श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 117, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थ अध्याय १०१
भूतैर्यदा पञ्चभिरात्मसृष्टैः पुरं विराजं विरचय्य तस्मिन्।
स्वांशेन विष्टः पुरुषाभिधातमवाप नारायण आदिदेवः ॥ ३ ॥
सर्वप्रथम 'द्रुमिल' मुनि यह अवतारों में से पुरुषावतारों की कथा सुनाने लगा। उसने कहा, महाराज! ध्यान
देकर सुनें। श्रीनारायण ने आत्मशक्ति के योग से पंचमहाभूतों को भूताकृति में यथाप्रमाण उत्पन्न कर ब्रह्माण्ड की
स्थिति निर्माण की। 'ब्रह्माण्ड' का ही नाम विराजपुर है। उसमें लीला से देवोत्तम ने प्रवेश किया इसलिये उस
पुरुषोत्तम को अपने ही अंश का होने के कारण पुरुषोत्तम कहने लगे। (इसी को 'विराट पुरुष' कहते हैं। यह
नारायण का पहला अवतार है।) उसके ही अंश से प्रकृति ने प्रजा उत्पन्न की इसलिये उसे 'पुरुष' यह नाम दिया
गया। वह अकर्तात्म प्रयोग से संसार को चिच्छक्ति से चेतन करता है। उसके ही योग से जगत को जगत्व की
स्फूर्ति प्राप्त होती है। उसकी गुणकीर्ति का अब दो श्लोकों में वर्णन करता हूँ।
यत्काव एष भुवनत्रयसंनिवेशो यस्येन्द्रियैस्तनुभृतामुभयेन्द्रियाणि।
ज्ञानं स्वतः श्वसनतो बलभोज ईहा सत्त्वादिभिः स्थितिलयोद्भव आदिकर्ता ॥ ४ ॥
त्रैलोक्य नाम से जो कुछ है, वही उसका शरीर है। उसके ही योग से प्राणी इधर-उधर विचरण करते
हैं। ब्रह्मदेवादिक देहधारी इनके ज्ञानेन्द्रियों की तथा कर्मेन्द्रियों की महानता उसके ही अर्थात् उस आदिपुरुष के
ही इन्द्रियों के कारण है। उसी की इन्द्रिय शक्ति से समस्त देहधारियों के इन्द्रिय, अपने-अपने व्यापार में
कार्यरत रहते हैं। वह जगत के नेत्र का नेत्र, जगत के प्राण का प्राण, जगत के कान का कान तथा जिह्वा की
जिह्वा है। वही जगत के हाथ, पैर तथा वाणी है। इस प्रकार दोनों इन्द्रियों में उसी के इन्द्रिय हैं। जीवों में जो
ज्ञान है वह उसी के कारण है, उसे ज्ञान देने वाला दूसरा कोई नहीं है। स्वभावतः वह ज्ञानधन है। उसके प्राण
से जगत का प्राण चलता है, बल, तेज और क्रियाशक्ति प्राप्ति होती है। रज, सत, तम आदि गुणों से युक्त
होकर उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय करने वाला मूलरूप से आदि कर्ता भगवान वही सचमुच 'पुरुषावतार' है। हे
राजा! सत्त्वादि त्रिगुणावस्था से वही उत्पत्ति स्थिति और प्रलय का कर्ता होता है। उसकी गुणावतार कथा भी
तुम्हें बताता हूँ, सुनो।
आदावभूच्छतधृती रजसाऽस्य सर्गे विष्णुः स्थितौ क्रतुपतिर्द्विजधर्मसेतुः।
रुद्रोऽप्ययाय तमसा पुरुषः स आद्य इत्युद्भवस्थितिलयाः सततं प्रजासु ॥ ५ ॥
वही आदिकरूप में सृष्टि की उत्पत्ति के समय रजोगुण से राजशक्ति धारण कर 'शतधृति' बना। उसी को
'ब्रह्मा' कहते हैं। इस प्रकार ब्रह्मदेव के रूप से राजसशक्ति से सृष्टि निर्माण की। स्वधर्मस्थिति का तथा सृष्टि का
प्रतिपालन करने के लिये सत्वगुण से वही 'विष्णु' बना। द्विज धर्म का प्रतिपाल करने वाला और यशभोक्ता
श्रीविष्णु, धर्म का ह्रास होते देख अनेक अवतार धारण कर संसार में प्रकट होता है। वही सृष्टि के अन्त में
तमोगुण अर्थात् तामसशक्ति से स्वयं ही 'रुद्रमूर्ति' होकर कल्पांत में सबका विनाश करता है। जो खेत की बुवाई
करता है वही उसकी रक्षा करता है, वही देखभाल करता है, वही सँभालता है और फसल सूखने पर वही उसकी
कटाई और दँवाई करता है। इस प्रकार उत्पत्तिकाल में 'ब्रह्मदेव' वही है, स्थितिकाल में वही 'विष्णु' है और
प्रलयकाल में उसी पुरुषोत्तम को 'रुद्र' यह नाम प्राप्त होता है। इसलिये श्रुतिशास्त्र में वही आदिकर्ता है ऐसा
निश्चयपूर्वक कहा गया है। दक्ष, कश्यप आदि में जो कर्तव्यक्षमता आयी वह इसी के सामर्थ्य से। इस प्रकार
विचार करने पर कर्त्ता यही एक है इसके सिवा किसी और को अणुरेणु जितनी कर्तव्यता भी सम्भव नहीं है। जो