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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 110, कुल 869 में से

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पृष्ठ 110

९४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
है। जो वेदोक्त कर्मों का आचरण नहीं करता और कर्म छोड़कर स्वयं को 'निष्कर्मी' समझता है वह भ्रम में है
और अभिमान में नष्ट हो गया है ऐसा समझ लो। विषयों का भले ही निग्रह किया हो और उसने वेदोक्त कर्मों
का त्याग कर दिया हो तो समझ लो कि वह अपने पैरों पर पत्थर मार रहा है और वह नरक में डूबा ऐसा समझ
लो क्योंकि वेद ही परमार्थ का मूल है इसलिये वेदोक्त कर्मों का पालन न कर वह जो कुछ भी करता है वह सब
हे राजा! उसके अधःपतन के लिये कारण बनता है। आँखें सचमुच देखने के लिये हैं लेकिन यदि उन आँखों को
ही निकाल कर देखना शुरू कर दें तो हमारी दृष्टि ही नष्ट हो जाती है, फिर अन्य चीजें कैसे देखेंगे ? उसी
प्रकार जिसने वेदोक्त आचरण न कर जिसे भी चाहे परमार्थ मान लिया उसने निमंत्रण देकर अनर्थ को घर बुला
लिया ऐसा समझ लो। इस प्रकार वे आचार के अनर्थ प्रवाह में बहकर जन्म-मरण की राह पर लग जाते हैं।
उधर विविध प्रकार की गर्भयातना भुगतते हुए कल्पान्त में भी उनसे छुटकारा नहीं मिलता। वहाँ बार-बार जन्म
लेने पर भी जन्म से छुटकारा नहीं मिल पाता और बार-बार मरने पर भी मौत नहीं टलती। वेदविहित कर्म न
करने से इस प्रकार अत्यन्त दुःसह दुःख भोगने पड़ते हैं। मूल पद में बताया गया है 'विकर्मणा ह्यधर्मेण' इससे
मालूम होता है कि विकर्म में पूर्ण अधर्म रहता है। लेकिन 'अकर्म' का अर्थ 'अधर्म' न समझो। जिसके लगने से
भी कर्म नहीं लगता उसी का नाम अकर्म अथवा निष्कर्म है। निष्कर्मलक्षण का ही अर्थ है धर्म और उसके ही
कारण साधु परममुक्त होते हैं। जिसे शुद्ध अकर्म का आकलन होता है वह तत्काल निष्कर्म होता है। अकर्म का
मर्म ज्ञात होते ही मुक्ति पैरों के पास आ जाती है।
वेदोक्तमेव कुर्वाणो निःसङ्गोऽर्पितमीश्वरे।
नैष्कर्म्यां लभते सिद्धिं रोचनार्था फलश्रुतिः ॥ ४६ ॥
दासी स्वामी की आज्ञाधारी होती है। जिस प्रकार राजा का आदेश अथवा सिक्का प्रजा स्वीकार करती है
उसी प्रकार जो वेदों की आज्ञा स्वीकार करता है और स्वधर्माचरण कर निष्काम रहता है, अर्थात् मैं ही
कर्मकर्ता हूँ ऐसा अहंकार मन में नहीं रखता, वही कर्म सहज रीति से श्रीअनंतरूपी ईश्वर को अर्पण होता है।
इस प्रकार जो कर्म ईश्वर को अर्पण होता है, वह कर्म निर्धर्म होता है। इसी का नाम है—'नैष्कर्म्य सिद्धि'।
वेदों ने कर्मफल के सम्बन्ध में कहा है लेकिन जिसकी वासना निष्काम और निर्मल रहती है उसे वेदोक्त प्रबल
फल को स्वप्न में भी नहीं भोगना पड़ता। ऐसा होते हुए भी जैसे पारस देकर पान के साथ सुपाड़ी माँगी जाय
उसी प्रकार कर्मफल की इच्छा करके लोग पूरी तरह घाटे में रहते हैं। कर्म में निष्कामता यही नित्य फल है,
फल की आशा में सभी धोखे में रहे हैं। चन्दन पूर्णरूप से गन्धरूप है, उससे यदि फल की कामना करें तो
स्वयं को धोखा देना है। मछली हाथ में आये इसलिये वंशी में थोड़ा आमिष लगाते हैं। उसी प्रकार मन को
निष्काम करने के लिये वेदों ने फल की आशा का प्रलोभन दिया है। आमिष दिखा कर मछली को पाला जाता
है या उन्हें पानी से बाहर कर दिया जाता है ? उसी प्रकार कर्म ही कर्म का विनाश करता है यह बात फलेच्छु
की समझ में नहीं आती। फल की आशा से स्वधर्म कर्म की ओर प्रवृत्त होता है और उससे 'नैष्कर्म्यसिद्धि'
प्राप्त होती है। यही वेद का सच्चा उद्देश्य है। कर्म ब्रह्मरूपत्व से सदा सफल है। लेकिन फल की इच्छा करने
वाले के लिये वह निष्फल सिद्ध होता है। यही ध्यान में लाकर कर्म कुशल लोग फलाशा त्याग देते हैं। इस
प्रकार वैदिक कर्म का आचरण करते रहने से 'नैष्कर्म्य' प्राप्त होता है। लेकिन तुम्हें इससे भी सुलभ एक
उपाय बताता हूँ, सुनो।