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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 118, कुल 869 में से

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पृष्ठ 118

सृष्टि के प्रारम्भ में स्वयंभू रहता है, उसके ही योग से उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय का आभास होता है। वही
आदिकर्ता सहज रहता है और वही अपने अंश से 'पुरुषावतार' होता है। हे राजा! वही 'नारायण' इस नाम से
अवतीर्ण हुआ। उसका चरित्र अत्यन्त अद्भुत तथा अलौकिक है और वह अत्यन्त पवित्र और पुण्यकारक है।
उसका वर्णन करता हूँ, सुनो !
धर्मस्य दक्षदुहितर्यजनिष्ट मूर्त्यां नारायणो नर ऋषिविप्रवरः प्रशान्तः।
नैष्कर्म्यलक्षणमुवाच चचार कर्म योऽद्यापि चास्त ऋषिवर्यनिषेविताङ्घ्रिः ॥ ६ ॥
जो त्रिभुवन में नित्य अजन्मा था लेकिन योनि में जन्म लिया, उसने धर्म नामक ऋषि की धर्मपत्नी जो मूर्ती
नामक दक्षकन्या थी उसे अपनी जननी बनाया। उस मूर्त्ति-माता के उदर में नर नारायण का अवतार हुआ। वे
दोनों स्वरूप से एक थे किन्तु दो रूपों में धर्म के घर अवतीर्ण हुए। हे राजा! उसने (इस नारायण ने) नारद आदि
को नैष्कर्म्य लक्षण का निरूपण कर स्वयं भी उसका आचरण कर दिखाया। वह कथा सुनो। यह नारायण किस
देश का था यह जानना चाहते हो तो समझ लो कि वह बदरिकाश्रम में रहने वाला था। नारद सनकादिक ऋषि
अभी भी उसकी सेवा में रहते हैं। अपने स्वरूप का प्रत्यक्ष ध्यान उसे सहज ही रहता है इसलिये उस
स्वरूपनिष्ठा का पक्ष अर्थात् अलक्ष्य के ध्यान का वह साधक को उपदेश देता रहता है। उस स्वरूप का बोध हमें
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