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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 132, कुल 869 में से

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पृष्ठ 132

११६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
करता तो उसे महादोष ग्रस लेते हैं और जो अज्ञानी किन्तु भाविक हैं वे साधुओं के कृपानुग्रह से तर जाते हैं।
अज्ञानी का विशेष दोष न होने के कारण वह केवल साधु पर विश्वास रखकर ही शुद्ध हो जाता है। ज्ञानाभिमानी
का भाव विपरीत होने के कारण उसी को दोषों की बाधा होती है। अज्ञानी साधु पर विश्वास कर उसका वन्दन
करता है और जो ज्ञानाभिमानी है वह दोनों की निन्दा करता है। इसलिए उसे निश्चित रूप से दोनों की बाधा
होती है। साधु पर विश्वास करने से अज्ञान नष्ट होता है लेकिन ज्ञानाभिमानी के पास अनेक तर्क-वितर्क होते हैं।
उन्हें किसी पर भी विश्वास नहीं होता। अभिमान की जिद के कारण ही उनका पतन होता है। इस पर ठीक तरह
से विश्वास करने पर ज्ञात होता है कि अहंकार का बंधन बहुत बड़ा होता है। अभिमान जैसी झूठी और खराब
वस्तु दुनिया में कोई नहीं है। अभिमान साक्षात ईश्वर के लिये भी बाधक होता है। अभिमान के ही कारण ईश्वर
उपाधि से सबल होता है। अभिमान के ही कारण देहबुद्धि उत्पन्न होती है और वह सुर और नर दोनों के लिये
बाधक होती है। इसलिये जो अज्ञानी होते हैं उन्हें ज्ञानाभिमान नहीं होता, यदि वे साधुसज्जनों पर विश्वास करे तो
वे उन पर अनुग्रह करते हैं। जो नीच वर्ण के हैं वे शूद्र आदि जिन्हें शास्त्र अथवा वेद श्रवण का अधिकार नहीं
प्राप्त है उनके मन में यदि सद्भाव उत्पन्न हुआ तो वे कनिष्ट जाति में उत्पन्न होते हुए भी सन्तों की कृपा के पात्र
होते हैं। उनका अधिकार उन्हें एक विश्वास के कारण ही प्राप्त होता है (राजा जनक ने कहा) जो पूर्ण भावार्थी
होते हैं उन्हें हे दयालु कृपामूर्ति! आप जैसे साधु सन्त ही अनुग्रह देकर तारते हैं। (चमसमुनि कहते हैं) इस
प्रकार अज्ञानी तर जाते हैं किन्तु जिनके मन में ज्ञानाभिमान भरा रहता है उन्हें ब्रह्मदेव भी नहीं तार सकते। उनकी
स्थिति भी मुनि बता रहे हैं।
विप्रराजन्यवैश्यौ च हरेः प्राप्ताः पदान्तिकम्।
श्रौतेन जन्मनाऽथापि मुह्यन्त्याम्नायवादिनः ॥ ५ ॥
जो अज्ञानी और हीन वर्ण के होते हैं, वे सन्तों के चरण पकड़ कर पूर्ण विश्वास के भरोसे जन्म-मरण की
बाधा से बच निकलते हैं। बाकी जो व्रतबन्ध के कारण दो बार जन्म वाले अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य हैं वे
स्वाभाविक रूप से हरिचरणों की ओर पहुँचे रहते हैं, किन्तु हम ही अधिकारी हैं, वेदों का ज्ञान केवल हमें ही है,
ऐसी अपनी अहंता के कारण वह घमण्ड में फूले रहते हैं। हमारा जन्म उच्च, हमारा कर्म उच्च, हम ही अग्रपूजा
के अधिकारी हैं ऐसा पूज्यत्व का अभिमान, वेदों का उनका ज्ञान बस दिखावे भर का ही होता है लेकिन
अभिमान शिखर तक पहुँचा रहता है। यज्ञोपवीत और गायत्रीमंत्र का जिन्हें पूर्ण अधिकार है जिन्हें हरि के भजन
की चाह है जिनके चरण पकड़ने से हरि की भेंट हो सकती है ऐसे जो उत्तम ब्राह्मण उन्हें भी वेदों के ज्ञान का
अभिमान होता है और उसी घमण्ड के कारण उनमें मोह उत्पन्न होता है। चमसमुनि उसी का विस्तार से निरूपण
कर रहे हैं।
कर्मण्यकोविदाः स्तब्धाः मूर्खाः पंडितमानिनः।
वदन्ति चाटुकाम्मूढा यया माध्व्या गिरोत्सुकाः ॥ ६ ॥
विधि, विधान, मंत्र इनमें से कुछ भी समझ में नहीं आता फिर भी घमण्ड और ज्ञातापन का अभिमान कुछ
मत पूछिये। मदारी के पास विद्या थोड़े ही रहती है लेकिन उसके पूरे शरीर पर तमगों की भीड़ लगी रहती है।
उसी प्रकार प्रबुद्ध ज्ञान की नुमाइश करके आसन-पूजा आदि की भीड़ लगा देता है। जिस प्रकार गहरा लाल रंग
देकर स्फटिक को माणिक की छवि लाने का प्रयत्न किया जाता है उसी प्रकार शुद्ध रूप से मूर्ख लोग भी ज्ञान