श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 121, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थ अध्याय १०५
इसीलिये बड़े-बड़े ऋषि भी तुम्हारे चरणों की सेवा करते हैं। हे देवाधिदेव ! शान्ति की इच्छा से जो तुम्हारी नित्य
सेवा करते हैं वे तुम्हारे नामस्मरण से ही कामक्रोध आदि के स्वभाव को सहज ही जीत लेते हैं। जहाँ सम्मान के
साथ काम अर्थात् इच्छा पूर्ण होती है वहाँ आदरपूर्वक अनुग्रह किया जाता है लेकिन जहाँ सम्मानपूर्वक काम तृप्त
नहीं हो पाता वहाँ क्रोध लाल होकर शाप देता है। इस प्रकार शापानुग्रह करने में समर्थ पुरुष सदा कामक्रोधयुक्त
रहते हैं लेकिन तुमने अपनी महानता के अनुकूल ही कार्य किया यह कौतुक की बात है। अपनी शान्ति और
स्वरूपनिष्ठा से कामक्रोध को अंकित कर दिया। फिर इतना सब कुछ करने पर भी गर्व न होने का अहंकार भी
नहीं ! छल करनेवालों को हलका साबित करने अथवा उनकी उपेक्षा करने का भी तुम्हारा विचार नहीं दिखायी
देता। लोग पृथ्वी को गोड कर उसे दुःखी करते हैं लेकिन वह अन्न पैदा कर उन्हें सुखी करती है। इस प्रकार
अपकार करने वाले पर जो उपकार करता है वह मोक्ष के सिर पर का मुकुट है। हे कृपामूर्ति ! तुझ में निर्विकार
शान्ति का होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। तुम्हारे स्वरूप की सच्ची स्थिति हमें निश्चित रूप से आज ही
मालूम हुई। तुम निर्गुण, निरुपम, मायातीत, पूर्णब्रह्म हो। सहज ही यदि कोई तुम्हारा नामस्मरण करे तो सकाम
को भी काम स्पर्श नहीं कर सकता। जो सर्वकाल तुम्हारा नामस्मरण करता है, उसे मैं काम ही निष्काम कर देता
हूँ और क्रोध ही क्रोध का शमन करता है और जो मोह है वही परमबोध होकर रहता है। जो निजशान्ति के योग
से धीर वीर होकर परमानन्द में ही निरन्तर तृप्त रहते हैं ऐसे मुक्तजनों की असंख्य पंक्तियाँ तुम्हारे चरण छूती हैं।
तुम्हें नमस्कार करने के लिये महासिद्धों का समुदाय आगे बढ़ता है लेकिन उन्हें मौका नहीं मिल पाता। आप ऐसे
परात्पर गुरु महात्मा हैं। तुम्हारे सेवकों के निकट यदि विघ्न जाने का प्रयास करता है तो वह दीन हीन हो जाता
है। तुम्हारे सामने वह किस बल बूते पर आयेगा ?
त्वां सेवतां सुरकृता बहवोऽन्तरायाः स्वौको विसृज्य परं व्रजतां पदं ते।
नान्यस्य बर्हिषि बलीन् ददतः स्वभागान् धत्ते पदं त्वमविता यदि विघ्नमूर्ध्नि ॥ १० ॥
हे नारायण ! तपस्वी लोगों के लिये विघ्न उत्पन्न करना, उन्हें कष्ट देना तथा उनके तप में बाधा डालना यह
हमारा स्वभाव ही है इसमें कोई आश्चर्य नहीं है। लेकिन जो हृदय के काम को छिपा कर, बाहर से जप-तप तथा
भक्ति का ढोंग करने वाले महाठग होते हैं उन पर ही विघ्न का प्रभाव पड़ता है। हमारी विघ्न उत्पन्न करने की
शक्ति तुम्हारे सच्चे भक्तों के आगे काम नहीं करती। भक्ताभिमानी भक्तों के रक्षक होने के कारण, वहाँ विघ्नों की
गति उलटी हो जाती है। मेरे भक्तों के लिये विघ्न किस बात के ? तो देवाधिदेव उसका भी अभिप्राय तुम्हें बताता
हूँ, सुनो ! आत्मपद प्राप्ति की आकांक्षा मन में होने के कारण जो स्वर्गसुख को ठोकर मार कर निरन्तर
निष्कामबुद्धि से तुम्हारा भजन करते हैं उनके देवता अनेक प्रकार के विघ्न उत्पन्न करते हैं। 'हमारा उल्लंघन कर
ये अटल पद तक पहुँचते हैं' यह कहकर देवेन्द्रादिक उनके लिये अनेक विघ्न उत्पन्न करते हैं। हमें हविर्भाग
दिये बिना ये पूर्ण पद तक पहुँचना चाहते हैं इस क्रोध से इन्द्रादि देव उनके लिये अनेक प्रकार के विघ्न खड़ा
कर देते हैं। उनके भजनों में बाधा पहुँचाने के लिये विघ्न तत्काल पहुँच जाते हैं। लेकिन उन विघ्नों से उनका
कुछ नहीं बिगड़ता क्योंकि तुम हृषीकेश उनकी सुरक्षा के लिये तत्पर रहते हो। सकाम कल्पना छोड़कर जो
तुम्हारे चरणों में रममाण होते हैं, उनकी तुम नारायण ! आठों पहर सुरक्षा करते रहते हो। विघ्नों से घबराकर 'हे
भगवान् ! दौड़ो, दौड़ो कहते हैं और तुम उनकी पुकार पुकार सुनकर दौड़ जाते हो। नारायण ! तुम कभी निष्ठुर
नहीं होते हो। भक्तों के निकट विघ्न पहुँचे इससे पहले ही तुम उनकी चारों ओर से सुरक्षा के लिए तत्पर रहते
हो। विघ्न कुपित होकर छलने के लिये दौड़ता है तभी उस विघ्न में ही तुम्हारा रूप प्रगट होता है। इसलिये