल थी, वह सभी अवतारों में श्रेष्ठ श्रीराम हुआ। उस
राम के नाम से समस्त पातक भाग जाते हैं, उसका नामस्मरण करने वाले के चरणों में यम भी लीन हो जाता है।
गणिका के सारे कर्म, अकर्म रामनाम से ही नष्ट हो गये। उसके नाम से कलि भी थरथर काँपने लगता है,
यमदूतों की कोई परवाह नहीं करता, रामनाम के स्वर से जन्म-मरण समूल नष्ट हो जाता है। जिसने देवताओं के
बन्धन खोले, नवग्रहों की बेड़ियाँ तोड़ीं और जिसने त्रैलोक्य में रामराज्य का झंडा फहराया, जिसके सामर्थ्य से
समुद्र पर शिलायें तर गयीं, क्षुद्र वानरों ने राक्षसों को मारा और सुवर्ण की लंका शरणागत विभीषण को सुपुर्द
की। प्रताप का वह साक्षात पुतला जिसने सहज ही समुद्र पर सेतु बनाया, जिसने अपने चरणों से शिला का उद्धार
किया और जो स्वभक्तों के लिए प्राणों से भी अधिक प्रिय है। हे राजा ! वह साक्षात अवतार आज भी संसार में
विचरण कर रहा है। (एकनाथ कहते हैं) यह भाषण त्रेतायुग में द्रुमिल मुनि राजाजनक को सुना रहे हैं। इसलिये
'श्रीराम राम' इस से जो नित्य जप करता है वह पुरुषों में पुरुषोत्तम रहता है तथा कर्माकर्म से अतीत रहता है।
राम का यह नाम यदि अकस्मात् कर्णपुट में प्रवेश करता है तो उस नामघोष से कलिसम्बन्धी सभी पापों का
विनाश होता है। रामनाम की महिमा ऐसी है। रामनाम ने जगत का उद्धार कर अपनी कीर्ति फैला रखी है। उस
राम का चरित्र जो गाते हैं या सुनते हैं, वे धन्य हैं।
भूमेर्भारावतरणाय यदुष्वजन्मा जातः करिष्यति सुरैरपि दुष्कराणि।
वादैर्विमोहयति यज्ञकृतोऽतदर्हान् शूद्रान् कलौ क्षितिभुजो न्यहनिष्यदन्ते ॥ २२ ॥
हे राजाधिराज ! अब तुम्हें अगले अवतारों की कथा सुनाता हूँ। वह अवतार श्रीकृष्ण का है। उसकी कथा
अत्यन्त अद्भुत और विचित्र है। जो परा से परात्पर, जो अजन्मा होते हुए भी अक्षर और श्रुतिशास्त्र के लिये भी
जो अगोचर है ऐसा वह श्रीकृष्ण पूर्णावतार है। जिसे नाम देना कठिन है, जहाँ रूप का प्रश्न ही नहीं उठता
जिसके लिये ब्रह्मतत्त्व शब्द भी अपूर्ण है ऐसा जो श्रीकृष्ण है वह अवतार है इसे ध्यान में रखो। जो वर्णाश्रम को
स्पर्श नहीं करता अर्थात् जो वर्णाश्रम से परे है, जिसे ईश्वरत्व का स्पर्श भी सहन नहीं होता, जो वास्तव में
अहा और अव्यय होकर स्वानंद में निमग्न रहता है ऐसा वह स्वलीला से धारण किया हुआ श्रीकृष्णावतार है।
इस प्रकार वह श्रीकृष्णनाथ का अवतार गुणधर्म कर्मातीत है। वह जगत का नाथ स्वयं ही, अपनी ही इच्छा से

चतुर्थ अध्याय १११
यादवों के वंश में उत्पन्न हुआ। जिस प्रकार उफनता समुद्रं चंचल भासित होता है, वास्तव में वह जल ही रहता
है अथवा काली, श्वेत, बलुई पीली मिट्टी अलग प्रकार की मालूम होने पर भी जमीन का ही भाग रहती है
या शक्कर के बड़े ढेर में जो मिठास रहती है वही मिठास उस राशि में से निकाले हुए छोटे हिस्से में भी रहती
है, उसी प्रकार यादवों के कुल में श्रीकृष्ण का अवतार पूर्णांश से हुआ था। जिस प्रकार दीपक जलाते ही
प्रकाश का पुंज बाहर आता है, उसी प्रकार श्रीकृष्ण का जन्म होते ही उन्होंने अद्भुत कार्य किये। जो
ब्रह्मदेवादिकों से भी नहीं हो सकता है वह सब देवाधिदेव श्रीकृष्ण ने बाललीलाओं के रूप में ही कर
दिखाया। मुख से दावाग्नि निगल लिया, नख से पर्वत उठाया, पूतना के स्तन का विष अपने मुँह से उसके
प्राणों के साथ चूस लिया। बछड़े चुराने के बहाने उसने ब्रह्मदेव को भी पागल बना दिया। वह बछड़े और गोप
वह स्वयं ही हो गया। अघासुर का जबड़ा चीर कर उसके टुकड़े कर दिये, कालिया सर्प का विष निकाल
लिया, यमलोक की तलाशी लेकर वह गुरु के पुत्र को वापस ले आया। प्रजा को पीड़ा देकर जो कर वसूल
करते हैं, जिन्हें धर्म और नीति अच्छी नहीं लगती, ऐसे धरती के लिए जो केवल भारस्वरूप हैं ऐसे कितने ही
राजाओं को उसने मार गिराया। उनमें से अनेक का सेना की सहायता से, कितनों का तो स्वयं ही और अनेकों
का किसी युक्ति से वध किया। किसी के घर भाई-भाई में ही कलह उत्पन्न कर उनका काम तमाम किया और
किसी का अग्रपूजा के बहाने ही वध किया। राजा! यह श्रीकृष्ण अधर्म को प्रताड़ित करेगा, धर्म की महिमा
बढ़ायेगा ये कौतुक भरी बातें तुम्हें विशेष रूप से दिखायी देंगी। जैसे-जैसे समय व्यतीत होगा वैसे-वैसे वह
अपने नये-नये चरित्र दिखायेगा और जो उसके असीम भक्त होंगे वही उसके सुख के लिये पात्र होंगे। साधुओं
के लिये तो नित नये स्वानंद समारोहों की बाढ़ आयेगी। हे राजाधिराज ! उस श्रीकृष्ण की लीला तुम भी अपनी
आँखों से देखोगे। वही जब आगे जाकर 'बौद्धरूप' लेकर दृढ़ मौन व्रत का पालन करेगा तब किसी को मालूम
ही नहीं हो पायेगा कि कर्म क्या है और अकर्म क्या है ? वह सर्वदा तटस्थ रह कर बड़े-बड़े वाद उत्पन्न करेगा
और वादों के बहाने मद और महामोह मचा रहेगा। वह दुर्धर मोह उत्पन्न करेगा, कोई दांभिक कर्म करेंगे,
कितने ही धर्मभ्रष्ट होंगे वह अपना आत्महित किस बात में है इसे नहीं समझ पायेंगे। ऐसे मत का प्रचार होगा
जिसमें लोग वेदों को ही झूठा कहना शुरू कर देंगे। वेदविहित को न पहचानना यही सचमुच में बलवान मोह
है। कितने ही मोह में फँसेंगे, कितने ही लोगों का ज्ञान का अभिमान सर्वोच्च शिखर पर पहुँच कर वे सारे कर्मों
की निन्दा करेंगे और वह केवल मूर्खता है यह जानकर वे सभी कर्मों को त्याग देंगे। इस प्रकार की मोहमय
स्थिति उत्पन्न होने पर कलियुग की प्रवृत्ति होगी और नीच लोग राजा होकर प्रजा को लूटना-खसोटना शुरू
करेंगे। शूद्रों से भी कनिष्ठ जाति के लोग बड़े-बड़े राजा होंगे। वे अत्यन्त पापी राजा वर्णावर्ण को भ्रष्ट करेंगे।
किसी भी व्यक्ति को बिना किसी अपराध के दण्ड देंगे। राह चलने वालों को पकड़कर उनका सर्वस्व लूट
लेंगे। राजा वास्तव में दुर्बलों की शक्ति होता है वह राजा स्वयं ही जनता को लूटना शुरू कर देगा। राजाओं में
इस प्रकार शुरू होने वाला अधर्म भगवान को सहन नहीं होगा। जब धर्मानुसार जीवन अधर्मियों को दुःसह
होगा तभी श्रीनारायण को 'कल्कि' नामक अवतार धारण करना पड़ेगा। वह (कल्की अवतार) प्रबल शस्त्र की
धार से दुष्ट राजाओं का संहार करेगा, महामोह का मूल ही तोड़ डालेगा। तब धर्म का उदय होगा, सत्य की
चार गुना वृद्धि होगी और वेदोक्त कर्म चालू होकर सब लोग स्वधर्म से व्यवहार करने लगेंगे।
एवंविधानि कर्माणि जन्मानि च जगत्पतेः ।
