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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 106, कुल 869 में से

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पृष्ठ 106

९० श्रीमद् एकनाथी भागवत
तीनों गुण समान होने पर उसे 'प्रधान' कहते हैं। वही क्रिया शक्तिसूत्र है। उसमें जब ज्ञान उत्पन्न होता है तो उसी
को 'महत्तत्त्व' कहते हैं। अहंब्रह्मं यह जो पूर्णस्फूर्ति है, उसमें का 'अहं' ही देहाकृति में आया। उस देहाभिमान
के कारण ही परब्रह्म को 'जीव' कहते हैं। 'क्रिया' का अर्थ है दस इन्द्रिय उनके अधिष्ठातृ देवताओं को 'ज्ञान'
कहते हैं। विषय को 'अर्थ' और सुख-दुःख को 'फल' कहते हैं। तीन गुण, पंचभूत, पाँच विषय, दस इन्द्रिय,
उनकी सहायता से सुख-दुःख भोगने वाला जीव और ज्ञान, क्रिया, कर्माचरण इन सबको भी पूर्णब्रह्म समझना
चाहिये। चीनी का कटहल बनाओ तो भी उसके काँटे, छिलका, गुठली आदि शुद्ध शक्कर ही होती है, उसी
प्रकार जगत के रूप में सारा ब्रह्म ही है। कपड़े की गुड़िया बनायी, उसमें भिन्न-भिन्न अवयव बनाये फिर भी
उसमें एक जैसा सूत ही होता है, उसी प्रकार जो अविकृत ब्रह्म है, वही जगत के आकार में दिखायी देता है।
जगत, विश्व, प्रपंच ये नाम अलग-अलग होने पर भी वह सारा शुद्ध परब्रह्म ही है। उपनिषद का प्रमुख तत्त्व
यही है और वेदांत का परम परमार्थ यही है। अब संसार के रूप में परब्रह्म फैला हुआ है और संसार तो
विकारयुक्त है तो कोई ब्रह्म को भी विकारयुक्त कहेगा। लेकिन हे राजा! ऐसा कभी नहीं होगा।
नात्मा जजान न मरिष्यति नैधतेऽसौ न क्षीयते सवनविद् व्यभिचारिणां हि।
सर्वत्र शश्वदनपाय्युपलब्धिमात्रं प्राणो यथेन्द्रियबलेन विकल्पितं सत्॥ ३८॥
ब्रह्मा को माता-पिता नहीं है इसलिये उसे जन्म नहीं है। आत्मा यदि एकदेशी होता तो उसने माता के गर्भ-
में जन्म लिया होता। आत्मा के सिवा संसार में तिलमात्र के लिये भी जगह नहीं है। वह इतना परिपूर्ण है
इसीलिये उसे जन्म का स्पर्श नहीं है। जन्म से पूर्व बालक का अस्तित्व नहीं होता, जन्म लेने पर उसका अस्तित्व
मानते हैं लेकिन यह आस्ति-नास्ति की भाषा आत्मा के पास नहीं है। अब है, पहले नहीं था, इस प्रकार का
'आस्तिक्य' आत्मा में कभी प्रवेश नहीं करता। वह नित्य, निरन्तर ऐसा ही है। देहरूप से जन्म लेनेवाले बालक
का दिन-प्रतिदिन विकास होता दिखायी देता है, उस प्रकार का बालजन्म आत्मा का न होने के कारण उसकी
'वृद्धि' अर्थात् विकास नहीं होता। जिसमें वृद्धि नहीं होती उसके स्वरूप में कभी भी 'विपरिणाम' अर्थात्
परिवर्तन नहीं होता। उसमें बाल, युवा और वार्धक्य ये अवस्थायें कभी भी नहीं होतीं। मैं बाल्यावस्था में छोटा
था, युवावस्था में बड़ा हो गया और हाय, अब मैं वृद्ध हो गया हूँ। ये तीन अवस्थाएँ देखने वाला अर्थात् जानने
वाला परमात्मा है। साक्षी अथवा देखने वाला उन अवस्थाओं से परे होता है, वह कभी अवस्थाभूत नहीं होता।
ऐसा वह परमात्मा सचमुच देह में होते हुए भी अवस्थारहित अथवा देहातीत होता है। आत्मा अवस्थाशून्य,
अविकारी तथा पूर्ण है। उसमें कभी भी क्षीणता नहीं आती। उसी प्रकार जिसे 'जन्म' ही नहीं है उसे 'मरण' कैसे
आयेगा? तुम कहोगे कि ऐसी आत्मा है कौन? तो यह जान लो कि वह सर्वज्ञ है और केवल 'ज्ञानस्वरूप' है।
अब तुम कहोगे कि ज्ञान भी क्षणिक है, घटज्ञान से परज्ञान नष्ट होता है, लेकिन ऐसी बात नहीं है। उस विषय
को जानने वाली इन्द्रिय वृत्ति ही नष्ट हो जाती है, ज्ञान वैसा का वैसा अविनाशी ही होता है। इसका उदाहरण यह
है कि जिस प्रकार प्राण देह की वृद्धि करता है लेकिन केवल देह ही बाल, युवा आदि अवस्थाओं के अधीन
होता है, प्राण अवस्थारहित होता है इसीलिये वह जैसा का तैसा रहता है। प्राण देह का चालक है, उसे देहावस्था
की बाधा नहीं होती और आत्मा तो प्राण को भी चैतन्य प्रदान करता है। इसलिये उसमें देहावस्था सम्भव नहीं है।
इसी उदाहरण से परब्रह्म का निर्विकार स्वरूप समझना चाहिये। आत्मा देह की इन्द्रियों से बिलकुल अलग है,
यह अगले श्लोक में स्पष्ट किया गया है।