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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

तृतीय अध्याय ८७
(पिप्पलायन ने कहा) अरे ! जिसके कारण विश्व की उत्पत्ति होती है, जिसके कारण सुरक्षा होती है
जिसके कारण प्रलयकाल को प्रलयशक्ति प्राप्त होती है ऐसे त्रैलोक्य की तीनों अवस्थाओं के लिये जो कारणीभूत
है, जगतका जो मूल उद्देश्य है, लेकिन जो स्वयं हेतुरहित तथा सदासर्वदा सच्चिदानंद से परिपूर्ण होता है, वही
'नारायण' है यह जान लो। प्रातःकाल, सायंकाल तथा दोपहर इन तीनों समय में जिस प्रकार गगन अलिप्त रहता
है उसी प्रकार उत्पत्ति, स्थिति और लयावस्था में भी परमात्मा नारायण अलिप्त रहता है। तुम कहोगे कि उत्पत्ति-
स्थिति तथा प्रलय को कौन देखता है तो उसके स्पष्टीकरण के लिये दृष्टांत सुनो। जागृति, स्वप्न और सुषुप्ति इन
तीनों को ही व्याप कर समाधि के पार भी जिसकी व्याप्ति है, जो उनका साक्षी है वही निश्चित रूप से नारायण
है यह जान लो। जागृति का ज्ञान, स्वप्न का मिथ्या भान तथा सुषुप्ति का जो पूर्ण साक्षी है वह शुद्ध चैतन्य ही
वास्तव में नारायण है। इस प्रकार परज्योति परमात्मा जो त्रिभुवन के सभी जीवों के हृदय में वास करता है, उसे
ही हे राजवर्य! निश्चित रूप से 'नारायण' कहते हैं यह ध्यान में रखो। इस प्रकार यदि ब्रह्मस्वरूप का वर्णन
किया जाय तो लगेगा कि ब्रह्म प्राप्ति अगम्य है। इसलिये जिससे सहज ही ब्रह्म की प्राप्ति हो सके ऐसा उपाय
बताता हूँ, सुनो। परमात्मा पूर्ण रूप से तुम्हारे ही हृदय में वास करता है, उसके ही कारण मन, बुद्धि और इन्द्रियों
का चलन होता है। उसके ही तेज से आँखें देख पाती हैं, उसके ही स्वाद से रसना में रस के प्रति रुचि जगती है,
उसके ही अवधान से कानों को शब्द ज्ञान का बोध होता है, उसके ही कारण अहंकार अहंभाव धारण कर पाता
है, मन मनन कर सकता है, उसके ही कारण चित्त चिंतन कर सकता है, बुद्धि को उसकी ही ब्रह्मज्ञान शक्ति से
बोद्धव्य प्राप्त होता है। उसके ही कारण जड़ देह सचेतन होता है, उसके ही कारण त्वचा को शीत-उष्ण तथा
मृत्यु और कठोर का भेद मालूम होता है, पैरों का चलना और हाथ का देना भी उसके ही आदेश से सम्भव होता
है। उसके ही कारण प्राण की श्वसन क्रिया तथा आँखों का खुलना और बन्द होना होता है। उसके ही आनन्द से
प्राणी जननेन्द्रियों का आनन्द भोगते हैं। इस प्रकार जो त्रिभुवन को चलाता है, जो स्वानंद से हृदय में वास करता
है, उसे ही 'नारायण' कहते हैं। वास्तव में 'परमात्मा' वही है। अब जिसके योग से मन, बुद्धि, प्राण और इन्द्रिय
विचरण करते हैं वह उनके अधीन है ऐसा यदि तुम कहोगे तो वह कल्पांत में भी सम्भव नहीं होगा। अब उस
स्वरूप का ज्ञाता बनकर उसे जानना चाहोगे तो वह सम्भव नहीं होगा क्योंकि ज्ञानी बनकर अर्थात् मैं ज्ञाता हूँ
और वह ज्ञेय है इस ज्ञान से बुद्धि का कभी आत्मस्वरूप में प्रवेश नहीं होता। ज्ञान अथवा ज्ञानाभाव इन दोनों को
छोड़ कर जब केवल सद्भाव उत्पन्न होगा, तभी परब्रह्म की अपने आप प्राप्ति होगी।
नैतन्मनो विशति वागुत चक्षुरात्मा प्राणेन्द्रियाणि च यथाऽनलमर्चिषः स्वाः ।
शब्दोऽपि बोधकनिषेधतयाऽऽत्ममूलमर्थोक्तमाहयदृते न निषेधसिद्धिः ॥ ३६ ॥
वैकुंठ, कैलाश, क्षीराब्धि, आदि की मन कल्पना कर सकता है, लेकिन आत्मा की वास्तविक कल्पना
करने का मनबुद्धि आदि को सामर्थ्य नहीं होता। जो मन स्वयं त्रिभुवन की कल्पना कर सकता है वह मन
आत्मस्वरूप में प्रवेश नहीं कर सकता। बुद्धि भी पूर्णरूप से निश्चयात्मक है किन्तु उसके लिए भी परब्रह्म दुरूह
है। जो मन, बुद्धि के लिये अगोचर है, जो वाणी के लिये भी दुस्तर है ऐसा वह परात्पर परब्रह्म शब्दों के लिये
कभी भी गोचर होना सम्भव नहीं है। आकाश को गठरी में बाँधना चाहो तो चारों छोर खाली रह जाते हैं उसी
प्रकार शब्दों से परब्रह्म को समझाने का प्रयास करो तो शब्दार्थ का धर्म ही नष्ट हो जाता है। प्राण की गति से
जिस क्रिया शक्ति का चलन होता है उस क्रिया को भी जब परब्रह्म का आकलन नहीं होता तो इन्द्रियों को कैसे

८८ श्रीमद् एकनाथी भागवत

हो पायेगा ? जिस प्रकार जलाशय में प्रतिबिम्बित होने पर भी सूर्य गीला नहीं होता, उसी प्रकार मन, बुद्धि और
इन्द्रियों के परे वह परमात्मा है, यह निश्चित रूप से ध्यान में रखो। मन का जो अनादि मन है, बुद्धि की जो
सज्ञान बुद्धि है, नेत्रों का जो आद्य नेत्र है, कान को भी जो ध्यानपूर्वक सुनने वाला कान है, नाक की जो मूल
नाक है, जो जिह्वा की भी जिह्वा है, जो त्वचा की अंतर्त्वचा है, जो जीवों का जीव है, जो इन्द्रियों का प्रकाशक
है, कर्म करते हुए भी जो अकर्ता है वह कभी भी इन्द्रियार्थ इन्द्रियों में विषय नहीं हो सकता। जहाँ बुद्धि की
दृष्टि नहीं पहुँच पाती वहाँ मन का मनपन कैसे प्रवेश कर पायेगा ? फिर श्रवण, नयन, घ्राण आदि के संयोग से
वह कैसे प्राप्त हो सकेगा ? जिसके पास प्राणों की शक्ति भी नहीं पहुँच पाती, वहाँ वाणी कैसे पहुँच पायेगी ?
वह लज्जा से मुड़ कर अपने आप लौट जाती है। फिर उसके आगे कर्मेन्द्रियों की क्या प्रतिष्ठा होगी ? अग्नि से
क्षण प्रति क्षण ज्वाला तथा चिनगारियाँ निकलती रहती हैं किन्तु उनसे अग्नि का पूर्ण स्वरूप प्रगट नहीं होता।
सूर्य से असंख्य सूर्यकान्त चमकते रहते हैं लेकिन उनमें सूर्य प्रकट नहीं होता। उसी प्रकार ब्रह्मा से अनेक
इन्द्रिय व्यक्त होते हैं लेकिन उन इन्द्रियों की ब्रह्मा से जान-पहचान कभी भी और किसी भी तरह होना सम्भव
नहीं है। यदि केले के फल से केला उत्पन्न हो सके या शक्कर से ईंख उत्पन्न हो तभी इन्द्रिय ब्रह्मा को जान
पायेंगे लेकिन वह ब्रह्मादिकों के लिये भी साध्य नहीं है। यदि इन्द्रियों को ब्रह्मज्ञान नहीं हो पाता तो जीवों का
बन्धन कभी नहीं टूटेगा इसलिये जन्ममरण से कभी मुक्ति नहीं मिलेगी। 'शब्दादेवापरोक्षेति' ऐसी श्रुतिशास्त्रों की
मान्यता है लेकिन वह भी झूठ ही लगता है ऐसा तुम कहोगे। तो हे राजा ! शब्द स्वयं लय हो जाता है और जीव
को ब्रह्मज्ञान देता है। इसके सम्बन्ध में जो निरूपण सुना रहा हूँ उसे ध्यान से सुनो। वेदों ने तो बाजी लगाकर
जीव को संसारबन्धन से मुक्त करने का बीड़ा उठाया है लेकिन सभी शास्त्रों की छानबीन करने के बाद लगता
है कि उन्होंने भी हाथ टेक दिये हैं। श्रुति ने 'नेति नेति' कह कर अनात्म पदार्थों का निषेध किया और एक
प्रकार से आत्मस्वरूप की पहचान बतायी लेकिन आत्मा का प्रत्यक्ष स्वरूप वेद भी नहीं बता पाये। शब्द से जो
निःशब्द का ज्ञान कराता है वही 'परब्रह्म' है ऐसा समझना चाहिये। यह पहचान जिसकी समझ में आती है, वह
स्वयं सहज ही ब्रह्मरूप हो जाता है। श्रुति 'नेति नेति' अर्थात् 'यह नहीं, यह नहीं' कह कर निषेधरूपी वचनों से
परब्रह्म का दर्शन कराता है। इस श्रुतिशब्द की सहायता से जो निःशब्द परब्रह्म को जान सकता है वही परब्रह्म
तक पहुँचता है। शब्द अपने निषेध से जिसका ज्ञान कराता है, उस तत्त्व में जिसकी बुद्धि समरस होती है, वही
तत्त्व निश्चित रूप से परब्रह्म है। आखिर निषेध की मर्यादा भी वही है। शब्द अपनी सारी शक्ति से जीव को
ब्रह्म की प्राप्ति करा देता है। 'शब्दादेवा परोक्षेते' अर्थात् 'शब्दों से ही अपरोक्ष ज्ञान' जिसे कहते हैं, वह यही है।
जहाँ वाणी पूरी तरह कुंठित हो जाती है, जहाँ मन और बुद्धि नहीं पहुँच पाती वही निषेध की सीमा है। उसी
को 'परब्रह्म' कहते हैं। जो वाणी को सवाक बनाता है किन्तु वाणी जिसे नहीं कह पाती जो मन और बुद्धि
वालों को जानता है लेकिन मन बुद्धि जिसे नहीं जानती, जो नेत्रों को रूप आदि दिखाता है लेकिन जिसे नेत्र
नहीं देखते जो श्रवण और घ्राण इन दोनों को सुनने की और घ्राण लेने की शक्ति देता है जिसे जानने के लिये
दूसरा कोई नहीं है ऐसे जो 'स्वसंवेद्य' अर्थात् स्वयं ही अपने को जानने वाले हैं, जिसे जानने वाला अन्य कोई
नहीं है। वहाँ शब्द को प्रवेश करने के लिये अवकाश ही कहाँ है ? जो कृश भी नहीं है और विपुल भी नहीं है,
जो सीधे भी नहीं है और वक्र भी नहीं है, जो सूक्ष्म भी नहीं है और स्थूल भी नहीं है ऐसी जो निर्विकार वस्तु
है जिसमें न रूप है न गुण है, जिसे न आश्रम है न वर्ण है, जिसमें 'मैं' पना नहीं है और 'दूजा' पन भी नहीं है,
उसी प्रकार जिसे जन्म और मरण नहीं है, जो न हलका है न भारी है, जो न दुबला पतला है न पुष्ट ही है, जो

