श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
बारहवाँ अध्याय ३५५
है वही मेरी मूर्ति है यह निश्चयपूर्वक ध्यान में रखो। इसके सम्बन्ध में सन्देह न करो। इसी का नाम है
अनन्यभक्ति। एकाग्र होकर गुरु का जो भजन किया जाता है वही मेरी पूजा है। गुरु और मैं इन दो में कल्पांत में
भी कभी बिलगाव नहीं होता। गुरु और भगवान दोनों एक ही हैं इस भावना से जो भजन करता है वही गुरु का
सेवक है। इसके अतिरिक्त कोई और होगा तो उसके बारे में सन्देह है। मुझसे एकत्व प्राप्त करने के लिये जिसने
अत्यन्त प्रेम से गुरुभक्ति को स्वीकार किया वह त्रैलोक्य में धन्य है। अब भजन के स्वरूप के बारे में सुनो। गुरु
की सेवा करने के लिये उसका देह मन से भी आगे रहता है और सारी सेवा मैं अकेला ही करूँ इस महत्त्वाकांक्षा
से वह तैयार रहता है। सेवा का क्रम जैसे-जैसे बढ़ता जाता है वैसे-वैसे यह अधिक उत्साह से सेवा के लिये
तैयार रहता है। पूरी देह वह सेवा के लिये अर्पित कर देता है। गुरुसेवा में ही उसे विश्राम मिलता है। सेवा की
चाह के कारण वह घड़ी भर के लिये भी विश्राम नहीं करता। जैसे-जैसे चाह बढ़ती जाती है वैसे-वैसे गुरुभजन
की माधुरी बढ़ने लगती है। नित्य गुरु की सेवा करते हुए प्रेम का नया दौर ही शुरू हो जाता है। सद्भक्ति की
इच्छा से उसने गुरु के चरणों में स्वयं को समर्पित किया रहता है। आलस्य उसके पास आना ही भूल जाता है,
विश्राम का स्थान ही नष्ट हो जाता है। गुरुसेवा के संभ्रम में भूलने के कारण वह अन्य विषयों का सेवन ही भूल
जाता है। प्यास जल को भूल जाती है, क्षुधा पकवान भूल जाती है और गुरु चरणों की सेवा में वह निद्रा भी भूल
जाता है। जम्हाई लेने की भी फुर्सत नहीं मिलती, वहाँ निद्रा को कहाँ स्थान मिलेगा? मुख में सद्गुरु का नाम,
हृदय में सद्गुरु का प्रेम और देह में सद्गुरु का कर्म यही रात-दिन अविश्रांत चलते रहना चाहिये। मन गुरुसेवा
में व्यस्त रहने के कारण उसे पत्नी बच्चे तथा धन का भी विस्मरण होता है। मन का भी विस्मरण होता है और
वह अपने अस्तित्व का भी स्फुरण भूल जाता है। उसके भजन का उत्साह आश्चर्यजनक होता है। भजन करते
समय देह का भी स्मरण नहीं रह जाता। इस प्रकार गुरुसेवा की महिमा विलक्षण है क्योंकि सारा आत्मभाव
गुरुचरणों में ही लगा रहता है। ऐसा होते हुए भी यदाकदा किसी समय गुरु से बिछोह भी हो जाय तो प्रेम का
बन्धन नहीं टूटता, उलटे भजन में भक्ति बढ़ जाती है। जहाँ गुरु का गाँव है वहीं सारा मनोधर्म बस जाता है। गुरु
के ध्यान को ही धर्म कर्म समझ कर वह सेवा का प्रयास नहीं छोड़ता। गुरु के मूर्ति की ही आदत हो जाने के
कारण वह उसी मूर्ति को हृदयाकाश में स्थापित करता है और फिर अनेक प्रकार के भजनरंग में उसके भजन प्रेम
का क्या वर्णन किया जाय? चित्स्वरूप यही उसकी पूर्णिमा और गुरु यही उसका पूर्णचन्द्र है और वह स्वयं
उसके नीचे तृषित चकोर बनकर बैठ जाता है। फिर वह स्वयं स्वानंद बोधरूपी चन्द्रकिरणों का निरन्तर सेवन
करता रहता है अथवा चिदाकाश में सद्गुरु को सूर्य बनाकर स्वयं सूर्यकांतमणि बन जाता है और उसके दिव्य
तेज से देदीप्यमान होकर वह अपने प्रभाव से मायारूपी वन की होली जलाता है अथवा सद्गुरु के कृपामृतरूपी
सागर में लहर बन जाता है और अंतर्बाह्य गुरु का ही स्वरूप है यह मानकर हृदय में वही भावना धारण करता
है। अपना वास्तविक स्वामी जो सद्गुरु है वह सचमुच निर्विकल्प कल्पतरु ही है यह मानता है और उसकी
छाया में बैठकर गुरुभक्ति का ही वर माँगता है अथवा सद्गुरु को कामधेनु बनाकर स्वयं उसके बछड़े की
कल्पना करता है और ज्ञानरूप जिह्वा से स्वानंद का दुग्ध सेवन करता है। हे गुरुदेव तुम्हारी सभी वृत्तियों की
