श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
हो पायेगा ? जिस प्रकार जलाशय में प्रतिबिम्बित होने पर भी सूर्य गीला नहीं होता, उसी प्रकार मन, बुद्धि और
इन्द्रियों के परे वह परमात्मा है, यह निश्चित रूप से ध्यान में रखो। मन का जो अनादि मन है, बुद्धि की जो
सज्ञान बुद्धि है, नेत्रों का जो आद्य नेत्र है, कान को भी जो ध्यानपूर्वक सुनने वाला कान है, नाक की जो मूल
नाक है, जो जिह्वा की भी जिह्वा है, जो त्वचा की अंतर्त्वचा है, जो जीवों का जीव है, जो इन्द्रियों का प्रकाशक
है, कर्म करते हुए भी जो अकर्ता है वह कभी भी इन्द्रियार्थ इन्द्रियों में विषय नहीं हो सकता। जहाँ बुद्धि की
दृष्टि नहीं पहुँच पाती वहाँ मन का मनपन कैसे प्रवेश कर पायेगा ? फिर श्रवण, नयन, घ्राण आदि के संयोग से
वह कैसे प्राप्त हो सकेगा ? जिसके पास प्राणों की शक्ति भी नहीं पहुँच पाती, वहाँ वाणी कैसे पहुँच पायेगी ?
वह लज्जा से मुड़ कर अपने आप लौट जाती है। फिर उसके आगे कर्मेन्द्रियों की क्या प्रतिष्ठा होगी ? अग्नि से
क्षण प्रति क्षण ज्वाला तथा चिनगारियाँ निकलती रहती हैं किन्तु उनसे अग्नि का पूर्ण स्वरूप प्रगट नहीं होता।
सूर्य से असंख्य सूर्यकान्त चमकते रहते हैं लेकिन उनमें सूर्य प्रकट नहीं होता। उसी प्रकार ब्रह्मा से अनेक
इन्द्रिय व्यक्त होते हैं लेकिन उन इन्द्रियों की ब्रह्मा से जान-पहचान कभी भी और किसी भी तरह होना सम्भव
नहीं है। यदि केले के फल से केला उत्पन्न हो सके या शक्कर से ईंख उत्पन्न हो तभी इन्द्रिय ब्रह्मा को जान
पायेंगे लेकिन वह ब्रह्मादिकों के लिये भी साध्य नहीं है। यदि इन्द्रियों को ब्रह्मज्ञान नहीं हो पाता तो जीवों का
बन्धन कभी नहीं टूटेगा इसलिये जन्ममरण से कभी मुक्ति नहीं मिलेगी। 'शब्दादेवापरोक्षेति' ऐसी श्रुतिशास्त्रों की
मान्यता है लेकिन वह भी झूठ ही लगता है ऐसा तुम कहोगे। तो हे राजा ! शब्द स्वयं लय हो जाता है और जीव
को ब्रह्मज्ञान देता है। इसके सम्बन्ध में जो निरूपण सुना रहा हूँ उसे ध्यान से सुनो। वेदों ने तो बाजी लगाकर
जीव को संसारबन्धन से मुक्त करने का बीड़ा उठाया है लेकिन सभी शास्त्रों की छानबीन करने के बाद लगता
है कि उन्होंने भी हाथ टेक दिये हैं। श्रुति ने 'नेति नेति' कह कर अनात्म पदार्थों का निषेध किया और एक
प्रकार से आत्मस्वरूप की पहचान बतायी लेकिन आत्मा का प्रत्यक्ष स्वरूप वेद भी नहीं बता पाये। शब्द से जो
निःशब्द का ज्ञान कराता है वही 'परब्रह्म' है ऐसा समझना चाहिये। यह पहचान जिसकी समझ में आती है, वह
स्वयं सहज ही ब्रह्मरूप हो जाता है। श्रुति 'नेति नेति' अर्थात् 'यह नहीं, यह नहीं' कह कर निषेधरूपी वचनों से
परब्रह्म का दर्शन कराता है। इस श्रुतिशब्द की सहायता से जो निःशब्द परब्रह्म को जान सकता है वही परब्रह्म
तक पहुँचता है। शब्द अपने निषेध से जिसका ज्ञान कराता है, उस तत्त्व में जिसकी बुद्धि समरस होती है, वही
तत्त्व निश्चित रूप से परब्रह्म है। आखिर निषेध की मर्यादा भी वही है। शब्द अपनी सारी शक्ति से जीव को
ब्रह्म की प्राप्ति करा देता है। 'शब्दादेवा परोक्षेते' अर्थात् 'शब्दों से ही अपरोक्ष ज्ञान' जिसे कहते हैं, वह यही है।
जहाँ वाणी पूरी तरह कुंठित हो जाती है, जहाँ मन और बुद्धि नहीं पहुँच पाती वही निषेध की सीमा है। उसी
को 'परब्रह्म' कहते हैं। जो वाणी को सवाक बनाता है किन्तु वाणी जिसे नहीं कह पाती जो मन और बुद्धि
वालों को जानता है लेकिन मन बुद्धि जिसे नहीं जानती, जो नेत्रों को रूप आदि दिखाता है लेकिन जिसे नेत्र
नहीं देखते जो श्रवण और घ्राण इन दोनों को सुनने की और घ्राण लेने की शक्ति देता है जिसे जानने के लिये
दूसरा कोई नहीं है ऐसे जो 'स्वसंवेद्य' अर्थात् स्वयं ही अपने को जानने वाले हैं, जिसे जानने वाला अन्य कोई
नहीं है। वहाँ शब्द को प्रवेश करने के लिये अवकाश ही कहाँ है ? जो कृश भी नहीं है और विपुल भी नहीं है,
जो सीधे भी नहीं है और वक्र भी नहीं है, जो सूक्ष्म भी नहीं है और स्थूल भी नहीं है ऐसी जो निर्विकार वस्तु
है जिसमें न रूप है न गुण है, जिसे न आश्रम है न वर्ण है, जिसमें 'मैं' पना नहीं है और 'दूजा' पन भी नहीं है,
उसी प्रकार जिसे जन्म और मरण नहीं है, जो न हलका है न भारी है, जो न दुबला पतला है न पुष्ट ही है, जो