न बसा हुआ है और न उजाड़ ही है, जो निःशेष निर्धर्म है, जो न छोटा है न लम्बा है, जो न वरिष्ठ है और न
कनिष्ठ है, जिसका विवेक से विचार करने पर विवेक भी सिकुड़ जाता है, जिसका न आदि है न अन्त है
जिसकी मध्यस्थिति भी नहीं है गुणयुक्त नहीं है और गुणातीत भी नहीं है, जो अद्वय भाव से अच्युत और अनन्त
है, उस स्वरूप का शब्दों में वर्णन करने का प्रयास वेदों ने किया, श्रुतियों ने भी बहुत हो-हल्ला किया किन्तु
बड़े कष्ट से 'नेति-नेति' कहने के कारण उन्हें लज्जा से गर्दन झुकानी पड़ गयी। तो क्या वेद उस स्वरूप को
बिना जाने ही लौट गये ? ऐसी बात नहीं है। उसने उसे जान लिया लेकिन वह शब्दों में व्यक्त नहीं कर सका
इसलिए वह मौन धारण कर बैठ गया और निःशब्द होकर तटस्थ रह गया। इस प्रकार वेदों ने मौन धारण कर
लेने के बाद सभी छः शास्त्र सकते में आ गये। वे अपने-अपने मत के अभिमान के कारण वितंडावाद में. उलझ
गये। शब्दवृत्ति जब शान्त हो जाती है, तभी ब्रह्मज्ञान प्राप्त होता है, इस बात का वेदों को पूरा विश्वास हो गया
इसीलिये उन्होंने शब्दों से शब्दों का निषेध कर हमेशा के लिये मौन धारण कर लिया। वेदराज के मौन धारण
करते ही बेचारे शास्त्र इधर-उधर भागने लगे। शब्दों का जंगल ढूँढ़ते-ढूँढ़ते उन्हें सच्चा समाधान नहीं ही मिला।
कल्पना का विराम होते ही जिन्हें ब्रह्म की प्राप्ति होती है उन्हें षड्दर्शन में मेल दिखायी देने लगता है, शास्त्रों
को अपने आप समझ आ जाती है और सारा त्रिभुवन एकरूप दिखायी देने लगता है। 'ब्रह्म' एक ही एक है
तथा अद्वय है, ऐसा सिद्धान्त आपही ने प्रतिपादित किया था तो फिर त्रिभुवन में जो एकता दिखायी देने लगी वह
किसको ? ऐसा हे राजा ! तुम कहोगे। तो तुम्हें बताता हूँ कि जिसकी वासना की गाँठ टूट गयी, अहंकार की गाँठ
खुल गयी, भाग्य केवल शरीर तक ही सीमित रह गया उनको ही यह सृष्टि ऐक्यरूप से भासित होने लगी। उस
अनुभव का किस्सा सुनाते समय उल्हास मालूम हुआ और स्वानन्द से सन्तुष्ट होकर पिप्पलायन मुनि
ब्रह्मैक्यरूप से सृष्टि की प्रशंसा करने लगे।
सत्त्वं रजस्तम इति त्रिवृदेकमादौ सूत्रं महानहमिति प्रवदन्ति जीवम्।
ज्ञानक्रियार्थफलरूपतयोरुशक्ति ब्रह्मैव भाति सदसच्च तयोः परं यत्॥३७॥
ब्रह्म और आत्मा एक है इस अनुभव से प्रपंच भी ब्रह्मरूप ही दिखायी देने लगता है। जिस प्रकार आकाश
में नीलापन का आभास होता है उसी प्रकार ब्रह्म में भी माया विचरती रहती है। उसकी करनी बड़ी अद्भुत है।
उसने नपुंसक में भी पुरुषत्व उत्पन्न किया। उसका पतिव्रता धर्म भी बड़ा विचित्र है। उसने नपुंसक में काम
उत्पन्न किया अनात्मा का नामकरण किया और उसके ही कारण निष्कर्म में कर्म उत्पन्न हुआ। वह निःसंग की
संगति में ही रममाण हुई और बिना शरीर का स्पर्श किये उसे गर्भ ठहर गया। प्रधान और महत्तत्त्व से उसे गर्भ
ठहरा और उसने विकारयुक्त त्रिगुणों को जन्म दिया। उस विचित्र स्त्री ने ज्ञानाज्ञानरूपी गाँव में वास कर अपनी
विद्या और अविद्या-स्वभाव के अनुसार शिव-भेद उस पुरुष को भोगने के लिये बाध्य किया। जिस प्रकार
सुवर्ण में अलंकार, तंतू में वस्त्राकार अथवा दीवार पर चित्र का आभास होता है, उसी प्रकार ब्रह्म में माया का
साकार आभास होता है। मिट्टी के गोकुल बनाये, उनकी भिन्न-भिन्न नामों से पूजा की लेकिन उनमें की मिट्टी
एक ही होती है उसी प्रकार ब्रह्म में जगद्रूप से माया का आभास होता है। घी के कण जिस प्रकार घी से भिन्न
नहीं होते, उसी प्रकार ब्रह्म में भी माया अनेक प्रकार दिखाती है। मूल रूप से ब्रह्म तो अकेला है, वह अनेक
कैसे हुआ ? तो वह माया की संगति का प्रभाव है ऐसा स्पष्टीकरण पिप्पलायन ने दिया। ब्रह्म मूलतः ओंकार रूप
है, वही अकार-उकार-मकार इस प्रकार तीन रूपों में प्रगट हुआ। सत्त्वादि तीन गुणात्मक विकार उसी के हैं।

९० श्रीमद् एकनाथी भागवत
तीनों गुण समान होने पर उसे 'प्रधान' कहते हैं। वही क्रिया शक्तिसूत्र है। उसमें जब ज्ञान उत्पन्न होता है तो उसी
को 'महत्तत्त्व' कहते हैं। अहंब्रह्मं यह जो पूर्णस्फूर्ति है, उसमें का 'अहं' ही देहाकृति में आया। उस देहाभिमान
के कारण ही परब्रह्म को 'जीव' कहते हैं। 'क्रिया' का अर्थ है दस इन्द्रिय उनके अधिष्ठातृ देवताओं को 'ज्ञान'
कहते हैं। विषय को 'अर्थ' और सुख-दुःख को 'फल' कहते हैं। तीन गुण, पंचभूत, पाँच विषय, दस इन्द्रिय,
उनकी सहायता से सुख-दुःख भोगने वाला जीव और ज्ञान, क्रिया, कर्माचरण इन सबको भी पूर्णब्रह्म समझना
चाहिये। चीनी का कटहल बनाओ तो भी उसके काँटे, छिलका, गुठली आदि शुद्ध शक्कर ही होती है, उसी
प्रकार जगत के रूप में सारा ब्रह्म ही है। कपड़े की गुड़िया बनायी, उसमें भिन्न-भिन्न अवयव बनाये फिर भी
उसमें एक जैसा सूत ही होता है, उसी प्रकार जो अविकृत ब्रह्म है, वही जगत के आकार में दिखायी देता है।
जगत, विश्व, प्रपंच ये नाम अलग-अलग होने पर भी वह सारा शुद्ध परब्रह्म ही है। उपनिषद का प्रमुख तत्त्व
यही है और वेदांत का परम परमार्थ यही है। अब संसार के रूप में परब्रह्म फैला हुआ है और संसार तो
विकारयुक्त है तो कोई ब्रह्म को भी विकारयुक्त कहेगा। लेकिन हे राजा! ऐसा कभी नहीं होगा।
नात्मा जजान न मरिष्यति नैधतेऽसौ न क्षीयते सवनविद् व्यभिचारिणां हि।
सर्वत्र शश्वदनपाय्युपलब्धिमात्रं प्राणो यथेन्द्रियबलेन विकल्पितं सत्॥ ३८॥
ब्रह्मा को माता-पिता नहीं है इसलिये उसे जन्म नहीं है। आत्मा यदि एकदेशी होता तो उसने माता के गर्भ-
में जन्म लिया होता। आत्मा के सिवा संसार में तिलमात्र के लिये भी जगह नहीं है। वह इतना परिपूर्ण है
इसीलिये उसे जन्म का स्पर्श नहीं है। जन्म से पूर्व बालक का अस्तित्व नहीं होता, जन्म लेने पर उसका अस्तित्व
मानते हैं लेकिन यह आस्ति-नास्ति की भाषा आत्मा के पास नहीं है। अब है, पहले नहीं था, इस प्रकार का
'आस्तिक्य' आत्मा में कभी प्रवेश नहीं करता। वह नित्य, निरन्तर ऐसा ही है। देहरूप से जन्म लेनेवाले बालक
का दिन-प्रतिदिन विकास होता दिखायी देता है, उस प्रकार का बालजन्म आत्मा का न होने के कारण उसकी
'वृद्धि' अर्थात् विकास नहीं होता। जिसमें वृद्धि नहीं होती उसके स्वरूप में कभी भी 'विपरिणाम' अर्थात्
परिवर्तन नहीं होता। उसमें बाल, युवा और वार्धक्य ये अवस्थायें कभी भी नहीं होतीं। मैं बाल्यावस्था में छोटा
था, युवावस्था में बड़ा हो गया और हाय, अब मैं वृद्ध हो गया हूँ। ये तीन अवस्थाएँ देखने वाला अर्थात् जानने
वाला परमात्मा है। साक्षी अथवा देखने वाला उन अवस्थाओं से परे होता है, वह कभी अवस्थाभूत नहीं होता।
ऐसा वह परमात्मा सचमुच देह में होते हुए भी अवस्थारहित अथवा देहातीत होता है। आत्मा अवस्थाशून्य,
अविकारी तथा पूर्ण है। उसमें कभी भी क्षीणता नहीं आती। उसी प्रकार जिसे 'जन्म' ही नहीं है उसे 'मरण' कैसे
आयेगा? तुम कहोगे कि ऐसी आत्मा है कौन? तो यह जान लो कि वह सर्वज्ञ है और केवल 'ज्ञानस्वरूप' है।
अब तुम कहोगे कि ज्ञान भी क्षणिक है, घटज्ञान से परज्ञान नष्ट होता है, लेकिन ऐसी बात नहीं है। उस विषय
को जानने वाली इन्द्रिय वृत्ति ही नष्ट हो जाती है, ज्ञान वैसा का वैसा अविनाशी ही होता है। इसका उदाहरण यह
है कि जिस प्रकार प्राण देह की वृद्धि करता है लेकिन केवल देह ही बाल, युवा आदि अवस्थाओं के अधीन
होता है, प्राण अवस्थारहित होता है इसीलिये वह जैसा का तैसा रहता है। प्राण देह का चालक है, उसे देहावस्था
की बाधा नहीं होती और आत्मा तो प्राण को भी चैतन्य प्रदान करता है। इसलिये उसमें देहावस्था सम्भव नहीं है।
इसी उदाहरण से परब्रह्म का निर्विकार स्वरूप समझना चाहिये। आत्मा देह की इन्द्रियों से बिलकुल अलग है,
यह अगले श्लोक में स्पष्ट किया गया है।

