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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 120, कुल 869 में से

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पृष्ठ 120

१०४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
इत्थं ब्रुवत्यभयदे नरदेव देवाः सव्रीडनम्रशिरसः सघृणं तमूचुः ।
नैतद् विभो त्वयि परेऽविकृते विचित्रं स्वारामधीरनिकरानतपादपद्मे ॥ ९ ॥
इस प्रकार अभय देते हुए नारायण ने अपने मुख से कहा, इससे काम, क्रोध, वसंत और अप्सरा आदि
लोगों ने लज्जा से गर्दन झुका ली। नारायण की निर्विकार पूर्ण क्षमा देखकर वसंतादिक लोगों ने समझ लिया कि
यह कोई ऋषि नहीं अपितु साक्षात परमात्मा है और वे स्वयं उसकी महिमा का वर्णन करने लगे। हे महाराज
चक्रवर्ति ! सार्वभौम विदेह ! सुनो। कामादि मण्डली अत्यन्त भक्तिभाव से नारायण की स्तुति करने लगी। जो
सर्वकाल लोगों को छलते थे, उन्होंने जब नारायण की परिपूर्ण शान्ति देखी तो वे उस शान्ति की स्तुति करने लगे
जिससे नारायण को संतोष प्राप्त हो, उसके मन में पूर्ण कृपा उत्पन्न हो, इस प्रकार वे परमार्थ बुद्धि से उनका
स्तवन करने लगे। उन्होंने कहा, "देवाधिदेव ! तुम्हारी जय हो। तुझ जैसी कामक्रोधरहित निर्विकार स्थिति
देवताओं में या मानवों में नहीं दिखायी देती। मेरे काम के वश में ब्रह्मदेव भी कन्या को पकड़ने के लिये गया
और पराशर ने क्या किया ? उन्होंने दिन में ही दुर्गंधा का उपभोग किया। योगी जिनका शिरसा वन्दन करते हैं, जो
तपस्वियों में शिखर पर है वह शंकर भी मोहिनी के पीछे आसक्त हुआ उस समय उसका लंगोटी में वीर्यस्खलन
हुआ। '' विषयग्लानि से विष्णु भी वृंदा के श्मशान में धरना देकर बैठा था। अहिल्या की कथा तो वेदों और
पुराणों में भी प्रसिद्ध है। नारद ने मेरी नहीं सुनी लेकिन उसे भी साठ पुत्र हुए। मेरा प्रहार सह सके ऐसा समर्थ
पुरुष संसार में कोई नहीं है। ब्रह्मचारियों का राजा मारुति अपने ब्रह्मचर्य का बड़ा अभिमान करता था लेकिन
उससे बिना संग किये मैंने मकरध्वज को जन्म दिया। चन्द्र को मैंने कलंकयुक्त किया, इन्द्र के शरीर में छिद्र
किये और शंकर के लाडले पुत्र कार्तिक स्वामी को गुफा में बन्द कर दिया। मेरे मदन का प्रहार देवदानवों को
भी सहन नहीं होता फिर मानव उसे कैसे सहन कर पायेंगे ? शंकर ने मुझे जलाया लेकिन मैंने उसे पागल कर
दिया। लेकिन तुम्हारे जैसा आश्चर्यकारी धैर्य त्रिभुवन में कहीं भी देखने को नहीं मिलेगा। तुमने मुझ जैसे
प्रभावशाली मदन को पराजित किया। शान्ति के कल्याण का उदय हुआ। इतना यश तुम अकेले ने सम्पादित
किया। अपनी शान्ति से हमारे स्वभाव को जीत लिया। मुझ काम को जीत कर क्रोध का भी घमण्ड चूर कर
दिया। वासना की मस्ती भी हमेशा के लिये क्षीण कर दी। हे नारायण ! कितने ही बड़े तपस्वी क्यों न आयें
लेकिन उनसे तुम्हारी यह निष्ठा अर्थात् आत्मस्थिति की बराबरी नहीं की जायेगी। अपने स्वानुभव को
सार्वजनिक कर तुमने शान्ति का साम्राज्य स्थापित कर दिया। पहले भी अनेक तपस्वियों के कामक्रोध को जीतने
का वर्णन आता है। लेकिन उन्हें भी हमने पूरी तरह छला, उसे अब सबके सामने बताता हूँ। कपिल जैसी महान
तेजोराशि उसे भी क्रोध ने छला, सगर को शाप देते समय वह भी क्रोध के वश में आ गया। नारद को भी क्रोध
आया और उसने नलकूवर को वृक्ष बनाकर छोड़ा। गौतम ने तो क्रोध में अहिल्या को वनवासी शिला बनाकर
छोड़ा। जो सदा लोगों के विघ्न दूर करता है उस विघ्नेश को भी क्रोध ने छला तब क्रोध में आकर उसने चन्द्रमा
को तत्काल शाप दिया। दुर्वासा को भी क्रोध आया और उसने अंबरीष को शाप दिया और भगवान को गर्भवास
दिलाया। इस प्रकार क्रोध ने अनेक ऋषियों को छला। जो प्रतिसृष्टि निर्माण कर सकते हैं वे भी कामक्रोध के
चक्कर में फँस जाते हैं। इन्द्र की सम्पत्ति समुद्र में गिर गयी यह क्रोध कथा पुराणों में प्रसिद्ध ही है। औरों की
बात क्या की जाय ? क्रोध ने शंकर को भी छला। उसने यज्ञदीक्षा लेकर बैठे हुए दक्षद्विज का वीरभद्र से शिरच्छेद
कराया। मैं काम जहाँ रहता हूँ वहाँ क्रोध भी धीरे-धीरे आ ही जाता है। लेकिन हे नारायण ! आपने तो काम और
क्रोध का मानों अस्तित्व ही नष्ट कर दिया। तुम्हारा यह सामर्थ्य आश्चर्यजनक है। इतना धैर्य औरों में नहीं है।