श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 105, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंन बसा हुआ है और न उजाड़ ही है, जो निःशेष निर्धर्म है, जो न छोटा है न लम्बा है, जो न वरिष्ठ है और न
कनिष्ठ है, जिसका विवेक से विचार करने पर विवेक भी सिकुड़ जाता है, जिसका न आदि है न अन्त है
जिसकी मध्यस्थिति भी नहीं है गुणयुक्त नहीं है और गुणातीत भी नहीं है, जो अद्वय भाव से अच्युत और अनन्त
है, उस स्वरूप का शब्दों में वर्णन करने का प्रयास वेदों ने किया, श्रुतियों ने भी बहुत हो-हल्ला किया किन्तु
बड़े कष्ट से 'नेति-नेति' कहने के कारण उन्हें लज्जा से गर्दन झुकानी पड़ गयी। तो क्या वेद उस स्वरूप को
बिना जाने ही लौट गये ? ऐसी बात नहीं है। उसने उसे जान लिया लेकिन वह शब्दों में व्यक्त नहीं कर सका
इसलिए वह मौन धारण कर बैठ गया और निःशब्द होकर तटस्थ रह गया। इस प्रकार वेदों ने मौन धारण कर
लेने के बाद सभी छः शास्त्र सकते में आ गये। वे अपने-अपने मत के अभिमान के कारण वितंडावाद में. उलझ
गये। शब्दवृत्ति जब शान्त हो जाती है, तभी ब्रह्मज्ञान प्राप्त होता है, इस बात का वेदों को पूरा विश्वास हो गया
इसीलिये उन्होंने शब्दों से शब्दों का निषेध कर हमेशा के लिये मौन धारण कर लिया। वेदराज के मौन धारण
करते ही बेचारे शास्त्र इधर-उधर भागने लगे। शब्दों का जंगल ढूँढ़ते-ढूँढ़ते उन्हें सच्चा समाधान नहीं ही मिला।
कल्पना का विराम होते ही जिन्हें ब्रह्म की प्राप्ति होती है उन्हें षड्दर्शन में मेल दिखायी देने लगता है, शास्त्रों
को अपने आप समझ आ जाती है और सारा त्रिभुवन एकरूप दिखायी देने लगता है। 'ब्रह्म' एक ही एक है
तथा अद्वय है, ऐसा सिद्धान्त आपही ने प्रतिपादित किया था तो फिर त्रिभुवन में जो एकता दिखायी देने लगी वह
किसको ? ऐसा हे राजा ! तुम कहोगे। तो तुम्हें बताता हूँ कि जिसकी वासना की गाँठ टूट गयी, अहंकार की गाँठ
खुल गयी, भाग्य केवल शरीर तक ही सीमित रह गया उनको ही यह सृष्टि ऐक्यरूप से भासित होने लगी। उस
अनुभव का किस्सा सुनाते समय उल्हास मालूम हुआ और स्वानन्द से सन्तुष्ट होकर पिप्पलायन मुनि
ब्रह्मैक्यरूप से सृष्टि की प्रशंसा करने लगे।
सत्त्वं रजस्तम इति त्रिवृदेकमादौ सूत्रं महानहमिति प्रवदन्ति जीवम्।
ज्ञानक्रियार्थफलरूपतयोरुशक्ति ब्रह्मैव भाति सदसच्च तयोः परं यत्॥३७॥
ब्रह्म और आत्मा एक है इस अनुभव से प्रपंच भी ब्रह्मरूप ही दिखायी देने लगता है। जिस प्रकार आकाश
में नीलापन का आभास होता है उसी प्रकार ब्रह्म में भी माया विचरती रहती है। उसकी करनी बड़ी अद्भुत है।
उसने नपुंसक में भी पुरुषत्व उत्पन्न किया। उसका पतिव्रता धर्म भी बड़ा विचित्र है। उसने नपुंसक में काम
उत्पन्न किया अनात्मा का नामकरण किया और उसके ही कारण निष्कर्म में कर्म उत्पन्न हुआ। वह निःसंग की
संगति में ही रममाण हुई और बिना शरीर का स्पर्श किये उसे गर्भ ठहर गया। प्रधान और महत्तत्त्व से उसे गर्भ
ठहरा और उसने विकारयुक्त त्रिगुणों को जन्म दिया। उस विचित्र स्त्री ने ज्ञानाज्ञानरूपी गाँव में वास कर अपनी
विद्या और अविद्या-स्वभाव के अनुसार शिव-भेद उस पुरुष को भोगने के लिये बाध्य किया। जिस प्रकार
सुवर्ण में अलंकार, तंतू में वस्त्राकार अथवा दीवार पर चित्र का आभास होता है, उसी प्रकार ब्रह्म में माया का
साकार आभास होता है। मिट्टी के गोकुल बनाये, उनकी भिन्न-भिन्न नामों से पूजा की लेकिन उनमें की मिट्टी
एक ही होती है उसी प्रकार ब्रह्म में जगद्रूप से माया का आभास होता है। घी के कण जिस प्रकार घी से भिन्न
नहीं होते, उसी प्रकार ब्रह्म में भी माया अनेक प्रकार दिखाती है। मूल रूप से ब्रह्म तो अकेला है, वह अनेक
कैसे हुआ ? तो वह माया की संगति का प्रभाव है ऐसा स्पष्टीकरण पिप्पलायन ने दिया। ब्रह्म मूलतः ओंकार रूप
है, वही अकार-उकार-मकार इस प्रकार तीन रूपों में प्रगट हुआ। सत्त्वादि तीन गुणात्मक विकार उसी के हैं।