तृतीय अध्याय ९१
अण्डेषु पेशिषु तरुष्वविनिश्चितेषु प्राणो हि जीवमुपधावति तत्र तत्र ।
सन्ने यदिन्द्रियगणेऽहमि च प्रसुप्ते कूटस्थ आशयमृते तदनुस्मृतिर्नः ॥ ३९ ॥
अंडज, स्वेदज, जारज और चौथा, अन्द्रिज, इनमें आत्मा की संगति से प्राण सहज सर्वकाल रहता है। प्राण
के साथ आत्मा रहने से उसे 'जीव' कहते हैं। जब उस प्राण को देहावस्था की बाधा नहीं होती तो फिर जीव के
माथे पर वे कैसे सवार होंगी ? देहेन्द्रियों में विचरण करते हुए भी आत्मा देहावस्था से अलिप्त रहता है। वह
किस तरह अलिप्त रहता है इसे उदाहरण देकर समझाता हूँ। आत्मा जब सविकार देह में रहता है तो उसे
सविकार मानते हैं। वही देहेन्द्रियों को छोड़कर पूर्वस्मृति से स्वप्न में भी रहता है। देहेन्द्रिय के बिना रहने वाले
लिंगदेह में आत्मा जागृत अवस्था के अभिमान संकल्प से स्वप्न भी देखता है। जब वह स्वप्न भी शान्त हो जाता
है और देहाभिमान का लय हो जाता है तो सुषुप्तावस्था में जो विकारशून्य पूर्ण परमात्मा है वही शेष रहता है।
देहेन्द्रियों के साथ जब अभिमान भी लीन हो जाता है तो स्फुरण का स्फुरण नहीं होता। जब सारा शून्य ही हो
गया तो फिर चिद्धन (ज्ञानमय) आत्मा भी नहीं है, ऐसा तुम कहोगे। उसका उत्तर देता हूँ—सुषुप्ति में यदि
आत्मा न होता तो 'मैं सुख से सोया हुआ था' इसका स्मरण कैसे हुआ होता ? अर्थात् यह जहाँ जागता है उसे
'शून्य' कभी नहीं कहा जा सकता। जो मैं जागृति में 'जानने वाला' वही मैं स्वप्न देखने वाला और वही मैं
सुषुप्ति में सुख भोगने वाला है। इस प्रकार वह तीनों अवस्थाओं में साक्षी होता है। ऐसी तीन अवस्थाओं में जो
पूर्ण साक्षीरूप से विचरण करता है वह कभी भी शून्य नहीं है। हे राजा ! वही परिपूर्ण परमात्मा है और वह शुद्ध
चिद्धनस्वरूप है। अब जब सुषुप्ति में ब्रह्मानुभव होता है तो फिर संसार का आभास क्यों होता है ऐसा तुम पूछोगे
तो उस अवस्था में अहंकार अविद्या में लीन रहता है। (उसका विनाश नहीं हुआ रहता) इसलिये संसारभ्रम
उत्पन्न होता है। वह अविद्या जब अहंकार के साथ नष्ट होती है, उस समय जगद्रूप से ब्रह्म का ही आभास होने
लगता है और जन्म-मरण का ठिकाना ही नष्ट होकर जीव परब्रह्म के साथ ऐक्य प्राप्त करता है। फिर वहाँ हेतु,
दृष्टांत, प्रमाण, प्रमेय, प्रमाता इन सबसे रहित एक परब्रह्म परमात्मा ही सदैव परमानन्दस्वरूप में रहता है। उस
अवस्था में सुख पर सुख की तरंगें मचलने लगती हैं आनन्द ही आनन्द का उपभोग लेता है, स्वानंदानुभव से
परिपूर्ण होने के कारण सारा जगत परमानन्द से भर जाता है। हे राजा ! इस माया का विलय होकर इस प्रकार का
अनुभव कब होगा ऐसा यदि तुम पूछोगे तो मैं यही कहूँगा कि निष्काम भावना से उस यदुवर्य श्रीकृष्ण का भजन
करना चाहिये।
यह्र्यब्जनाभचरणैषणयोरुभक्त्या चेतोमलानि विधमेदगुणकर्मजानि।
तस्मिन् विशुद्ध उपलभ्यत आत्मतत्त्वं साक्षाद् यथामलदृशोः सवितुप्रकाशः ॥ ४० ॥
यदि मन में निर्विकार स्वरूप की प्राप्ति की इच्छा हो तो उत्कट प्रेम से अविश्रांत भगवद्भक्ति करनी
चाहिये। पुत्र और वित्त की बात छोड़ कर लौकिक की लज्जा त्याग कर भगवद्भजन की चाह से निर्लज्ज होकर
नाचना चाहिये। इन तीनों की आसक्ति त्याग कर श्रीहरिचरण का भजन करते रहने से चित्त का मल क्षण
प्रतिक्षण नष्ट होने लगता है। कर्म से उत्पन्न होने वाले जो रजतम्रादि दोष चित्त में बस्ती बनाकर बैठ जाते हैं। वे
सब भक्तिप्रेम रूपी जल से धुल जाते हैं। सप्रेम भक्ति जैसे-जैसे बढ़ती जाती है वैसे-वैसे विरक्ति चरणों के पास
आ जाती है, इससे विषयासक्ति अपने आप कम होकर चित्तवृत्ति निर्मल हो जाती है। चित्तवृत्ति जब निर्मल हो
जाती है तो वह सारे भूतों में परमात्मा को अनन्य प्रीति से भजने लगता है। यह ज्ञानोत्तर चौथी भक्ति अत्यन्त श्रेष्ठ

९२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
है। यह भक्ति अत्यन्त उदार रहती है, वह भक्त का अहंकार नष्ट कर डालती है, वह देवतागण, मानव, स्त्रियों,
शूद्र इन सबका उद्धार कर जीव को आनन्दित करती है। यह भक्ति जब बढ़ती है तो भवभय की निःशेष शान्ति
होती है। चारों मुक्ति चरणों के पास आ जाती हैं। हरि की भक्ति अत्यन्त उदार है। आँखों में जब कचरा आ जाता
है तो सूर्य बिम्ब उसे नहीं दिखायी देता फिर अन्य सारे पदार्थ कैसे दिखाई देंगे ? कचरा निकल जाने पर दृष्टि
निर्मल हो जाती है, सूर्यमण्डल के साथ-साथ अन्य पदार्थ भी साफ-साफ दिखायी देने लगते हैं। उसी प्रकार
परमात्मा हृदय में रहता अवश्य है लेकिन जब तक चित्तवृत्ति मलिन रहती है तब तक उस परब्रह्म का प्रकाश
नहीं होता क्योंकि चित्त वासना के दोष से दूषित हुआ रहता है। इसलिये भगवद्भक्ति करने से ही चित्तवृत्ति
निर्मल होती है और ऐसे भजनों से ही भक्त निर्विकार स्वरूप तक पहुँचते हैं। परमप्राप्ति के लिये संसार में एक
भगवद्भक्ति ही समर्थ है। हे नृपवर्य ! मैंने तुमसे उसका यथार्थ वर्णन किया है। आँखों का पटल हटते ही जिस
प्रकार प्रकाश के साथ सूर्य दिखायी देता है, उसी प्रकार कल्पना नष्ट होते ही निश्चित रूप से परब्रह्म भी प्रकट
होता है। मन जब निश्चयपूर्वक निर्विकल्प साम्यावस्था में पहुँचता है, तब देह में विचरण करते हुए भी
भवबन्धन उसे स्पर्श नहीं करता, यह बात निश्चित रूप से जान लो। इस प्रकार पिप्पलायन ने अत्यन्त
आनन्दपूर्वक, गर्जना करते हुए भाषण दिया। तब राजा को मनःपूर्वक सन्तोष हुआ और अनुभव का लक्षण
मालूम हुआ। इस प्रकार ब्रह्मनिरूपण सुनते-सुनते राजा का लालच बढ़ गया और उन्होंने निरूपण बढ़ाने के लिए
पुनः प्रश्न किया। जिसके कारण कर्मबन्धन टूट सके ऐसे कर्मयोग का समूल लक्षण सुनने के लिये राजा ने
आग्रहपूर्वक प्रश्न किया।
राजोवाच
कर्मयोगं वदत नः पुरुषो येन संस्कृतः ।
विधूयेहाशु कर्माणि नैष्कर्म्यं विन्दते परम् ॥ ४१ ॥
राजा ने आत्मश्रद्धा से परिपूर्ण होकर अत्यन्त विनीत भाव से पूछा, स्वामी ! जिसके योग से कर्म का बन्धन
टूटता है, वह कर्मयोग मुझे पूरी तरह बताइये। किस कर्म के योग से सारा कर्म नष्ट होकर अपने आप
नैष्कर्म्यसिद्धि प्राप्त होती है और पुरुष की पुरुषोत्तम से भेंट होती है, उसका सच्चा मर्म मुझे बताइये।
एवं प्रश्नममृषीन्पूर्वमपृच्छं पितुरन्तिके ।
नाब्रुवन् ब्रह्मणः पुत्रास्तत्र कारणमुच्यताम् ॥ ४२ ॥
स्वामी ! पहले यही प्रश्न मैंने सनकादिक से पिता के सान्निध्य में पूछा था, उसका उत्तर उन्होंने क्यों नहीं
दिया ? मेरी इस आशंका का भी समाधान कीजिये। राजा का मन अत्यन्त पवित्र था, उनका उत्तर देने के लिये
आविर्होत्र बड़े हर्ष के साथ आगे बढ़ा और उसने कर्म वैचित्र्य का निरूपण किया।
आविर्होत्र उवाच
कर्माकर्मविकर्मेति वेदवादो न लौकिकः ।
वेदस्य चेश्वरात्मत्वात्तत्र मुह्यन्ति सूरयः ॥ ४३ ॥
(आविर्होत्र ने कहा) हे नृपनन्दन ! कर्म, अकर्म और विकर्म साधारण नहीं हैं। उनके विभाग का निर्णय
बड़े-बड़े ज्ञानी, स्मृतिकार भी नहीं कर पाये। जो स्वयं प्रतिसृष्टि करने वाले थे वे भी कर्म के विभाग का निर्णय

तृतीय अध्याय | ९३

करते समय भ्रमित हो गये। जिन्होंने एक चुल्लू में समुद्र का प्राशन किया था, वे भी कर्म-समुद्र में डूब गये।
इसी कर्माकर्म की चिन्ता में असंख्य महर्षि मताभिमान से थक गये। अन्त में उनकी भी समझ में कुछ नहीं
आया। कर्माकर्म का विभाग जब स्वयं ब्रह्मदेव की भी समझ में नहीं आया तो उस कर्म की चिन्ता करनेवाले
दूसरों की क्या कथा है? कर्म का मूल वेद है और वेद स्वयं नारायण है। अर्थात् उस वेद के वाक्यों का विचार
करते समय श्रुतिशास्त्रों का भी मुँह बन्द हो गया। कर्म, अकर्म और विकर्म ये तीनों एक ही हैं फिर भी उनके
तीन प्रकार हैं। उनके विभागों का विस्तार भी बताता हूँ, सुनो। जिस प्रकार सफेद, मृदु और मधुर ये तीन भेद
दिखायी देने पर भी जिस प्रकार शक्कर एक ही होती है, उसी प्रकार कर्मठ लोग एक ही कर्म के तीन भेद मानते
हैं। मधुरता को यदि अलग किया जाय तो उसमें मृदुलता और सफेदी रहती ही है, सफेदी अलग करने पर भी
उसमें मृदुलता और मधुरता होती है, उसी प्रकार 'कर्म' को अलग करने पर भी उस कर्म के सर्वांग में 'अकर्म'
और 'कर्म-अकर्म' में 'विकर्म' अत्यन्त भूषण के साथ विचरण करता है। मुख्यरूप से जो मूलतः उत्पन्न होता है
उसे 'कर्म' कहते हैं और जो विहिता विहित क्रियाएँ हैं उन्हें 'विकर्म' कहते हैं। अकर्म के संयोग से कर्म का
विकास होता है और यह विकर्म में भी जिसको दिखायी देता है उसे गुरुकृपा के बल पर तत्काल निष्कर्मता प्राप्त
होती है। जब कर्म पर विशेष रीति से कर्म का विकास होता है तो उसे 'विकर्म' कहा जाता है। जहाँ कर्म की
गति रुक जाती है, उसे 'अकर्म' यह नाम दिया जाता है। कर्म की चिन्ता इस प्रकार अगम्य है। जब तुमने यह
प्रश्न किया उस समय तुम अभी बच्चे हो यह समझ कर सनकादिक ने उसका कोई उत्तर नहीं दिया था। हे
नृपनन्दन ! कर्माकर्म की चिन्ता भी किसी भी अयोग्य व्यक्ति को नहीं बतानी चाहिये क्योंकि कर्म ज्ञानियों के
लिये भी अगम्य है।
परोक्षवादो वेदोऽयं बालानामनुशासनम्।
कर्ममोक्षाय कर्माणि विधत्ते ह्यगदं यथा॥ ४४॥
रोग दूर करने के लिए जिस प्रकार बाप लड़के को औषधि देता है और वह रुचि से उसे खा ले इसलिये
उसके हाथ पर शक्कर देता है, उसी प्रकार मन्दमति लोग वेदों के परोक्षवाद को सच मान लेते हैं। वेदों का
अन्तर्गत उद्देश्य है कर्म से ही कर्म का बन्धन समाप्त करना। वेदों ने स्वर्गादिक फल की बात कही है लेकिन वह
केवल प्रवृत्त होने के लिए दिया हुआ प्रलोभन है। कर्म से ही कर्म का मूल नष्ट करने का वेदवचनों का उद्देश्य है
ऐसा ही समझना चाहिये। पैर में पड़ी हुई बेड़ी को तोड़ने के लिये हथौड़ा मँगाया लेकिन उस हथौड़े को ही जो
बेच कर खा गये उनका बन्धन कभी नहीं टूटेगा। उसी प्रकार सचमुच कर्म का बन्धन तोड़ना भूलकर जो लोग
सारा कर्म विषय के प्रीत्यर्थ खर्च करते हैं उनका भवबन्धन कभी भी नहीं टूटेगा और जन्म-मरण कभी समाप्त
नहीं हो पायेगा। दूसरे, हमें स्वर्गफल की आकांक्षा नहीं है इसलिये हम वेदोक्त कर्मों का आचरण नहीं करते यह
धारणा भी गलत है। उस पर बहुत बड़ा अनर्थ हो जाता है।
नाचरेद् यस्तु वेदोक्तं स्वयमज्ञोऽजितेन्द्रियः।
विकर्मणा ह्यधर्मेण मृत्योर्मृत्युमुपैति सः॥ ४५॥
जो जितेन्द्रिय होने के घमण्ड में वेदोक्त कर्मों का आचरण नहीं करते उसे परमार्थ की प्राप्ति तो नहीं ही
होती, उलटे उस पर बहुत बड़ा अनर्थ टूट पड़ता है। भले ही कोई बड़ा शास्त्रवेत्ता हो और ज्ञानी हो लेकिन यदि
वह वेदोक्त कर्मों से विमुख रहा तो वह ज्ञानी होकर ही पूरी तरह लुट जाता है और दुःख के सागर में डूब जाता

