श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 112, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ें९६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
पूर्व श्लोक में कहे अनुसार सारे प्रयोग अर्थात् द्रव्यशुद्धि, भूमिप्रोक्षण आदि फिर से करना चाहिये। प्रत्येक
पदार्थ को शुद्ध करने का मुख्य अर्थ शुद्धि है। भूमिशुद्धि संमार्जन से होती है, आत्मशुद्धि चित्त की सावधानी से
होती है और मूर्ति पर चढ़ाया हुआ पहले का लेप अर्थात् निर्माल्य दूर करना मूर्तिशुद्धि है। फिर पूजा का साहित्य
सिद्ध करके उन सब पर शंखोदक से प्रोक्षण कर अपने आसन पर एकाग्र मन से बैठना चाहिये। जिसके ध्यान में
सम्पूर्ण मूर्ति नहीं आती उसे प्रतिमामूर्ति की स्थापना कर उसी की प्राप्त उपचार से आगमोक्त विधि से पूजा करनी
चाहिये। अत्यन्त प्रयास से यदि ध्यान में मूर्ति आती हो तो उसे बाह्य उपचार की चिन्ता छोड़ ध्यान दृष्टि से उत्तम
प्रकार से मानस पूजा करनी चाहिये। जिसके हृदय से ध्यान डिगता नहीं है और जो बाह्य मूर्ति की पूजा भी
सावधानी से कर सकता है, उसे आगमोक्त विधि से दोनों पूजा यथासांग करनी चाहिये।
पाद्यादीनुपकल्प्याऽथ सन्निधाप्य समाहितः।
हृदादिभिः कृतन्यासो मूलमन्त्रेण चार्चयेत्॥५१॥
पूजा का सारा साहित्य पास में रख कर फिर शास्त्रोक्त पद्धति से मूर्ति का न्यास करें। जैसे हम अपने शरीर
का न्यास करते हैं उसी प्रकार मूर्ति का भी करना चाहिये। मूलमंत्र से मूर्ति का न्यास करना चाहिये, यही
आगमोक्त गुरु दीक्षा है। अपने अंग-प्रत्यंगों का न्यास करने से मनुष्य स्वयं हृषीकेश हो जाता है। यही उद्देश्य मन
में दृढ़ करना चाहिये। चित्त का अनुसन्धान दृढ़ रखकर हृदय की मूर्ति तथा बाह्य प्रतिमा का पूजन मूलमंत्र से
यथाविधि करना चाहिये।
साङ्गोपाङ्गां सपार्षदां तां तां मूर्तिं स्वमन्त्रतः।
पाद्यार्घ्याचमनीयाद्यैः स्नानवासोविभूषणैः॥५२॥
अव्यंग अर्थात् जिसमें जरा भी व्यंग्य न हो ऐसी श्यामसुन्दर, मनोहर श्रीरंग की मूर्ति का ध्यान करना
चाहिये, ध्यान करते समय मन में अत्यन्त उल्हास रहना चाहिये। सुन्दर चतुर्भुज मूर्ति, शंख, चक्र, गदा, कमल
आदि आयुधों के साथ, उसी प्रकार पार्षदसमुदाय तथा आयुधों के देवता आदि सभी का चिन्तन करना चाहिये।
मधुपर्क विधि, पाद्य, अर्घ्य, आचमन आदि देकर निर्मल जल लेकर पुरुषसूक्त मंत्र से स्नान कराना चाहिये।
मुकुट, कुण्डल, कमर में मेखला, पहनने के लिये जरीदार पीताम्बर, गले से पैरों तक शोभित वनमाला, कंठ में
तेजःपुंज कौस्तुभमणि, पद्मचिह्न से अंकित पैर के तलुए, उस पर अंकित ऊर्ध्व रेखा, ध्वज, वज्र आदि चिह्न, उसी
प्रकार कंकण तथा चरणों में पायल आदि (इस प्रकार चिन्तन करना चाहिये।)।
गन्धमाल्याक्षतस्रग्भिर्धूपदीपोपहारकैः।
साङ्गं सम्पूज्य विधिवत्तस्तवैः स्तुत्वा नमेद्धरिम्॥५३॥
शुद्ध श्यामवर्ण, ललाट पर पीला केशरी टीका, उस पर कुंकुम से सनी हुई लाल अक्षत, गाँठ बनाकर बाँधे
हुए पिरोये हुए फूल उसके चारों ओर भ्रमरों का समुदाय, गले में कमल और तुलसी की मालायें और श्यामवर्ण
देह पर सुशोभित चन्दन! (इस प्रकार ध्यान करना चाहिये।) धूप, दीप, नैवेद्य तथा कर्पूरयुक्त ताम्बूल अर्पण
करना चाहिये। फिर निरंजन से आरती कर उच्च मंत्रस्वर में जय-जयकार कर मंत्रपुष्प अर्पण करना चाहिये।
उसके बाद वेदयुक्त मंत्रों से स्तुति करनी चाहिये अथवा पुराणों के अनुसार अनेक प्रकार के स्तोत्रों का स्तवन
करना चाहिये अथवा प्राकृत भाषा से अनेक प्रकार के नामोच्चार के साथ गद्यपद्यात्मक स्तुति करनी चाहिये। हे