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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 128, कुल 869 में से

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पृष्ठ 128

११२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
हे राजन! भगवान के नाम, उसके अवतार, जन्म, चरित्र तथा कर्म अनन्त हैं, उस श्रीहरि की कीर्ति भी
अनंतोत्तम है। इस प्रकार उस भगवान की महिमा अगाध है। उसके जन्म और कर्म का कोई अन्त नहीं है। हे
पुरुष श्रेष्ठ उसकी यह महिमा तुम्हें संक्षेप में बतायी। ऐसे अवतारचरित्र तथा उनके नाम, कर्म आदि सुनकर राजा
के मन में प्रेम का सागर उमड़ पड़ा और उसका मनोधर्म शान्त हुआ। प्रत्येक अवतार के समय भगवान सगुण
आकार अवश्य लेता है लेकिन वह स्वयं निर्गुण के गुण प्रकट करता हुआ कर्माचरण करके दिखाता है। जो हरि
के सेवक भगवान का गुणवर्णन करते हैं, जिनके भाषण से श्रोताओं का हृदय शान्त होता है, वे अत्यन्त धन्य हैं।
जब श्रोताओं की श्रवणवृत्ति शान्त होती है तो उससे वक्ता को स्वानंदसुख प्राप्त होता है और अपने आप साहित्य
रस भरकर ग्रन्थों में प्रसाद बाँटने लगता है। सचमुच, जिस प्रकार चन्द्रकिरणों के कारण चकोर के मुख अपने
आप खुल जाते हैं उसी प्रकार जनार्दन स्वामी के एकनाथ की भी संतों की कृपा से वाचा प्रस्फुटित हुई है।
सूर्यकिरणों के स्पर्शमात्र से जिस प्रकार कमल की कली अपने आप खिल उठती है, उसी प्रकार संतों के
कृपाप्रसाद से अर्थज्ञान से ग्रन्थ का भी विस्तार हो रहा है। उनकी ही कृपा से मैं भागवत का अर्थ निकाल रहा
हूँ। अब अगले पाँचवें अध्याय की कथा श्रोतागण ध्यानपूर्वक सुनें। राजा मधुर प्रश्न करेगा। उसे सुनते ही मन
की इच्छा पूर्ण होगी। साधकों की जिज्ञासा तृप्त होगी और धर्माधर्म का निर्णय समझ में आयेगा। उसके भजना-
भजन का कौशल दिखाई देगा। प्रश्नोत्तरों की यह कथा अत्यन्त सुन्दर और रस से पूर्ण होगी जिसे सुनते ही
अधर्म की गाँठ खुल जायेगी। उस उत्तम निरूपण से संतों का श्रवण तृप्त होगा। जनार्दन स्वामी की पूर्ण कृपा के
कारण एकनाथ उसे सुनायेगा। शरीर में वायु का संचार होने से वह बड़बड़ाने लगता है। उसी प्रकार एकाजनार्दन
यह कविता सुना रहा है।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादश स्कंधे निमिजयंत
संवादे एकाकारटीकायां चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥
श्रीकृष्णार्पणमस्तु