९४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
है। जो वेदोक्त कर्मों का आचरण नहीं करता और कर्म छोड़कर स्वयं को 'निष्कर्मी' समझता है वह भ्रम में है
और अभिमान में नष्ट हो गया है ऐसा समझ लो। विषयों का भले ही निग्रह किया हो और उसने वेदोक्त कर्मों
का त्याग कर दिया हो तो समझ लो कि वह अपने पैरों पर पत्थर मार रहा है और वह नरक में डूबा ऐसा समझ
लो क्योंकि वेद ही परमार्थ का मूल है इसलिये वेदोक्त कर्मों का पालन न कर वह जो कुछ भी करता है वह सब
हे राजा! उसके अधःपतन के लिये कारण बनता है। आँखें सचमुच देखने के लिये हैं लेकिन यदि उन आँखों को
ही निकाल कर देखना शुरू कर दें तो हमारी दृष्टि ही नष्ट हो जाती है, फिर अन्य चीजें कैसे देखेंगे ? उसी
प्रकार जिसने वेदोक्त आचरण न कर जिसे भी चाहे परमार्थ मान लिया उसने निमंत्रण देकर अनर्थ को घर बुला
लिया ऐसा समझ लो। इस प्रकार वे आचार के अनर्थ प्रवाह में बहकर जन्म-मरण की राह पर लग जाते हैं।
उधर विविध प्रकार की गर्भयातना भुगतते हुए कल्पान्त में भी उनसे छुटकारा नहीं मिलता। वहाँ बार-बार जन्म
लेने पर भी जन्म से छुटकारा नहीं मिल पाता और बार-बार मरने पर भी मौत नहीं टलती। वेदविहित कर्म न
करने से इस प्रकार अत्यन्त दुःसह दुःख भोगने पड़ते हैं। मूल पद में बताया गया है 'विकर्मणा ह्यधर्मेण' इससे
मालूम होता है कि विकर्म में पूर्ण अधर्म रहता है। लेकिन 'अकर्म' का अर्थ 'अधर्म' न समझो। जिसके लगने से
भी कर्म नहीं लगता उसी का नाम अकर्म अथवा निष्कर्म है। निष्कर्मलक्षण का ही अर्थ है धर्म और उसके ही
कारण साधु परममुक्त होते हैं। जिसे शुद्ध अकर्म का आकलन होता है वह तत्काल निष्कर्म होता है। अकर्म का
मर्म ज्ञात होते ही मुक्ति पैरों के पास आ जाती है।
वेदोक्तमेव कुर्वाणो निःसङ्गोऽर्पितमीश्वरे।
नैष्कर्म्यां लभते सिद्धिं रोचनार्था फलश्रुतिः ॥ ४६ ॥
दासी स्वामी की आज्ञाधारी होती है। जिस प्रकार राजा का आदेश अथवा सिक्का प्रजा स्वीकार करती है
उसी प्रकार जो वेदों की आज्ञा स्वीकार करता है और स्वधर्माचरण कर निष्काम रहता है, अर्थात् मैं ही
कर्मकर्ता हूँ ऐसा अहंकार मन में नहीं रखता, वही कर्म सहज रीति से श्रीअनंतरूपी ईश्वर को अर्पण होता है।
इस प्रकार जो कर्म ईश्वर को अर्पण होता है, वह कर्म निर्धर्म होता है। इसी का नाम है—'नैष्कर्म्य सिद्धि'।
वेदों ने कर्मफल के सम्बन्ध में कहा है लेकिन जिसकी वासना निष्काम और निर्मल रहती है उसे वेदोक्त प्रबल
फल को स्वप्न में भी नहीं भोगना पड़ता। ऐसा होते हुए भी जैसे पारस देकर पान के साथ सुपाड़ी माँगी जाय
उसी प्रकार कर्मफल की इच्छा करके लोग पूरी तरह घाटे में रहते हैं। कर्म में निष्कामता यही नित्य फल है,
फल की आशा में सभी धोखे में रहे हैं। चन्दन पूर्णरूप से गन्धरूप है, उससे यदि फल की कामना करें तो
स्वयं को धोखा देना है। मछली हाथ में आये इसलिये वंशी में थोड़ा आमिष लगाते हैं। उसी प्रकार मन को
निष्काम करने के लिये वेदों ने फल की आशा का प्रलोभन दिया है। आमिष दिखा कर मछली को पाला जाता
है या उन्हें पानी से बाहर कर दिया जाता है ? उसी प्रकार कर्म ही कर्म का विनाश करता है यह बात फलेच्छु
की समझ में नहीं आती। फल की आशा से स्वधर्म कर्म की ओर प्रवृत्त होता है और उससे 'नैष्कर्म्यसिद्धि'
प्राप्त होती है। यही वेद का सच्चा उद्देश्य है। कर्म ब्रह्मरूपत्व से सदा सफल है। लेकिन फल की इच्छा करने
वाले के लिये वह निष्फल सिद्ध होता है। यही ध्यान में लाकर कर्म कुशल लोग फलाशा त्याग देते हैं। इस
प्रकार वैदिक कर्म का आचरण करते रहने से 'नैष्कर्म्य' प्राप्त होता है। लेकिन तुम्हें इससे भी सुलभ एक
उपाय बताता हूँ, सुनो।

तृतीय अध्याय ९५
य आशु हृदयग्रन्थिं निर्जिहीर्षुः परात्मनः।
विधिनोपचरेद्देवं तन्त्रोक्तेन च केशवम्॥ ४७॥
हे राजा ! जिसके योग से वासना का जाल टूट जाता है, अहंकार की गाँठ खुलती है और जीव में परमात्मा
स्वयं प्रगट होता है उस सुन्दर तांत्रिक विधान को तुम्हें बताता हूँ, सुनो। हे राजाधिराज ! जिस तांत्रिक महापूजा से
भगवान को सन्तोष प्राप्त होता है, वह विधान अब सुनो। वैदिक मन्त्र और तांत्रिक तंत्र से युक्त पूजा अत्यन्त पवित्र
है। वह पुरुष को तत्काल निष्काम करती है। पूजा का वह प्रकार अत्युत्तम है। लेकिन पूजा वैदिक हो या तांत्रिक,
वह गुरुमार्ग से ही सफल होती है। इसीलिये पहले सद्गुरु की शरण में जाना चाहिए।
लब्धानुग्रह आचार्यात्तेन संदर्शितागमः।
महापुरुषमभ्यर्चेन्मूर्त्याऽभिमतयाऽऽत्मनः॥ ४८॥
प्रवृत्ति मार्ग या निवृत्ति मार्ग के कार्य में गुरु अवश्य ही होना चाहिये। हे राजा ! अपने मन से भजन करने
पर उस मनुष्य के अनेक संकटों में पड़ने की सम्भावना है। भूमि और पैर तो सिद्ध ही रहते हैं लेकिन यदि
मार्गदर्शक न हो तो व्यर्थ भटकना पड़ता है। उसी प्रकार बिना गुरु के जो उपाय करने लगते हैं वे अहंकारी लोग
अहंभाव के कारण भ्रम में पड़ जाते हैं। गुरु और ब्रह्म दोनों एक ही हैं यह भावना मन में रखकर भक्ति भाव से
उनकी सेवा करनी चाहिये और उन्हें प्रसन्न कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिये। फिर अपने अधिकार के
अनुसार अथवा संस्कार के अनुरूप जो मूर्ति अच्छी लगे, उससे सम्बन्धित मंत्र विद्या ग्रहण करनी चाहिये और
तब गुरुमुख से पुरुषोत्तम की वैदिक और तांत्रिक मिश्र महापूजा सीख लेनी चाहिये और इष्ट की प्राप्ति के लिये
भगवान का भजन पूजन करना चाहिये। हे राजा ! वही आगमोक्त पद्धति से पूजा करने की विधि विस्तारपूर्वक
बताता हूँ ध्यान से सुनो।
शुचिः सम्मुखमासीनः प्राण संयमनादिभिः।
पिण्डं विशोध्य संन्यास कृतरक्षोऽर्चयेद्धरिम्॥ ४९॥
विधिपूर्वक स्नान संध्या करना यही ब्रह्मज्ञान है। आचमन करते समय हम हरिस্বরূপ हो जाते हैं। यह न
मालूम होने के कारण कुछ लोग तंत्र मार्ग में अज्ञान भरा है ऐसा कहते हैं। केशवादि नामों से अंग-प्रत्यंग में ठीक
प्रकार से न्यास करने से हम हरिस্বরূপ हो जाते हैं, लेकिन यह न जानने के कारण तंत्रमार्ग पर अज्ञान थोपते हैं।
(इसलिये ऐसा न कर) शास्त्र के अनुसार स्नान संध्या कर मूर्ति के पास आकर उसके सामने आसन लगाना
चाहिये। पहले दर्भासन, उस पर मृगचर्म और उसके ऊपर कपड़े की तह बनाकर रखना चाहिये। उस पर बैठ
कर रेचक, पूरक और कुंभक इस प्रकार प्राणायाम कर प्राण का संयमन करना चाहिये और भूतशुद्धि आदि से
शरीर को शुद्ध करना चाहिये। भूतविलय, भूतशुद्धि, प्राणप्रतिष्ठा आदि से पिण्ड शुद्धि कर ज्ञाता मनुष्य को गुरु
सम्प्रदाय से प्राप्त विधि के अनुसार मूलमंत्र से अंग-प्रत्यंगों से न्यास करना चाहिये। हृदय, कवच, शिखा, सिर,
नेत्र अस्त्रायफट् आदि आगमोक्त पद्धति से यथाविधि करना चाहिये। इस प्रकार मूलमंत्र दीक्षा तथा दिग्बंधादि
संरक्षक विधि होने के बाद हे राजेन्द्र ! मूर्तिपूजन करना चाहिये। उसका प्रकार बताता हूँ, सुनो।
अर्चादौ हृदये चापि यथालब्धोपचारकैः।
द्रव्यक्षित्यात्मलिङ्गानि निष्पाद्य प्रोक्ष्य चासनम्॥ ५०॥

९६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
पूर्व श्लोक में कहे अनुसार सारे प्रयोग अर्थात् द्रव्यशुद्धि, भूमिप्रोक्षण आदि फिर से करना चाहिये। प्रत्येक
पदार्थ को शुद्ध करने का मुख्य अर्थ शुद्धि है। भूमिशुद्धि संमार्जन से होती है, आत्मशुद्धि चित्त की सावधानी से
होती है और मूर्ति पर चढ़ाया हुआ पहले का लेप अर्थात् निर्माल्य दूर करना मूर्तिशुद्धि है। फिर पूजा का साहित्य
सिद्ध करके उन सब पर शंखोदक से प्रोक्षण कर अपने आसन पर एकाग्र मन से बैठना चाहिये। जिसके ध्यान में
सम्पूर्ण मूर्ति नहीं आती उसे प्रतिमामूर्ति की स्थापना कर उसी की प्राप्त उपचार से आगमोक्त विधि से पूजा करनी
चाहिये। अत्यन्त प्रयास से यदि ध्यान में मूर्ति आती हो तो उसे बाह्य उपचार की चिन्ता छोड़ ध्यान दृष्टि से उत्तम
प्रकार से मानस पूजा करनी चाहिये। जिसके हृदय से ध्यान डिगता नहीं है और जो बाह्य मूर्ति की पूजा भी
सावधानी से कर सकता है, उसे आगमोक्त विधि से दोनों पूजा यथासांग करनी चाहिये।
पाद्यादीनुपकल्प्याऽथ सन्निधाप्य समाहितः।
हृदादिभिः कृतन्यासो मूलमन्त्रेण चार्चयेत्॥५१॥
पूजा का सारा साहित्य पास में रख कर फिर शास्त्रोक्त पद्धति से मूर्ति का न्यास करें। जैसे हम अपने शरीर
का न्यास करते हैं उसी प्रकार मूर्ति का भी करना चाहिये। मूलमंत्र से मूर्ति का न्यास करना चाहिये, यही
आगमोक्त गुरु दीक्षा है। अपने अंग-प्रत्यंगों का न्यास करने से मनुष्य स्वयं हृषीकेश हो जाता है। यही उद्देश्य मन
में दृढ़ करना चाहिये। चित्त का अनुसन्धान दृढ़ रखकर हृदय की मूर्ति तथा बाह्य प्रतिमा का पूजन मूलमंत्र से
यथाविधि करना चाहिये।
साङ्गोपाङ्गां सपार्षदां तां तां मूर्तिं स्वमन्त्रतः।
पाद्यार्घ्याचमनीयाद्यैः स्नानवासोविभूषणैः॥५२॥
अव्यंग अर्थात् जिसमें जरा भी व्यंग्य न हो ऐसी श्यामसुन्दर, मनोहर श्रीरंग की मूर्ति का ध्यान करना
चाहिये, ध्यान करते समय मन में अत्यन्त उल्हास रहना चाहिये। सुन्दर चतुर्भुज मूर्ति, शंख, चक्र, गदा, कमल
आदि आयुधों के साथ, उसी प्रकार पार्षदसमुदाय तथा आयुधों के देवता आदि सभी का चिन्तन करना चाहिये।
मधुपर्क विधि, पाद्य, अर्घ्य, आचमन आदि देकर निर्मल जल लेकर पुरुषसूक्त मंत्र से स्नान कराना चाहिये।
मुकुट, कुण्डल, कमर में मेखला, पहनने के लिये जरीदार पीताम्बर, गले से पैरों तक शोभित वनमाला, कंठ में
तेजःपुंज कौस्तुभमणि, पद्मचिह्न से अंकित पैर के तलुए, उस पर अंकित ऊर्ध्व रेखा, ध्वज, वज्र आदि चिह्न, उसी
प्रकार कंकण तथा चरणों में पायल आदि (इस प्रकार चिन्तन करना चाहिये।)।
गन्धमाल्याक्षतस्रग्भिर्धूपदीपोपहारकैः।
साङ्गं सम्पूज्य विधिवत्तस्तवैः स्तुत्वा नमेद्धरिम्॥५३॥
शुद्ध श्यामवर्ण, ललाट पर पीला केशरी टीका, उस पर कुंकुम से सनी हुई लाल अक्षत, गाँठ बनाकर बाँधे
हुए पिरोये हुए फूल उसके चारों ओर भ्रमरों का समुदाय, गले में कमल और तुलसी की मालायें और श्यामवर्ण
देह पर सुशोभित चन्दन! (इस प्रकार ध्यान करना चाहिये।) धूप, दीप, नैवेद्य तथा कर्पूरयुक्त ताम्बूल अर्पण
करना चाहिये। फिर निरंजन से आरती कर उच्च मंत्रस्वर में जय-जयकार कर मंत्रपुष्प अर्पण करना चाहिये।
उसके बाद वेदयुक्त मंत्रों से स्तुति करनी चाहिये अथवा पुराणों के अनुसार अनेक प्रकार के स्तोत्रों का स्तवन
करना चाहिये अथवा प्राकृत भाषा से अनेक प्रकार के नामोच्चार के साथ गद्यपद्यात्मक स्तुति करनी चाहिये। हे