भूरीणि भूरियशसो वर्णितानि महाभुज ॥ २३ ॥

११२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
हे राजन! भगवान के नाम, उसके अवतार, जन्म, चरित्र तथा कर्म अनन्त हैं, उस श्रीहरि की कीर्ति भी
अनंतोत्तम है। इस प्रकार उस भगवान की महिमा अगाध है। उसके जन्म और कर्म का कोई अन्त नहीं है। हे
पुरुष श्रेष्ठ उसकी यह महिमा तुम्हें संक्षेप में बतायी। ऐसे अवतारचरित्र तथा उनके नाम, कर्म आदि सुनकर राजा
के मन में प्रेम का सागर उमड़ पड़ा और उसका मनोधर्म शान्त हुआ। प्रत्येक अवतार के समय भगवान सगुण
आकार अवश्य लेता है लेकिन वह स्वयं निर्गुण के गुण प्रकट करता हुआ कर्माचरण करके दिखाता है। जो हरि
के सेवक भगवान का गुणवर्णन करते हैं, जिनके भाषण से श्रोताओं का हृदय शान्त होता है, वे अत्यन्त धन्य हैं।
जब श्रोताओं की श्रवणवृत्ति शान्त होती है तो उससे वक्ता को स्वानंदसुख प्राप्त होता है और अपने आप साहित्य
रस भरकर ग्रन्थों में प्रसाद बाँटने लगता है। सचमुच, जिस प्रकार चन्द्रकिरणों के कारण चकोर के मुख अपने
आप खुल जाते हैं उसी प्रकार जनार्दन स्वामी के एकनाथ की भी संतों की कृपा से वाचा प्रस्फुटित हुई है।
सूर्यकिरणों के स्पर्शमात्र से जिस प्रकार कमल की कली अपने आप खिल उठती है, उसी प्रकार संतों के
कृपाप्रसाद से अर्थज्ञान से ग्रन्थ का भी विस्तार हो रहा है। उनकी ही कृपा से मैं भागवत का अर्थ निकाल रहा
हूँ। अब अगले पाँचवें अध्याय की कथा श्रोतागण ध्यानपूर्वक सुनें। राजा मधुर प्रश्न करेगा। उसे सुनते ही मन
की इच्छा पूर्ण होगी। साधकों की जिज्ञासा तृप्त होगी और धर्माधर्म का निर्णय समझ में आयेगा। उसके भजना-
भजन का कौशल दिखाई देगा। प्रश्नोत्तरों की यह कथा अत्यन्त सुन्दर और रस से पूर्ण होगी जिसे सुनते ही
अधर्म की गाँठ खुल जायेगी। उस उत्तम निरूपण से संतों का श्रवण तृप्त होगा। जनार्दन स्वामी की पूर्ण कृपा के
कारण एकनाथ उसे सुनायेगा। शरीर में वायु का संचार होने से वह बड़बड़ाने लगता है। उसी प्रकार एकाजनार्दन
यह कविता सुना रहा है।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादश स्कंधे निमिजयंत
संवादे एकाकारटीकायां चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥
श्रीकृष्णार्पणमस्तु

पंचम अध्याय
हे ओंकारस्वरूप सद्गुरु देव ! तुम्हें मेरा नमस्कार है। यदि तुम्हें उदार कहें तो तुम अत्यन्त कंजूस दिखायी
देते हो। अपने घर आये याचक से भेंट होते ही तुम उसे निगलने के लिये दौड़ पड़ते हो। उसे देखते ही उसे
उसके प्राणों सहित आत्मसात कर लेते हो। जो भी कोई तुम्हारे पास माँगने के लिये आते हैं उन्हें बाँध कर तुम
उन्हें अपने ऐक्यरूप में समा लेते हो। उन्हें छुड़ाने के लिये स्वप्न में भी किसी दूसरे से भेंट नहीं होती। तुम्हारी
अणुमात्र प्राप्ति भी जिसे हो जाती है, उसकी इहलोक की सम्पत्ति नष्ट हो जाती है। ठग का बीड़ा खाने से वह
अपने ही लिये घातक होता है, उसी प्रकार जब तुम प्रसन्न होते हो तो दूसरे के प्राण ही नष्ट हो जाते हैं। जो भी
कोई तुम्हारे पास कुछ माँगने के लिये आया उन्हें तुमने पूरी तरह लूट ही लिया, अन्त में वे नग्न स्थिति में
निर्लज्ज होकर त्रिभुवन में घूमने लगे। तुम्हारी ऐसी निर्वाणस्थिति के रहते तुम्हें उदार कौन कहेगा ? तो उसका भी
चमत्कार सुनो। इससे पहले जिनका 'उदार' के रूप में वर्णन किया है उन्हें भी तुमने आत्मसदृश कर लिया है
और फिर उन्हें उदारतापूर्वक अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया है। षड्गुण ऐश्वर्य वैभव के साथ तुमने स्वयं को ही
दान में दे दिया और वह दिया हुआ दान तुम कल्पांत में भी वापस नहीं लेते। स्वयं का ही दान देने के कारण तुम
दासों के ही अधीन रहते हो और इसलिये तुम उनकी ही इच्छा से नाचते फिरते हो। बली ने अपना सर्वस्व दान
दिया लेकिन अन्त में तुम उनके ही अधीन हो गये और अभी तक उसके घर के दरवाजे पर रखवाली करते हो।
धर्मराज ने तुम्हें अग्रपूजा दी लेकिन अन्त में तुम उनकी सेवा करने लग गये। उसके लिये स्वयं अनेक प्रकार के
संकट सहे, यहाँ तक कि उनकी जूठन भी उठायी अपने भक्त अम्बरीष का गर्भवास भी तुमने सहन किया। हे
ऋषिकेश ! ग्वालिनों ने तुम्हारा पालन-पोषण किया, लेकिन अन्त में उनकी सुरक्षा तुमने ही की। सारांश यही कि
भक्तों को स्वस्वरूप देने की उदारता केवल तुझमें ही है। हे दयालु ऋषिकेश ! यह सामर्थ्य दूसरों में नहीं है। इस
प्रकार तुम उदार होते हुए राजा और रंक दोनों के लिये समान हो। जहाँ भाव रहता है वहाँ तुम निश्चयपूर्वक मिल
जाते हो। तुम्हारी प्राप्ति के लिए योगी गिरिकन्दराओं में जाकर बैठते हैं, कोई भोगों का त्याग कर विरक्त होकर
बैठते हैं और कुछ तो सर्वस्व का ही त्याग करते हैं। कुछ दसों दिशाओं में भटकते रहते हैं। कोई तुम्हारे लिये
पागल हो जाते हैं लेकिन उन्हें क्षण भर के लिए तुम्हारा स्वप्न में भी दर्शन नहीं हो पाता। लेकिन ऐसे लोगों के
लिये भी तुम्हारी प्राप्ति एक रीति से सुलभ है। यदि वे संतचरणों में अत्यन्त भक्तिभाव से एवं असीम भाव से रंग
जाएँ तो उन्हें तुम्हारी प्राप्ति हो सकेगी। जो संतचरणों में रंग जाता है उसे आत्मप्राप्ति सहज ही होती है क्योंकि
सर्वव्यापी परमात्मा संतस्वरूप में अवतीर्ण हुआ रहता है। इसलिये संतों के जो रूप हैं वे श्रीहरि के भी रूप हैं।
इसलिये संतों की कृपा प्राप्त करने के लिये अत्यन्त उत्कंठा से प्रयास करना चाहिये। उन्हें ज्ञानार्थ की पिपासा है
इसलिये मैं इस ग्रन्थ के बहाने उनके चरणों की सेवा करूँगा। संतों की कृपादृष्टि यही मेरी आँखों का अंजन है।
उनकी चरणकृपा का उदय होते ही जनार्दन स्वामी प्रकट हो जाते हैं। उनकी सेवा को गुरुत्व का नाम देकर
निजस्वभाव के अनुसार जीवभाव के साथ भजन के लिये अग्रसर हो रहा हूँ। भज्य, भजक तथा भजन इन तीन
भावनाओं को एक ही चिदात्मस्वरूप में दिखला कर जगजीवन की निजभक्ति श्रीजनार्दन में की जा सकती है।
यही विशुद्ध अभेदभक्ति है। इसमें परम ऐक्य के योग से भजन में अधिक मधुरता आती है और भक्तों की रुचि

१९४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
और भी बढ़ जाती है। भक्तों के प्रेम के लिये भगवान अपना सर्वस्व खर्च करता है। ऐसी इस अभेद भक्ति की
मधुरता है। गोविन्द को वह अत्यन्त प्रिय है इसलिये भक्तों के योगक्षेम का भार श्रीधर स्वयं सँभालता है और