सेवा मैं ही करूँ इस सद्भक्ति से मैं उसकी प्रार्थना करता हूँ और कहता हूँ, हे कृपानिधे! मुझे यही वर दीजिये।
तब गुरुनाथ ने प्रसन्न होकर मस्तक पर वरदहस्त रखकर वैसा वर देते ही उसका मन आनन्द से मचल उठता है
और वह कहता है, "मुझे वर मिल गया, मैं धन्य हो गया।'' ऐसा वर प्राप्त कर वह वही सेवा प्रेम और आदर
से करने लगता है। गुरुभजन के असंख्य प्रकार हैं। सद्गुरु का मन, बुद्धि, अंतःकरण आदि जो दशेन्द्रिय हैं उन
३५६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
सबकी क्रिया मैं स्वयं बन जाऊँ ऐसी वह मन ही मन इच्छा करता है। सद्गुरु के सारे भोग मैं ही बनूँगा। इस
प्रकार मैं ही गुरुभक्तिस्वरूप बनकर रहूँगा। सद्गुरु जहाँ खड़े रहेंगे वहाँ उनके पैरों के नीचे की जमीन मैं बनूँगा,
सद्गुरु जहाँ-जहाँ चलते जायेंगे उस मार्ग की मिट्टी मैं ही बनूँगा। उनके पैर धोने का पानी मैं ही बनूँगा और
चरण धोने वाला मैं ही रहूँगा और उनके चरणों के तीर्थ को सेवन करने वाला मैं ही बनूँगा। सद्गुरु के चरणों की
धूल मैं स्वयं बनूँगा। सद्गुरु जिस पर बैठते हैं, वह सिंहासन भी मैं ही बनूँगा। उस पर रखा जाने वाला आसन
भी मैं ही बनूँगा इसे ध्यान में रखो। सद्गुरु के शरीर में जो तेल लगाया जाता है, वह भी सर्वांग से मैं ही बनूँगा।
गुरु को टेकने के लिये आगे-पीछे रखे जाने वाले तकिये मैं बनूँगा। यहाँ तक कि सद्गुरु की सिद्ध पादुकाएं भी
मैं ही बनूँगा। दूसरों को उन्हें हाथ भी नहीं लगाने दूँगा। गुरु का श्वासोच्छ्वास भी मैं ही बनूँगा और उनके नाम
से मैं ही तीव्र गति से बाहर आऊँगा। गुरु जिस सुगन्ध का सेवन करेंगे वह सुगन्ध मैं बनूँगा। गुरु कृपादृष्टि से
जिधर देखेंगे वह दृश्य मैं ही बनूँगा। अथवा जो कीर्तन गुरु को पसन्द है उसका गायक मैं रहूँगा। सद्गुरु के मुख
में जो कथा होगी वह आदरपूर्वक मैं ही रहूँगा और उसका प्रत्येक अक्षर और उसका अर्थ भी मैं ही रहूँगा।
सद्गुरु जहाँ स्नान करेंगे वहाँ भी स्नान से उड़ने वाला पानी मैं बनूँगा। गुरु जो आचमन करेंगे वह भी मैं ही
बनूँगा। गुरु जो वस्त्र परिधान करेंगे वह उत्तम वस्त्र मैं ही रहूँगा। गुरु के पैर पोंछने के लिये जो धूतवस्त्र होता है,
वह मैं ही रहूँगा। गुरु के शरीर पर उबटन लगाया जाता है, वह उबटन मैं बनूँगा। गुरु के चरणों पर अर्पण किया
जाने वाला फूल मैं ही रहूँगा। सद्गुरु जिसमें भोजन करेंगे वह थाली और अन्न मैं ही रहूँगा। उसमें रस का
माधुर्य, पकवान, पंगत में साथ में बैठने वाला सब कुछ मैं ही रहूँगा। दही मथ कर जो मक्खन निकलता है उसे
वैराग्यरूपी अग्नि पर पका कर भोजन का प्रमुख व्यंजन घृत मैं ही बनूँगा। भोजन में स्वाद लाने वाला लवण मैं
बनूँगा और इसके बाद भी यदि कोई कमी रह जाएगी तो उसे वे गुरु पूरा करेंगे। जो पानी गुरु प्राशन करेंगे वह
पानी मैं बनूँगा और सद्गुरु तृप्ति की जो डकार देंगे वह भी मैं ही बनूँगा। गुरु को जो फल अर्पण किया जाता है
वह फल तत्काल मैं बनूँगा। गुरु को अर्पण करने के कारण सफल होने वाले फल की सफलता मैं बनूँगा। गुरु
की जूठन ग्रहण करने की मुझे आदत-सी पड़ गयी है। इसके लिये मैं बिल्ली बनकर उनकी थाली चाट कर
साफ करूँगा। गुरु जब सुगन्धित चूर्ण से हस्तशुद्धि करेंगे तो मैं सुगन्धी चन्दन बन जाऊँगा और मुख में सुगन्ध
लाने वाली गन्ध भी बन जाऊँगा। फलाशा तोड़ कर उसके टुकड़े तथा वासना की रेशाएँ तोड़ कर उसका बीड़ा
सद्गुरु के मुख में रखने से आने वाली ताम्बूल की रुचि मैं बनूँगा। 'अहंता' का अभिमान छोड़कर मैं 'सोहं' का
शुद्ध चूना बन जाऊँगा और शान्ति रूप पके पान में लग कर सद्गुरु के मुख में प्रवेश करूँगा। सभी सारों का
