श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपंचम अध्याय ११५
वैश्यवर्ण उत्पन्न हुआ और शूद्र वर्ण का जन्म स्थान चरण है। मूलरूप में गुण तो तीन ही हैं और गुणों के कारण
ही वर्ण बने हैं, तो फिर तीन गुणों में से चार वर्ण कैसे उत्पन्न हुए ? (उत्तर देते हैं) शुद्ध सत्त्वगुण से ब्राह्मण
उत्पन्न हुए, सत्त्व और रज के मिश्रण से राजा अर्थात् क्षत्रिय हुए, रज और तम मिलकर वैश्य वर्ण हुआ और
तमोगुण से शूद्रवर्ण हुआ। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ये तीन वर्ण 'द्विजन्मा' अर्थात् उपनयन संस्कार के कारण दो
बार जन्म लेते हैं, उन्हें गायत्री मंत्र का तथा वेदाध्ययन का अधिकार है, लेकिन शूद्र संस्काररहित हैं।
ब्रह्मचर्याश्रम और गृहस्थाश्रम ये इन तीनों वर्णों को प्राप्त हैं किन्तु ब्राह्मण इन चारों आश्रमों को आश्रयभूत होते
हैं। गृहस्थाश्रम यह उस विराट पुरुष के चरण स्थान पर, ब्रह्मचर्याश्रम हृदय स्थान पर, वानप्रस्थाश्रम वक्षःस्थान
पर तथा संन्यासाश्रम यहाँ शिरस्थान पर रहता है।
य एषां पुरुषं साक्षादात्मप्रभवमीश्वरम् ।
न भजन्त्यवजानन्ति स्थानाद् भ्रष्टाः पतन्त्यधः ॥ ३॥
जरा देखिये, इन ब्राह्मणादि वर्णों को जिससे जन्म प्राप्त होता है, उस देवाधिदेव का यदि भजन नहीं किया
तो प्राप्त हुए उत्तम देह का अधःपात होने लगता है। पूर्वमीमांसा, उत्तरमीमांसा तथा उसी प्रकार विविध शास्त्रों के
विचार, उनका स्वरूप तथा सिद्धान्त आदि का विवेचन करने में पारंगत, सारांश शब्द पाण्डित्य में अत्यन्त चतुर,
ऐसे पण्डित, ज्ञानाभिमान के कारण अत्यन्त उन्मत्त हो जाते हैं और सचमुच उसी अभिमान के कारण वे भजन से
विन्मुख हो जाते हैं। कोई निखालस ध्यानी रहते हैं, वे स्वप्न में भी परमार्थ को नहीं पहचानते हैं। वे सचमुच
अज्ञान के कारण ही परमार्थ को नहीं पहचानते । वे सचमुच अज्ञान के कारण जगन्नाथ को नहीं भजते । गन्ने के
रस की मिठास बकरी नहीं जानती इसीलिये वह उसके पत्ते चबाती है। उसी प्रकार हरिभक्ति की मिठास न
जानने के कारण ही बेचारे अज्ञानी लोग विषय लंपट होकर ही रह जाते हैं। किन्तु वेदशास्त्रों के अवलोकन से जो
स्वयं को ज्ञाता समझ कर पण्डित होने का घमण्ड करते हैं, वे भक्तिमार्ग का अपमान करते हैं। ज्ञानाभिमान के
कारण अत्यन्त उन्मत्त हो जाते हैं। ज्वरग्रस्त व्यक्ति जिस प्रकार दूध को कडुुआ समझता है, उसी प्रकार ज्ञान के
अभिमान से पण्डित लोग हरिभजन से विन्मुख हो जाते हैं। इस प्रकार ज्ञान के अभिमान के कारण जो हरिभजन
से विमुख हो जाते हैं वे चतुर्वर्ण में श्रेष्ठ होते हुए भी अधःपतन में फँस जाते हैं अधिक क्या कहें? वर्णों में श्रेष्ठ
(ब्राह्मण) होते हुए भी जो हरिचरण से विन्मुख रहता है उसकी अपेक्षा भगवद्भजन प्रेम से करने वाला चांडाल
भी श्रेष्ठ है। 'हम मुक्त हैं' यह कह कर वे भगवद्भजन नहीं करते, वे पश्चादि योनि में जन्म-मरण के थपेड़े
सहते हुए अधःपतन की ओर अग्रसर होते हैं। मनुष्य देह प्राप्त करने पर भी जो ईश्वर भजन नहीं करते वे
स्थानभ्रष्ट होकर अधःपतन से अत्यन्त कष्ट प्राप्त करते हैं और घोर यातनायें भुगतते हैं। ज्ञानाभिमान के कारण
जो भजन नहीं करते हैं, उनका भयानक अधःपात होता है इसलिये हे राजा! अज्ञानियों की भी वही गति होगी
ऐसा मत समझो।
दूरेहरिकथाः केचिद् दूरेचाच्यतकीर्तनाः ।
स्त्रीयः शूद्रादयश्चैव वतेऽनुकम्प्या भवादृशाम् ॥४॥
एक ही बाप के दो पुत्र हैं, उनमें से एक प्रबुद्ध है और दूसरा बालक है, उनमें से कोई पिता का अपमान
करता है तो पिता प्रबुद्ध को ही मारता है लेकिन बालक यदि पिता के सिर पर भी चढ़ता है, पिता को लात भी
मारता है तो उसे दोष नहीं लगता। गलती का फल बड़े वाले को ही भोगना पड़ता है। ज्ञाता यदि भजन नहीं