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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 124, कुल 869 में से

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पृष्ठ 124

१०८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
वे सारे देवताओं के दूत स्वर्ग पहुँचे और उन्होंने नारायण की अद्भुत शक्ति का इन्द्र की सभा में वर्णन किया।
उन्होंने नारायण का अत्यन्त पवित्र चरित्र उन्हें सुनाया जिसे सुनकर देवतागण आश्चर्य चकित हो गये। इन्द्र ने
उर्वशी को देखा तो वह रात दिन उसके साथ लंपट होकर रहने लगा। बाहर आकर सभा में बैठने का उसे होश ही
नहीं रहा। वर्षों तक उसे साथ लेकर वह अंतगृह में रहने लगा। नारायण की यह कथा प्रथम दृश्य सगुण अवतार
की कथा है। अब हे राजराजेश्वर ! अगला अवतार सुनो। राजा, कितनी विचित्र बात है। समस्त छलवादियों की
स्वतः पूजा करने का ही नाम है 'पूर्णानुभव'। सद्भाव से भगवद्भजन करते समय इन्द्र उसमें अनेक प्रकार के
विघ्न उत्पन्न करता है। नारायण चैतन्यधन होने के कारण उन्होंने समस्त विघ्नों की पराजय कर डाली लेकिन
भोले भाले यदि भक्ति करने लगें और उनके भी मार्ग में ऐसे ही विघ्न आये तो उन्हें भगवदप्राप्ति कभी नहीं होगी
ऐसा विकल्प तुम मन में न लाओ। क्योंकि ब्रह्मादिक समस्त प्राणिमात्रों का जो केवल भौं उठाकर ही नियंत्रण
करता है उस श्रीनारायण का केवल भक्तिपूर्वक भजन करने से विघ्नों की बाधा कभी नहीं हो सकती। उसके
कारण ही इन्द्र का इन्द्रपद कायम है, उस श्रीनारायण का भक्तिभाव से भजन करने पर भक्तों को कौन विघ्नों की
बाधा खड़ी करेगा ? वह श्रीहरि ही अपने भक्तों की सुरक्षा करता रहता है। यह सच है कि कामादिक सबका छल
करते हैं लेकिन जब उनका चालक भी नारायण ही है तो वह अपने भक्तों का स्पर्श कैसे करने देगा ? सारे विघ्नों
को जिसने भुलावे में रखा उस नारायण का नित्य स्मरण करने से केवल उसके भय से ही विघ्न भाग जाते हैं। हरि
के नामस्मरण से ही भक्त की सुरक्षा होती रहती है। अपने भक्तों की रक्षा करने के लिये ही देवता अनेक प्रकार के
अवतार धारण करता है। उसके अवतारों का अत्यन्त अद्भुत चरित्र तुम श्रवण करो।
हंसस्वरूप्यवददच्युत आत्मयोगं दत्त: कुमार ऋषभो भगवान् पिता नः।
विष्णुः शिवाय जगतां कलयाऽवतीर्णस्तेनाहता मधुभिदा श्रुतयो हयास्ये ॥ १७॥
ब्रह्मदेव के सनकादिक पुत्रों ने जब पिता से प्रश्न किया तो 'हंसावतार' लेकर उन्होंने उस प्रश्न के उत्तर
के बहाने ब्रह्मज्ञान कथन किया। हरिनाम का नित्य भजन करने से महादुर्धर विघ्न भस्म हो जाते हैं। ऐसे उस
हरि के अवतार का उत्तम वर्णन सुनो। जिसका नाम सुनकर यम भी भाग जाता है, जिसके नाममात्र से जन्म-
मरण का नाश हो जाता है वह 'श्रीदत्त' का अवतार अर्थात् साक्षात परब्रह्म है। जो निष्ठापूर्वक ब्रह्मचारी हैं,
स्वप्न में भी जिनका वीर्यपतन सम्भव नहीं है और इसी कारण जिन्हें 'कुमार' कहते हैं वे सनकादिक भी
अवतार मूर्ति ही हैं। उसी प्रकार हमारे ज्ञानसम्पन्न पिता ऋषभनारायण को भी तुम भगवान का अवतार ही जान
लो। उपर्युक्त नामों से और रूपों से अवतार लेनेवाला वह एक नारायण ही है। जगत् का पालन करने वाला जो
श्रीकृष्ण है वही अपने अंश से अवतार लेता रहता है। वही श्रीकृष्ण स्वयं मधुकैटभ दैत्य का संहार कर
'मधुसूदन' नाम से प्रसिद्ध हुआ। 'हयग्रीव' को अवतार लेनेवाला भी वही है। उसी ने बाद में शंखासुर का वध
कर डूबे हुए वेदों को निकाल कर उन्हें ब्रह्मदेव के हाथ में दिया। इस प्रकार वेदों की रक्षा उसी ने की यह
निश्चित रूप से जान लो।
गुप्तोऽप्यये मनुरिलौषधयश्च मात्स्ये क्रौडे हतो दितिज उद्धरताऽम्भसःक्ष्माम्।
कौर्में धृतोऽद्रिरमृतोन्मथने स्वपृष्ठे ग्राहात् प्रपन्नमिभराजममुञ्चदार्तम् ॥ १८ ॥
उसी ने मत्स्यावतार धारण कर प्रलयकाल की बाढ़ में पृथ्वी का मनु तथा वनस्पतियों के साथ संरक्षण
किया। उसी ने कूर्मावतार धारण कर मंदर पर्वत को अपनी पीठ पर लादकर क्षीरसागर का मन्थन कर देवताओं