शुद्ध कत्था मैं बनूँगा। सद्गुरु के मुख में रंग के रूप में मैं ही शोभा बढ़ाऊँगा। सद्गुरु के मुख का पवित्र थूक मैं
लपकूँगा और पीकदानी का मुँह मैं ही बनूँगा। गुरु ने चबाया हुआ बीड़ा और थूकी हुई पीक के साथ पीकदान मैं
ही बनूँगा। मक्खियाँ भगाने की चँवर मैं ही बनूँगा। गुरु के मुख का बीड़ा लेने के लिये मैं अत्यन्त आस्था से
सेवक बनूँगा। अन्यथा गुरु की गोद में मैं प्यारा बच्चा बनकर लेटूँगा। मेरे गुणरूपी पुष्पों की माला मैं बड़े प्यार से
गुरु के गले में डालूँगा। गुरु कमल के फूल के साथ खेलने लगेंगे तो उनका करकमल मैं ही बनूँगा। गुरु की
नीरांजन से आरती करते समय उस नीरांजन की ज्योति मैं अपने ही तेज से प्रकाशित करूँगा और गुरु जिस
प्रकाश से चलेंगे उस दीपक की प्रभा मैं बनूँगा। मैं श्रीगुरु पर अपने प्राण न्योछावर कर दूँगा। उनके सारे कष्ट मैं
अपने ऊपर ले लूँगा। वह शाप लक्षण मुझे लगे। मैं छत्र भी हूँ और छत्रधारी भी। चँवर भी मैं हूँ और चँवरधारी
भी मैं ही हूँ। पंखा भी मैं हूँ और पंखा झलने वाला भी मैं ही हूँ। इस प्रकार गुरु का सारा परिवार मैं ही रहूँगा।
बारहवाँ अध्याय ३५७
गुरु जिस पर बैठेंगे वह घोड़ा मैं ही बनूँगा। गुरु का बोझ उठाने के लिये मैं घोड़े के रूप में वाहन बनूँगा। गुरु के
आगे-आगे मैं मार्गरक्षक योद्धा रहूँगा, गुरु के गुणों का वर्णन करने के लिये मैं उनका भाट बनूँगा और गुरु के घर
शान्तिपाठ करने वाला भिक्षुक बनूँगा। गुरु के सिर पर छत्र धारण करने वाला, उन पर चँवर झुलाने वाला, उन्हें
बीड़ा देने वाला, फूल देने वाला, झाड़ लगाने वाला, दूध देने वाला और द्वारपाल मैं ही बनूँगा। गुरु जिधर-जिधर
ध्यान देंगे वहाँ का अवधान मैं ही रहूँगा, भले ही प्राण चले जाएँ लेकिन गुरु को छोड़कर एक क्षण के लिये भी
मैं कहीं नहीं जाऊँगा। गुरु जो कथा कहेंगे उसे आग्रहपूर्वक सुनने वाला मैं श्रोता बनूँगा। गुरुकृपा से अध्यात्मज्ञान
सुनाने वाला वक्ता मैं बनूँगा। गुरु उदारतापूर्वक दान देने लगें तो मैं गरीब याचक बन जाऊँगा। गुरु अपने मन की
बात कहने लगें तो मैं ही एकान्तस्वरूप हो जाऊँगा। गुरु विश्राम करने बैठें तो मैं अवकाश बन जाऊँगा और गुरु
के हृदयस्थ अवकाशरहित जो चिदाकाश है वह मैं बनूँगा। गुरु जिस पर बैठेंगे वह सुखकारी आसन मैं ही बनूँगा
और डोली उठाने वाला कहार मैं ही बनूँगा। स्वामी का ख्याल रखते हुए, बड़े संयम से तेज कदम उठाकर तथा
गुरु की पालकी का डंडा कन्धे पर उठा कर स्वामी से बातें करते हुए मैं तेज कदमों से चलता जाऊँगा। वाहन में
बैठे हुए गुरु का ध्यान रखते हुए कहीं पैर परस्पर टकरा न जाय इसलिये पैर उठाकर चलूँगा। जमीन के गड्ढों
तथा ऊँचाइयों को बचाकर ठीक तरह से चलूँगा। संकल्प और विकल्प के झटकों से शरीर के दायें-बायें अंग को
बचाते हुए श्रीगुरु के मुख की ओर देखते हुए मैं चलूँगा। रास्ता बिना भूले, पालकी का डंडा न हिले इसका ध्यान
रखते हुए, दूसरों की आस किये बिना मैं उत्तम कहार बनूँगा। उस सुखद वाहन में बैठकर चलने से सुख बढ़ता
ही जाएगा। चढ़ना, गिरना, लड़खड़ाना, डरना, दौड़ना, अटकना आदि का ध्यान रखते हुए ध्यानपूर्वक पूरी
उम्मीद से चलूँगा। पालकी में बैठने में गुरुजी को कष्ट न हो इसलिये पालकी का डंडा कन्धे पर, मस्तक पर,
कोहनी पर, इस प्रकार रखकर पैर का ध्यान रखते हुए चुपचाप चलूँगा। सामने चढ़ाई आ जाय, मोड़ आये, साँस
फूलने से शरीर थक जाय लेकिन सीना तान कर, धैर्यपूर्वक चढ़ाई चढ़ता चलूँगा। काम का प्रवाह लाँघ कर,
क्रोध के आवेग से बच कर तथा गड्ढों से बच कर पालकी का अगला डंडा कन्धे पर लेकर मैं चलूँगा। ममता