भक्तों को स्वयं भवसागर पार कराता है। अपने भक्तों का देहभाव (भार) देवाधिदेव स्वयं वहन करता है तो फिर
अभक्तों का देह भार वहन करने वाला क्या कोई और है ? तो उसका उत्तर यह है कि भक्तों को अहंकार न होने
के कारण भगवान को ही उसे वहन करना पड़ता है और अभक्तों को पूर्ण देहाभिमान होने के कारण उनमें
अतिबद्धता होती है इसलिये जो अभिमानरहित होता है वह पूरी तरह भगवद्भक्त है। जिसमें देहाभिमान है उसमें
भक्त की प्रवृत्ति कभी नहीं आ सकती। भगवान बड़े कौशल से निजभक्त का संरक्षण करता है इसलिए उसका
बाल भी बाँका नहीं होता। वह प्रसन्नतापूर्वक अपने भक्तों को निर्भय कर उनको निजसुख देकर उनका तारण
करता है। इसलिये निरभिमानी होकर जो भक्तिमार्ग पर चलते हैं वे विघ्नों को ठोकर मारकर निश्चय के साथ
भगवत्पद प्राप्त करते हैं। इसके बाद राजा ने अभक्तों की गति के बारे में प्रश्न पूछा। इस पाँचवें अध्याय में
अभक्तों का लक्षण और उनकी गति का निरूपण कर, विभिन्न युगों में श्रीहरि पूजाविधान किस प्रकार का रहता है
इसका भी विवेचन करेंगे। अवतार चरित्र और पराक्रम सुनाकर चौथे अध्याय का समापन किया। अब राजा
मुनियों से अभक्तों के लक्षण पूछ रहा है।
राजोवाच
भगवन्तं हरिं प्रायो न भजन्त्यात्मवित्तमाः।
तेषामशान्तकामानां का निष्ठाविजितात्मनाम् ॥ १ ॥
राजा ने कहा, हे दयानिधि मुनिश्रेष्ठ! जो भगवद्भजन को पीठ दिखाता है, ऐसे अभक्त मनुष्य को कौन सी
गति प्राप्त होती है ? जो काम के कारण मदांध हो गये हैं, क्रोध से संतप्त हो गये हैं, अतिलोभ से लालची हो गये
हैं और सर्वदा प्रपंच में रम गये हैं, उसी प्रकार जो घमण्ड के पुतले तथा अहंकार के शिरोमणि हैं, विकारों का
ढेर और विकल्पों की खुली खान हैं, जिनकी सद्बुद्धि की आड़ में महामोह का गहरा बादल आया हुआ है, जो
कपट में अत्यन्त कुशल, लोभ से ग्रस्त हैं जिस प्रकार चमगादड़ दिन के उजाले में जो नहीं दिखायी देता उसे
अँधेरे में देखते हैं, उसी प्रकार वे परमार्थ के मामले में अन्धे किन्तु प्रपंच में महापण्डित होते हैं, जिन्हें आत्महित
समझ में नहीं आता और ज्ञान बेचकर व्यर्थ का काम बढ़ाते हैं ऐसे जो अभक्त हैं उनकी कौन सी गति है यह मुझे
बतायें। आप जैसे बुद्धिमान और बोध के चलते-फिरते महासागर आज मेरे भाग्य से मुझ मिले हैं, इसलिये मुझे
निश्चयपूर्वक इन प्रश्नों का उत्तर बतायें। इस प्रकार जब राजा ने अभक्तों के लक्षणपूछे तो उसका उत्तर देने के
लिये 'चमस' अत्यन्त प्रसन्नता से आगे बढ़ा।
चमस उवाच
मुखबाहूरुपादेभ्यः पुरुषस्याश्रमैः सह।
चत्वारो जज्ञिरे वर्णा गुणैर्विप्रादयः पृथक् ॥ २ ॥
चमस ने कहा—जो सारे जगत का जनक है वही एकमेव प्रमुख गुरु है, उसे जो पुरुष नहीं भजता, उसका
सर्वस्व नष्ट हो गया समझिये। चारों आश्रम और चारों वर्ण उसी मूलपुरुष से उत्पन्न हुए हैं। हे राजाधिराज !
उनकी उत्पत्ति का स्थान सुन लो। मुख से वेदवेत्ता ब्राह्मणों का जन्म हुआ। बाहुओं से क्षत्रिय पैदा हुए, जाँघों से

पंचम अध्याय ११५
वैश्यवर्ण उत्पन्न हुआ और शूद्र वर्ण का जन्म स्थान चरण है। मूलरूप में गुण तो तीन ही हैं और गुणों के कारण
ही वर्ण बने हैं, तो फिर तीन गुणों में से चार वर्ण कैसे उत्पन्न हुए ? (उत्तर देते हैं) शुद्ध सत्त्वगुण से ब्राह्मण
उत्पन्न हुए, सत्त्व और रज के मिश्रण से राजा अर्थात् क्षत्रिय हुए, रज और तम मिलकर वैश्य वर्ण हुआ और
तमोगुण से शूद्रवर्ण हुआ। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ये तीन वर्ण 'द्विजन्मा' अर्थात् उपनयन संस्कार के कारण दो
बार जन्म लेते हैं, उन्हें गायत्री मंत्र का तथा वेदाध्ययन का अधिकार है, लेकिन शूद्र संस्काररहित हैं।
ब्रह्मचर्याश्रम और गृहस्थाश्रम ये इन तीनों वर्णों को प्राप्त हैं किन्तु ब्राह्मण इन चारों आश्रमों को आश्रयभूत होते
हैं। गृहस्थाश्रम यह उस विराट पुरुष के चरण स्थान पर, ब्रह्मचर्याश्रम हृदय स्थान पर, वानप्रस्थाश्रम वक्षःस्थान
पर तथा संन्यासाश्रम यहाँ शिरस्थान पर रहता है।
य एषां पुरुषं साक्षादात्मप्रभवमीश्वरम् ।
न भजन्त्यवजानन्ति स्थानाद् भ्रष्टाः पतन्त्यधः ॥ ३॥
जरा देखिये, इन ब्राह्मणादि वर्णों को जिससे जन्म प्राप्त होता है, उस देवाधिदेव का यदि भजन नहीं किया
तो प्राप्त हुए उत्तम देह का अधःपात होने लगता है। पूर्वमीमांसा, उत्तरमीमांसा तथा उसी प्रकार विविध शास्त्रों के
विचार, उनका स्वरूप तथा सिद्धान्त आदि का विवेचन करने में पारंगत, सारांश शब्द पाण्डित्य में अत्यन्त चतुर,
ऐसे पण्डित, ज्ञानाभिमान के कारण अत्यन्त उन्मत्त हो जाते हैं और सचमुच उसी अभिमान के कारण वे भजन से
विन्मुख हो जाते हैं। कोई निखालस ध्यानी रहते हैं, वे स्वप्न में भी परमार्थ को नहीं पहचानते हैं। वे सचमुच
अज्ञान के कारण ही परमार्थ को नहीं पहचानते । वे सचमुच अज्ञान के कारण जगन्नाथ को नहीं भजते । गन्ने के
रस की मिठास बकरी नहीं जानती इसीलिये वह उसके पत्ते चबाती है। उसी प्रकार हरिभक्ति की मिठास न
जानने के कारण ही बेचारे अज्ञानी लोग विषय लंपट होकर ही रह जाते हैं। किन्तु वेदशास्त्रों के अवलोकन से जो
स्वयं को ज्ञाता समझ कर पण्डित होने का घमण्ड करते हैं, वे भक्तिमार्ग का अपमान करते हैं। ज्ञानाभिमान के
कारण अत्यन्त उन्मत्त हो जाते हैं। ज्वरग्रस्त व्यक्ति जिस प्रकार दूध को कडुुआ समझता है, उसी प्रकार ज्ञान के
अभिमान से पण्डित लोग हरिभजन से विन्मुख हो जाते हैं। इस प्रकार ज्ञान के अभिमान के कारण जो हरिभजन
से विमुख हो जाते हैं वे चतुर्वर्ण में श्रेष्ठ होते हुए भी अधःपतन में फँस जाते हैं अधिक क्या कहें? वर्णों में श्रेष्ठ
(ब्राह्मण) होते हुए भी जो हरिचरण से विन्मुख रहता है उसकी अपेक्षा भगवद्भजन प्रेम से करने वाला चांडाल
भी श्रेष्ठ है। 'हम मुक्त हैं' यह कह कर वे भगवद्भजन नहीं करते, वे पश्चादि योनि में जन्म-मरण के थपेड़े
सहते हुए अधःपतन की ओर अग्रसर होते हैं। मनुष्य देह प्राप्त करने पर भी जो ईश्वर भजन नहीं करते वे
स्थानभ्रष्ट होकर अधःपतन से अत्यन्त कष्ट प्राप्त करते हैं और घोर यातनायें भुगतते हैं। ज्ञानाभिमान के कारण
जो भजन नहीं करते हैं, उनका भयानक अधःपात होता है इसलिये हे राजा! अज्ञानियों की भी वही गति होगी
ऐसा मत समझो।
दूरेहरिकथाः केचिद् दूरेचाच्यतकीर्तनाः ।
