श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 111, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीय अध्याय ९५
य आशु हृदयग्रन्थिं निर्जिहीर्षुः परात्मनः।
विधिनोपचरेद्देवं तन्त्रोक्तेन च केशवम्॥ ४७॥
हे राजा ! जिसके योग से वासना का जाल टूट जाता है, अहंकार की गाँठ खुलती है और जीव में परमात्मा
स्वयं प्रगट होता है उस सुन्दर तांत्रिक विधान को तुम्हें बताता हूँ, सुनो। हे राजाधिराज ! जिस तांत्रिक महापूजा से
भगवान को सन्तोष प्राप्त होता है, वह विधान अब सुनो। वैदिक मन्त्र और तांत्रिक तंत्र से युक्त पूजा अत्यन्त पवित्र
है। वह पुरुष को तत्काल निष्काम करती है। पूजा का वह प्रकार अत्युत्तम है। लेकिन पूजा वैदिक हो या तांत्रिक,
वह गुरुमार्ग से ही सफल होती है। इसीलिये पहले सद्गुरु की शरण में जाना चाहिए।
लब्धानुग्रह आचार्यात्तेन संदर्शितागमः।
महापुरुषमभ्यर्चेन्मूर्त्याऽभिमतयाऽऽत्मनः॥ ४८॥
प्रवृत्ति मार्ग या निवृत्ति मार्ग के कार्य में गुरु अवश्य ही होना चाहिये। हे राजा ! अपने मन से भजन करने
पर उस मनुष्य के अनेक संकटों में पड़ने की सम्भावना है। भूमि और पैर तो सिद्ध ही रहते हैं लेकिन यदि
मार्गदर्शक न हो तो व्यर्थ भटकना पड़ता है। उसी प्रकार बिना गुरु के जो उपाय करने लगते हैं वे अहंकारी लोग
अहंभाव के कारण भ्रम में पड़ जाते हैं। गुरु और ब्रह्म दोनों एक ही हैं यह भावना मन में रखकर भक्ति भाव से
उनकी सेवा करनी चाहिये और उन्हें प्रसन्न कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिये। फिर अपने अधिकार के
अनुसार अथवा संस्कार के अनुरूप जो मूर्ति अच्छी लगे, उससे सम्बन्धित मंत्र विद्या ग्रहण करनी चाहिये और
तब गुरुमुख से पुरुषोत्तम की वैदिक और तांत्रिक मिश्र महापूजा सीख लेनी चाहिये और इष्ट की प्राप्ति के लिये
भगवान का भजन पूजन करना चाहिये। हे राजा ! वही आगमोक्त पद्धति से पूजा करने की विधि विस्तारपूर्वक
बताता हूँ ध्यान से सुनो।
शुचिः सम्मुखमासीनः प्राण संयमनादिभिः।
पिण्डं विशोध्य संन्यास कृतरक्षोऽर्चयेद्धरिम्॥ ४९॥
विधिपूर्वक स्नान संध्या करना यही ब्रह्मज्ञान है। आचमन करते समय हम हरिस্বরূপ हो जाते हैं। यह न
मालूम होने के कारण कुछ लोग तंत्र मार्ग में अज्ञान भरा है ऐसा कहते हैं। केशवादि नामों से अंग-प्रत्यंग में ठीक
प्रकार से न्यास करने से हम हरिस্বরূপ हो जाते हैं, लेकिन यह न जानने के कारण तंत्रमार्ग पर अज्ञान थोपते हैं।
(इसलिये ऐसा न कर) शास्त्र के अनुसार स्नान संध्या कर मूर्ति के पास आकर उसके सामने आसन लगाना
चाहिये। पहले दर्भासन, उस पर मृगचर्म और उसके ऊपर कपड़े की तह बनाकर रखना चाहिये। उस पर बैठ
कर रेचक, पूरक और कुंभक इस प्रकार प्राणायाम कर प्राण का संयमन करना चाहिये और भूतशुद्धि आदि से
शरीर को शुद्ध करना चाहिये। भूतविलय, भूतशुद्धि, प्राणप्रतिष्ठा आदि से पिण्ड शुद्धि कर ज्ञाता मनुष्य को गुरु
सम्प्रदाय से प्राप्त विधि के अनुसार मूलमंत्र से अंग-प्रत्यंगों से न्यास करना चाहिये। हृदय, कवच, शिखा, सिर,
नेत्र अस्त्रायफट् आदि आगमोक्त पद्धति से यथाविधि करना चाहिये। इस प्रकार मूलमंत्र दीक्षा तथा दिग्बंधादि
संरक्षक विधि होने के बाद हे राजेन्द्र ! मूर्तिपूजन करना चाहिये। उसका प्रकार बताता हूँ, सुनो।
अर्चादौ हृदये चापि यथालब्धोपचारकैः।
द्रव्यक्षित्यात्मलिङ्गानि निष्पाद्य प्रोक्ष्य चासनम्॥ ५०॥