की दलदल विचित्र होती है। उसमें मनुष्य पूरी तरह फँस जाता है लेकिन मैं पैर में जरा भी कीचड़ लगे बिना
उस दलदल को पार कर जाऊँगा। मोहरूपी नदी की खोह बहुत भयंकर है। पानी के तेज बहाव के कारण वह
बड़ी तेजी से नीचे की ओर खींचता है। लेकिन मैं स्वामी को पानी का एक भी बूँद लगे बिना एक किनारे से
दूसरे किनारे तक ले जाऊँगा। सामने दृष्टि रख कर तेजी से आगे चलते समय दोनों ओर का कहार मैं बन
जाऊँगा और रास्ता चलता जाऊँगा। इस प्रकार आगे और पीछे मैं स्वयं सुखासन के आनन्द में कहीं स्वामी की
नींद न टूटे इसका ध्यान रखते हुए उन्हें ले जाऊँगा। जूठे अन्न पर पलने वाला, आठों पहर जागता रहने वाला
तथा गुरु के द्वार पर 'गुरु' 'गेरु' कहने वाला मैं कुत्ता बन कर रहूँगा। कोई अपरिचित दिखाई देते ही मैं 'सोहं'
भावना से भूकने लगूँगा और भजनरूप कुण्ड में बैठने वाले गुरु के द्वार का कुत्ता बनूँगा। ऐसी अनेक कल्पनाएँ
कर गुरु की सेवा के सम्बन्ध में शिष्य विचार करता रहता है। दैवयोग से वह भले ही दूर चला जाए किन्तु
भक्तियोग से वह पास ही रहता है। गुरु सेवा के लिए जो इस प्रकार अपने आप को न्योछावर कर देता है वह
सद्विद्या शास्त्र में सहज ही पारंगत हो जाता है। वह गुरु के पास रहे अथवा दूर रहे लेकिन उसे गुरुभक्ति से प्रेम
ही रहता है। वह अपने प्राण गुरु की सेवा के लिये और भजन के लिये गुरु के द्वार पर ही रखे रहते हैं। गुरुभक्ति
के प्रति ऐसी तत्परता के कारण तथा स्वरुचि से अधिकाधिक एकाग्रता साधने के कारण वही गुरुकृपाकुठार रूप
सद्विद्यालक्षणशस्त्र उसके हाथ में आता है। उस शस्त्र को वैराग्य की सील पर घिसने और स्वस्वरूपाकार वृत्ति ने
३५८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
सान लगाकर चमकाने से अत्यन्त तेज शस्त्र तैयार हो जाता है। अपने सामने शस्त्र तैयार कर उसे ऐक्यभाव की
मुट्ठी में इस प्रकार पकड़ना चाहिये कि शस्त्र और शस्त्रधर दोनों एकजुट हो जाएँ। तब वह संसार पर प्रहार
करने के लिये सिद्ध हो जाता है। ठीक से निशाना साध कर प्रबल प्रहार करने से के लिये तत्पर होते ही
संसारवृक्ष का नाश होता है और प्रहार करने पहले ही टूट जाता है। लिंग वासना निज कल्पना का नाश करती है
उसे धैर्यपूर्वक तथा सावधान होकर नष्ट करने से संसाररूपी वृक्ष का नाश होता है। आत्मसाक्षात्कार होने पर सभी
साधन अपने आप नष्ट हो जाते हैं। भोजन से परितृप्ति हो जाने के बाद शेष पकवान वैसे ही रह जाते हैं। जिस
प्रकार क्षुधा शान्त हो जाने के बाद कोई अमृत भी मुँह से नहीं लगाता, उसी प्रकार ब्रह्मपद की प्राप्ति के बाद इन
साधनों का प्रयास नहीं करना चाहिये। यही भाव मन में रख कर मैंने तुम्हें पहले भी बताया था कि साधनों का
प्रयास प्रवृत्ति निवृत्ति के साथ छोड़ देना चाहिये। परब्रह्म तक पहुँचने के बाद सारे वेदोक्त कर्म भी मिथ्या हो जाते
हैं और आश्रमादि वर्णधर्म भी मिथ्या हो जाते हैं। यह कर्मत्याग का मर्म है। स्वप्न में गड़बड़ी में चलते समय
लड़खड़ा कर जो कुएँ में गिर पड़ता है वह जागृत होने पर खुद को उसमें से निकालता है। उसी प्रकार साधन का
अट्टहास व्यर्थ है। खेत जब फसल से भर जाता है तो उसे कौन जीतेगा? जब गजान्तलक्ष्मी ही घर में आयी तो
दरवाजे दरवाजे भीख कौन माँगेगा? जब निधि ही हाथ लग जाये तो आँख में अंजन कौन डालेगा? उसी प्रकार
आत्मज्ञान प्राप्त हो जाने पर साधनों का बोझ कौन ढोयेगा? हे उद्धव! ज्ञानसामर्थ्य को स्वीकार करने के बाद
सचमुच अपनी वृत्ति का ही त्याग करना चाहिये। अग्नि से अन्न पक कर तैयार होता है, लेकिन जब तक उसकी
भाप निकल नहीं जाती तो उसकी जो गरमी शेष रह जाती है, उससे खानेवाले का मुँह जलता है और खाना
