श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 125, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थ अध्याय १०९
को अमृतपान कराया। जिस समय हिरण्याक्ष दैत्य पृथ्वी को रसातल तक ले गया था उस समय उस प्रभु ने
'वराह' अवतार धारण किया। उस श्वेत वराह मूर्ति की पृथ्वी देवी ने पूर्ण निष्ठा से भक्ति की। उस समय उस
दैत्य का वध कर पृथ्वी का उद्धार किया और परम शान्ति प्रदान की। उसी ने दीनों का संकट निवारण करने के
लिये वैकुण्ठ से छलांग लगायी और गजेन्द्र का नक्र ने पकड़ा हुआ पैर छुड़ा कर उसका प्रेमपूर्वक उद्धार किया।
संस्तुन्वतोऽब्धिपतिताञ्छ्रममाणानृषींश्च शक्रं च वृत्रवधतस्तमसि प्रविष्टम्।
देवस्त्रीयोऽसुरगृहे पिहिता अनाथा जघ्नेऽसुरेन्द्रमभयाय सतां नृसिंहे ॥ १९॥
किसी समय अकस्मात हुए जलप्रलय में मार्कण्डेय ऋषि डूबने लगे थे उस समय उन्होंने श्रीकृष्ण का
स्मरण किया। तत्काल 'वटपत्रशायी' भगवान ने उसे बचाया (यही बालमुकुन्द है) ऋषि शालिग्राम की पूजा कर
रहे थे उस समय नल नामक वानर ने अपने स्वभाव के अनुसार उनकी देवपूजा उध्वस्त कर देवता को समुद्र में
फेंक दिया। यह देखकर उस ऋषि ने क्रोध से 'तुम्हारे हाथ से शिला पानी में नहीं डूबेगी' ऐसा शाप दिया। तभी
उन्हें समुद्र में शालिग्राम तैरते हुए दिखायी दिये। उन्हें निकालने के लिये ऋषि ने जल में प्रवेश किया। वे समुद्र
की भीषण लहरों के बीच फँस गये और उनकी साँस फूलने लगी। तब उस ऋषि ने उस संकट का निवारण
करने के लिए आर्तिहरण श्रीहरि की प्रार्थना की। इससे प्रसन्न होकर श्रीहरि वहाँ प्रकट हुए और उन्होंने उस ऋषि
की पूजा के साथ बाहर निकाला। वज्राघात से वृत्तासुर को मारने के कारण इन्द्र को ब्रह्महत्या का पातक लगा
जिसके कारण वह अंधतम नामक नरक में डूब रहा था। उस समय कृपालु श्रीअनंत ने अवतार धारण किया तथा
कृपादृष्टि से इन्द्र को उस ताप से मुक्त किया। मुर नामक दैत्य ने अमरपुर जीतकर देवताओं के जनानखाने की
स्त्रियों को बन्द कर रखा था। श्रीहरि ने उस 'मुर' नामक दैत्य का वध किया इसलिये उसका नाम 'मुरारी' हो
गया। उसने देवताओं की सभी स्त्रियों को मुक्त कर उन्हें पुनः देवताओं के सुपुर्द किया। जो राक्षसों का राजा
और दुष्टों में अग्रगण्य, जो हरि का नाम सुनते ही क्रोध से संतप्त होकर मन ही मन जलने लगता था वह क्रोध
का महासागर, अविवेक की अपार निधि, जो गर्व से उन्मत्त होकर मदोन्मत्त होकर हरिनाम का स्मरण करने वाले
अपने पुत्र का छल करता था उस हिरण्यकश्यपु का साधुओं को अभय देने वाले स्वभक्त हितकारी 'नरसिंह' ने
नाखूनों के अग्रभाग से वध किया।
देवासुरे युधि च दैत्यपतीन् सुरार्थे हत्वान्तरेषु भुवनान्यदधात् कलाभिः।
भूत्वाऽथ वामन इमामहरद्बलेः क्ष्मां याञ्छाछलेन समदाददितेः सुतेभ्यः ॥ २०॥
समुद्रमंथन के अन्त में क्षीरसागर के तट पर देवदानवों के बीच अमृत के लिये जब बहुत कलह मच गया
था उस समय जिसके सामने अमृत भी फीका लगे ऐसा 'मोहिनी' अवतार लेकर उन्होंने राक्षसों को मेद्य प्राशन
करने के मद्य लिये दिया और देवताओं को अमृत दिया। उस समय चुराकर अमृत प्राशन करने के कारण राहु का
शिरच्छेद किया और उसके धड़ पर म्हालसा के स्वरूप में स्वयं नेवासे में वास्तव्य किया। देवताओं की सहायता
करने वाले नारायण ने द्वारका में कुश का निर्दलन कर तथा लवणासुर का वध कर स्वयं 'कुमार' रूप में अवतार
धारण किया। इस प्रकार भक्त कार्य का पक्ष लेने वाला श्रीहरि ने एक के बाद दूसरे मन्वंतर में देवताओं के कार्य
से स्वयं अनेक अवतार लिये। देवताओं का सहायक जगजीवन स्वयं बौना वामन बनकर याचक धर्म स्वीकार
कर देवताओं के अपमान का बदला लेता है। अपने दान के पुण्य से राजा बली समर्थ था, उसके साथ युद्ध करना
देवताओं के लिये कठिन था। इसलिये त्रिविक्रम रूप से अर्थात् त्रैलोक्य व्यापक रूप धारण कर उसने बली का