स्त्रीयः शूद्रादयश्चैव वतेऽनुकम्प्या भवादृशाम् ॥४॥
एक ही बाप के दो पुत्र हैं, उनमें से एक प्रबुद्ध है और दूसरा बालक है, उनमें से कोई पिता का अपमान
करता है तो पिता प्रबुद्ध को ही मारता है लेकिन बालक यदि पिता के सिर पर भी चढ़ता है, पिता को लात भी
मारता है तो उसे दोष नहीं लगता। गलती का फल बड़े वाले को ही भोगना पड़ता है। ज्ञाता यदि भजन नहीं

११६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
करता तो उसे महादोष ग्रस लेते हैं और जो अज्ञानी किन्तु भाविक हैं वे साधुओं के कृपानुग्रह से तर जाते हैं।
अज्ञानी का विशेष दोष न होने के कारण वह केवल साधु पर विश्वास रखकर ही शुद्ध हो जाता है। ज्ञानाभिमानी
का भाव विपरीत होने के कारण उसी को दोषों की बाधा होती है। अज्ञानी साधु पर विश्वास कर उसका वन्दन
करता है और जो ज्ञानाभिमानी है वह दोनों की निन्दा करता है। इसलिए उसे निश्चित रूप से दोनों की बाधा
होती है। साधु पर विश्वास करने से अज्ञान नष्ट होता है लेकिन ज्ञानाभिमानी के पास अनेक तर्क-वितर्क होते हैं।
उन्हें किसी पर भी विश्वास नहीं होता। अभिमान की जिद के कारण ही उनका पतन होता है। इस पर ठीक तरह
से विश्वास करने पर ज्ञात होता है कि अहंकार का बंधन बहुत बड़ा होता है। अभिमान जैसी झूठी और खराब
वस्तु दुनिया में कोई नहीं है। अभिमान साक्षात ईश्वर के लिये भी बाधक होता है। अभिमान के ही कारण ईश्वर
उपाधि से सबल होता है। अभिमान के ही कारण देहबुद्धि उत्पन्न होती है और वह सुर और नर दोनों के लिये
बाधक होती है। इसलिये जो अज्ञानी होते हैं उन्हें ज्ञानाभिमान नहीं होता, यदि वे साधुसज्जनों पर विश्वास करे तो
वे उन पर अनुग्रह करते हैं। जो नीच वर्ण के हैं वे शूद्र आदि जिन्हें शास्त्र अथवा वेद श्रवण का अधिकार नहीं
प्राप्त है उनके मन में यदि सद्भाव उत्पन्न हुआ तो वे कनिष्ट जाति में उत्पन्न होते हुए भी सन्तों की कृपा के पात्र
होते हैं। उनका अधिकार उन्हें एक विश्वास के कारण ही प्राप्त होता है (राजा जनक ने कहा) जो पूर्ण भावार्थी
होते हैं उन्हें हे दयालु कृपामूर्ति! आप जैसे साधु सन्त ही अनुग्रह देकर तारते हैं। (चमसमुनि कहते हैं) इस
प्रकार अज्ञानी तर जाते हैं किन्तु जिनके मन में ज्ञानाभिमान भरा रहता है उन्हें ब्रह्मदेव भी नहीं तार सकते। उनकी
स्थिति भी मुनि बता रहे हैं।
विप्रराजन्यवैश्यौ च हरेः प्राप्ताः पदान्तिकम्।
श्रौतेन जन्मनाऽथापि मुह्यन्त्याम्नायवादिनः ॥ ५ ॥
जो अज्ञानी और हीन वर्ण के होते हैं, वे सन्तों के चरण पकड़ कर पूर्ण विश्वास के भरोसे जन्म-मरण की
बाधा से बच निकलते हैं। बाकी जो व्रतबन्ध के कारण दो बार जन्म वाले अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य हैं वे
स्वाभाविक रूप से हरिचरणों की ओर पहुँचे रहते हैं, किन्तु हम ही अधिकारी हैं, वेदों का ज्ञान केवल हमें ही है,
ऐसी अपनी अहंता के कारण वह घमण्ड में फूले रहते हैं। हमारा जन्म उच्च, हमारा कर्म उच्च, हम ही अग्रपूजा
के अधिकारी हैं ऐसा पूज्यत्व का अभिमान, वेदों का उनका ज्ञान बस दिखावे भर का ही होता है लेकिन
अभिमान शिखर तक पहुँचा रहता है। यज्ञोपवीत और गायत्रीमंत्र का जिन्हें पूर्ण अधिकार है जिन्हें हरि के भजन
की चाह है जिनके चरण पकड़ने से हरि की भेंट हो सकती है ऐसे जो उत्तम ब्राह्मण उन्हें भी वेदों के ज्ञान का
अभिमान होता है और उसी घमण्ड के कारण उनमें मोह उत्पन्न होता है। चमसमुनि उसी का विस्तार से निरूपण
कर रहे हैं।
कर्मण्यकोविदाः स्तब्धाः मूर्खाः पंडितमानिनः।
वदन्ति चाटुकाम्मूढा यया माध्व्या गिरोत्सुकाः ॥ ६ ॥
विधि, विधान, मंत्र इनमें से कुछ भी समझ में नहीं आता फिर भी घमण्ड और ज्ञातापन का अभिमान कुछ
मत पूछिये। मदारी के पास विद्या थोड़े ही रहती है लेकिन उसके पूरे शरीर पर तमगों की भीड़ लगी रहती है।
उसी प्रकार प्रबुद्ध ज्ञान की नुमाइश करके आसन-पूजा आदि की भीड़ लगा देता है। जिस प्रकार गहरा लाल रंग
देकर स्फटिक को माणिक की छवि लाने का प्रयत्न किया जाता है उसी प्रकार शुद्ध रूप से मूर्ख लोग भी ज्ञान

पंचम अध्याय ११७
का झूठा अभिमान रखते हैं। उन्हें विधान की कोई जानकारी नहीं रहती और जानकार से भी वे नहीं पूछते। लोगों
के बीच प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिये अपने ही मत से कर्म करते हैं। मीठे-मीठे किन्तु झूठे शब्दों से वाचाल बनने का
प्रयत्न करते हैं तथा भोग में जरा भी सुख नहीं है ऐसा कहने वालों को अप्सरादिक भोगों के लिये लालायित
लोगों को इहलोक और परलोक का लालच दिखाते हैं। यहाँ अच्छे से अच्छे भोगों का आनन्द लिया जाये और
भविष्य में स्वर्गसुख तो रखा ही है इस आशा से बेचारे यज्ञ-याग करने के पीछे दौड़ते-फिरते हैं। कर्ता भले ही
खर्च करके डूब जाय लेकिन मुझे आचार्यत्व मिले ऐसी उनकी बुद्धि रहती है। ऐसी बुद्धि से वे यज्ञ के लिये
प्रयत्न करते हैं। अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिये अनेक प्रकार की कर्मचेष्टायें करते हैं और कर्मारम्भ का बहुत
बड़ा समारोह करने का भारी-भरकम प्रयास करते हैं। जिस प्रकार शराबी शराब को अमृत समझता है और
उसकी बात मधुर समझ कर अन्य लोग स्वाद लेने की इच्छा से मद्यपान की ओर प्रवृत्त होते हैं। लेकिन उससे
क्या होता है ? एक तो शरीर पर अपना संयम टूट जाता है और तत्काल दारिद्र्य और पिशाचातत्व का संचार होता
है। उसी प्रकार अधःपतनात्मक सुख को ही स्वर्गसुख मान लेते हैं और जो फल की आशा से लंपट हो जाते हैं वे
जान-बूझ कर उस काम की ओर प्रवृत्त होते हैं। कीड़ा दीवार फाँद तो नहीं सकता लेकिन उस पर चढ़ने का
प्रयत्न तो करता ही है और अपने आप गिर पड़ता है। उसी प्रकार स्वर्ग सुख के लिये भी पतन निश्चित है। कर्म
की आसक्ति से काम और लालच की अत्यधिक वृद्धि होती है जिससे ढोंग करना आवश्यक हो जाता है और
उस ढोंग में क्रोध भी अचानक बढ़ता है।
रजसा घोरसंकल्पाः कामुका अहिमन्यवः।
दाम्भिका मानिनः पापा विहसन्त्यच्युतप्रि यान्॥ ७॥
लेकिन इसके लिये बेचारे वे भी क्या करेंगे ? उनका शुद्ध सत्त्व ही नष्ट हुआ रहता है इसलिये वे रजोगुण
से काम की ओर आकर अत्यन्त कामासक्त हो जाते हैं। उस समय अप्सराओं के भोग की इच्छा बलवती होकर
