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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 129, कुल 869 में से

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पृष्ठ 129

पंचम अध्याय
हे ओंकारस्वरूप सद्गुरु देव ! तुम्हें मेरा नमस्कार है। यदि तुम्हें उदार कहें तो तुम अत्यन्त कंजूस दिखायी
देते हो। अपने घर आये याचक से भेंट होते ही तुम उसे निगलने के लिये दौड़ पड़ते हो। उसे देखते ही उसे
उसके प्राणों सहित आत्मसात कर लेते हो। जो भी कोई तुम्हारे पास माँगने के लिये आते हैं उन्हें बाँध कर तुम
उन्हें अपने ऐक्यरूप में समा लेते हो। उन्हें छुड़ाने के लिये स्वप्न में भी किसी दूसरे से भेंट नहीं होती। तुम्हारी
अणुमात्र प्राप्ति भी जिसे हो जाती है, उसकी इहलोक की सम्पत्ति नष्ट हो जाती है। ठग का बीड़ा खाने से वह
अपने ही लिये घातक होता है, उसी प्रकार जब तुम प्रसन्न होते हो तो दूसरे के प्राण ही नष्ट हो जाते हैं। जो भी
कोई तुम्हारे पास कुछ माँगने के लिये आया उन्हें तुमने पूरी तरह लूट ही लिया, अन्त में वे नग्न स्थिति में
निर्लज्ज होकर त्रिभुवन में घूमने लगे। तुम्हारी ऐसी निर्वाणस्थिति के रहते तुम्हें उदार कौन कहेगा ? तो उसका भी
चमत्कार सुनो। इससे पहले जिनका 'उदार' के रूप में वर्णन किया है उन्हें भी तुमने आत्मसदृश कर लिया है
और फिर उन्हें उदारतापूर्वक अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया है। षड्गुण ऐश्वर्य वैभव के साथ तुमने स्वयं को ही
दान में दे दिया और वह दिया हुआ दान तुम कल्पांत में भी वापस नहीं लेते। स्वयं का ही दान देने के कारण तुम
दासों के ही अधीन रहते हो और इसलिये तुम उनकी ही इच्छा से नाचते फिरते हो। बली ने अपना सर्वस्व दान
दिया लेकिन अन्त में तुम उनके ही अधीन हो गये और अभी तक उसके घर के दरवाजे पर रखवाली करते हो।
धर्मराज ने तुम्हें अग्रपूजा दी लेकिन अन्त में तुम उनकी सेवा करने लग गये। उसके लिये स्वयं अनेक प्रकार के
संकट सहे, यहाँ तक कि उनकी जूठन भी उठायी अपने भक्त अम्बरीष का गर्भवास भी तुमने सहन किया। हे
ऋषिकेश ! ग्वालिनों ने तुम्हारा पालन-पोषण किया, लेकिन अन्त में उनकी सुरक्षा तुमने ही की। सारांश यही कि
भक्तों को स्वस्वरूप देने की उदारता केवल तुझमें ही है। हे दयालु ऋषिकेश ! यह सामर्थ्य दूसरों में नहीं है। इस
प्रकार तुम उदार होते हुए राजा और रंक दोनों के लिये समान हो। जहाँ भाव रहता है वहाँ तुम निश्चयपूर्वक मिल
जाते हो। तुम्हारी प्राप्ति के लिए योगी गिरिकन्दराओं में जाकर बैठते हैं, कोई भोगों का त्याग कर विरक्त होकर
बैठते हैं और कुछ तो सर्वस्व का ही त्याग करते हैं। कुछ दसों दिशाओं में भटकते रहते हैं। कोई तुम्हारे लिये
पागल हो जाते हैं लेकिन उन्हें क्षण भर के लिए तुम्हारा स्वप्न में भी दर्शन नहीं हो पाता। लेकिन ऐसे लोगों के
लिये भी तुम्हारी प्राप्ति एक रीति से सुलभ है। यदि वे संतचरणों में अत्यन्त भक्तिभाव से एवं असीम भाव से रंग
जाएँ तो उन्हें तुम्हारी प्राप्ति हो सकेगी। जो संतचरणों में रंग जाता है उसे आत्मप्राप्ति सहज ही होती है क्योंकि
सर्वव्यापी परमात्मा संतस्वरूप में अवतीर्ण हुआ रहता है। इसलिये संतों के जो रूप हैं वे श्रीहरि के भी रूप हैं।
इसलिये संतों की कृपा प्राप्त करने के लिये अत्यन्त उत्कंठा से प्रयास करना चाहिये। उन्हें ज्ञानार्थ की पिपासा है
इसलिये मैं इस ग्रन्थ के बहाने उनके चरणों की सेवा करूँगा। संतों की कृपादृष्टि यही मेरी आँखों का अंजन है।
उनकी चरणकृपा का उदय होते ही जनार्दन स्वामी प्रकट हो जाते हैं। उनकी सेवा को गुरुत्व का नाम देकर
निजस्वभाव के अनुसार जीवभाव के साथ भजन के लिये अग्रसर हो रहा हूँ। भज्य, भजक तथा भजन इन तीन
भावनाओं को एक ही चिदात्मस्वरूप में दिखला कर जगजीवन की निजभक्ति श्रीजनार्दन में की जा सकती है।
यही विशुद्ध अभेदभक्ति है। इसमें परम ऐक्य के योग से भजन में अधिक मधुरता आती है और भक्तों की रुचि