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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 127, कुल 869 में से

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पृष्ठ 127

चतुर्थ अध्याय १११
यादवों के वंश में उत्पन्न हुआ। जिस प्रकार उफनता समुद्रं चंचल भासित होता है, वास्तव में वह जल ही रहता
है अथवा काली, श्वेत, बलुई पीली मिट्टी अलग प्रकार की मालूम होने पर भी जमीन का ही भाग रहती है
या शक्कर के बड़े ढेर में जो मिठास रहती है वही मिठास उस राशि में से निकाले हुए छोटे हिस्से में भी रहती
है, उसी प्रकार यादवों के कुल में श्रीकृष्ण का अवतार पूर्णांश से हुआ था। जिस प्रकार दीपक जलाते ही
प्रकाश का पुंज बाहर आता है, उसी प्रकार श्रीकृष्ण का जन्म होते ही उन्होंने अद्भुत कार्य किये। जो
ब्रह्मदेवादिकों से भी नहीं हो सकता है वह सब देवाधिदेव श्रीकृष्ण ने बाललीलाओं के रूप में ही कर
दिखाया। मुख से दावाग्नि निगल लिया, नख से पर्वत उठाया, पूतना के स्तन का विष अपने मुँह से उसके
प्राणों के साथ चूस लिया। बछड़े चुराने के बहाने उसने ब्रह्मदेव को भी पागल बना दिया। वह बछड़े और गोप
वह स्वयं ही हो गया। अघासुर का जबड़ा चीर कर उसके टुकड़े कर दिये, कालिया सर्प का विष निकाल
लिया, यमलोक की तलाशी लेकर वह गुरु के पुत्र को वापस ले आया। प्रजा को पीड़ा देकर जो कर वसूल
करते हैं, जिन्हें धर्म और नीति अच्छी नहीं लगती, ऐसे धरती के लिए जो केवल भारस्वरूप हैं ऐसे कितने ही
राजाओं को उसने मार गिराया। उनमें से अनेक का सेना की सहायता से, कितनों का तो स्वयं ही और अनेकों
का किसी युक्ति से वध किया। किसी के घर भाई-भाई में ही कलह उत्पन्न कर उनका काम तमाम किया और
किसी का अग्रपूजा के बहाने ही वध किया। राजा! यह श्रीकृष्ण अधर्म को प्रताड़ित करेगा, धर्म की महिमा
बढ़ायेगा ये कौतुक भरी बातें तुम्हें विशेष रूप से दिखायी देंगी। जैसे-जैसे समय व्यतीत होगा वैसे-वैसे वह
अपने नये-नये चरित्र दिखायेगा और जो उसके असीम भक्त होंगे वही उसके सुख के लिये पात्र होंगे। साधुओं
के लिये तो नित नये स्वानंद समारोहों की बाढ़ आयेगी। हे राजाधिराज ! उस श्रीकृष्ण की लीला तुम भी अपनी
आँखों से देखोगे। वही जब आगे जाकर 'बौद्धरूप' लेकर दृढ़ मौन व्रत का पालन करेगा तब किसी को मालूम
ही नहीं हो पायेगा कि कर्म क्या है और अकर्म क्या है ? वह सर्वदा तटस्थ रह कर बड़े-बड़े वाद उत्पन्न करेगा
और वादों के बहाने मद और महामोह मचा रहेगा। वह दुर्धर मोह उत्पन्न करेगा, कोई दांभिक कर्म करेंगे,
कितने ही धर्मभ्रष्ट होंगे वह अपना आत्महित किस बात में है इसे नहीं समझ पायेंगे। ऐसे मत का प्रचार होगा
जिसमें लोग वेदों को ही झूठा कहना शुरू कर देंगे। वेदविहित को न पहचानना यही सचमुच में बलवान मोह
है। कितने ही मोह में फँसेंगे, कितने ही लोगों का ज्ञान का अभिमान सर्वोच्च शिखर पर पहुँच कर वे सारे कर्मों
की निन्दा करेंगे और वह केवल मूर्खता है यह जानकर वे सभी कर्मों को त्याग देंगे। इस प्रकार की मोहमय
स्थिति उत्पन्न होने पर कलियुग की प्रवृत्ति होगी और नीच लोग राजा होकर प्रजा को लूटना-खसोटना शुरू
करेंगे। शूद्रों से भी कनिष्ठ जाति के लोग बड़े-बड़े राजा होंगे। वे अत्यन्त पापी राजा वर्णावर्ण को भ्रष्ट करेंगे।
किसी भी व्यक्ति को बिना किसी अपराध के दण्ड देंगे। राह चलने वालों को पकड़कर उनका सर्वस्व लूट
लेंगे। राजा वास्तव में दुर्बलों की शक्ति होता है वह राजा स्वयं ही जनता को लूटना शुरू कर देगा। राजाओं में
इस प्रकार शुरू होने वाला अधर्म भगवान को सहन नहीं होगा। जब धर्मानुसार जीवन अधर्मियों को दुःसह
होगा तभी श्रीनारायण को 'कल्कि' नामक अवतार धारण करना पड़ेगा। वह (कल्की अवतार) प्रबल शस्त्र की
धार से दुष्ट राजाओं का संहार करेगा, महामोह का मूल ही तोड़ डालेगा। तब धर्म का उदय होगा, सत्य की
चार गुना वृद्धि होगी और वेदोक्त कर्म चालू होकर सब लोग स्वधर्म से व्यवहार करने लगेंगे।
एवंविधानि कर्माणि जन्मानि च जगत्पतेः ।
भूरीणि भूरियशसो वर्णितानि महाभुज ॥ २३ ॥