बनाने वाले को भी उसका स्वाद समझ में नहीं आता। पेड़ से आम गिरता है, फिर भी उसमें खटास रहती है।
उसी आम को पाल में डाल दिया जाय तो पक जाने पर उसकी सुगन्ध से ही उसकी मिठास का पता चल जाता
है। लेकिन आम को पाल में रखने में भी खूबी है और वह यह कि एक आम का दूसरे से सम्पर्क नहीं होना
चाहिये क्योंकि ऐसा होने से दोनों में दाग लग जाता है और उनके संसर्ग से अन्य आम भी खराब हो जाते हैं।
समरभूमि में विजयध्वज फहराने से भी, जब तक शरीर के कवच नहीं उतारे जाते तब तक सच्चा विश्राम नहीं
मिल पाता। गर्भवती स्त्री प्रसूत होती है और पुत्र की प्राप्ति से आनन्दित होती है लेकिन जब उसका बारहवें दिन
नामकरण होता है तभी उसे पुत्र होने का सच्चा सुख प्राप्त होता है। कोई पुरुष मर जाता है तो उसके शरीर का
दहन होता है लेकिन सुतक तो रहता ही है। वह जब समाप्त हो जाता है तभी देह की शुद्धि होती है। उसी प्रकार
अज्ञान जाकर जो ज्ञानाभिमान बच रहता है उसका भी त्याग करने पर स्वानंद से आत्म समाधान होता है। खैर का
शूल सचमुच मारता है तो चन्दन का क्या कुछ अलग करता है? उसी प्रकार ज्ञान अथवा अज्ञान दोनों ही प्रकार
का अभिमान बाधक ही होता है। लोहे की बेड़ी तोड़ कर शौक से सोने की बेड़ी पहनने से पीड़ा कम नहीं
होती। 'ब्रह्मादिक' 'ब्रह्म मैं ही हूँ' यह अभिमान कोई शुद्ध ब्रह्म नहीं है। अहंता के कारण वह भी कठिन है।
उसका लक्षण भी सुनो। पानी से नमक तैयार होता है और वह पानी में ही मिल जाता है। लेकिन मोती पानी से
ही तैयार होता है किन्तु वह कठिन रहता है इसलिये वह पानी में घुल नहीं जाता। मोती होने से उसका मोल भले
ही बढ़ जाय लेकिन वह स्त्री के होठों के पास सोने की तार में फँस जाता है। मुक्त होते हुए भी वह नाक के
पास आ गया, यह कठिन प्रसंग अभिमान के कारण उपस्थित हुआ। उसी प्रकार अज्ञान का अभिमान तत्काल
नष्ट हो जाता है लेकिन ज्ञानाभिमान बहुत कठिन है। मिट्टी की गागर कच्ची रहती है वह तत्काल गलने लगती है
और मिट्टी में मिल जाती है। लेकिन वही भट्टी में सेंका हुआ खपरैल कठोर होने के कारण कितने ही दिन क्यों न
बारहवाँ अध्याय ३५९
बीत जाएँ लेकिन मिट्टी में नहीं मिलता। उसी प्रकार प्रपंच अज्ञान के ही कारण बलवान हुआ है। इसलिये ज्ञान
और अज्ञान इन दोनों का अभिमान छोड़ कर, जिस प्रकार काँटे से काँटा निकाला जाता है उसी प्रकार दोनों को
दूर फेंक देना चाहिये क्योंकि यदि इन्हें बीच रास्ते पर फेंक दिया जाय तो ये कभी हमें ही बाधक हो सकते हैं।
अहंकार के रूप में जितना भी कुछ है वह उतना ही बाधक है। इसलिये अहंकार अच्छा हो या बुरा हो ज्ञानीजन
दोनों ही प्रकार के अभिमान को पूर्णरूप से छोड़ देते हैं। हे उद्धव ! तुम्हें मेरे पद की प्राप्ति मेरी भक्ति करने से ही
हुई है। अब अनेक प्रकार के साधनों की झंझट तथा शास्त्रों की चर्चा क्यों करते हो? सद्भक्ति से मेरा भजन
करने से तुम ब्रह्मस्वरूप हो गये हो। इसलिये अब शास्त्र श्रवण के साथ सद्धिद्याधिक साधनों का परित्याग कर
दो। 'तस्मादुद्धव उत्सृज्य' इस श्लोक के त्याग का बीज यही है यह अपने अंतःकरण की गुप्त बात मैंने तुम्हें
स्पष्ट करके बतलायी। शिष्य के लिये गुरु का भजन यही सब साधनों में श्रेष्ठ साधन है। सचमुच उससे ही
ब्रह्मसमाधान प्राप्त होता है। जो गुरुचरण का भक्तिभाव से भजन करता है वह सच्चिदानंद मन्दिर में वास करता
है। मेरा यह भाषण पूरी तरह सच है। उसके सम्बन्ध में कोई विकल्प मन में नहीं रखना चाहिये। यह कह कर
श्रीकृष्ण ने अपनी चारों बाहें पसारीं और उन हाथों से उद्धव को बड़े आनन्द से अपने पेट से लगा लिया।
