श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 113, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीय अध्याय ९७
जनक राजा! स्तवन से भगवान को सन्तोष होता है ऐसी मन में भावना रखनी चाहिये और फिर प्रेमभाव से
श्रीहरि को साष्टांग दण्डवत करना चाहिये।
आत्मानं तन्मयं ध्यायन् मूर्तिं सम्पूजयेद्धरेः।
शेषामाधाय शिरसि स्वधाम्न्युद्वास्य सत्कृतम्॥५४॥
द्वैतभाव से भजन करना स्थूल बुद्धि है ऐसा समझना चाहिये। भजन में तन्मय हो जाना यही सचमुच भजन
की सिद्धि है। मूर्तिध्यान से तन्मयता प्राप्त होना तथा ऐक्य भाव से वृत्ति का निश्चल रहना इसी का नाम मुख्य
भक्ति है। इस प्रकार पूजा करके उठने पर पुनः श्रीहरि को नमस्कार करना चाहिये। इस प्रकार हरि की पूजा का
शेषप्रसाद मस्तक पर धारण कर फिर भगवान को अपने हृदय मन्दिर में सुलाना चाहिये। ध्यानमूर्ति का हृदय में
शयन यह मानस पूजा का विसर्जन है तथा प्रतिमा को पलंग पर सुलाना यह प्रतिमा पूजा-विधान की समाप्ति है।
पूजा का विसर्जन होने पर भी अपने अनुसन्धान को नहीं छोड़ना चाहिये। अर्थात् सर्वदा अखण्ड हरि का स्मरण
करते रहना चाहिये। राजा! इसी का नाम 'आगम विधि' है इसे ध्यान में रखो। इससे परमात्मा की प्राप्ति होती है,
इसलिये बुद्धिमान लोग सदा इसी का पालन करते हैं। फिर यह भी ध्यान में रखो कि आगमोक्त विधि लक्षण में
प्रतिमा ही मुख्य नहीं है बल्कि जिसकी जहाँ पूर्ण श्रद्धा हो वहाँ यह विधि निःसंकोच करना चाहिये।
एवमग्न्यर्कतोयादावतिथौ हृदये च यः।
यजतीश्वरमात्मानमचिरान्मुच्यते हि सः॥५५॥
श्लोक ५५—हे राजा! यह पूजा केवल एकदेशीय अर्थात् प्रतिमा में ही होती है, ऐसा नहीं है। उसके
लिये अनेक स्थान हैं। उनमें से जहाँ भगवत्प्राप्ति अत्यन्त शीघ्र हो सकती है वह मैं तुम्हें बताता हूँ। इसी विधि से
'जल' में यथासमय विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिये अथवा 'सूर्यमण्डल' में हरि का ध्यान कर पवित्रता से पूजा
करनी चाहिये अथवा 'अग्नि' में ज्वाला निकलने पर उसमें श्रीहरि के स्वरूप का मन में ध्यान कर पूजा करनी
चाहिये। किन्तु सबकी अपेक्षा 'अतिथि' भगवत्स्वरूप है, ऐसा समझ कर उसकी पूजा करने पर भगवान की
प्राप्ति अति शीघ्र होती है। वैश्वदेव के अन्त में जो भी कोई आये, वह किसी भी जाति का क्यों न हो, उसकी जो
भगवद्भावना से पूजा करते हैं उनके घर पूर्ण प्राप्ति दौड़ती हुई आती है। जिससे पहले का परिचय न हो ऐसा
कोई वैश्वदेव के अन्त में यदि आता है, तो उसकी जो ब्रह्मभावना से पूजा करते हैं उनकी भुक्ति और मुक्ति दासी
बनकर रहती हैं। उसमें यदि वैश्वदेव के अन्त में सौभाग्य से पवित्र ब्राह्मण ही आ गया और यदि उसका
श्रद्धापूर्वक पूजन किया तो उसके घर स्वानन्द से नारायण का वास होता है। राजा! वैश्वदेव के अन्त में अतिथि
के साथ भुक्ति-मुक्ति भी आते रहते हैं इसलिये अतिथि विन्मुख चला गया तो व्यक्ति उस लाभ से वंचित रह
जाता है और यदि उसकी पूजा की जाय तो सुख की प्राप्ति होकर परमानन्द से जीवनयापन करता है। अतिथि
सामने होने पर मूर्ति का ध्यान नहीं करना पड़ता क्योंकि वह स्वयं ही नारायण स्वरूप होने के कारण उसकी पूजा
करने पर सर्वार्थ सिद्धि पूर्ण रूप से हाथ लगती है। इस प्रकार अतिथि को जो अर्पण किया जाता है वह भगवान
के मुख में ही समर्पित होता है। इसलिये अत्यन्त आदर के साथ सदासर्वदा अतिथि को ब्रह्म समझ कर उसकी
पूजा करनी चाहिये। हे राजा! ऊपर पूजा स्थान के रूप में जिसका उल्लेख हुआ है वहाँ पूजा करने वाले की
श्रद्धा ही प्रमुख है। बिना श्रद्धा के पूर्ण प्राप्ति कभी नहीं हो सकती, इसे ध्यान में रखो। हमारा हृदय भी एक
पूजास्थान है। उस हृदय में यदि हम श्रद्धा से पूजन करें तो सम्पूर्ण प्राप्ति अपने आप सामने खड़ी हो जाती है।