श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११० श्रीमद् एकनाथी भागवत
छल किया। लेकिन बली का प्रभाव प्रबल होने के कारण उसने देवता को द्वारपाल बना दिया। इस प्रकार विष्णु
भक्तों की परीक्षा लेने के लिये उनका काफी छल करते हैं लेकिन अन्त में वह दयानिधि स्वयं ही दासों का दास
बन जाता है। इस प्रकार बली का छल कर वामन ने सारा दिगमण्डल अपने अधिकार में कर लिया और उसे
देवताओं को अर्पित कर उन्हें सुखी किया।
निःक्षत्रियामकृत गां च त्रिःसप्तकृत्वो रामस्तु हैहयकुलाप्ययभार्गवाग्निः।
सोऽब्धिं बबन्ध दशवक्त्रमहन्सलङ्कं सीतापत्तिर्जयति लोकमलघ्नकीर्तिः ॥ २१ ॥
वही देवदेवोत्तम देवाधिदेव स्वयं 'परशुराम' बना और उसने अपने प्रताप से समस्त क्षत्रियों का पराक्रम
व्यर्थ कर दिया। वह गो ब्राह्मणों का महान हितैषी था। उसने सहस्रार्जुन का वध कर उसके सहस्रबाहु के अनेक
टुकड़े कर डाले और दैत्यों के समस्त कुलों को रसातल तक पहुँचाया। जमदग्नि का क्रोध परशुराम के तेज से
प्रज्ज्वलित होकर उसने हैहयकुल को भस्म कर क्षत्रियों की पृथ्वी को भून डाला। उसने इक्कीस बार वीररस
देकर क्षत्रियों का उन्माद रोग नष्ट किया तथा भूदेवता को धरती का आधिपत्य सौंप दिया। इसके बाद सभी
अवतारों में जो श्रेष्ठ था, जिसकी वीरवृत्ति अत्यन्त उज्ज्वल थी, वह सभी अवतारों में श्रेष्ठ श्रीराम हुआ। उस
राम के नाम से समस्त पातक भाग जाते हैं, उसका नामस्मरण करने वाले के चरणों में यम भी लीन हो जाता है।
गणिका के सारे कर्म, अकर्म रामनाम से ही नष्ट हो गये। उसके नाम से कलि भी थरथर काँपने लगता है,
यमदूतों की कोई परवाह नहीं करता, रामनाम के स्वर से जन्म-मरण समूल नष्ट हो जाता है। जिसने देवताओं के
बन्धन खोले, नवग्रहों की बेड़ियाँ तोड़ीं और जिसने त्रैलोक्य में रामराज्य का झंडा फहराया, जिसके सामर्थ्य से
समुद्र पर शिलायें तर गयीं, क्षुद्र वानरों ने राक्षसों को मारा और सुवर्ण की लंका शरणागत विभीषण को सुपुर्द
की। प्रताप का वह साक्षात पुतला जिसने सहज ही समुद्र पर सेतु बनाया, जिसने अपने चरणों से शिला का उद्धार
किया और जो स्वभक्तों के लिए प्राणों से भी अधिक प्रिय है। हे राजा ! वह साक्षात अवतार आज भी संसार में
विचरण कर रहा है। (एकनाथ कहते हैं) यह भाषण त्रेतायुग में द्रुमिल मुनि राजाजनक को सुना रहे हैं। इसलिये
'श्रीराम राम' इस से जो नित्य जप करता है वह पुरुषों में पुरुषोत्तम रहता है तथा कर्माकर्म से अतीत रहता है।
राम का यह नाम यदि अकस्मात् कर्णपुट में प्रवेश करता है तो उस नामघोष से कलिसम्बन्धी सभी पापों का
विनाश होता है। रामनाम की महिमा ऐसी है। रामनाम ने जगत का उद्धार कर अपनी कीर्ति फैला रखी है। उस
राम का चरित्र जो गाते हैं या सुनते हैं, वे धन्य हैं।
भूमेर्भारावतरणाय यदुष्वजन्मा जातः करिष्यति सुरैरपि दुष्कराणि।
वादैर्विमोहयति यज्ञकृतोऽतदर्हान् शूद्रान् कलौ क्षितिभुजो न्यहनिष्यदन्ते ॥ २२ ॥
हे राजाधिराज ! अब तुम्हें अगले अवतारों की कथा सुनाता हूँ। वह अवतार श्रीकृष्ण का है। उसकी कथा
अत्यन्त अद्भुत और विचित्र है। जो परा से परात्पर, जो अजन्मा होते हुए भी अक्षर और श्रुतिशास्त्र के लिये भी
जो अगोचर है ऐसा वह श्रीकृष्ण पूर्णावतार है। जिसे नाम देना कठिन है, जहाँ रूप का प्रश्न ही नहीं उठता
जिसके लिये ब्रह्मतत्त्व शब्द भी अपूर्ण है ऐसा जो श्रीकृष्ण है वह अवतार है इसे ध्यान में रखो। जो वर्णाश्रम को
स्पर्श नहीं करता अर्थात् जो वर्णाश्रम से परे है, जिसे ईश्वरत्व का स्पर्श भी सहन नहीं होता, जो वास्तव में
अहा और अव्यय होकर स्वानंद में निमग्न रहता है ऐसा वह स्वलीला से धारण किया हुआ श्रीकृष्णावतार है।
इस प्रकार वह श्रीकृष्णनाथ का अवतार गुणधर्म कर्मातीत है। वह जगत का नाथ स्वयं ही, अपनी ही इच्छा से