तृतीय अध्याय ९७
जनक राजा! स्तवन से भगवान को सन्तोष होता है ऐसी मन में भावना रखनी चाहिये और फिर प्रेमभाव से
श्रीहरि को साष्टांग दण्डवत करना चाहिये।
आत्मानं तन्मयं ध्यायन् मूर्तिं सम्पूजयेद्धरेः।
शेषामाधाय शिरसि स्वधाम्न्युद्वास्य सत्कृतम्॥५४॥
द्वैतभाव से भजन करना स्थूल बुद्धि है ऐसा समझना चाहिये। भजन में तन्मय हो जाना यही सचमुच भजन
की सिद्धि है। मूर्तिध्यान से तन्मयता प्राप्त होना तथा ऐक्य भाव से वृत्ति का निश्चल रहना इसी का नाम मुख्य
भक्ति है। इस प्रकार पूजा करके उठने पर पुनः श्रीहरि को नमस्कार करना चाहिये। इस प्रकार हरि की पूजा का
शेषप्रसाद मस्तक पर धारण कर फिर भगवान को अपने हृदय मन्दिर में सुलाना चाहिये। ध्यानमूर्ति का हृदय में
शयन यह मानस पूजा का विसर्जन है तथा प्रतिमा को पलंग पर सुलाना यह प्रतिमा पूजा-विधान की समाप्ति है।
पूजा का विसर्जन होने पर भी अपने अनुसन्धान को नहीं छोड़ना चाहिये। अर्थात् सर्वदा अखण्ड हरि का स्मरण
करते रहना चाहिये। राजा! इसी का नाम 'आगम विधि' है इसे ध्यान में रखो। इससे परमात्मा की प्राप्ति होती है,
इसलिये बुद्धिमान लोग सदा इसी का पालन करते हैं। फिर यह भी ध्यान में रखो कि आगमोक्त विधि लक्षण में
प्रतिमा ही मुख्य नहीं है बल्कि जिसकी जहाँ पूर्ण श्रद्धा हो वहाँ यह विधि निःसंकोच करना चाहिये।
एवमग्न्यर्कतोयादावतिथौ हृदये च यः।
यजतीश्वरमात्मानमचिरान्मुच्यते हि सः॥५५॥
श्लोक ५५—हे राजा! यह पूजा केवल एकदेशीय अर्थात् प्रतिमा में ही होती है, ऐसा नहीं है। उसके
लिये अनेक स्थान हैं। उनमें से जहाँ भगवत्प्राप्ति अत्यन्त शीघ्र हो सकती है वह मैं तुम्हें बताता हूँ। इसी विधि से
'जल' में यथासमय विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिये अथवा 'सूर्यमण्डल' में हरि का ध्यान कर पवित्रता से पूजा
करनी चाहिये अथवा 'अग्नि' में ज्वाला निकलने पर उसमें श्रीहरि के स्वरूप का मन में ध्यान कर पूजा करनी
चाहिये। किन्तु सबकी अपेक्षा 'अतिथि' भगवत्स्वरूप है, ऐसा समझ कर उसकी पूजा करने पर भगवान की
प्राप्ति अति शीघ्र होती है। वैश्वदेव के अन्त में जो भी कोई आये, वह किसी भी जाति का क्यों न हो, उसकी जो
भगवद्भावना से पूजा करते हैं उनके घर पूर्ण प्राप्ति दौड़ती हुई आती है। जिससे पहले का परिचय न हो ऐसा
कोई वैश्वदेव के अन्त में यदि आता है, तो उसकी जो ब्रह्मभावना से पूजा करते हैं उनकी भुक्ति और मुक्ति दासी
बनकर रहती हैं। उसमें यदि वैश्वदेव के अन्त में सौभाग्य से पवित्र ब्राह्मण ही आ गया और यदि उसका
श्रद्धापूर्वक पूजन किया तो उसके घर स्वानन्द से नारायण का वास होता है। राजा! वैश्वदेव के अन्त में अतिथि
के साथ भुक्ति-मुक्ति भी आते रहते हैं इसलिये अतिथि विन्मुख चला गया तो व्यक्ति उस लाभ से वंचित रह
जाता है और यदि उसकी पूजा की जाय तो सुख की प्राप्ति होकर परमानन्द से जीवनयापन करता है। अतिथि
सामने होने पर मूर्ति का ध्यान नहीं करना पड़ता क्योंकि वह स्वयं ही नारायण स्वरूप होने के कारण उसकी पूजा
करने पर सर्वार्थ सिद्धि पूर्ण रूप से हाथ लगती है। इस प्रकार अतिथि को जो अर्पण किया जाता है वह भगवान
के मुख में ही समर्पित होता है। इसलिये अत्यन्त आदर के साथ सदासर्वदा अतिथि को ब्रह्म समझ कर उसकी
पूजा करनी चाहिये। हे राजा! ऊपर पूजा स्थान के रूप में जिसका उल्लेख हुआ है वहाँ पूजा करने वाले की
श्रद्धा ही प्रमुख है। बिना श्रद्धा के पूर्ण प्राप्ति कभी नहीं हो सकती, इसे ध्यान में रखो। हमारा हृदय भी एक
पूजास्थान है। उस हृदय में यदि हम श्रद्धा से पूजन करें तो सम्पूर्ण प्राप्ति अपने आप सामने खड़ी हो जाती है।

९८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
वैसे भी देह को परिचालित करने वाला ईश्वर हमारे शरीर में हृदय में ही रहता है। उसके प्रति श्रद्धा रखकर यदि
भजन किया जाय तो सहज ही आत्मप्राप्ति होती है। हम जिस भी चीज का सेवन करते हैं, वह सब भगवान के
मुख में ही जाता है ऐसी भावना से भजन करने से परमात्मा सहज ही प्राप्त होता है। देह की अहंता छोड़ कर
सारे भोग भोगने वाला ईश्वर ही है। ऐसी दृढ़ भावना रखने से परमार्थ का प्रत्यक्ष साक्षात्कार होता है। देह, जड़,
मूढ़, अचेतन है, समस्त भोगों का पूर्ण रूप से उपभोग करने वाला ईश्वर ही है, ऐसा अहंकार मन में रखकर
अज्ञानी लोग अनेक दुःख भोगते हैं। हे नृपवर्य! उस देहअहंकार को छोड़ कर हृदयस्थ परमात्मा की शरण में
जाने पर सचमुच ही परमार्थ का पूर्ण लाभ होता है। 'मैं' पन को पूरी तरह छोड़ना इसी का अर्थ है हृदयस्थ की
शरण में जाना। तुम स्वयं परब्रह्मस्वरूप ही हो, व्यर्थ ही देह का अहंकार न करो। हे राजा! ऐसे कर्म से ही कर्म
का बन्धन टूटता है और पूर्ण समाधान प्राप्त होता है। आगमोक्त भजन का यह प्रमुख लक्षण है। इसे सुनकर राजा
को अत्यन्त समाधान हुआ और वह परमानन्द से तृप्त हो गया। राजा की श्रवणेच्छा जैसे-जैसे पूर्ण होने लगी,
वैसे-वैसे कथा अधिक रोचक मालूम होने लगी और सुनने की इच्छा बढ़ने लगी। राजा अब परमानन्द से तृप्त
होते हुए भी स्वानंद के प्रलोभन में पुनः विनोद से प्रश्न पूछेगा। कहीं मैं चुप रहा तो ये मुनिवर्य उठ कर चले
जायेंगे इस भय से वह विचित्र ढंग से एक के बाद एक प्रश्न पूछने लगा। स्वानंद से उसकी चित्तवृत्ति भर गयी।
इन्द्रिय आत्मसुख से बिंध गये। इस प्रकार मन में तृप्त होते हुए भी राजा प्रश्न पूछ ही रहा था। इसके बाद वह
हरि के अवतारों के बारे में पूछेगा। वह कथा अत्यन्त सुन्दर और मनोहर है तथा उसका निरूपण प्रेममय होने के
कारण वह आपके हृदय को शान्त कर देगा। इस प्रश्न का उत्तर उत्तम कथा है। मैं एकनाथ श्री जनार्दन स्वामी
का किंकर तथा संतों की पादरक्षा धारण करनेवाला हूँ। संतजन कृपासागर हैं और श्रीजनार्दन वरदमूर्ति हैं। उनकी
कृपा से आगे की कथा सुसंगत यथार्थ से वर्णन करूँगा। श्रीभागवत का यह भण्डार भरने का कार्य जनार्दन
स्वामी ने इस एका को सौंपा है। वह निजबोध को खोलकर श्रवण सामग्री का भण्डार भर देगा।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादश स्कंधे निमिजायते
संवादे, माया कर्म ब्रह्म निरूपण नाम तृतीयोध्यायः ॥ ३ ॥