भगवान ने सद्भक्त को आलिंगन देने के कारण हृदय से हृदय मिल गया। तब अर्थात् ही कहना और सुनना ये
दोनों क्रियाएँ बन्द हो गयीं और शब्दों ने ही शब्दों को खा लिया। चारों वाणियाँ बन्द हो गयीं, जीव अपना
जीवत्व भी भूल गया और सद्भक्तों को केवल आनन्दघन के रूप में जो एकनाथरूपी जनार्दन है वह भी सन्तुष्ट
हो गया। उसी सद्भक्ति का भावार्थ बारहवें अध्याय में स्पष्ट किया। उसका सारांश यही कि भक्तों को उनकी
भक्ति से श्रीकृष्णनाथ सदा प्राप्त होते हैं। आत्मप्राप्ति होने का कारण केवल मुख्य भावार्थ ही है। भावार्थ के सिवा
अन्य साधन व्यर्थ की परिक्रमा है।, जप, तप, यज्ञ अथवा दान भावार्थ के ही लिये किये जाते हैं। वह भावार्थ
जिसने साध लिया उसका जन्म धन्य है। नरदेह की प्राप्ति धन्य है। साधुओं का संग धन्य है और जो भावार्थी
भगवद्भक्ति में रंग गये वे अत्यन्त धन्य हैं। जो भगवन्मार्ग में रंग जाते हैं उनका चित्त विषयसुख को भूल जाता
है। वह हंसगीत की कथा उद्धव श्रीकृष्ण से पूछेंगे। वह निरूपण अत्यन्त रसीला है तथा शुद्ध ब्रह्मज्ञान है।
इसलिये श्रोतागण उधर ध्यान दें ऐसी विनती एकनाथरूपी जनार्दन कर रहे हैं।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादशस्कंधे
श्रीकृष्ण उद्धव संवादे एकाकारटीकायां द्वादशोध्यायः ॥ १२ ॥
श्री कृष्णार्पणमस्तु।
तेरहवाँ अध्याय
हे ॐकारस्वरूप अनादि हंस! हे हंसरूप जगदीश! तुम्हें नमस्कार है। हे श्रेष्ठ परमेश्वर! हे परिपूर्ण, तुम
परमहंस के भी सद्गुरु हो। विद्या-अविद्या, ज्ञान-अज्ञान, प्रकृति पुरुष आदि द्वैतभावना के बिना ही तुम्हारे दो
पंख शोभायमान हो रहे हैं, शुद्ध सत्त्व से भी सुन्दर और उज्ज्वल तुम्हारा स्वरूप है। कहते हैं कि हंस शुभ्र वर्ण
का होता है किन्तु तुम्हारा 'हंस रूप' विलक्षण है। जब सुवर्ण के कमल विकसित होते हैं तब अन्य हंस वहाँ
क्रीड़ा करते हैं लेकिन तुम प्रेम से प्रफुल्लित हृदयकमल में क्रीड़ा करते हो। हंस का रहने का स्थान मानसरोवर
है लेकिन तुम मानसविरहित (मन के सिवा) ही रहने वाले हो। हंस की उड़ान आकाश में रहती है लेकिन तुम
चिदाकाश में उड़ान भरते हो। विवेकरूपी चोंच से तुम दूध और पानी सहज ही अलग कर लेते हो और असार
का त्याग कर शुद्ध सार ग्रहण करते हो। तुम्हारे जैसे हंस के लिये चित्समुद्र के वैराग्यरूपी सीप में तैयार-मुक्तारूप
मोतियों का चारा खिलाया जाता है। पृथ्वी का स्पर्श किये बिना तुम निराधार मार्ग से हंस की गति से प्रवास करते
हो यह तुम्हारे प्रवास की कला अद्भुत है। जो स्वभाव में तुमसे भिन्न नहीं है ऐसी वाग्देवता को तुम परिचालित
करते हो। तुम्हारे अंश के कारण ही उसे हंसवाहिनी कहा जाता है। तुम कहते हो तभी सरस्वती चलती है, तुम्हारे
कहने से ही वेद बोलते हैं, जब तुम कहते हो तभी प्राण में स्पन्दन होता है और तुम्हारी वक्तृत्व शक्ति से ही
सरस्वती बोलती है। सरस्वती वाणी की देवता है लेकिन तुम्हारे ही कारण उसे वाक्शक्ति प्राप्त हुई है उसी प्रकार
जैसे बाँसुरी के स्वर मधुर रहते हैं किन्तु उसे बजाने वाला कोई और ही होता है। उसी प्रकार वाचा, वचन और
वक्ता तुम ही हो, सरस्वती तुम ही हो और बोलने वाले भी तुम ही हो। इसलिये अपने हंसरूप की कथा तुम्हीं
सहज ही बोलवा रहे हो। बड़े-बड़े कवियों को बोलने के लिये तुमने सरस्वती प्रकट की। उस हंसरूप की
अपूर्वता से अभिनव बातें ही प्रकट होती हैं। तो तुम हंसरूपी श्रीजनार्दन सर्वभूतों में एकसमान हो। उसके
श्रीचरण मस्तक पर धारण करने के कारण जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो गया। वह जब स्वयं ही भय के कारण
भाग रहा था तब उसे भ्रम के पास छिपने के लिये जगह मिल गयी और उसने जन्म के बाद मरण को वहाँ रहने
