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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 869 में से

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पृष्ठ 109

तृतीय अध्याय | ९३

करते समय भ्रमित हो गये। जिन्होंने एक चुल्लू में समुद्र का प्राशन किया था, वे भी कर्म-समुद्र में डूब गये।
इसी कर्माकर्म की चिन्ता में असंख्य महर्षि मताभिमान से थक गये। अन्त में उनकी भी समझ में कुछ नहीं
आया। कर्माकर्म का विभाग जब स्वयं ब्रह्मदेव की भी समझ में नहीं आया तो उस कर्म की चिन्ता करनेवाले
दूसरों की क्या कथा है? कर्म का मूल वेद है और वेद स्वयं नारायण है। अर्थात् उस वेद के वाक्यों का विचार
करते समय श्रुतिशास्त्रों का भी मुँह बन्द हो गया। कर्म, अकर्म और विकर्म ये तीनों एक ही हैं फिर भी उनके
तीन प्रकार हैं। उनके विभागों का विस्तार भी बताता हूँ, सुनो। जिस प्रकार सफेद, मृदु और मधुर ये तीन भेद
दिखायी देने पर भी जिस प्रकार शक्कर एक ही होती है, उसी प्रकार कर्मठ लोग एक ही कर्म के तीन भेद मानते
हैं। मधुरता को यदि अलग किया जाय तो उसमें मृदुलता और सफेदी रहती ही है, सफेदी अलग करने पर भी
उसमें मृदुलता और मधुरता होती है, उसी प्रकार 'कर्म' को अलग करने पर भी उस कर्म के सर्वांग में 'अकर्म'
और 'कर्म-अकर्म' में 'विकर्म' अत्यन्त भूषण के साथ विचरण करता है। मुख्यरूप से जो मूलतः उत्पन्न होता है
उसे 'कर्म' कहते हैं और जो विहिता विहित क्रियाएँ हैं उन्हें 'विकर्म' कहते हैं। अकर्म के संयोग से कर्म का
विकास होता है और यह विकर्म में भी जिसको दिखायी देता है उसे गुरुकृपा के बल पर तत्काल निष्कर्मता प्राप्त
होती है। जब कर्म पर विशेष रीति से कर्म का विकास होता है तो उसे 'विकर्म' कहा जाता है। जहाँ कर्म की
गति रुक जाती है, उसे 'अकर्म' यह नाम दिया जाता है। कर्म की चिन्ता इस प्रकार अगम्य है। जब तुमने यह
प्रश्न किया उस समय तुम अभी बच्चे हो यह समझ कर सनकादिक ने उसका कोई उत्तर नहीं दिया था। हे
नृपनन्दन ! कर्माकर्म की चिन्ता भी किसी भी अयोग्य व्यक्ति को नहीं बतानी चाहिये क्योंकि कर्म ज्ञानियों के
लिये भी अगम्य है।
परोक्षवादो वेदोऽयं बालानामनुशासनम्।
कर्ममोक्षाय कर्माणि विधत्ते ह्यगदं यथा॥ ४४॥
रोग दूर करने के लिए जिस प्रकार बाप लड़के को औषधि देता है और वह रुचि से उसे खा ले इसलिये
उसके हाथ पर शक्कर देता है, उसी प्रकार मन्दमति लोग वेदों के परोक्षवाद को सच मान लेते हैं। वेदों का
अन्तर्गत उद्देश्य है कर्म से ही कर्म का बन्धन समाप्त करना। वेदों ने स्वर्गादिक फल की बात कही है लेकिन वह
केवल प्रवृत्त होने के लिए दिया हुआ प्रलोभन है। कर्म से ही कर्म का मूल नष्ट करने का वेदवचनों का उद्देश्य है
ऐसा ही समझना चाहिये। पैर में पड़ी हुई बेड़ी को तोड़ने के लिये हथौड़ा मँगाया लेकिन उस हथौड़े को ही जो
बेच कर खा गये उनका बन्धन कभी नहीं टूटेगा। उसी प्रकार सचमुच कर्म का बन्धन तोड़ना भूलकर जो लोग
सारा कर्म विषय के प्रीत्यर्थ खर्च करते हैं उनका भवबन्धन कभी भी नहीं टूटेगा और जन्म-मरण कभी समाप्त
नहीं हो पायेगा। दूसरे, हमें स्वर्गफल की आकांक्षा नहीं है इसलिये हम वेदोक्त कर्मों का आचरण नहीं करते यह
धारणा भी गलत है। उस पर बहुत बड़ा अनर्थ हो जाता है।
नाचरेद् यस्तु वेदोक्तं स्वयमज्ञोऽजितेन्द्रियः।
विकर्मणा ह्यधर्मेण मृत्योर्मृत्युमुपैति सः॥ ४५॥
जो जितेन्द्रिय होने के घमण्ड में वेदोक्त कर्मों का आचरण नहीं करते उसे परमार्थ की प्राप्ति तो नहीं ही
होती, उलटे उस पर बहुत बड़ा अनर्थ टूट पड़ता है। भले ही कोई बड़ा शास्त्रवेत्ता हो और ज्ञानी हो लेकिन यदि
वह वेदोक्त कर्मों से विमुख रहा तो वह ज्ञानी होकर ही पूरी तरह लुट जाता है और दुःख के सागर में डूब जाता