चतुर्थ अध्याय
हे ओंकारस्वरूप श्रीगुरु शिव ! तुम्हें प्रणाम करता हूँ। नमस्कार करने से जहाँ जीव का जीवभाव निःशेष
हो जाता है वहाँ देहभाव कैसे प्रवेश कर सकता है ? जीव का जीवभाव तथा देह का देहभाव ले कर ऊपर से
सेवा भी करा लेते हो ! इसलिये हे भगवान्, आपका यह कौशल बस देखते ही बनता है। शंखासुर का वध कर
उसका शरीर हाथ में धारण करते हो और आज तुम मुझमें प्रवेश कर मेरे शरीर को भी परिचालित कर रहे हो।
शंख से जो आवाज निकलती है उसमें फूँकने वाले का कौशल रहता है उसी प्रकार मैं जो कुछ बोलता हूँ वह
सब आपके कारण सुन्दर हो जाता है। अब मेरे शरीर में जो गति है वह तुम्हारी ही संगति से है, मुझसे होने
वाले सारे कर्म तुम्हारे ही बल से हो पाते हैं। मेरी देह का जो 'मैं' पना है वह तुम स्वयं हो गये हो। भगवन् !
तुम्हारे ही प्राण से मेरे प्राण चल रहे हैं। 'नेत्र' जो कुछ देखते हैं वह सब तुम्हारी ही ज्ञानशक्ति से, कान जो
सुनते हैं वह सब तुम्हारा ही अवधान है, जिह्वा जो कुछ चखती है वह सब तुम्हारे ही स्वादरूपी मुख से सम्भव
होता है। 'बुद्धि' जिस ज्ञान से संतुष्ट होती है वह ज्ञान भी तुम्हारा ही है। 'मन' अपने मनोधर्म से अत्यन्त चपल
रहता है वह भी तुम्हारी ही शक्ति के कारण, विवेक को उज्ज्वल विवेक तुम से ही प्राप्त होता है। 'वाणी' जो
कुछ बोलती है वह वक्तृत्व तुम्हारे ही शब्दों से आता है, 'बोध' जिस प्रबोध से मन में अपना स्थान बनाता है,
वह प्रबोध तुम्हारे ही अनुग्रह से होता है। तुम्हारे ही आनन्द से 'जागृति' जाग उठती है, तुम्हारे ही कारण
'स्वप्न' स्वप्न को देखता है। 'सुषुप्ति' जिस सुख से सुखी होती है वह पूर्णतया तुम्हारे ही सुख से। जिन-जिन
विषयों को मैं भोगता हूँ उन्हें भोगने का सामर्थ्य तुम्हारे में ही है। तुम्ही अपने साथ मुझे लेकर मुझे मेरी अस्मिता
के साथ परिचालित करते हो। मुझे कठपुतली बनाकर तुम सूत्रधार बन गये हो और मनचाहे ढंग से सूत्र
हिलाकर तुम मुझसे विचित्र काम कराते हो। हे जगच्चालक चिद्धन श्री जनार्दन ! कृपालु जगजीवना ! तुम्हारी
ही सत्ता से तुम्हारे श्रीचरणों को मैं प्रणाम करता हूँ। इस प्रकार तुम्ही मेरे चालक हो इसलिये यह ग्रन्थ भी तुम
ही मुझसे लिखवा रहे हो। इसलिये 'मैं एक कवि हूँ' यह समझना सचमुच ही जड़बुद्धि का परिचायक है। यह
एका (एकनाथ) जनार्दन के साथ एकरूप हो गया है या जनार्दन एकनाथ के साथ एकरूप हो गया है ? तो तुम
ही भिन्न-भिन्न नाम धारण कर एक अकेले विचरण करते हो ? जिस प्रकार सुवर्ण का आभूषण कहें अथवा
आभूषण में सुवर्ण है यह कहें उसी प्रकार एका और जनार्दन एकत्व से तुम जनार्दन ही हो। ऐसी विनती सुनकर
सद्गुरु प्रसन्न हुए और बोले यहाँ कल्पना करने की तुम्हें कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि जब कर्पूर में ज्योत
जलती है तभी उसका कर्पूरधर्म समाप्त हो जाता है उसी प्रकार सच्छिष्य को सद्गुरु मिलते ही उनका भेदभाव
समाप्त हो जाता है। जिस बोध के कारण भिन्न भाव समाप्त होता है, उस आत्मबोध से श्रीभागवत् भरा हुआ है।
इतिहास में संवाद रूप में उसे श्रीनारद ने वसुदेव को सुनाया है। उस इतिहास का अर्थ सुनने से अन्तर में
परमार्थ प्रकट होता है। जब श्रोतागण उसे सुनते हैं तो उनके हृदय में निरन्तर स्वानंद के बोध अर्थात् अनुभव का
उदय होता है। (यह सुन कर) इस पर संत श्रोता समुदाय कहने लगा, "क्या आश्चर्य है! सद्गुरु स्तवन में
तुमने ब्रह्मभाव अत्यन्त अभेदत्व से साध लिया है। यह सद्गुरु की विनती है या ब्रह्मसुख की खान है ? तुम्हारे
प्रेमभरे बोल सुनकर सज्जनों की चित्तवृत्ति प्रेम के रंग में रंग गयी है। मराठी भाषा में तुमने परमार्थ की खान ही

१०० श्रीमद् एकनाथी भागवत
खोल दी है। ये शब्द नहीं पारस हैं। उनके कान में पड़ते ही जीव ब्रह्मरूप हो जाता है। इस प्रकार श्रीभागवत् में
अनुपम और अगाध स्थिति अवश्य है, तो अब अर्थज्ञान के अनुसार उस कथा की संगति अच्छी तरह लगाओ।''
संतों का यह भाषण श्रवण कर, उनके चरण मस्तक पर धारण कर आगे की कथा का निरूपण करता हूँ।
श्रोतागण कृपया ध्यान से सुनें। तीसरे अध्याय के अन्त में तांत्रिक भक्ति का निरूपण करते समय अपनी पसन्द
की मूर्त्ति का भजन करने के लिये कहा था, उसे सुनकर राजा के मन में एक प्रश्न उठा कि त्रिभुवन में भगवान
तो एक हैं, लेकिन उनकी अवतार मूर्त्ति अनेक क्यों हैं? उनके जन्म-कर्म और उनके अनेक प्रकार कैसे हो
गये? वह प्रश्न राजा ने मुनि से पूछा।
राजोवाच
यानि यानीह कर्माणि यैर्यैः स्वच्छन्दजन्मभिः ।
चक्रे करोति कर्ता वा हरिस्तानि ब्रुवन्तुनः ॥ १ ॥
मुनीश्वर का ज्ञान वैसे भी अगाध था, तिस पर प्रतिपादन की रसाल शैली! इससे राजा का मन तल्लीन हो
गया और वह प्रश्न पूछने लगा। उसने कहा, "हरि तो देवाधिदेव हैं, वह स्वलीला से अर्थात् स्वेच्छा से कैसे
जन्म लेता है? स्वेच्छा से कौन-कौन से कर्म करता है? उसकी उस अगाध महानता का वर्णन करें। (शायद
आप कहेंगे) ईश्वर का जन्म नहीं होता, वहाँ कर्मों की बात कैसे पूछते हो? (लेकिन मैं कहता हूँ) भगवान को
रूप नहीं है और नाम भी नहीं है उसे जन्म भी नहीं है और कर्म भी नहीं है। वह अजन्मा है किन्तु जन्म लेता है,
वह अकर्मा है किन्तु कर्म करता है, वह विदेही है किन्तु देहधारी होकर संसार में स्वधर्म का पालन करता है। तो
उसके अवतार की स्थिति कैसी है, जन्म कौन से हैं, व्यक्ति कैसे हैं, अवतार कितने हैं, मूर्त्ति कितनी हैं? हे
स्वामी! आप कृपां करके मुझे सुनाएँ। जो पूर्व में हो गया है और आगे होने वाला है और वर्तमान में जो हैं, उन
सारे अवतारों के बारे में साद्योपांत सुनाएँ। हरि का चरित्र और उसके अवतार गुणों को प्रतिपादित करने का जनक
राजा का प्रश्न सुनकर द्रुमिल आनन्दपूर्वक सुनाने लगा।
द्रुमिल उवाच
यो वा अनन्तस्य गुणाननन्ताननुक्रमिष्यन् स तु बालबुद्धिः ।
रजांसि भूमेर्गणयेत् कथंचित् कालेन नैवाखिलशक्तिधाम्नः ॥ २ ॥
जिसकी लीला की शक्ति अपार है, ऐसी अनन्त शक्ति जिसके नाखून में रहती है और इसीलिये जिसे
अनन्त कहते हैं उसके सारे गुण किसे गिनायेंगे? उस अनन्त की गुणसमृद्धि का जो वर्णन करेगा उसे मंदबुद्धि
समझना चाहिये क्योंकि जिस प्रकार आकाश के विस्तार का नाप चींटी से नहीं हो सकता अथवा समुद्र के सारे
पानी का नाप जिस प्रकार नमक के पास नहीं होता, उसी प्रकार अनन्त के अनन्त गुणों का आकलन कौन कर
पायेगा? हे नृपवर्य! पर्जन्य की धाराओं की भी गिनती हो सकेगी, पृथ्वी पर उगी हुई सारी दूब की भी गिनती हो
सकेगी। हे राजा! वायु तेज गति से बहती है लेकिन उसका वेग भी गणित से ज्ञात किया जा सकता है। आँखों
का दिनभर में खुलना और बन्द होना इसका भी हिसाब हो सकता है। पृथ्वी के परमाणुओं की भी कालान्तर में
गणना हो सकती है किन्तु भगवान के गुणों का गणित वेदों को भी नहीं आता इसे ध्यान में रखो। उसका एक
नाम लेते ही वेद मौन हो गये, उसके सारे गुणों की गणना करते समय शेष की जीभ भी टूट गयी। उस अनन्त के
अनन्त गुण यहाँ कौन गिन सकता है? फिर भी उसके अवतार के कुछ लक्षण मैं संक्षेप में अवश्य बताऊँगा।

चतुर्थ अध्याय १०१
भूतैर्यदा पञ्चभिरात्मसृष्टैः पुरं विराजं विरचय्य तस्मिन्।
स्वांशेन विष्टः पुरुषाभिधातमवाप नारायण आदिदेवः ॥ ३ ॥
सर्वप्रथम 'द्रुमिल' मुनि यह अवतारों में से पुरुषावतारों की कथा सुनाने लगा। उसने कहा, महाराज! ध्यान
देकर सुनें। श्रीनारायण ने आत्मशक्ति के योग से पंचमहाभूतों को भूताकृति में यथाप्रमाण उत्पन्न कर ब्रह्माण्ड की
स्थिति निर्माण की। 'ब्रह्माण्ड' का ही नाम विराजपुर है। उसमें लीला से देवोत्तम ने प्रवेश किया इसलिये उस
पुरुषोत्तम को अपने ही अंश का होने के कारण पुरुषोत्तम कहने लगे। (इसी को 'विराट पुरुष' कहते हैं। यह
नारायण का पहला अवतार है।) उसके ही अंश से प्रकृति ने प्रजा उत्पन्न की इसलिये उसे 'पुरुष' यह नाम दिया
गया। वह अकर्तात्म प्रयोग से संसार को चिच्छक्ति से चेतन करता है। उसके ही योग से जगत को जगत्व की
स्फूर्ति प्राप्त होती है। उसकी गुणकीर्ति का अब दो श्लोकों में वर्णन करता हूँ।
यत्काव एष भुवनत्रयसंनिवेशो यस्येन्द्रियैस्तनुभृतामुभयेन्द्रियाणि।
ज्ञानं स्वतः श्वसनतो बलभोज ईहा सत्त्वादिभिः स्थितिलयोद्भव आदिकर्ता ॥ ४ ॥
त्रैलोक्य नाम से जो कुछ है, वही उसका शरीर है। उसके ही योग से प्राणी इधर-उधर विचरण करते
हैं। ब्रह्मदेवादिक देहधारी इनके ज्ञानेन्द्रियों की तथा कर्मेन्द्रियों की महानता उसके ही अर्थात् उस आदिपुरुष के
ही इन्द्रियों के कारण है। उसी की इन्द्रिय शक्ति से समस्त देहधारियों के इन्द्रिय, अपने-अपने व्यापार में
कार्यरत रहते हैं। वह जगत के नेत्र का नेत्र, जगत के प्राण का प्राण, जगत के कान का कान तथा जिह्वा की
जिह्वा है। वही जगत के हाथ, पैर तथा वाणी है। इस प्रकार दोनों इन्द्रियों में उसी के इन्द्रिय हैं। जीवों में जो
ज्ञान है वह उसी के कारण है, उसे ज्ञान देने वाला दूसरा कोई नहीं है। स्वभावतः वह ज्ञानधन है। उसके प्राण
से जगत का प्राण चलता है, बल, तेज और क्रियाशक्ति प्राप्ति होती है। रज, सत, तम आदि गुणों से युक्त
होकर उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय करने वाला मूलरूप से आदि कर्ता भगवान वही सचमुच 'पुरुषावतार' है। हे
राजा! सत्त्वादि त्रिगुणावस्था से वही उत्पत्ति स्थिति और प्रलय का कर्ता होता है। उसकी गुणावतार कथा भी
तुम्हें बताता हूँ, सुनो।
आदावभूच्छतधृती रजसाऽस्य सर्गे विष्णुः स्थितौ क्रतुपतिर्द्विजधर्मसेतुः।
रुद्रोऽप्ययाय तमसा पुरुषः स आद्य इत्युद्भवस्थितिलयाः सततं प्रजासु ॥ ५ ॥
वही आदिकरूप में सृष्टि की उत्पत्ति के समय रजोगुण से राजशक्ति धारण कर 'शतधृति' बना। उसी को
'ब्रह्मा' कहते हैं। इस प्रकार ब्रह्मदेव के रूप से राजसशक्ति से सृष्टि निर्माण की। स्वधर्मस्थिति का तथा सृष्टि का
प्रतिपालन करने के लिये सत्वगुण से वही 'विष्णु' बना। द्विज धर्म का प्रतिपाल करने वाला और यशभोक्ता
श्रीविष्णु, धर्म का ह्रास होते देख अनेक अवतार धारण कर संसार में प्रकट होता है। वही सृष्टि के अन्त में
तमोगुण अर्थात् तामसशक्ति से स्वयं ही 'रुद्रमूर्ति' होकर कल्पांत में सबका विनाश करता है। जो खेत की बुवाई
करता है वही उसकी रक्षा करता है, वही देखभाल करता है, वही सँभालता है और फसल सूखने पर वही उसकी
कटाई और दँवाई करता है। इस प्रकार उत्पत्तिकाल में 'ब्रह्मदेव' वही है, स्थितिकाल में वही 'विष्णु' है और
प्रलयकाल में उसी पुरुषोत्तम को 'रुद्र' यह नाम प्राप्त होता है। इसलिये श्रुतिशास्त्र में वही आदिकर्ता है ऐसा
निश्चयपूर्वक कहा गया है। दक्ष, कश्यप आदि में जो कर्तव्यक्षमता आयी वह इसी के सामर्थ्य से। इस प्रकार
विचार करने पर कर्त्ता यही एक है इसके सिवा किसी और को अणुरेणु जितनी कर्तव्यता भी सम्भव नहीं है। जो

