श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
है। यह भक्ति अत्यन्त उदार रहती है, वह भक्त का अहंकार नष्ट कर डालती है, वह देवतागण, मानव, स्त्रियों,
शूद्र इन सबका उद्धार कर जीव को आनन्दित करती है। यह भक्ति जब बढ़ती है तो भवभय की निःशेष शान्ति
होती है। चारों मुक्ति चरणों के पास आ जाती हैं। हरि की भक्ति अत्यन्त उदार है। आँखों में जब कचरा आ जाता
है तो सूर्य बिम्ब उसे नहीं दिखायी देता फिर अन्य सारे पदार्थ कैसे दिखाई देंगे ? कचरा निकल जाने पर दृष्टि
निर्मल हो जाती है, सूर्यमण्डल के साथ-साथ अन्य पदार्थ भी साफ-साफ दिखायी देने लगते हैं। उसी प्रकार
परमात्मा हृदय में रहता अवश्य है लेकिन जब तक चित्तवृत्ति मलिन रहती है तब तक उस परब्रह्म का प्रकाश
नहीं होता क्योंकि चित्त वासना के दोष से दूषित हुआ रहता है। इसलिये भगवद्भक्ति करने से ही चित्तवृत्ति
निर्मल होती है और ऐसे भजनों से ही भक्त निर्विकार स्वरूप तक पहुँचते हैं। परमप्राप्ति के लिये संसार में एक
भगवद्भक्ति ही समर्थ है। हे नृपवर्य ! मैंने तुमसे उसका यथार्थ वर्णन किया है। आँखों का पटल हटते ही जिस
प्रकार प्रकाश के साथ सूर्य दिखायी देता है, उसी प्रकार कल्पना नष्ट होते ही निश्चित रूप से परब्रह्म भी प्रकट
होता है। मन जब निश्चयपूर्वक निर्विकल्प साम्यावस्था में पहुँचता है, तब देह में विचरण करते हुए भी
भवबन्धन उसे स्पर्श नहीं करता, यह बात निश्चित रूप से जान लो। इस प्रकार पिप्पलायन ने अत्यन्त
आनन्दपूर्वक, गर्जना करते हुए भाषण दिया। तब राजा को मनःपूर्वक सन्तोष हुआ और अनुभव का लक्षण
मालूम हुआ। इस प्रकार ब्रह्मनिरूपण सुनते-सुनते राजा का लालच बढ़ गया और उन्होंने निरूपण बढ़ाने के लिए
पुनः प्रश्न किया। जिसके कारण कर्मबन्धन टूट सके ऐसे कर्मयोग का समूल लक्षण सुनने के लिये राजा ने
आग्रहपूर्वक प्रश्न किया।
राजोवाच
कर्मयोगं वदत नः पुरुषो येन संस्कृतः ।
विधूयेहाशु कर्माणि नैष्कर्म्यं विन्दते परम् ॥ ४१ ॥
राजा ने आत्मश्रद्धा से परिपूर्ण होकर अत्यन्त विनीत भाव से पूछा, स्वामी ! जिसके योग से कर्म का बन्धन
टूटता है, वह कर्मयोग मुझे पूरी तरह बताइये। किस कर्म के योग से सारा कर्म नष्ट होकर अपने आप
नैष्कर्म्यसिद्धि प्राप्त होती है और पुरुष की पुरुषोत्तम से भेंट होती है, उसका सच्चा मर्म मुझे बताइये।
एवं प्रश्नममृषीन्पूर्वमपृच्छं पितुरन्तिके ।
नाब्रुवन् ब्रह्मणः पुत्रास्तत्र कारणमुच्यताम् ॥ ४२ ॥
स्वामी ! पहले यही प्रश्न मैंने सनकादिक से पिता के सान्निध्य में पूछा था, उसका उत्तर उन्होंने क्यों नहीं
दिया ? मेरी इस आशंका का भी समाधान कीजिये। राजा का मन अत्यन्त पवित्र था, उनका उत्तर देने के लिये
आविर्होत्र बड़े हर्ष के साथ आगे बढ़ा और उसने कर्म वैचित्र्य का निरूपण किया।
आविर्होत्र उवाच
कर्माकर्मविकर्मेति वेदवादो न लौकिकः ।
वेदस्य चेश्वरात्मत्वात्तत्र मुह्यन्ति सूरयः ॥ ४३ ॥
(आविर्होत्र ने कहा) हे नृपनन्दन ! कर्म, अकर्म और विकर्म साधारण नहीं हैं। उनके विभाग का निर्णय
बड़े-बड़े ज्ञानी, स्मृतिकार भी नहीं कर पाये। जो स्वयं प्रतिसृष्टि करने वाले थे वे भी कर्म के विभाग का निर्णय