श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थ अध्याय १०७
की। इतने में उन्हें वहाँ एक अद्भुत चमत्कार दिखायी दिया। चमत्कार यह कि वहाँ अनेक उत्पन्न से उत्तम
स्त्रियाँ उत्पन्न हो गयीं। रूप, वैभव, अलंकार इत्यादि में वे लक्ष्मी से भी सुन्दर दिखायी दे रही थीं। ऐसी वे
स्त्रियाँ सेवा और आदरभाव में अत्यन्त तत्पर दिखायी दे रही थीं। नारायण की यह लीला भी कितनी विचित्र थी।
उसने कितना बड़ा चमत्कार दिखला दिया। उन स्त्रियों को देखते ही आगत स्वर्ग की अप्सरायें जैसे सूर्य के
सामने जुगनू निस्तेज दिखायी देते हैं वैसी निस्तेज दिखायी देने लगीं।
ते देवानुचरोदृष्ट्वा स्त्रियः श्रीरिव रूपिणीः।
गन्धेन मुमुहुस्तासां रूपौदार्यहतश्रियः ॥ १३ ॥
इन (नारायण निर्मित) स्त्रियों को देखते ही मदन मूर्च्छित होकर गिर पड़ा। वसन्त के मुँह में पानी आ गया
और क्रोध तो आँखें फाड़ कर बस देखने लग गया। भ्रमर गुंजार करना भूल गये, कोकिलायें जैसे पंचम स्वर ही
भूल गयीं प्राणवायु का संचार रूक गया इस प्रकार देवताओं के वे सेवक पागल जैसे हो गये। उन स्त्रियों का
स्वरूप देखकर अप्सरायें किसी दासी की तरह दिखायी देने लगीं। वे लज्जित हो उठीं। उन स्त्रियों के शरीर से
निकलने वाले परिमल से वसन्त तो बौरा गया। उसी प्रकार उनके शरीर की सुगन्धित वायु शरीर में लगते ही
मलयानल संभ्रम में पड़ गया। नारायण की इस विधा का क्या वर्णन किया जाय ? जो उसे सम्मोहित करने आये
थे वही उसके मोहजाल में फँस गये। सौन्दर्य में रंभा और तिलोत्तमा प्रमुख हैं लेकिन समुद्र मंथन के समय
उत्पन्न हुई लक्ष्मी ने अपने सौन्दर्य से उन दोनों पर विजय प्राप्त की। उस लक्ष्मी की अपेक्षा आज नारायण ने
उत्पन्न की हुई स्त्रियाँ अधिक सुन्दर थीं।
तानाह देवदेवेशः प्रणतान् प्रहसन्निव।
आसामेकतमां वृङ्ग्ध्वं सवर्णां स्वर्गभूषणाम्॥ १४॥
यह आश्चर्य देखकर काम आदि सारे मूर्च्छित होकर गिर पड़े। (वे होश में आते ही) नारायण ने हँस कर
कहा, हम आपकी पूजा करें, आपका सत्कार करें तथा आपको कोई भेंट दें यह उचित ही है। इसलिये इन्द्र को
सन्तोष हो इसलिये इनमें से कोई एक दासी आप स्वीकार करें। यदि इनका सौन्दर्य अधिक हो तो जो इनमें से
आपके लायक हो उसे ही आप स्वीकार करें। शायद आप यह कहें कि इनमें से कोई भी स्त्री कम सुन्दर नहीं है,
सभी सौन्दर्य से परिपूर्ण हैं तो आप इनमें से किसी एक का अंगीकार करें, ताकि वह स्वर्ग के लिए एक भूषण ही
होगा। नारायण का यह भाषण सुनकर सबको बड़ा ही सन्तोष हुआ और उन्होंने उसे साष्टांग दण्डवत कर उसका
भाषण शिरसा वंद्य किया।
ओमित्यादेशमादाय नत्वा तं सुरवन्दिनः।
उर्वशीमप्सरःश्रेष्ठां पुरस्कृत्य दिवंययुः॥ १५॥
इन्द्रायानम्य सदसि शृण्वतां त्रिदिवौकसाम्।
ऊचुर्नारायणबलं शक्रस्तत्रास विस्मतः ॥ १६॥
नारायण का भाषण सुनकर उसके चरणों पर मस्तक रखकर स्त्रियों में जो उर्वशी थी उसे साथ लेकर
कामादि सारे लोग बड़ी फुर्ती से वहाँ से निकले। वह नारायण के ऊरु से अर्थात् जाँघ से सट कर खड़ी थी
इसलिये उसका नाम उर्वशी पड़ा और कालान्तर में वह देवांगन में भी इसी नाम से पहचानी जाने लगी। इस प्रकार