श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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और भी बढ़ जाती है। भक्तों के प्रेम के लिये भगवान अपना सर्वस्व खर्च करता है। ऐसी इस अभेद भक्ति की
मधुरता है। गोविन्द को वह अत्यन्त प्रिय है इसलिये भक्तों के योगक्षेम का भार श्रीधर स्वयं सँभालता है और
भक्तों को स्वयं भवसागर पार कराता है। अपने भक्तों का देहभाव (भार) देवाधिदेव स्वयं वहन करता है तो फिर
अभक्तों का देह भार वहन करने वाला क्या कोई और है ? तो उसका उत्तर यह है कि भक्तों को अहंकार न होने
के कारण भगवान को ही उसे वहन करना पड़ता है और अभक्तों को पूर्ण देहाभिमान होने के कारण उनमें
अतिबद्धता होती है इसलिये जो अभिमानरहित होता है वह पूरी तरह भगवद्भक्त है। जिसमें देहाभिमान है उसमें
भक्त की प्रवृत्ति कभी नहीं आ सकती। भगवान बड़े कौशल से निजभक्त का संरक्षण करता है इसलिए उसका
बाल भी बाँका नहीं होता। वह प्रसन्नतापूर्वक अपने भक्तों को निर्भय कर उनको निजसुख देकर उनका तारण
करता है। इसलिये निरभिमानी होकर जो भक्तिमार्ग पर चलते हैं वे विघ्नों को ठोकर मारकर निश्चय के साथ
भगवत्पद प्राप्त करते हैं। इसके बाद राजा ने अभक्तों की गति के बारे में प्रश्न पूछा। इस पाँचवें अध्याय में
अभक्तों का लक्षण और उनकी गति का निरूपण कर, विभिन्न युगों में श्रीहरि पूजाविधान किस प्रकार का रहता है
इसका भी विवेचन करेंगे। अवतार चरित्र और पराक्रम सुनाकर चौथे अध्याय का समापन किया। अब राजा
मुनियों से अभक्तों के लक्षण पूछ रहा है।
राजोवाच
भगवन्तं हरिं प्रायो न भजन्त्यात्मवित्तमाः।
तेषामशान्तकामानां का निष्ठाविजितात्मनाम् ॥ १ ॥
राजा ने कहा, हे दयानिधि मुनिश्रेष्ठ! जो भगवद्भजन को पीठ दिखाता है, ऐसे अभक्त मनुष्य को कौन सी
गति प्राप्त होती है ? जो काम के कारण मदांध हो गये हैं, क्रोध से संतप्त हो गये हैं, अतिलोभ से लालची हो गये
हैं और सर्वदा प्रपंच में रम गये हैं, उसी प्रकार जो घमण्ड के पुतले तथा अहंकार के शिरोमणि हैं, विकारों का
ढेर और विकल्पों की खुली खान हैं, जिनकी सद्बुद्धि की आड़ में महामोह का गहरा बादल आया हुआ है, जो
कपट में अत्यन्त कुशल, लोभ से ग्रस्त हैं जिस प्रकार चमगादड़ दिन के उजाले में जो नहीं दिखायी देता उसे
अँधेरे में देखते हैं, उसी प्रकार वे परमार्थ के मामले में अन्धे किन्तु प्रपंच में महापण्डित होते हैं, जिन्हें आत्महित
समझ में नहीं आता और ज्ञान बेचकर व्यर्थ का काम बढ़ाते हैं ऐसे जो अभक्त हैं उनकी कौन सी गति है यह मुझे
बतायें। आप जैसे बुद्धिमान और बोध के चलते-फिरते महासागर आज मेरे भाग्य से मुझ मिले हैं, इसलिये मुझे
निश्चयपूर्वक इन प्रश्नों का उत्तर बतायें। इस प्रकार जब राजा ने अभक्तों के लक्षणपूछे तो उसका उत्तर देने के
लिये 'चमस' अत्यन्त प्रसन्नता से आगे बढ़ा।
चमस उवाच
मुखबाहूरुपादेभ्यः पुरुषस्याश्रमैः सह।
चत्वारो जज्ञिरे वर्णा गुणैर्विप्रादयः पृथक् ॥ २ ॥
चमस ने कहा—जो सारे जगत का जनक है वही एकमेव प्रमुख गुरु है, उसे जो पुरुष नहीं भजता, उसका
सर्वस्व नष्ट हो गया समझिये। चारों आश्रम और चारों वर्ण उसी मूलपुरुष से उत्पन्न हुए हैं। हे राजाधिराज !
उनकी उत्पत्ति का स्थान सुन लो। मुख से वेदवेत्ता ब्राह्मणों का जन्म हुआ। बाहुओं से क्षत्रिय पैदा हुए, जाँघों से