स्वर्गसुख की प्रीति बढ़ने लगती है इसलिये यज्ञ आदि प्रारम्भ कर पुण्य बढ़ाने का प्रयास शुरू हो जाता है। तब
वे तंत्र-मंत्र, शुद्धि, द्रव्यशुद्धि अथवा यज्ञयाग का विधि भी नहीं देखते जिससे स्वर्ग प्राप्ति तो नहीं ही होती,
उलटे इस अविधि कृति से वे ठगे अवश्य जाते हैं। जिस प्रकार अंबील अथवा माँड पूरी तरह पकने के बाद
कड़ुई हो जाती है, उसी प्रकार कामी पुरुषों की इच्छा अर्थात् काम तृप्त न होने से उनके शरीर में क्रोध भड़क
उठता है। या जिस प्रकार घीकुआर पकने पर उसकी कडुवाहट बढ़ती जाती है, उसी प्रकार काम का भंग होने
पर क्रोध भड़क उठता है। क्रोध सचमुच ही कालसर्प है। वे द्वेष की फुफकारें छोड़ता रहता है। वह पूज्यता की
कुण्डली बना कर बैठता है और साधु निन्दा की हवा बहाता है। तो यही क्रोध का निवास है। इस स्थान पर तम
की पंचायत बैठती है और देश के खोटे सिक्के वहाँ बिकने के लिये आते हैं। फिर जो भी राह में मिलता है उसे
जन्म-मरण के प्रयोग की लत लगाकर खेचरी, भूचरी आदि बाह्य मुद्रा दिखाकर पापकर्म से पाप की प्रवृत्ति
बढ़ाता है। मुँह से स्वधर्म का पाठ अवश्य पढ़ता है लेकिन अधर्म की खदान खोल कर शुद्ध झूठ कर्माचरण
करता है। इससे पापाचार की फसल पक कर गगन को छूने लगती है। उस समय अच्छे और बुरे एक ही बाट
से अधर्म की तराजू में तौले जाते हैं। अभिमान को आश्रय देकर ज्ञानाभिमान बढ़ाते हैं और फिर साधुजनों की
निन्दा करते हैं, और सज्जनों का उपहास करते हैं। संसार में वे सबमें दोष ही देखना शुरू करते हैं। यदि उसमें
कोई निर्दोष दिखायी देता है तो उसका मजाक उड़ाते हैं और उस पर अनेक प्रकार के आरोप मढ़ते हैं। इस

१९८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
प्रकार जो अभिमान के नशे में रहते हैं उन्हें पाप बुद्धि की बाधा होती है। वे सहज बात भी करते हैं तो उसमें
हमेशा साधुओं की निन्दा ही भरी रहती है। जो श्रीहरि के प्रिय हैं वे सदा हरि की भक्ति करते हैं उनका वे
हमेशा उपहास करते हैं, उनके गुणों की चर्चा भी दोषों के ही रूप में करते हैं। ब्राह्मण जब हरि का नामस्मरण
करने लगते हैं तो उसे 'अधर्म' कहते हैं। नामसंकीर्तन का गजर सुन कर ये उसे 'महापाप' कहते हैं। जो इस
प्रकार हरिनाम की निन्दा तथा उसके प्रति दुर्बुद्धि रखने वाला होगा उसे वास्तव में दुष्ट और भजन वैरी चांडाल
समझना चाहिये।
वदन्ति तेऽन्योन्यमुपासितस्त्रियो गृहेषु मैथुन्यसुखेषु चाशिषः ।
यजन्त्यसृष्टान्नविधानदक्षिणं वृत्त्यै परं घ्नन्ति पशूनतद्विदः ॥ ८ ॥
स्त्रीकाम में बेचैन, मैथुन के सिवा अन्य कहीं सुख नहीं है इस भ्रमात्मक कामासक्ति से मूर्ख बने लोग
निश्चय ही स्त्रियों की ही उपासना करते हैं। इस प्रकार मूर्ख लोग शब्दचातुरी से अपनी मूर्खता का वर्णन करते हैं
कि विविध प्रकार की भोगविधि से स्त्रियों का उपभोग करने में ही मनुष्य जन्म की सिद्धि है। स्त्री समागम में जो
प्रत्यक्ष सुख मिलता है उसे जो छुड़ाना चाहते हैं वे महामूर्ख हैं। उन महामूर्खों ने वैराग्य के नाम पर अनेक लोगों
को ठगा है। घर के अनेक भोगविलास और सुन्दर स्त्री को छोड़कर जिन्हें वैराग्य की उत्कट इच्छा होती है, उन्हें
उनका कर्म ही सजा देता है और उनका भाग्य ही उनका सर्वस्व लूट कर उन्हें जंगल में भेजता है। क्या
गृहस्थाश्रम में भगवान नहीं हैं? इसीलिये पागल की तरह जंगल की ओर दौड़ते हैं ? ईश्वर यदि जंगल में ही
होता तो हिरन, खरगोश और व्याघ्र क्यों नहीं तर जाते ? आसन पर बैठ कर ध्यान करने से ही यदि ईश्वर की
प्राप्ति होती तो शुतुरमुर्ग के झुण्डों का क्यों नहीं उसी क्षण उद्धार हो जाता ? एकान्त गुफा में रहकर यदि ईश्वर
की प्राप्ति सम्भव होती तो बिल में रहने वाले चूहे भवसागर पार न कर चीं-चीं करते क्यों फिरते ? ईश्वर बहुत
बड़ा सर्वज्ञ है। उसने पशु-पक्षियों के युगल ही बना दिये हैं लेकिन लोगों ने उस परमेश्वर को ही पागल बनाकर
सर्वसंगपरित्याग की महिमा इतनी बढ़ा दी है। 'आनन्द का स्थान जननेन्द्रिय है' यह ईश्वर का ही वेद में वचन
है लेकिन अज्ञानी लोग उसकी परवाह न कर त्याग को ही महिमामण्डित करते हैं। ईश्वर ने ही मैथुन में
परमानन्द भर दिया है लेकिन मूर्ख लोग उसका भी त्याग कर वैराग्य लेकर संन्यासी बनते हैं। संसार में जो पागल
हैं वही स्वयं संन्यासी होते हैं। भगवान ही उन्हें दण्ड देकर घर-घर भिक्षा माँगने के लिये भेजता है। अपनी स्त्री
को त्याग कर जो कर्म छोड़कर संन्यासी बनते हैं उन्हें स्त्री शाप की बाधा होकर पेट भर भीख भी नहीं मिलती।
उन्हें यह दण्ड मिला है। मूंछे और सिर मुंडवा कर भगवा वस्त्र लपेट कर घूमना यह विडम्बना भी स्त्री शाप के
ही कारण है। दोनों हाथों में ढेर सारी मिट्टी लेकर वे गुदा में लगाते हैं और तीनों पहर गोता लगाते हैं। ऐसा
दण्ड उन्हें स्त्रीशाप के ही कारण मिला है। चूतड में लंगोटी लगा दी, हाथ में झोली लटका दी, तिस पर हाथ में
दण्ड देकर स्त्री शाप के कारण भीख माँगने के लिए भेज दिया। स्त्री सुख जैसा कोई सुख नहीं है और स्त्री त्याग
जैसा कोई पातक नहीं है यही न समझने के कारण अनेक मूर्खों ने वैराग्यरूप से सर्वसंगपरित्याग कर स्वयं दण्ड
भुगत लिया है। स्त्री संग के सिवा अन्य कितने ही सुख क्यों न हों लेकिन वे उद्वेगरूप ही हैं। सौभाग्य से जो
भाग्यसम्पन्न हैं वही स्त्री संगति से अनेक प्रकार के सुख विलास भोगते हैं। सदासर्वदा इच्छित भोग प्राप्त होना
यही ईश्वर का प्रसाद है और उसका त्याग करना यही ईश्वर का क्षोभ है। प्रत्यक्ष दिखायी देने वाले स्त्रियादि
भोग छोड़ कर मोक्ष की बात करना ही झूठ है। वेदों के वैराग्यवाद ने बेचारे भोले-भाले लोगों का विनाश कर

पंचम अध्याय १९९
दिया है। इस प्रकार की परस्पर चर्चा करने के बाद वे कहते हैं " 'गोविन्दा ! हमें कभी त्याग करने की बुद्धि न
देना। सर्वस्व का त्याग कर भीख माँगने से मर जाना अच्छा है। मुक्ति तो किसी ने नहीं देखी है लेकिन आज की
विपत्ति तो अभी दिखायी पड़ती है। किसी को मुक्ति प्राप्त हुई दिखायी देती, कहीं दिखायी पड़ती तो उसे सच
माना जा सकता था, लेकिन वैसी बात नहीं है, इसलिये वैराग्य से सर्वस्व का त्याग करने की बात व्यर्थ है।' ' इस
प्रकार त्याग की निन्दा कर वे हमेशा भोग की ही बात करते हैं और परस्पर इसी प्रकार का आशीर्वाद देते हैं।