के लिये स्थान निश्चित कर दिया। इसलिये जो भ्रम में पड़ता है वह जन्म-मरण में फँस जाता है और एक बार
भ्रम के चक्र में फँसने पर उससे छूटना कठिन है। वहाँ वह रहटमाला की तरह जन्म-मरण के यंत्र में फँस जाता
है। एक के प्रहार से बचता है तो दूसरा सिर पर सवार हो जाता है। जन्म-मरण के संकट से बचने के लिये
तुम्हारे 'सोहंहंसा' का स्मरण करना पड़ता है। जब कोई सावधानी से उसका स्मरण करता है तभी उसका भ्रम
नष्ट होता है। तुम परमात्मा परमहंस हो। परब्रह्मस्वरूपी पूर्ण परमेश्वर हो। ब्रह्मदेव के पुत्र को उपदेश करने के
लिये तुम हंस बने थे। उस हंसमुख का निरूपण सुनाने के लिये ही श्रीशुक्राचार्य वक्ता बने और उस भाषण का
अर्थग्रहण कर ही परिक्षिति परम पावन हुए। उस हंस का हंसगीत श्रीकृष्ण उद्धव को सुना रहे हैं। इसलिये
श्रोतागण इधर ध्यान दें जिससे उन्हें सहज ही आत्मबोध होगा। वही यह तेरहवाँ अध्याय भगवान अत्यन्त
आस्थापूर्वक सुना रहे हैं। उसे सुनते ही उद्धव विषयों का नाश होते देख सकेगा। तेरहवें अध्याय में सत्त्वबुद्धि के
कारण का निरूपण है तथा सद्दिद्या के उद्भव का क्रमानुसार अत्यन्त सुलभ रीति से वर्णन किया गया है। उस हंस
के इतिहास का योग भगवान स्वयं बतायेंगे और उसी में चित्त को विषयों का वियोग कैसे होता है वह भी सुलभ
रीति से बताया जायगा। बारहवें अध्याय के अन्त में सद्गुरु की भक्ति कर विद्यारूपी शस्त्र प्राप्त कर जीवों में
तेरहवाँ अध्याय
३६१
वासना का ही छेद करने की बात कही गयी है। जीव का जीवत्त्व ही छेद देने पर सभी साधन छोड़ देने चाहिये,
इसलिये उद्धव ने उस पर कोई उत्तर नहीं दिया। तब उद्धव के मन के विचार, उसके अंतःकरण में चलने वाले
गूढ़ विचार आदि बातों को अच्छी तरह जानकर भगवान श्रीकृष्ण स्वयं से ही बातें करने लगे। तुम कहोगे कि
त्रिगुण का सूत्र लगने के कारण जीव में जीवंत्व आता है, तो जब तक देह में तीन गुण हैं तब तक सद्विद्या उत्पन्न
ही नहीं होगी। नारियल के मुँह पर का ढक्कन जब तक नहीं खोला जाता तब तक उसके अन्दर का पानी प्राप्त
नहीं हो सकता। इस प्रकार जब तक गुण ही समाप्त नहीं होंगे तब तक विद्या कैसे उत्पन्न होगी ? उद्धव की इसी
शंका का समाधान श्रीकृष्ण तीन श्लोकों में करते हैं।
श्री भगवानुवाच
सत्वं रजस्तम इति गुणा बुद्धेर्न चात्मनः।
सत्त्वेनान्यतमौ हन्यात् सत्त्वं सत्त्वेन चैव हि ॥ १ ॥
सत्त्व, रज, तम आदि जो गुण हैं वे सचमुच मायारूपी हैं यह ध्यान में रखो। इन सब बातों का निरूपण
मैंने बारहवें अध्याय में किया ही हुआ है। अब जो सच्चिदानन्द है वह आत्मा से भिन्न नहीं है। लेकिन सभी गुण
वैसे नहीं हैं। वह प्रकृति के ही कार्य होने के कारण प्राकृत हैं। जो सत् है वही चित् है और जो चित् है वही
आनन्द है लेकिन आत्मस्वरूप में तीन प्रकार के भेद नहीं होते। वह एकमेव सच्चिदानंद स्वरूप ही है। जिस
प्रकार श्वेत, मुलायम और मीठी इन तीन गुणों से युक्त चीनी एक ही है, उसी प्रकार सच्चिदानंद यह अविकृत
वस्तु है तथा आकाररूप में भी एक है। प्रकृति ही गुणों को उत्पन्न करने वाली है और उन गुणों के कारण ही
बलवान हुई है। इसलिये हे उद्धव ! गुणों की और आत्मा की संगति कल्पांत में भी कभी नहीं होती। अब विद्या
साध्य करने का ढंग भगवान स्वयं ही बताते हैं। गुण से ही गुणों का नाश कर सद्विद्या प्राप्त करनी चाहिये यह
बात ध्यान में रखो। जब प्रेम से सत्त्व की वृद्धि होकर रज और तम पूरी तरह झड़ जाते हैं तभी सद्विद्या हाथ
लगती है और आत्मस्वरूप का बोध होने पर सत्त्व की वृद्धि भी रुक जाती है। सर्प जिसे काटता है उसे विष
खाने पर आराम मिलता है लेकिन वही विष यदि गलत दिन खा लिया जाय तो वह आत्मघात का कारण बन