सृष्टि के प्रारम्भ में स्वयंभू रहता है, उसके ही योग से उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय का आभास होता है। वही
आदिकर्ता सहज रहता है और वही अपने अंश से 'पुरुषावतार' होता है। हे राजा! वही 'नारायण' इस नाम से
अवतीर्ण हुआ। उसका चरित्र अत्यन्त अद्भुत तथा अलौकिक है और वह अत्यन्त पवित्र और पुण्यकारक है।
उसका वर्णन करता हूँ, सुनो !
धर्मस्य दक्षदुहितर्यजनिष्ट मूर्त्यां नारायणो नर ऋषिविप्रवरः प्रशान्तः।
नैष्कर्म्यलक्षणमुवाच चचार कर्म योऽद्यापि चास्त ऋषिवर्यनिषेविताङ्घ्रिः ॥ ६ ॥
जो त्रिभुवन में नित्य अजन्मा था लेकिन योनि में जन्म लिया, उसने धर्म नामक ऋषि की धर्मपत्नी जो मूर्ती
नामक दक्षकन्या थी उसे अपनी जननी बनाया। उस मूर्त्ति-माता के उदर में नर नारायण का अवतार हुआ। वे
दोनों स्वरूप से एक थे किन्तु दो रूपों में धर्म के घर अवतीर्ण हुए। हे राजा! उसने (इस नारायण ने) नारद आदि
को नैष्कर्म्य लक्षण का निरूपण कर स्वयं भी उसका आचरण कर दिखाया। वह कथा सुनो। यह नारायण किस
देश का था यह जानना चाहते हो तो समझ लो कि वह बदरिकाश्रम में रहने वाला था। नारद सनकादिक ऋषि
अभी भी उसकी सेवा में रहते हैं। अपने स्वरूप का प्रत्यक्ष ध्यान उसे सहज ही रहता है इसलिये उस
स्वरूपनिष्ठा का पक्ष अर्थात् अलक्ष्य के ध्यान का वह साधक को उपदेश देता रहता है। उस स्वरूप का बोध हमें
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चतुर्थ अध्याय १०३
प्रकार नारायण की दृष्टि से उन स्त्रियों के काम की गति हुई। नारायण की महिमा न जानकर काम ने दौड़ कर
उस पर प्रहार किया लेकिन अपने निंद्य धर्म से ये लोग लज्जित हो उठे। पराजित होकर मुँह छिपाये लौट गये
उस समय नारायण ने उनके कुंठाग्रस्त चेहरे को देखा। नारायण स्वयं इन्द्रियों का नियंता है यह न जानकर वे उसे
छलने गये थे लेकिन अब उनमें उसके सामने से लौटने का साहस नहीं हो रहा था। न आगे जा पा रहे हैं न पीछे
लौट पा रहे हैं इस दुविधा में वे गड़बड़ा गये। भय से उनका शरीर काँपने लगा और वे व्याकुल हो उठे। यह
नारायण के ही प्रभाव के कारण है और कहीं वह शाप न दे दे इस भय से वे काँपने लगे। उनकी वह असहाय
स्थिति देखकर वह कृपालु व्यथित हो उठा। उसके मन में जरा भी क्रोध नहीं हुआ। ऐसी विचित्र थी उस
नारायण की शान्ति।
विज्ञाय शक्रकृतमक्रममादिदेवः प्राह प्रहस्य गतविस्मय एजमानान्।
मा भैष्ट भो मदन मारुत देववध्वो गृहीत नो बलिमशून्यमिमं कुरुध्वम्॥ ८॥
यह इन्द्र का किया हुआ अपराध था फिर भी नारायण को उन पर गुस्सा नहीं आया। कामादिकों पर भी
उन्हें क्षोभ नहीं हुआ। उसने इन्द्र को भी शाप नहीं दिया। उसके प्रति नारायण के मन में जरा भी विकार उत्पन्न
नहीं हुआ। अपकार करने वाले पर जो कुपित होता है उसकी कोप के कारण तत्काल दुर्गति होती है लेकिन
अपकार करने वाले पर जो उपकार करता है वही श्रेष्ठ परमार्थी है। अपकारी अर्थात् शत्रु पर उपकार करने का
नाम ही परम शान्ति है। उस शान्ति का स्वरूप नारायण ने प्रत्यक्ष आचरण करके लोगों को दिखाया। परमार्थ की
स्थिति यह है कि हृदय में अत्यन्त शान्ति होनी चाहिये। उसका स्वरूप उसने प्रत्यक्ष आचरण से लोगों को
दिखाया। कामादिक भयाक्रांत हो उठे थे। अप्सराएँ भी साशंक हो उठी थीं। उन्हें अभय देकर नारायण ने कहा, हे
काम वसंतादिक स्वामी ! आप इतनी कृपा कर यहाँ पधारे हैं। आपकी चरण धूलि से हमारी आश्रमभूमि पवित्र हो
गयी है। आप यहाँ सहज ही आ गये हैं लेकिन हमें आपका पूजन अवश्य करना चाहिये। यही हमारा अनुष्ठान
है। आप हमारे कुछ बलिदान अर्थात् उपचार स्वीकार करें और आप अप्सराओं, देवस्त्रियों! आप बिकुल निर्भय
रहें। यहाँ आयी हुई आप सब मेरे लिये पूज्य हैं। आश्रम में कोई अतिथि आने पर जो उसकी पूजा नहीं करते
उसकी पुण्यसंपदा का विलय हो जाता है और आश्रम की स्थिति शून्य हो जाती है। इसलिए यदि आपने हमारी
पूजा स्वीकार नहीं की और बिना उपचार ग्रहण किये चली गयीं तो यह आश्रम शून्य हो जायेगा। इसलिये कृपा
करके पूजा ग्रहण करें। आश्रम में आया हुआ अतिथि सभी की दृष्टि में पूज्य होता है। आश्रम में जो अतिथि की
पूजा करते हैं उस आश्रम की कीर्ति का वर्णन शंकर भी करते हैं। समधी जब नाराज होते हैं तो उनके चरण छूते
हैं उसी प्रकार अतिथि जब विन्मुख होकर जाने लगता है तो उसका वन्दन करने से वह प्रसन्न हो जाता है और
दूसरे को भी आनन्द देता है। समधी यदि नाराज हो गया तो वह बहू को मैके नहीं भेजेगा लेकिन यदि अतिथि
नाराज हुआ तो आज तक सम्पादित किया हुआ सारा पुण्य नष्ट हो जायेगा। आश्रम में जो अध्यात्म भाव से
अतिथि की पूजा करते हैं उस आश्रम में वैकुण्ठ में रहने वाला वैकुण्ठपति नित्य निवास करने आता है। नारायण
ने ऐसा कहा लेकिन यह मेरी महान शान्ति है ऐसे भाव ने उसके मन को स्पर्श भी नहीं किया। जिसमें परिपूर्ण
शान्ति होते हुए भी घमण्ड जरा भी नहीं है वही सच्चा देवाधिदेव है। देवताओं को और मानवों को जो नित्य
नचाता है, जिसके भय से तपस्वी लोग तप छोड़ देते हैं, उन कामक्रोधों को अभय देकर नारायण ने अपने पास
रख लिया।

१०४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
इत्थं ब्रुवत्यभयदे नरदेव देवाः सव्रीडनम्रशिरसः सघृणं तमूचुः ।
नैतद् विभो त्वयि परेऽविकृते विचित्रं स्वारामधीरनिकरानतपादपद्मे ॥ ९ ॥
इस प्रकार अभय देते हुए नारायण ने अपने मुख से कहा, इससे काम, क्रोध, वसंत और अप्सरा आदि
लोगों ने लज्जा से गर्दन झुका ली। नारायण की निर्विकार पूर्ण क्षमा देखकर वसंतादिक लोगों ने समझ लिया कि
यह कोई ऋषि नहीं अपितु साक्षात परमात्मा है और वे स्वयं उसकी महिमा का वर्णन करने लगे। हे महाराज
चक्रवर्ति ! सार्वभौम विदेह ! सुनो। कामादि मण्डली अत्यन्त भक्तिभाव से नारायण की स्तुति करने लगी। जो
सर्वकाल लोगों को छलते थे, उन्होंने जब नारायण की परिपूर्ण शान्ति देखी तो वे उस शान्ति की स्तुति करने लगे
जिससे नारायण को संतोष प्राप्त हो, उसके मन में पूर्ण कृपा उत्पन्न हो, इस प्रकार वे परमार्थ बुद्धि से उनका
स्तवन करने लगे। उन्होंने कहा, "देवाधिदेव ! तुम्हारी जय हो। तुझ जैसी कामक्रोधरहित निर्विकार स्थिति
देवताओं में या मानवों में नहीं दिखायी देती। मेरे काम के वश में ब्रह्मदेव भी कन्या को पकड़ने के लिये गया
और पराशर ने क्या किया ? उन्होंने दिन में ही दुर्गंधा का उपभोग किया। योगी जिनका शिरसा वन्दन करते हैं, जो
तपस्वियों में शिखर पर है वह शंकर भी मोहिनी के पीछे आसक्त हुआ उस समय उसका लंगोटी में वीर्यस्खलन
हुआ। '' विषयग्लानि से विष्णु भी वृंदा के श्मशान में धरना देकर बैठा था। अहिल्या की कथा तो वेदों और
पुराणों में भी प्रसिद्ध है। नारद ने मेरी नहीं सुनी लेकिन उसे भी साठ पुत्र हुए। मेरा प्रहार सह सके ऐसा समर्थ
पुरुष संसार में कोई नहीं है। ब्रह्मचारियों का राजा मारुति अपने ब्रह्मचर्य का बड़ा अभिमान करता था लेकिन
उससे बिना संग किये मैंने मकरध्वज को जन्म दिया। चन्द्र को मैंने कलंकयुक्त किया, इन्द्र के शरीर में छिद्र
किये और शंकर के लाडले पुत्र कार्तिक स्वामी को गुफा में बन्द कर दिया। मेरे मदन का प्रहार देवदानवों को
भी सहन नहीं होता फिर मानव उसे कैसे सहन कर पायेंगे ? शंकर ने मुझे जलाया लेकिन मैंने उसे पागल कर
दिया। लेकिन तुम्हारे जैसा आश्चर्यकारी धैर्य त्रिभुवन में कहीं भी देखने को नहीं मिलेगा। तुमने मुझ जैसे
प्रभावशाली मदन को पराजित किया। शान्ति के कल्याण का उदय हुआ। इतना यश तुम अकेले ने सम्पादित
किया। अपनी शान्ति से हमारे स्वभाव को जीत लिया। मुझ काम को जीत कर क्रोध का भी घमण्ड चूर कर
दिया। वासना की मस्ती भी हमेशा के लिये क्षीण कर दी। हे नारायण ! कितने ही बड़े तपस्वी क्यों न आयें
लेकिन उनसे तुम्हारी यह निष्ठा अर्थात् आत्मस्थिति की बराबरी नहीं की जायेगी। अपने स्वानुभव को
सार्वजनिक कर तुमने शान्ति का साम्राज्य स्थापित कर दिया। पहले भी अनेक तपस्वियों के कामक्रोध को जीतने
का वर्णन आता है। लेकिन उन्हें भी हमने पूरी तरह छला, उसे अब सबके सामने बताता हूँ। कपिल जैसी महान
तेजोराशि उसे भी क्रोध ने छला, सगर को शाप देते समय वह भी क्रोध के वश में आ गया। नारद को भी क्रोध
आया और उसने नलकूवर को वृक्ष बनाकर छोड़ा। गौतम ने तो क्रोध में अहिल्या को वनवासी शिला बनाकर
छोड़ा। जो सदा लोगों के विघ्न दूर करता है उस विघ्नेश को भी क्रोध ने छला तब क्रोध में आकर उसने चन्द्रमा
को तत्काल शाप दिया। दुर्वासा को भी क्रोध आया और उसने अंबरीष को शाप दिया और भगवान को गर्भवास
दिलाया। इस प्रकार क्रोध ने अनेक ऋषियों को छला। जो प्रतिसृष्टि निर्माण कर सकते हैं वे भी कामक्रोध के
चक्कर में फँस जाते हैं। इन्द्र की सम्पत्ति समुद्र में गिर गयी यह क्रोध कथा पुराणों में प्रसिद्ध ही है। औरों की
बात क्या की जाय ? क्रोध ने शंकर को भी छला। उसने यज्ञदीक्षा लेकर बैठे हुए दक्षद्विज का वीरभद्र से शिरच्छेद
कराया। मैं काम जहाँ रहता हूँ वहाँ क्रोध भी धीरे-धीरे आ ही जाता है। लेकिन हे नारायण ! आपने तो काम और
क्रोध का मानों अस्तित्व ही नष्ट कर दिया। तुम्हारा यह सामर्थ्य आश्चर्यजनक है। इतना धैर्य औरों में नहीं है।

