श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 115, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थ अध्याय
हे ओंकारस्वरूप श्रीगुरु शिव ! तुम्हें प्रणाम करता हूँ। नमस्कार करने से जहाँ जीव का जीवभाव निःशेष
हो जाता है वहाँ देहभाव कैसे प्रवेश कर सकता है ? जीव का जीवभाव तथा देह का देहभाव ले कर ऊपर से
सेवा भी करा लेते हो ! इसलिये हे भगवान्, आपका यह कौशल बस देखते ही बनता है। शंखासुर का वध कर
उसका शरीर हाथ में धारण करते हो और आज तुम मुझमें प्रवेश कर मेरे शरीर को भी परिचालित कर रहे हो।
शंख से जो आवाज निकलती है उसमें फूँकने वाले का कौशल रहता है उसी प्रकार मैं जो कुछ बोलता हूँ वह
सब आपके कारण सुन्दर हो जाता है। अब मेरे शरीर में जो गति है वह तुम्हारी ही संगति से है, मुझसे होने
वाले सारे कर्म तुम्हारे ही बल से हो पाते हैं। मेरी देह का जो 'मैं' पना है वह तुम स्वयं हो गये हो। भगवन् !
तुम्हारे ही प्राण से मेरे प्राण चल रहे हैं। 'नेत्र' जो कुछ देखते हैं वह सब तुम्हारी ही ज्ञानशक्ति से, कान जो
सुनते हैं वह सब तुम्हारा ही अवधान है, जिह्वा जो कुछ चखती है वह सब तुम्हारे ही स्वादरूपी मुख से सम्भव
होता है। 'बुद्धि' जिस ज्ञान से संतुष्ट होती है वह ज्ञान भी तुम्हारा ही है। 'मन' अपने मनोधर्म से अत्यन्त चपल
रहता है वह भी तुम्हारी ही शक्ति के कारण, विवेक को उज्ज्वल विवेक तुम से ही प्राप्त होता है। 'वाणी' जो
कुछ बोलती है वह वक्तृत्व तुम्हारे ही शब्दों से आता है, 'बोध' जिस प्रबोध से मन में अपना स्थान बनाता है,
वह प्रबोध तुम्हारे ही अनुग्रह से होता है। तुम्हारे ही आनन्द से 'जागृति' जाग उठती है, तुम्हारे ही कारण
'स्वप्न' स्वप्न को देखता है। 'सुषुप्ति' जिस सुख से सुखी होती है वह पूर्णतया तुम्हारे ही सुख से। जिन-जिन
विषयों को मैं भोगता हूँ उन्हें भोगने का सामर्थ्य तुम्हारे में ही है। तुम्ही अपने साथ मुझे लेकर मुझे मेरी अस्मिता
के साथ परिचालित करते हो। मुझे कठपुतली बनाकर तुम सूत्रधार बन गये हो और मनचाहे ढंग से सूत्र
हिलाकर तुम मुझसे विचित्र काम कराते हो। हे जगच्चालक चिद्धन श्री जनार्दन ! कृपालु जगजीवना ! तुम्हारी
ही सत्ता से तुम्हारे श्रीचरणों को मैं प्रणाम करता हूँ। इस प्रकार तुम्ही मेरे चालक हो इसलिये यह ग्रन्थ भी तुम
ही मुझसे लिखवा रहे हो। इसलिये 'मैं एक कवि हूँ' यह समझना सचमुच ही जड़बुद्धि का परिचायक है। यह
एका (एकनाथ) जनार्दन के साथ एकरूप हो गया है या जनार्दन एकनाथ के साथ एकरूप हो गया है ? तो तुम
ही भिन्न-भिन्न नाम धारण कर एक अकेले विचरण करते हो ? जिस प्रकार सुवर्ण का आभूषण कहें अथवा
आभूषण में सुवर्ण है यह कहें उसी प्रकार एका और जनार्दन एकत्व से तुम जनार्दन ही हो। ऐसी विनती सुनकर
सद्गुरु प्रसन्न हुए और बोले यहाँ कल्पना करने की तुम्हें कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि जब कर्पूर में ज्योत
जलती है तभी उसका कर्पूरधर्म समाप्त हो जाता है उसी प्रकार सच्छिष्य को सद्गुरु मिलते ही उनका भेदभाव
समाप्त हो जाता है। जिस बोध के कारण भिन्न भाव समाप्त होता है, उस आत्मबोध से श्रीभागवत् भरा हुआ है।
इतिहास में संवाद रूप में उसे श्रीनारद ने वसुदेव को सुनाया है। उस इतिहास का अर्थ सुनने से अन्तर में
परमार्थ प्रकट होता है। जब श्रोतागण उसे सुनते हैं तो उनके हृदय में निरन्तर स्वानंद के बोध अर्थात् अनुभव का
उदय होता है। (यह सुन कर) इस पर संत श्रोता समुदाय कहने लगा, "क्या आश्चर्य है! सद्गुरु स्तवन में
तुमने ब्रह्मभाव अत्यन्त अभेदत्व से साध लिया है। यह सद्गुरु की विनती है या ब्रह्मसुख की खान है ? तुम्हारे
प्रेमभरे बोल सुनकर सज्जनों की चित्तवृत्ति प्रेम के रंग में रंग गयी है। मराठी भाषा में तुमने परमार्थ की खान ही