स्त्रीसुख को ही अत्यन्त श्रेष्ठ मानकर हमेशा स्त्रैण बन कर रहते हैं। फिर क्या पूछना ? जागृति में, स्वप्न में तथा
सुषुप्तावस्था में सदा स्त्री का ही ध्यान करते हैं। न सद्गुरु का भजन करते हैं, न बड़ों की पूजा, न अतिथि को
अन्नदान, हमेशा स्त्रियों के अधीन रहते हैं। कहीं स्त्री के मन को ठेस न लगे, कभी स्त्री के वचन का उल्लंघन न
हो, नित्य स्त्री का ही अनुसंधान कर उसके अनुसार आचरण करते हैं। हमेशा सद्भाव से स्त्री की ही आराधना
करना। न कुलदेवता का ध्यान, न कुलवृत्ति की चिन्ता, न माता, पिता अथवा सद्गुरु की भक्ति। रुपया, पैसा सब
कुछ पत्नी के अधीन सौंप कर स्वयं उसके अधीन होकर रहते हैं। ऐसे ये स्त्रीलंपट लोग स्त्रीभोग भोगने के
उद्देश्य से द्रव्यार्जन करने के लिये केवल अहंकारवश उदरभरण के लिये ही यज्ञयाग का प्रारम्भ करते हैं। यज्ञ से
मुझे सभी प्रकार की सिद्धि प्राप्त हो ऐसा विचार भी उस दंभी के मन में नहीं रहता। केवल तात्कालिक निर्वाह
का साधन मिले इसी युक्ति की योजना की रहती है। यज्ञ की दीक्षा लेकर हाथ में यज्ञ का कंगन पहनने से
समाज में मेरी प्रतिष्ठा बढ़ेगी, मैं बड़े-बड़े लोगों के बीच पूजनीय बनूँगा, मुझे अग्रपूजा का सम्मान प्राप्त होगा
ऐसी उत्कट इच्छा मन में रखकर ही वह यज्ञ का प्रारम्भ करता है। निर्वाह तथा प्रतिष्ठा के अनेक विचारों की
योजना मन में पहले से ही करके रखता है और फिर यज्ञयाग की शुरुआत करता है। लेकिन इस काम में भी धन
कमाने का ही उसका दृढ़ निश्चय रहता है। विधिविधान की ओर उसकी दृष्टि नहीं रहती। शुद्ध मंत्रोच्चार के प्रति
आदर नहीं रहता। अन्न को बिना पकाये, सूखे अनाज से ही वह हवन करता है। मैं स्वयं यज्ञ कर रहा हूँ इस
प्रकार वह जनता में प्रचार करता है और यज्ञ के बहाने अपने कुशल मंगल को देखता है। स्वयं तो विधि विधान
नहीं जानता लेकिन जो जानते हैं उनसे भी नहीं पूछता। लेकिन ऐसे शठ, ढोंगी लोग पशु को मारने के लिये
उद्यत हो जाते हैं। फिर यज्ञ का पुरोडाश अर्थात् पशु के मांस का हवन द्रव्य शेष मजे में ग्रहण करते हैं और
अपने पवित्र होने की, निर्दोष होने की घोषणा करते हैं। जहाँ देवता के आवाहन और विसर्जन का ही ठिकाना
नहीं है वहाँ पूजा और दक्षिणा किसे दी जाये ? हाँ, अपने ज्ञान के अभिमान से सत्पात्र का अनादर और अवहेलना
अवश्य करते हैं। केवल उपजीविका के लिये पशु की हिंसा करने लगते हैं और स्वयं याज्ञिक-यज्ञकर्ता होने का
ढिंढोरा पीटते हैं। केवल जीविका के उपार्जन के लिये अविधि से हिंसा करते हैं। इससे मुझे पाप लगेगा ऐसी
चिन्ता भी उसके मन को नहीं छूती।
श्रिया विभूत्याऽभिजनेन विद्यया त्यागेन रूपेण बलेन कर्मणा।
जातस्मयेनान्धधियः सहेश्वरान् सतोऽवमन्यन्ति हरिप्रियान् खलाः ॥ ९॥
ऐसा क्रम चलता रहता है। तिस पर यदि और सम्पत्ति मिल जाय तो फिर क्या पूछना ? मदमस्त हाथी की
तरह वह घमण्ड में चूर होकर डोलने लगता है अथवा नाले में बाढ़ आने पर वह जिस प्रकार सूखे पेड़ों को
बहा ले जाता है अथवा वानर के मुँह में शराब लगने पर वह जिस प्रकार बहक कर बड़बड़ाने लगता है उसी
प्रकार सच्चा ज्ञाता मैं हूँ, यह समझ कर वह उलटा-सीधा नाचने लगता है। मेरे सामने दूसरा कोई ज्ञानी है ही

१२० श्रीमद् एकनाथी भागवत
कौन ? और कहीं सौभाग्य से सुवर्ण, मोती, रत्न आदि मूल्यवान चीजें भण्डारगृह में आ जाएँ और घर के परिसर
में हाथी, घोड़े, पालकी आदि आ जाएँ तो फिर और क्या चाहिये ? वह घमण्ड के कारण इन्द्र के मस्तक पर
लात मारने के लिए भी तैयार हो जाता है। "यज्ञयाग में स्वाहाकार प्राप्त करने के लिए इन्द्र मुझ से आशा करता
है तो फिर उसे मुझसे श्रेष्ठ क्यों समझा जाय ? इसके उपरान्त शिष्य, सगे-सम्बन्धी, सज्जन एवं सेवकजन उसके
चारों तरफ इकट्ठा हो जाएँ तो फिर त्रिभुवन में मुझ जैसा कोई समर्थ नहीं है ऐसा ही वह समझने लगता है।
काँटों से भरे पेड़ के चारों ओर जिस प्रकार हरियाली लिपटी रहती है उसी प्रकार अपने चारों ओर शिष्यों का
जमावड़ा देखकर घमण्ड में वह ध्रुवमण्डल को भी अपने पैरों तले ही समझता है। बिच्छू में विष कम रहता है
लेकिन उसका दर्द भयंकर रहता है उसी प्रकार इसके पास विद्या कम लेकिन घमण्ड मानों बहता रहता है।
जुगनू जिस प्रकार अँधेरे में अपने तेज की चमक दिखाता है, उसी प्रकार वह अज्ञानी लोगों में अपनी सर्वज्ञता
तथा प्रतिष्ठा प्रदर्शित करने लगता है। पर निकली हुई चिउंटी जिस प्रकार गरुड़ के मस्तक पर पैर धरने का
प्रयास करती है उसी प्रकार यह अल्पज्ञ अपनी अल्प विद्या के घमण्ड में बृहस्पति की भी परवाह नहीं करता।
ताँबे के पैसे का एक सिक्का दान में देकर वह उदारता में बली को भी अपने से कम मानता है। वह कहता
है—दानियों में कर्ण को महान समझा जाता है लेकिन हमारे सामने वह नहीं टिक सकता। कर्ण को हर रोज
८०००० तोला सुवर्ण दान के लिये मिलता था, उसकी और हमारी बराबरी कैसी ? जिसके हाथ से हमेशा
अपकार ही होता है उसके हाथ से कभी-कभी उपकार भी हो जाता है लेकिन इतनी सी बात से उसे
गलतफहमी हो जाती है और वह अपना सारा संचित पुण्य खो बैठता है। इस प्रकार जरा से दान से दातृत्व की
शेखी बघारते हुए अपने ही मुँह से मेघ की तरह गर्जना करने लगता है। अपने सौन्दर्य के अभिमान में वह
साक्षात मदन का भी उपहास करने लगता है। सौन्दर्य केवल मुझ में ही है और मेरी बराबरी करने वाला कोई
दूसरा नहीं है ऐसी भाषा वह बोलने लगता है। कौआ अपने सौन्दर्य के आगे राजहंस को भी हेय समझता है
अथवा कछुई अपने को सीता से भी सुन्दर समझती है या जिस प्रकार सामने हरा भरा जंगल देखकर भैंसा
उन्मत्त हो जाता है उसी प्रकार अपने सौन्दर्य के गर्व से वह फूल जाता है और इसके बाद यदि उसके हाथों कोई
पराक्रम हो जाय तो फिर क्या पूछना ? कहता है मेरे सामने श्रीराम, परशुराम और बलराम क्या हैं ? मानों गोग्रहण
के युद्ध में उत्तराने किये हुए पराक्रम का वर्णन हो रहा हो। या फिर जिस प्रकार शारीरिक बल के उन्माद से
जंगली सुअर किसी को कुछ नहीं समझता उसी प्रकार वह शरीर सामर्थ्य की घमण्ड में मदमाता रहता है। ऐसे
लोग प्रारम्भ से ही अपने को ज्ञानी समझते हैं, और अब 'याज्ञिक' कहला कर प्रसिद्ध होते हैं। इसलिए स्वयं
यज्ञकर्म कर लोगों को विस्मित कर देते हैं। मिलने के लिये आने वाले लोगों के सामने अपने कार्यों की बड़ाई
करते हैं तथा अपनी कीर्ति बढ़ाने के लिये अनेक उपाय कर लोगों को बताते हैं। उसके ऐसे मिथ्या कर्माचार में
