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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 116, कुल 869 में से

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पृष्ठ 116

१०० श्रीमद् एकनाथी भागवत
खोल दी है। ये शब्द नहीं पारस हैं। उनके कान में पड़ते ही जीव ब्रह्मरूप हो जाता है। इस प्रकार श्रीभागवत् में
अनुपम और अगाध स्थिति अवश्य है, तो अब अर्थज्ञान के अनुसार उस कथा की संगति अच्छी तरह लगाओ।''
संतों का यह भाषण श्रवण कर, उनके चरण मस्तक पर धारण कर आगे की कथा का निरूपण करता हूँ।
श्रोतागण कृपया ध्यान से सुनें। तीसरे अध्याय के अन्त में तांत्रिक भक्ति का निरूपण करते समय अपनी पसन्द
की मूर्त्ति का भजन करने के लिये कहा था, उसे सुनकर राजा के मन में एक प्रश्न उठा कि त्रिभुवन में भगवान
तो एक हैं, लेकिन उनकी अवतार मूर्त्ति अनेक क्यों हैं? उनके जन्म-कर्म और उनके अनेक प्रकार कैसे हो
गये? वह प्रश्न राजा ने मुनि से पूछा।
राजोवाच
यानि यानीह कर्माणि यैर्यैः स्वच्छन्दजन्मभिः ।
चक्रे करोति कर्ता वा हरिस्तानि ब्रुवन्तुनः ॥ १ ॥
मुनीश्वर का ज्ञान वैसे भी अगाध था, तिस पर प्रतिपादन की रसाल शैली! इससे राजा का मन तल्लीन हो
गया और वह प्रश्न पूछने लगा। उसने कहा, "हरि तो देवाधिदेव हैं, वह स्वलीला से अर्थात् स्वेच्छा से कैसे
जन्म लेता है? स्वेच्छा से कौन-कौन से कर्म करता है? उसकी उस अगाध महानता का वर्णन करें। (शायद
आप कहेंगे) ईश्वर का जन्म नहीं होता, वहाँ कर्मों की बात कैसे पूछते हो? (लेकिन मैं कहता हूँ) भगवान को
रूप नहीं है और नाम भी नहीं है उसे जन्म भी नहीं है और कर्म भी नहीं है। वह अजन्मा है किन्तु जन्म लेता है,
वह अकर्मा है किन्तु कर्म करता है, वह विदेही है किन्तु देहधारी होकर संसार में स्वधर्म का पालन करता है। तो
उसके अवतार की स्थिति कैसी है, जन्म कौन से हैं, व्यक्ति कैसे हैं, अवतार कितने हैं, मूर्त्ति कितनी हैं? हे
स्वामी! आप कृपां करके मुझे सुनाएँ। जो पूर्व में हो गया है और आगे होने वाला है और वर्तमान में जो हैं, उन
सारे अवतारों के बारे में साद्योपांत सुनाएँ। हरि का चरित्र और उसके अवतार गुणों को प्रतिपादित करने का जनक
राजा का प्रश्न सुनकर द्रुमिल आनन्दपूर्वक सुनाने लगा।
द्रुमिल उवाच
यो वा अनन्तस्य गुणाननन्ताननुक्रमिष्यन् स तु बालबुद्धिः ।
रजांसि भूमेर्गणयेत् कथंचित् कालेन नैवाखिलशक्तिधाम्नः ॥ २ ॥
जिसकी लीला की शक्ति अपार है, ऐसी अनन्त शक्ति जिसके नाखून में रहती है और इसीलिये जिसे
अनन्त कहते हैं उसके सारे गुण किसे गिनायेंगे? उस अनन्त की गुणसमृद्धि का जो वर्णन करेगा उसे मंदबुद्धि
समझना चाहिये क्योंकि जिस प्रकार आकाश के विस्तार का नाप चींटी से नहीं हो सकता अथवा समुद्र के सारे
पानी का नाप जिस प्रकार नमक के पास नहीं होता, उसी प्रकार अनन्त के अनन्त गुणों का आकलन कौन कर
पायेगा? हे नृपवर्य! पर्जन्य की धाराओं की भी गिनती हो सकेगी, पृथ्वी पर उगी हुई सारी दूब की भी गिनती हो
सकेगी। हे राजा! वायु तेज गति से बहती है लेकिन उसका वेग भी गणित से ज्ञात किया जा सकता है। आँखों
का दिनभर में खुलना और बन्द होना इसका भी हिसाब हो सकता है। पृथ्वी के परमाणुओं की भी कालान्तर में
गणना हो सकती है किन्तु भगवान के गुणों का गणित वेदों को भी नहीं आता इसे ध्यान में रखो। उसका एक
नाम लेते ही वेद मौन हो गये, उसके सारे गुणों की गणना करते समय शेष की जीभ भी टूट गयी। उस अनन्त के
अनन्त गुण यहाँ कौन गिन सकता है? फिर भी उसके अवतार के कुछ लक्षण मैं संक्षेप में अवश्य बताऊँगा।