श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
वैसे भी देह को परिचालित करने वाला ईश्वर हमारे शरीर में हृदय में ही रहता है। उसके प्रति श्रद्धा रखकर यदि
भजन किया जाय तो सहज ही आत्मप्राप्ति होती है। हम जिस भी चीज का सेवन करते हैं, वह सब भगवान के
मुख में ही जाता है ऐसी भावना से भजन करने से परमात्मा सहज ही प्राप्त होता है। देह की अहंता छोड़ कर
सारे भोग भोगने वाला ईश्वर ही है। ऐसी दृढ़ भावना रखने से परमार्थ का प्रत्यक्ष साक्षात्कार होता है। देह, जड़,
मूढ़, अचेतन है, समस्त भोगों का पूर्ण रूप से उपभोग करने वाला ईश्वर ही है, ऐसा अहंकार मन में रखकर
अज्ञानी लोग अनेक दुःख भोगते हैं। हे नृपवर्य! उस देहअहंकार को छोड़ कर हृदयस्थ परमात्मा की शरण में
जाने पर सचमुच ही परमार्थ का पूर्ण लाभ होता है। 'मैं' पन को पूरी तरह छोड़ना इसी का अर्थ है हृदयस्थ की
शरण में जाना। तुम स्वयं परब्रह्मस्वरूप ही हो, व्यर्थ ही देह का अहंकार न करो। हे राजा! ऐसे कर्म से ही कर्म
का बन्धन टूटता है और पूर्ण समाधान प्राप्त होता है। आगमोक्त भजन का यह प्रमुख लक्षण है। इसे सुनकर राजा
को अत्यन्त समाधान हुआ और वह परमानन्द से तृप्त हो गया। राजा की श्रवणेच्छा जैसे-जैसे पूर्ण होने लगी,
वैसे-वैसे कथा अधिक रोचक मालूम होने लगी और सुनने की इच्छा बढ़ने लगी। राजा अब परमानन्द से तृप्त
होते हुए भी स्वानंद के प्रलोभन में पुनः विनोद से प्रश्न पूछेगा। कहीं मैं चुप रहा तो ये मुनिवर्य उठ कर चले
जायेंगे इस भय से वह विचित्र ढंग से एक के बाद एक प्रश्न पूछने लगा। स्वानंद से उसकी चित्तवृत्ति भर गयी।
इन्द्रिय आत्मसुख से बिंध गये। इस प्रकार मन में तृप्त होते हुए भी राजा प्रश्न पूछ ही रहा था। इसके बाद वह
हरि के अवतारों के बारे में पूछेगा। वह कथा अत्यन्त सुन्दर और मनोहर है तथा उसका निरूपण प्रेममय होने के
कारण वह आपके हृदय को शान्त कर देगा। इस प्रश्न का उत्तर उत्तम कथा है। मैं एकनाथ श्री जनार्दन स्वामी
का किंकर तथा संतों की पादरक्षा धारण करनेवाला हूँ। संतजन कृपासागर हैं और श्रीजनार्दन वरदमूर्ति हैं। उनकी
कृपा से आगे की कथा सुसंगत यथार्थ से वर्णन करूँगा। श्रीभागवत का यह भण्डार भरने का कार्य जनार्दन
स्वामी ने इस एका को सौंपा है। वह निजबोध को खोलकर श्रवण सामग्री का भण्डार भर देगा।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादश स्कंधे निमिजायते
संवादे, माया कर्म ब्रह्म निरूपण नाम तृतीयोध्यायः ॥ ३ ॥