भी ज्ञातृत्व का अभिमान भरा रहता है। जिस प्रकार उल्लू अँधेरे में बाहर निकलता है उसी प्रकार ये अज्ञजनों के
बीच आत्मस्तुति से विचरते रहते हैं। बकरी की लेंडी जलने पर प्रकाश नहीं देती लेकिन धुआँ फैलाती है, उसी
प्रकार अनेक प्रकार के दंभ तथा गर्व के उन्माद से उनकी सद्बुद्धि अन्धी होकर वह केवल साधुओं की ही नहीं
बल्कि ईश्वर की भी निन्दा करता फिरता है। जिस प्रकार पीलिया होने पर सब कुछ पीला ही दिखायी पड़ने
लगता है उसी प्रकार निन्दावृत्ति तथा घमण्ड के अतिरेक से उसकी बुद्धि की प्रखरता मन्द होने लगती है। वे
निर्दोषी को भी दोष लगाने लगते हैं और निष्पाप को भी पापी समझने लगते हैं। वे कहते हैं—जो समस्त
योगियों का मुकुटमणि है, जिसे धूर्जटी अर्थात् शंकर कहते हैं, उसका व्यवहार देखने पर वह नितांत मलिन

पंचम अध्याय १२१
दिखायी देता है। उमा क्रोध में अग्नि में कूद पड़ी इसलिये उतने याज्ञिक का शिरच्छेद किया और वह कामांध
तो इतना था कि मोहिनी को प्राप्त करने के लिये वह उसके पीछे नग्न होकर दौड़ने लगा। विष्णु तो हमेशा से
ही कपटी था उसमें कोई भी अच्छी बात नहीं दिखायी देतीं। बेचारी वृन्दा कितनी पतिव्रता थी लेकिन उसने उसे
भी व्यभिचारिणी बनाकर छोड़ा। ऐसा व्यभिचारी विष्णु जिस वृन्दा के वृन्दावन में वास करता है, उस वन में जो
जटादाढीधारी लोक एकत्र होते हैं उन्हें भी हम साधु कैसे मानें ? यदि सनत्कुमार को साधु कहा जाय तो उन्हें भी
वैकुण्ठ में अत्यधिक क्रोध आया और उन्होंने श्रीहरि के सेवक जय विजय वीर को अधिक शब्द कहने के
कारण शाप दे डाला। यदि ब्रह्मदेव को श्रेष्ठ कहें तो वह भी हीन और निर्लज्ज है। शंकर के विवाह में पार्वती
को देखकर 'सावधान' कहते ही उसका वीर्य स्खलित हो गया। नारद बहुत बड़ा ब्रह्मचारी था लेकिन उसने भी
जब कृष्ण से उसकी स्त्री माँगी तो कृष्ण ने उसे अच्छी तरह फँसाया। वह स्नान कर रहा था उस समय नारद
की नारदी बनकर साठ पुत्रों को जन्म दिया। जिस युधिष्ठिर को साक्षात 'धर्म' कहते हैं वह भी निखालस
अधर्मी है क्योंकि उसने गोत्रजों की हत्या का प्रयास किया। व्यास तो जारिणी का पुत्र था और उसी कर्म के
कारण पराशर भी हीन सिद्ध होता है। वसिष्ठ और विश्वामित्र के परस्पर द्वेष और ईर्ष्या की बात ही न करें।
यदि दुर्वासा को साधु कहें तो वह भी अम्बरीष का छल करने गया था। प्रह्लाद ने तो खुलेआम पितृद्रोह किया,
फिर उसे भी साधु कैसे कहा जाय ? तो फिर वर्तमान काल में साधु कोई नहीं है ऐसा यदि वे सोचते हैं तो इसमें
आश्चर्य किस बात का ? वे कहते हैं "कुछ तो अद्भुत सुनकर लोग एक के पीछे दौड़ने लगते हैं। कुछ लोग
पेट के लिए कुछ तो बकते रहते हैं। कोई आसन पर बैठ कर मुद्रा लगाते हैं, कोई बगुले की तरह ध्यान लगाकर
बैठते हैं लेकिन मन जिस पर विश्वास करे ऐसा एक भी साधु नहीं दिखायी देता।" इस प्रकार वे जानबूझ कर
साधुओं की निन्दा करते रहते हैं। संसार में कोई साधु भी है इस बात पर उन्हें विश्वास नहीं होता। जिस प्रकार
बकरे के सामने दर्पण रखने से वह आगबबूला हो उठता है उसी प्रकार साधु का नाम सुनते ही उसका पारा चढ़
जाता है। जो हरि के अत्यन्त प्रिय हैं उनसे वह घृणा करता है। जिस ईश्वर के आदेश से वे विचरण करते हैं
उसे ईश्वर मानने को वे तैयार नहीं होते। हे राजा ! ऐसे उस ईश्वर के बारे में तुम्हें बताता हूँ।
सर्वेषु शश्वत्तनुभृत्स्ववस्थितं यथा स्वमात्मानमभीष्टमीश्वरम्।
वेदोपगीतं च न शृण्वतेऽबुधा मनोरथानां प्रवदन्ति वार्तया ॥ १०॥
जो समस्त प्राणियों में भेदभावरहित तथा सदैव अखण्ड भरा रहता है, जो सब में समसमान रूप से रहता
है, कल्पांत में भी कभी न्यून नहीं होता, जो सब में सर्वकाल रहता है लेकिन व्यापकता उसे स्पर्श नहीं करती,
जिस प्रकार कमलपत्र जल में रहते हुए भी उससे अलिप्त रहता है उसी प्रकार सभी लोगों में रहते हुए भी उसका
लोकव्यवहार से सम्बन्ध नहीं रहता। हे राजेश्वर ! आकाश जिस प्रकार सभी पदार्थों को अंतर्बाह्य व्यापते हुए भी
उनसे अलिप्त रहता है उसी प्रकार अलिप्तता कायम रखते हुए वह अनन्त ब्रह्माण्ड की रचना करता है और
अकर्ता रहते हुए भी उन असंख्य ब्रह्माण्डों को अपने स्वरूप में चलाता है। इसीलिये उसे वेदों में अंतर्यामी के
नाम से जाना जाता है। वही सभी के हृदयों में स्थित चैतन्य के रूप में पहचाना जाता है। ऐसे उस ईश्वर का
निरन्तन ध्यान किया जाय, मन में चाह रखकर मुख से उसका नाम लिया जाय तो वह अभीष्ट पूर्ति की अखण्ड
वर्षा करता है। उस ईश्वर की कथाओं का गायन करने से समस्त संकटों का नाश होता है। उसे देखने से वह
प्रसन्न होकर स्वानंद की वर्षा करता है। सारांश यह कि सुखदाता भी वही है और शास्ता भी वही है। काल का

१२२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
नियंता भी वही है। उसके भय से काल भी अपनी इच्छा से अपनी सत्ता नहीं चला सकता। उसके भय से
प्राणियों का श्वासोच्छ्वास नियमित समय से चलता रहता है, उसके भय से वायु भी आकाश में मंद गति से तथा
निश्चित परिमाण में बहता रहता है। उसके भय से पृथ्वी जल में रहते हुए भी समुद्र उसे अपने में घोल नहीं
सकता। उसकी आज्ञा से सूर्य ठीक ढंग से दिनमान चलाता है और जिसकी पुरातन आज्ञा से सूर्य अपनी सीमा
का उल्लंघन नहीं करता। वेद जिसका सदा गायन करते हैं, उपनिषद जिसका वर्णन करते हैं, जिसकी यशगाथा
दुष्ट बुद्धि के लोग कभी कान से भी नहीं सुनते। जिसके नाम का स्मरण करने मात्र से समस्त पापों का विनाश
होता है, यम भी जिसके चरण छूता है और जो भक्तों को जन्ममरण से मुक्त करता है, जिसका चरित्र कर्णपथ पर
पड़ते ही विकल्प रसातल में पहुँच जाते हैं और देखते-देखते परब्रह्म से एकत्व प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार यह
पवित्रता की मूर्ति जिसका वेद सर्वकाल स्तवन करते हैं, उसकी कीर्ति का श्रवण न कर ये अभागे लोग केवल
मनोरथ की बातें करते रहते हैं। रीछ जब अपने गुर्राने में मगन रहता है उस समय उसे जिस प्रकार रणभेरी की
आवाज नहीं सुनायी देती उसी तरह हरि के गुणानुवाद न सुन वे अत्यन्त रुचि से विषय की ही चर्चा करते रहते
हैं। इसीलिये वे नितांत मूर्ख, उद्धत तथा हमेशा सुस्त और विषयांध होकर क्षुब्ध बने रहते हैं।
लोके व्यवायामिषमद्यसेवा नित्यास्तु जन्तोर्न हि तत्र चोदना।