चतुर्थ अध्याय १०५
इसीलिये बड़े-बड़े ऋषि भी तुम्हारे चरणों की सेवा करते हैं। हे देवाधिदेव ! शान्ति की इच्छा से जो तुम्हारी नित्य
सेवा करते हैं वे तुम्हारे नामस्मरण से ही कामक्रोध आदि के स्वभाव को सहज ही जीत लेते हैं। जहाँ सम्मान के
साथ काम अर्थात् इच्छा पूर्ण होती है वहाँ आदरपूर्वक अनुग्रह किया जाता है लेकिन जहाँ सम्मानपूर्वक काम तृप्त
नहीं हो पाता वहाँ क्रोध लाल होकर शाप देता है। इस प्रकार शापानुग्रह करने में समर्थ पुरुष सदा कामक्रोधयुक्त
रहते हैं लेकिन तुमने अपनी महानता के अनुकूल ही कार्य किया यह कौतुक की बात है। अपनी शान्ति और
स्वरूपनिष्ठा से कामक्रोध को अंकित कर दिया। फिर इतना सब कुछ करने पर भी गर्व न होने का अहंकार भी
नहीं ! छल करनेवालों को हलका साबित करने अथवा उनकी उपेक्षा करने का भी तुम्हारा विचार नहीं दिखायी
देता। लोग पृथ्वी को गोड कर उसे दुःखी करते हैं लेकिन वह अन्न पैदा कर उन्हें सुखी करती है। इस प्रकार
अपकार करने वाले पर जो उपकार करता है वह मोक्ष के सिर पर का मुकुट है। हे कृपामूर्ति ! तुझ में निर्विकार
शान्ति का होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। तुम्हारे स्वरूप की सच्ची स्थिति हमें निश्चित रूप से आज ही
मालूम हुई। तुम निर्गुण, निरुपम, मायातीत, पूर्णब्रह्म हो। सहज ही यदि कोई तुम्हारा नामस्मरण करे तो सकाम
को भी काम स्पर्श नहीं कर सकता। जो सर्वकाल तुम्हारा नामस्मरण करता है, उसे मैं काम ही निष्काम कर देता
हूँ और क्रोध ही क्रोध का शमन करता है और जो मोह है वही परमबोध होकर रहता है। जो निजशान्ति के योग
से धीर वीर होकर परमानन्द में ही निरन्तर तृप्त रहते हैं ऐसे मुक्तजनों की असंख्य पंक्तियाँ तुम्हारे चरण छूती हैं।
तुम्हें नमस्कार करने के लिये महासिद्धों का समुदाय आगे बढ़ता है लेकिन उन्हें मौका नहीं मिल पाता। आप ऐसे
परात्पर गुरु महात्मा हैं। तुम्हारे सेवकों के निकट यदि विघ्न जाने का प्रयास करता है तो वह दीन हीन हो जाता
है। तुम्हारे सामने वह किस बल बूते पर आयेगा ?
त्वां सेवतां सुरकृता बहवोऽन्तरायाः स्वौको विसृज्य परं व्रजतां पदं ते।
नान्यस्य बर्हिषि बलीन् ददतः स्वभागान् धत्ते पदं त्वमविता यदि विघ्नमूर्ध्नि ॥ १० ॥
हे नारायण ! तपस्वी लोगों के लिये विघ्न उत्पन्न करना, उन्हें कष्ट देना तथा उनके तप में बाधा डालना यह
हमारा स्वभाव ही है इसमें कोई आश्चर्य नहीं है। लेकिन जो हृदय के काम को छिपा कर, बाहर से जप-तप तथा
भक्ति का ढोंग करने वाले महाठग होते हैं उन पर ही विघ्न का प्रभाव पड़ता है। हमारी विघ्न उत्पन्न करने की
शक्ति तुम्हारे सच्चे भक्तों के आगे काम नहीं करती। भक्ताभिमानी भक्तों के रक्षक होने के कारण, वहाँ विघ्नों की
गति उलटी हो जाती है। मेरे भक्तों के लिये विघ्न किस बात के ? तो देवाधिदेव उसका भी अभिप्राय तुम्हें बताता
हूँ, सुनो ! आत्मपद प्राप्ति की आकांक्षा मन में होने के कारण जो स्वर्गसुख को ठोकर मार कर निरन्तर
निष्कामबुद्धि से तुम्हारा भजन करते हैं उनके देवता अनेक प्रकार के विघ्न उत्पन्न करते हैं। 'हमारा उल्लंघन कर
ये अटल पद तक पहुँचते हैं' यह कहकर देवेन्द्रादिक उनके लिये अनेक विघ्न उत्पन्न करते हैं। हमें हविर्भाग
दिये बिना ये पूर्ण पद तक पहुँचना चाहते हैं इस क्रोध से इन्द्रादि देव उनके लिये अनेक प्रकार के विघ्न खड़ा
कर देते हैं। उनके भजनों में बाधा पहुँचाने के लिये विघ्न तत्काल पहुँच जाते हैं। लेकिन उन विघ्नों से उनका
कुछ नहीं बिगड़ता क्योंकि तुम हृषीकेश उनकी सुरक्षा के लिये तत्पर रहते हो। सकाम कल्पना छोड़कर जो
तुम्हारे चरणों में रममाण होते हैं, उनकी तुम नारायण ! आठों पहर सुरक्षा करते रहते हो। विघ्नों से घबराकर 'हे
भगवान् ! दौड़ो, दौड़ो कहते हैं और तुम उनकी पुकार पुकार सुनकर दौड़ जाते हो। नारायण ! तुम कभी निष्ठुर
नहीं होते हो। भक्तों के निकट विघ्न पहुँचे इससे पहले ही तुम उनकी चारों ओर से सुरक्षा के लिए तत्पर रहते
हो। विघ्न कुपित होकर छलने के लिये दौड़ता है तभी उस विघ्न में ही तुम्हारा रूप प्रगट होता है। इसलिये

भक्तों को विघ्न कोई बाधा नहीं पहुँचा सकते। काम हरिभक्तों को छलने जाता है तो काम के हृदय में भी श्रीहरि
का ही वास्तव्य उन्हें दिखायी देता है और जो विघ्न रहता है वही उनके लिये निर्विघ्न हो जाता है। सारांश भक्तों
को स्वप्न में भी विघ्न का भय नहीं रहता। विघ्न विरोध उत्पन्न करता है लेकिन विघ्न के भीतर बाहर श्रीहरि ही
होने के कारण जो विरोध है वही निजभक्तों के लिये महाबोध तथा स्वानन्द का कन्द होता है। जिन्हें तुम्हारे
चरणों पर श्रद्धा होती है उनके लिये विघ्न में से ही परमार्थ प्रगट होता है। इस प्रकार भावबल के साथ सर्वसमर्थ
तुम अपने भक्तों के लिये निरन्तर सहायक बनते हो। इस प्रकार भक्त सभी विघ्नों को पराजित कर इन्द्रपद के
पाथे पर पैर रख, तुम्हारी कृपा से परमार्थ पद तक पहुँचते हैं। भगवान जिसकी सुरक्षा के लिये तत्पर रहते हैं,
उसे छलने के लिये भी जब विघ्न दौड़ पड़ते हैं तो फिर गरीब सकाम लोगों की क्या कथा है? तो हे राजा
जनक ! उनकी भी कथा सुनाता हूँ। मन में विषय कामना रखकर जो इन्द्रादि देवों को बलिदान देने के लिये यज्ञ
आदि के चक्कर में पड़ते हैं उन्हें भगवान कोई विघ्न नहीं पहुँचाते। इन्द्र याज्ञिकों का राजा है और सकाम यज्ञ
करने वाले ये देवताओं की प्रजा है। वे उन्हें उत्तमोत्तम यज्ञभाग अर्पण करते हैं। वह बलिपूजा मिलते ही वे उन्हें
विघ्न नहीं करते। लेकिन काम आदि उन्हें कष्ट नहीं देते क्योंकि वे निष्काम को कभी स्पर्श नहीं करते। वे सहज
ही काम के वश में रहते हैं क्योंकि वे सदा सकाम कर्मों को ही करते हैं। अब जो मुझ काम के वश में होते हैं वे
अपना तप खर्च कर भोग भोगते हैं, लेकिन जो क्रोध के चक्कर में फँसते हैं वे व्यर्थ ही तप से हाथ धो बैठते हैं।
क्षुत्तृट्त्रि कालगुणमारूतजैह्वशैस्यानसमानपारजलधीनतितीर्य केचिंत।
क्रोधस्य यान्ति विफलस्य वशं पदे गोर्मजन्ति दुश्चरतपश्च वृथोत्सृजन्ति॥ ११॥
प्राणायाम से प्राणापान की गति का निरोध कर, निजप्राण को वश में कर वायु, वर्षा, जाड़ा, धूप आदि
सहन कर जो अनुष्ठान में व्यस्त रहते हैं, क्षुधा और तृष्णा का संयमन कर जिह्वा और शिश्न पर नियंत्रण कर मुझ
काम को जीत लिया यह मानकर अहंकार से उन्मत्त होते हैं। वे क्षुद्र अपमान से क्रुद्ध होकर क्रोध के अधीन
होकर शाप देते हैं और अपनी निष्ठा और तपसम्पत्ति व्यर्थ ही खो देते हैं। सकाम अनुष्ठान कर मुझ काम की
संगति से पुष्पमाला, चन्दन (इत्र आदि) तथा स्वर्ग की अप्सराओं के भोग भोग कर अमृत का भी प्राशन करते
हैं। लेकिन ऐसे भोग देने वाले मुझ काम की उपेक्षा कर जो क्रोध के वश में हो जाते हैं वे एकाध प्रखर शाप
देकर अपने सारे तप पर पानी फेरते हैं। विराट समुद्र तैर कर पार करने वाला कोई जैसे गाय के पैरों में एकत्र
पानी में डूब जाय उसी प्रकार मुझ काम को जो जीत लेते हैं वे भी अपने क्रोध के कारण दुःख भोगते हैं। मुझ
काम की अतृप्ति में जो स्थिति है वही क्रोध के लिये सुदृढ़ स्थिति है। लेकिन काम, क्रोध ये अभक्तों का छल
करते हैं, हरिभक्तों के आगे उनकी कुछ नहीं चलती। तुम्हारे भक्तों को भी जब काम क्रोध का बन्धन नहीं बाँध
सकता तो फिर तुम भक्तपति नारायण को हमारे काम की कैसे बाधा हो सकती है? तुम्हारी महिमा न मालूम होने
के कारण हम अपना धर्म चलाने के लिये यहाँ आये। लेकिन हे कृपालु पुरुषोत्तम ! तुम्हारे पास तो सर्वदा क्षमा ही
वास कर रही है।
इति प्रगृणतां तेषा स्त्रियोऽत्यद्भूतदर्शनाः।
दर्शयामास शुश्रूशां स्वर्चिताः कुर्वतीर्विभुः॥ १२॥
अपकारी पर उपकार करना इसी को 'निर्विकार शान्ति' कहते हैं। उसी शान्ति की पूर्णावस्था विघ्नकर्ता को
हरी ने (नारायण ने) दिखला दी। कामादिकों ने अपनी स्थिति निवेदन कर अनेक प्रकार से नारायण की स्तुति