श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 103, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीय अध्याय ८७
(पिप्पलायन ने कहा) अरे ! जिसके कारण विश्व की उत्पत्ति होती है, जिसके कारण सुरक्षा होती है
जिसके कारण प्रलयकाल को प्रलयशक्ति प्राप्त होती है ऐसे त्रैलोक्य की तीनों अवस्थाओं के लिये जो कारणीभूत
है, जगतका जो मूल उद्देश्य है, लेकिन जो स्वयं हेतुरहित तथा सदासर्वदा सच्चिदानंद से परिपूर्ण होता है, वही
'नारायण' है यह जान लो। प्रातःकाल, सायंकाल तथा दोपहर इन तीनों समय में जिस प्रकार गगन अलिप्त रहता
है उसी प्रकार उत्पत्ति, स्थिति और लयावस्था में भी परमात्मा नारायण अलिप्त रहता है। तुम कहोगे कि उत्पत्ति-
स्थिति तथा प्रलय को कौन देखता है तो उसके स्पष्टीकरण के लिये दृष्टांत सुनो। जागृति, स्वप्न और सुषुप्ति इन
तीनों को ही व्याप कर समाधि के पार भी जिसकी व्याप्ति है, जो उनका साक्षी है वही निश्चित रूप से नारायण
है यह जान लो। जागृति का ज्ञान, स्वप्न का मिथ्या भान तथा सुषुप्ति का जो पूर्ण साक्षी है वह शुद्ध चैतन्य ही
वास्तव में नारायण है। इस प्रकार परज्योति परमात्मा जो त्रिभुवन के सभी जीवों के हृदय में वास करता है, उसे
ही हे राजवर्य! निश्चित रूप से 'नारायण' कहते हैं यह ध्यान में रखो। इस प्रकार यदि ब्रह्मस्वरूप का वर्णन
किया जाय तो लगेगा कि ब्रह्म प्राप्ति अगम्य है। इसलिये जिससे सहज ही ब्रह्म की प्राप्ति हो सके ऐसा उपाय
बताता हूँ, सुनो। परमात्मा पूर्ण रूप से तुम्हारे ही हृदय में वास करता है, उसके ही कारण मन, बुद्धि और इन्द्रियों
का चलन होता है। उसके ही तेज से आँखें देख पाती हैं, उसके ही स्वाद से रसना में रस के प्रति रुचि जगती है,
उसके ही अवधान से कानों को शब्द ज्ञान का बोध होता है, उसके ही कारण अहंकार अहंभाव धारण कर पाता
है, मन मनन कर सकता है, उसके ही कारण चित्त चिंतन कर सकता है, बुद्धि को उसकी ही ब्रह्मज्ञान शक्ति से
बोद्धव्य प्राप्त होता है। उसके ही कारण जड़ देह सचेतन होता है, उसके ही कारण त्वचा को शीत-उष्ण तथा
मृत्यु और कठोर का भेद मालूम होता है, पैरों का चलना और हाथ का देना भी उसके ही आदेश से सम्भव होता
है। उसके ही कारण प्राण की श्वसन क्रिया तथा आँखों का खुलना और बन्द होना होता है। उसके ही आनन्द से
प्राणी जननेन्द्रियों का आनन्द भोगते हैं। इस प्रकार जो त्रिभुवन को चलाता है, जो स्वानंद से हृदय में वास करता
है, उसे ही 'नारायण' कहते हैं। वास्तव में 'परमात्मा' वही है। अब जिसके योग से मन, बुद्धि, प्राण और इन्द्रिय
विचरण करते हैं वह उनके अधीन है ऐसा यदि तुम कहोगे तो वह कल्पांत में भी सम्भव नहीं होगा। अब उस
स्वरूप का ज्ञाता बनकर उसे जानना चाहोगे तो वह सम्भव नहीं होगा क्योंकि ज्ञानी बनकर अर्थात् मैं ज्ञाता हूँ
और वह ज्ञेय है इस ज्ञान से बुद्धि का कभी आत्मस्वरूप में प्रवेश नहीं होता। ज्ञान अथवा ज्ञानाभाव इन दोनों को
छोड़ कर जब केवल सद्भाव उत्पन्न होगा, तभी परब्रह्म की अपने आप प्राप्ति होगी।
नैतन्मनो विशति वागुत चक्षुरात्मा प्राणेन्द्रियाणि च यथाऽनलमर्चिषः स्वाः ।
शब्दोऽपि बोधकनिषेधतयाऽऽत्ममूलमर्थोक्तमाहयदृते न निषेधसिद्धिः ॥ ३६ ॥
वैकुंठ, कैलाश, क्षीराब्धि, आदि की मन कल्पना कर सकता है, लेकिन आत्मा की वास्तविक कल्पना
करने का मनबुद्धि आदि को सामर्थ्य नहीं होता। जो मन स्वयं त्रिभुवन की कल्पना कर सकता है वह मन
आत्मस्वरूप में प्रवेश नहीं कर सकता। बुद्धि भी पूर्णरूप से निश्चयात्मक है किन्तु उसके लिए भी परब्रह्म दुरूह
है। जो मन, बुद्धि के लिये अगोचर है, जो वाणी के लिये भी दुस्तर है ऐसा वह परात्पर परब्रह्म शब्दों के लिये
कभी भी गोचर होना सम्भव नहीं है। आकाश को गठरी में बाँधना चाहो तो चारों छोर खाली रह जाते हैं उसी
प्रकार शब्दों से परब्रह्म को समझाने का प्रयास करो तो शब्दार्थ का धर्म ही नष्ट हो जाता है। प्राण की गति से
जिस क्रिया शक्ति का चलन होता है उस क्रिया को भी जब परब्रह्म का आकलन नहीं होता तो इन्द्रियों को कैसे