व्यवस्थितिस्तेषु विवाहयज्ञसुराग्रहैरासु निवृत्तिरिष्टा ॥ ११ ॥
वेदों द्वारा प्रेरित न होते हुए भी सभी लोगों की सदासर्वकाल विषय के प्रति सहज ही वासना रहती है।
मांसभक्षण, मद्यपान तथा स्त्रीसहवास इन बातों के प्रति लोगों की हमेशा तीव्र वासना रहती ही है। उसमें सेवन
करने योग्य क्या है और क्या नहीं है इसका विचार कौन करता फिरेगा ? एक बार विषय का चस्का लग जाय तो
फिर वे लोग अनर्थ करने के लिये आगापीछा नहीं देखेंगे। कपास में जब आग लग जाती है तो वह बुझने का
नाम नहीं लेती उसी प्रकार विषय लंपट पुरुष के मन में विवेक सहसा उत्पन्न नहीं होता। मछली जब बंसी में
लगे मांस की ओर आकर्षित होती है तो फिर वह अपनी मृत्यु के बारे में भूल जाती है या बन्दर मुट्ठी भर चने के
लालच में स्वयमेव नलिका में फँस जाता है या जिस प्रकार दूध मिल जाने पर बिल्ली इस बात का विचार नहीं
करती कि वह ब्राह्मण के घर का है या अंत्यज के घर का, उसी प्रकार विषय में उन्मत्त लोग क्या सेवन करने
योग्य हैं और क्या नहीं हैं इसका विचार नहीं करते। इस प्रकार बढ़ती हुई विषय वासना के कारण कहीं भविष्य
में वर्ण समस्या न उत्पन्न हो इसलिये वेदों ने धर्म और आश्रम इस प्रकार विभाग बना दिये। पृथ्वी का पृष्ठ भाग
विशाल होने के कारण वहाँ सप्तद्वीप बना कर उन भिन्न-भिन्न विभागों पर विभिन्न अधिकारियों की व्यवस्था की।
वर्षा चारों ओर नियोजित ढंग से नहीं होती इसलिये वर्षा का जल बाँध बनाकर तालाबों तथा जलाशयों में एकत्र
करते हैं। फिर खेती के लिये उस जल को उपलब्ध कराने के लिये नहरें बनाते हैं। वाद्यकार जिस प्रकार बाँस से
वाद्य तैयार करते हैं और फिर विविध प्रकार की मधुर ध्वनि से उस वाद्य को बजाया जाता है उसी प्रकार विषय
की लत से कहीं लोग उच्छृंखल न हो जाएँ इसलिये वेदों ने वेदों ने नियम बना दिये हैं। उस वेदाज्ञा के बारे में
तुम्हें बताता हूँ। योनिभ्रष्टों पर नियंत्रण रखने के लिये स्त्रीसंग के लिये विवाह संस्कार का बन्धन लगाया तथा
विशिष्ट वर्णों की योजना कर उस पर नियंत्रण किया। यदि ब्राह्मण धोबिन के पास जाता है तो उसे वह संभोग
कड़ुआ नहीं लगता अथवा यदि धोबी ब्राह्मणी के पास जाता है तो वह स्त्रीसंग उसे तीता नहीं लगता। किन्तु चाहे
जो स्त्री और चाहे जिस पुरुष का संयोग होने से वर्णसंकर उत्पन्न होता है इसे टालने के लिये वेदों ने विवाह की

पंचम अध्याय १२३
व्यवस्था की। धर्मपत्नी बनाने के लिये पाणिग्रहण करना हो तो सजातियों में ही विवाह होना चाहिये ऐसा
निश्चित किया गया है। उसमें भी स्वगोत्र में विवाह नहीं करना चाहिये और परगोत्र में भी सप्तम पंचम छोड़कर
(बाप की सात तथा माँ की पाँच पीढ़ियाँ त्याग कर) विवाह करना चाहिये। तीन वर्ण और तीन वेद छोड़कर
अर्थात् उनमें मिश्रता न उत्पन्न हो इसका ध्यान रखकर सवेद तथा सवर्ण में ही विवाह करना चाहिये ऐसा निश्चय
वेदों ने कर रखा है। जो सवेद और सवर्ण हो और जिसे अभी रजोदर्शन न हुआ हो ऐसी कन्या उसके पिता से
माँग कर ही यथाविधि विवाह करना चाहिये। धर्म, अर्थ और काम किसी अन्य स्त्री के साथ नहीं करूँगा यह
शपथ लेकर ही वेदोक्त रीति से विवाह करना पड़ता है। वधुवर द्वारा पाणिग्रहण करते समय ब्राह्मण, देवतागण
तथा अग्नि साक्षी के रूप में रहते हैं इसलिये अन्य स्त्रियों को माता के समान मानना चाहिये। वेदों ने पुरुष के
लिये स्वस्त्रीगमन ही निश्चित कर रखा है। इस प्रकार विवाह की व्यवस्था कर वेदों ने यह आज्ञा दी है कि अन्य
सभी स्त्रियों को त्याग कर केवल अपनी स्त्री के साथ ही रमण करना चाहिये। दिन में स्त्रीसंग नहीं करना
चाहिये, रात्रि में भी पहला और अन्तिम पहर छोड़ कर मध्यरात्रि में ही संभोग करना उचित है। अपनी स्त्री से
संग करना चाहिये यह निश्चित होने पर भी रातभर संग करना उचित नहीं है। केवल सन्तानोत्पत्ति के ही लिये
स्त्रीसंग करना चाहिये और वह भी उस समय जब ऋतुकाल चल रहा हो। जो पुरुष ऋतुकाल में स्वस्त्री से भोग
करते हैं वे सचमुच ब्रह्मचारी ही हैं। वेद निवृत्ति की ही संस्तुति करते हैं। उन्होंने त्याग के साथ भोग का नियमन
किया है। 'आत्मा वैपुत्रनामासि' पुत्र के रूप में हम स्वयं ही जन्म लेते हैं। इसलिये स्त्री को पुत्रोत्पत्ति होने पर
उसके साथ सहवास नहीं करना चाहिये। यह कहकर वेद धीरे-धीरे विषय का त्याग कराता है। अब मांस खाने
पर वेदों ने किस प्रकार प्रतिबन्ध लगाया जरा देखें। पशु हिंसा न हो इसलिये उन्होंने उसमें अनेक संकट और
प्रतिबन्ध पहले से ही लगा रखे हैं। जिह्वा की रुचि के लिये अथवा स्वर्ग प्राप्ति की आशा से जो कोई पशु का
वध करेंगे उन पुरुषों को नरक प्राप्त होता है। निष्काम कर्म के लिये पशु का वध किया लेकिन वह निष्काम
कहाँ हुआ ? इसलिये वेदों का यह कहना है कि सभी धर्मों में अहिंसा प्रमुख है। रोज-रोज मांसभक्षण न कर
सके इसलिये वेदों ने यज्ञ में बचा हुआ अवशेष ग्रहण करने के लिये कहा है और वह भी बिलकुल परिमित
मात्रा में कह कर वेदों ने मांसभक्षण का निषेध ही किया है। अब मद्यपान के नियंत्रण के सम्बन्ध में बताते हैं।
'सौत्रामणि' नामक यज्ञ कर फिर मद्यपान करना चाहिये ऐसी वेद की आज्ञा को जो मानता है वह स्वधर्म से च्युत
हो गया ऐसा समझना चाहिये क्योंकि जिस कर्म में मद्यपान होता है उसे यदि स्वधर्म कहा जाय तो जीभ टूट कर
गिर जायेगी। बेचारे लंपट बने हुए लोग वेदों को विषयवासना की ओर घसीटते हैं। 'सौत्रामणि' यज्ञ यदि किया
हो तो भी स्वयं मद्यपान नहीं करना चाहिये, यज्ञ में बचा हुआ मद्य केवल सूँघना चाहिये लेकिन मुँह में नहीं
डालना चाहिये। मैथुन, मांस भक्षण तथा सुरापान ये विषयों के तीन प्रकार हैं, उनका त्याग करना चाहिये यही
निश्चित अर्थ है। त्याग ही वेदों का वास्तविक उद्देश्य है। वर्णाश्रम धर्म के माध्यम से वेद विषयों से निवृत्त होने
की ही बात कहते हैं। वह कभी भी विषयासक्ति की बात नहीं करता। अपना धन खर्च कर विवाह के लिये यज्ञ
करने तथा मद्य, मांस और मैथुन की बात वेद करें यह सम्भव ही नहीं है।
धनं च धर्मैकफलं यतो वै ज्ञानं सविज्ञानमनुपशान्ति।
गृहेषु युञ्जन्ति कलेवरस्य मृत्युं न पश्यन्ति दुरन्तवीर्यम् ॥ १२ ॥
ज्ञानाभिमानी लोग भगवान की कथा न सुनने के कारण त्रस्त रहते हैं। वास्तव में वह धन से परमार्थ की