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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 122, कुल 869 में से

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पृष्ठ 122

भक्तों को विघ्न कोई बाधा नहीं पहुँचा सकते। काम हरिभक्तों को छलने जाता है तो काम के हृदय में भी श्रीहरि
का ही वास्तव्य उन्हें दिखायी देता है और जो विघ्न रहता है वही उनके लिये निर्विघ्न हो जाता है। सारांश भक्तों
को स्वप्न में भी विघ्न का भय नहीं रहता। विघ्न विरोध उत्पन्न करता है लेकिन विघ्न के भीतर बाहर श्रीहरि ही
होने के कारण जो विरोध है वही निजभक्तों के लिये महाबोध तथा स्वानन्द का कन्द होता है। जिन्हें तुम्हारे
चरणों पर श्रद्धा होती है उनके लिये विघ्न में से ही परमार्थ प्रगट होता है। इस प्रकार भावबल के साथ सर्वसमर्थ
तुम अपने भक्तों के लिये निरन्तर सहायक बनते हो। इस प्रकार भक्त सभी विघ्नों को पराजित कर इन्द्रपद के
पाथे पर पैर रख, तुम्हारी कृपा से परमार्थ पद तक पहुँचते हैं। भगवान जिसकी सुरक्षा के लिये तत्पर रहते हैं,
उसे छलने के लिये भी जब विघ्न दौड़ पड़ते हैं तो फिर गरीब सकाम लोगों की क्या कथा है? तो हे राजा
जनक ! उनकी भी कथा सुनाता हूँ। मन में विषय कामना रखकर जो इन्द्रादि देवों को बलिदान देने के लिये यज्ञ
आदि के चक्कर में पड़ते हैं उन्हें भगवान कोई विघ्न नहीं पहुँचाते। इन्द्र याज्ञिकों का राजा है और सकाम यज्ञ
करने वाले ये देवताओं की प्रजा है। वे उन्हें उत्तमोत्तम यज्ञभाग अर्पण करते हैं। वह बलिपूजा मिलते ही वे उन्हें
विघ्न नहीं करते। लेकिन काम आदि उन्हें कष्ट नहीं देते क्योंकि वे निष्काम को कभी स्पर्श नहीं करते। वे सहज
ही काम के वश में रहते हैं क्योंकि वे सदा सकाम कर्मों को ही करते हैं। अब जो मुझ काम के वश में होते हैं वे
अपना तप खर्च कर भोग भोगते हैं, लेकिन जो क्रोध के चक्कर में फँसते हैं वे व्यर्थ ही तप से हाथ धो बैठते हैं।
क्षुत्तृट्त्रि कालगुणमारूतजैह्वशैस्यानसमानपारजलधीनतितीर्य केचिंत।
क्रोधस्य यान्ति विफलस्य वशं पदे गोर्मजन्ति दुश्चरतपश्च वृथोत्सृजन्ति॥ ११॥
प्राणायाम से प्राणापान की गति का निरोध कर, निजप्राण को वश में कर वायु, वर्षा, जाड़ा, धूप आदि
सहन कर जो अनुष्ठान में व्यस्त रहते हैं, क्षुधा और तृष्णा का संयमन कर जिह्वा और शिश्न पर नियंत्रण कर मुझ
काम को जीत लिया यह मानकर अहंकार से उन्मत्त होते हैं। वे क्षुद्र अपमान से क्रुद्ध होकर क्रोध के अधीन
होकर शाप देते हैं और अपनी निष्ठा और तपसम्पत्ति व्यर्थ ही खो देते हैं। सकाम अनुष्ठान कर मुझ काम की
संगति से पुष्पमाला, चन्दन (इत्र आदि) तथा स्वर्ग की अप्सराओं के भोग भोग कर अमृत का भी प्राशन करते
हैं। लेकिन ऐसे भोग देने वाले मुझ काम की उपेक्षा कर जो क्रोध के वश में हो जाते हैं वे एकाध प्रखर शाप
देकर अपने सारे तप पर पानी फेरते हैं। विराट समुद्र तैर कर पार करने वाला कोई जैसे गाय के पैरों में एकत्र
पानी में डूब जाय उसी प्रकार मुझ काम को जो जीत लेते हैं वे भी अपने क्रोध के कारण दुःख भोगते हैं। मुझ
काम की अतृप्ति में जो स्थिति है वही क्रोध के लिये सुदृढ़ स्थिति है। लेकिन काम, क्रोध ये अभक्तों का छल
करते हैं, हरिभक्तों के आगे उनकी कुछ नहीं चलती। तुम्हारे भक्तों को भी जब काम क्रोध का बन्धन नहीं बाँध
सकता तो फिर तुम भक्तपति नारायण को हमारे काम की कैसे बाधा हो सकती है? तुम्हारी महिमा न मालूम होने
के कारण हम अपना धर्म चलाने के लिये यहाँ आये। लेकिन हे कृपालु पुरुषोत्तम ! तुम्हारे पास तो सर्वदा क्षमा ही
वास कर रही है।
इति प्रगृणतां तेषा स्त्रियोऽत्यद्भूतदर्शनाः।
दर्शयामास शुश्रूशां स्वर्चिताः कुर्वतीर्विभुः॥ १२॥
अपकारी पर उपकार करना इसी को 'निर्विकार शान्ति' कहते हैं। उसी शान्ति की पूर्णावस्था विघ्नकर्ता को
हरी ने (नारायण ने) दिखला दी। कामादिकों ने अपनी स्थिति निवेदन कर अनेक प्रकार से नारायण की स्तुति