श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 107, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीय अध्याय ९१
अण्डेषु पेशिषु तरुष्वविनिश्चितेषु प्राणो हि जीवमुपधावति तत्र तत्र ।
सन्ने यदिन्द्रियगणेऽहमि च प्रसुप्ते कूटस्थ आशयमृते तदनुस्मृतिर्नः ॥ ३९ ॥
अंडज, स्वेदज, जारज और चौथा, अन्द्रिज, इनमें आत्मा की संगति से प्राण सहज सर्वकाल रहता है। प्राण
के साथ आत्मा रहने से उसे 'जीव' कहते हैं। जब उस प्राण को देहावस्था की बाधा नहीं होती तो फिर जीव के
माथे पर वे कैसे सवार होंगी ? देहेन्द्रियों में विचरण करते हुए भी आत्मा देहावस्था से अलिप्त रहता है। वह
किस तरह अलिप्त रहता है इसे उदाहरण देकर समझाता हूँ। आत्मा जब सविकार देह में रहता है तो उसे
सविकार मानते हैं। वही देहेन्द्रियों को छोड़कर पूर्वस्मृति से स्वप्न में भी रहता है। देहेन्द्रिय के बिना रहने वाले
लिंगदेह में आत्मा जागृत अवस्था के अभिमान संकल्प से स्वप्न भी देखता है। जब वह स्वप्न भी शान्त हो जाता
है और देहाभिमान का लय हो जाता है तो सुषुप्तावस्था में जो विकारशून्य पूर्ण परमात्मा है वही शेष रहता है।
देहेन्द्रियों के साथ जब अभिमान भी लीन हो जाता है तो स्फुरण का स्फुरण नहीं होता। जब सारा शून्य ही हो
गया तो फिर चिद्धन (ज्ञानमय) आत्मा भी नहीं है, ऐसा तुम कहोगे। उसका उत्तर देता हूँ—सुषुप्ति में यदि
आत्मा न होता तो 'मैं सुख से सोया हुआ था' इसका स्मरण कैसे हुआ होता ? अर्थात् यह जहाँ जागता है उसे
'शून्य' कभी नहीं कहा जा सकता। जो मैं जागृति में 'जानने वाला' वही मैं स्वप्न देखने वाला और वही मैं
सुषुप्ति में सुख भोगने वाला है। इस प्रकार वह तीनों अवस्थाओं में साक्षी होता है। ऐसी तीन अवस्थाओं में जो
पूर्ण साक्षीरूप से विचरण करता है वह कभी भी शून्य नहीं है। हे राजा ! वही परिपूर्ण परमात्मा है और वह शुद्ध
चिद्धनस्वरूप है। अब जब सुषुप्ति में ब्रह्मानुभव होता है तो फिर संसार का आभास क्यों होता है ऐसा तुम पूछोगे
तो उस अवस्था में अहंकार अविद्या में लीन रहता है। (उसका विनाश नहीं हुआ रहता) इसलिये संसारभ्रम
उत्पन्न होता है। वह अविद्या जब अहंकार के साथ नष्ट होती है, उस समय जगद्रूप से ब्रह्म का ही आभास होने
लगता है और जन्म-मरण का ठिकाना ही नष्ट होकर जीव परब्रह्म के साथ ऐक्य प्राप्त करता है। फिर वहाँ हेतु,
दृष्टांत, प्रमाण, प्रमेय, प्रमाता इन सबसे रहित एक परब्रह्म परमात्मा ही सदैव परमानन्दस्वरूप में रहता है। उस
अवस्था में सुख पर सुख की तरंगें मचलने लगती हैं आनन्द ही आनन्द का उपभोग लेता है, स्वानंदानुभव से
परिपूर्ण होने के कारण सारा जगत परमानन्द से भर जाता है। हे राजा ! इस माया का विलय होकर इस प्रकार का
अनुभव कब होगा ऐसा यदि तुम पूछोगे तो मैं यही कहूँगा कि निष्काम भावना से उस यदुवर्य श्रीकृष्ण का भजन
करना चाहिये।
यह्र्यब्जनाभचरणैषणयोरुभक्त्या चेतोमलानि विधमेदगुणकर्मजानि।
तस्मिन् विशुद्ध उपलभ्यत आत्मतत्त्वं साक्षाद् यथामलदृशोः सवितुप्रकाशः ॥ ४० ॥
यदि मन में निर्विकार स्वरूप की प्राप्ति की इच्छा हो तो उत्कट प्रेम से अविश्रांत भगवद्भक्ति करनी
चाहिये। पुत्र और वित्त की बात छोड़ कर लौकिक की लज्जा त्याग कर भगवद्भजन की चाह से निर्लज्ज होकर
नाचना चाहिये। इन तीनों की आसक्ति त्याग कर श्रीहरिचरण का भजन करते रहने से चित्त का मल क्षण
प्रतिक्षण नष्ट होने लगता है। कर्म से उत्पन्न होने वाले जो रजतम्रादि दोष चित्त में बस्ती बनाकर बैठ जाते हैं। वे
सब भक्तिप्रेम रूपी जल से धुल जाते हैं। सप्रेम भक्ति जैसे-जैसे बढ़ती जाती है वैसे-वैसे विरक्ति चरणों के पास
आ जाती है, इससे विषयासक्ति अपने आप कम होकर चित्तवृत्ति निर्मल हो जाती है। चित्तवृत्ति जब निर्मल हो
जाती है तो वह सारे भूतों में परमात्मा को अनन्य प्रीति से भजने लगता है। यह ज्ञानोत्तर चौथी भक्ति अत्यन्त श्रेष्ठ