श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 119, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थ अध्याय १०३
प्रकार नारायण की दृष्टि से उन स्त्रियों के काम की गति हुई। नारायण की महिमा न जानकर काम ने दौड़ कर
उस पर प्रहार किया लेकिन अपने निंद्य धर्म से ये लोग लज्जित हो उठे। पराजित होकर मुँह छिपाये लौट गये
उस समय नारायण ने उनके कुंठाग्रस्त चेहरे को देखा। नारायण स्वयं इन्द्रियों का नियंता है यह न जानकर वे उसे
छलने गये थे लेकिन अब उनमें उसके सामने से लौटने का साहस नहीं हो रहा था। न आगे जा पा रहे हैं न पीछे
लौट पा रहे हैं इस दुविधा में वे गड़बड़ा गये। भय से उनका शरीर काँपने लगा और वे व्याकुल हो उठे। यह
नारायण के ही प्रभाव के कारण है और कहीं वह शाप न दे दे इस भय से वे काँपने लगे। उनकी वह असहाय
स्थिति देखकर वह कृपालु व्यथित हो उठा। उसके मन में जरा भी क्रोध नहीं हुआ। ऐसी विचित्र थी उस
नारायण की शान्ति।
विज्ञाय शक्रकृतमक्रममादिदेवः प्राह प्रहस्य गतविस्मय एजमानान्।
मा भैष्ट भो मदन मारुत देववध्वो गृहीत नो बलिमशून्यमिमं कुरुध्वम्॥ ८॥
यह इन्द्र का किया हुआ अपराध था फिर भी नारायण को उन पर गुस्सा नहीं आया। कामादिकों पर भी
उन्हें क्षोभ नहीं हुआ। उसने इन्द्र को भी शाप नहीं दिया। उसके प्रति नारायण के मन में जरा भी विकार उत्पन्न
नहीं हुआ। अपकार करने वाले पर जो कुपित होता है उसकी कोप के कारण तत्काल दुर्गति होती है लेकिन
अपकार करने वाले पर जो उपकार करता है वही श्रेष्ठ परमार्थी है। अपकारी अर्थात् शत्रु पर उपकार करने का
नाम ही परम शान्ति है। उस शान्ति का स्वरूप नारायण ने प्रत्यक्ष आचरण करके लोगों को दिखाया। परमार्थ की
स्थिति यह है कि हृदय में अत्यन्त शान्ति होनी चाहिये। उसका स्वरूप उसने प्रत्यक्ष आचरण से लोगों को
दिखाया। कामादिक भयाक्रांत हो उठे थे। अप्सराएँ भी साशंक हो उठी थीं। उन्हें अभय देकर नारायण ने कहा, हे
काम वसंतादिक स्वामी ! आप इतनी कृपा कर यहाँ पधारे हैं। आपकी चरण धूलि से हमारी आश्रमभूमि पवित्र हो
गयी है। आप यहाँ सहज ही आ गये हैं लेकिन हमें आपका पूजन अवश्य करना चाहिये। यही हमारा अनुष्ठान
है। आप हमारे कुछ बलिदान अर्थात् उपचार स्वीकार करें और आप अप्सराओं, देवस्त्रियों! आप बिकुल निर्भय
रहें। यहाँ आयी हुई आप सब मेरे लिये पूज्य हैं। आश्रम में कोई अतिथि आने पर जो उसकी पूजा नहीं करते
उसकी पुण्यसंपदा का विलय हो जाता है और आश्रम की स्थिति शून्य हो जाती है। इसलिए यदि आपने हमारी
पूजा स्वीकार नहीं की और बिना उपचार ग्रहण किये चली गयीं तो यह आश्रम शून्य हो जायेगा। इसलिये कृपा
करके पूजा ग्रहण करें। आश्रम में आया हुआ अतिथि सभी की दृष्टि में पूज्य होता है। आश्रम में जो अतिथि की
पूजा करते हैं उस आश्रम की कीर्ति का वर्णन शंकर भी करते हैं। समधी जब नाराज होते हैं तो उनके चरण छूते
हैं उसी प्रकार अतिथि जब विन्मुख होकर जाने लगता है तो उसका वन्दन करने से वह प्रसन्न हो जाता है और
दूसरे को भी आनन्द देता है। समधी यदि नाराज हो गया तो वह बहू को मैके नहीं भेजेगा लेकिन यदि अतिथि
नाराज हुआ तो आज तक सम्पादित किया हुआ सारा पुण्य नष्ट हो जायेगा। आश्रम में जो अध्यात्म भाव से
अतिथि की पूजा करते हैं उस आश्रम में वैकुण्ठ में रहने वाला वैकुण्ठपति नित्य निवास करने आता है। नारायण
ने ऐसा कहा लेकिन यह मेरी महान शान्ति है ऐसे भाव ने उसके मन को स्पर्श भी नहीं किया। जिसमें परिपूर्ण
शान्ति होते हुए भी घमण्ड जरा भी नहीं है वही सच्चा देवाधिदेव है। देवताओं को और मानवों को जो नित्य
नचाता है, जिसके भय से तपस्वी लोग तप छोड़ देते हैं, उन कामक्रोधों को अभय देकर नारायण ने अपने पास
रख लिया।