जाता है। उसी प्रकार रज और तम का लोप होकर सत्त्व की वृद्धि होती है लेकिन वही सत्त्व जब बाधक हो
जाता है तब बहुत खराब रहता है। उस बाधा के बारे में तुम्हें आगे स्पष्ट करके बताऊँगा। सभी कर्मों से तथा
कार्यों से मैं अलिप्त हूँ। मैं ही ज्ञाता हूँ, मैं ही अत्यन्त सुखी हूँ ऐसी कल्पना कर ही सत्त्व ने गुण से गुणों के
कार्य में उलझा दिया है। इस प्रकार जो सत्त्वगुण बढ़ता है उसका शमन आत्मतत्त्व से ही किया जाना चाहिये।
उसका सम्पूर्ण निर्दलन करने से ही समाधान प्राप्त होता है। उद्धव ! तुम कहोगे कि जब तीनों गुण समान ही हैं तो
फिर केवल सत्त्व की ही वृद्धि क्यों होती है ? इसका उत्तर यह है कि गुण ही गुणों की रखवाली करते हैं। जब
तमोगुण बढ़ता है तो उसे ज्ञान-ध्यान अच्छा नहीं लगता, त्याग अच्छा नहीं लगता और चंदनादि सुखविलास
अच्छा नहीं लगता। निद्रा तथा जोरदार कलह अच्छा लगता है। जब रजोगुण बढ़ता है तो ज्ञान का निरूपण सुनते
हुए भी उसका मन भोग के प्रति आसक्त रहता है। उसे सदा विषय भोग का ही ध्यान लगा रहता है। दृष्टि में
धन की लालसा भरी हो तो-कोई पैर से पादत्राण भी निकाल ले तो उसे गुस्सा नहीं आता। यह रजोगुण की
विशेषता है। रजोगुणी मनुष्य स्त्री पुत्रों के प्रति अत्यन्त लालची होता है। सत्त्वगुण बढ़ने पर वह स्त्रियादि भोगों
के प्रति उदासीन हो जाता है। वह निरन्तर भगवद्चिंतन करता है। क्रोध, लोभ अथवा मोह का लक्षण सत्त्व के
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काल में उत्पन्न नहीं होता। किन्तु अकेले सत्त्वगुण की ही वृद्धि कैसे हो? क्योंकि गुण ही गुणों की रक्षा करते हैं।
सत्त्वगुण के पीछे-पीछे तमोगुण रहता है, आगे परिपूर्ण रजोगुण रहता है और उन दोनों के बीच सत्त्वगुण फँसा
रहता है। तब वह कैसे बढ़ेगा? वह तो पूरी तरह फँसा रहता है। ऐसी शंका मन में आकर तुम सोचोगे कि
सत्त्वगुण कैसे बढ़ेगा? तो उसी सत्त्ववृद्धि का लक्षण बताता हूँ, सुनो।
सत्त्वाद् धर्मो भवेद् वृद्धात् पुंसो मद्भक्तिलक्षणः ।
सात्त्विकोपासया सत्त्वं ततो धर्मः प्रवर्तते ॥ २ ॥
इन श्लोकों का निरूपण करते समय प्रथम उत्तरार्ध का व्याख्यान सुनाता हूँ। उसमें सत्त्ववृद्धि का कारण
सात्त्विक वस्तुओं का ही सेवन बताया गया है। सात्त्विक पदार्थ ही सेवन करने से सत्त्व की ही वृद्धि होती है और
सत्त्ववृद्धि से ही आचरण करने के कारण जीवों में भी पवित्रता आती है। सत्त्व के उत्कर्ष का लक्षण है धर्मनिष्ठा
एवं स्वधर्म का आचरण। उसी प्रकार वहाँ की वासनाओं का बन्धन वह इहलोक तथा परलोक में भी नहीं चाहता।
अंतःकरण शुद्ध हो जाने पर सत्त्वगुण असीम बढ़ जाता है और पुरुषों में मेरी भक्ति का लक्षण धर्म उत्पन्न होता है।
सत्त्व से धर्म की प्रवृत्ति बढ़ने पर गुरुभजन के प्रति प्रेम स्थापित होता है। अथवा जहाँ मेरी सात्त्विक मूर्ति रहती है,
वहीं भक्ति का विकास होता है। कायिक, वाचिक एवं मानसिक कर्म वही मुझे सहज ही अर्पण करता है। मेरे
सिवा किसी और की भक्ति उनमें उत्पन्न ही नहीं होती। तब स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होने लगता है कि गुरु और
भगवान भिन्न नहीं हैं। वही अत्यन्त महान सत्त्व का लक्षण है। यह धर्म पूर्ण सात्त्विक ही है।
धर्मो रजस्तमो हन्यात् सत्त्ववृद्धिरनुत्तमः।
आशु नश्यति तन्मूलो ह्यधर्म उभये हते॥ ३ ॥
ऐसे सात्त्विक धर्मों की वृद्धि होने पर, जिन सत्त्वों में मुमुक्षुओं का विश्रामस्थल पुरुषोत्तम प्रकट होता है,
उस सर्वोत्तम सत्त्व की वृद्धि होती है। इस प्रकार सत्त्ववृत्ति में जो धर्म बढ़ता है वही तत्काल अधर्म का नाश
करता है क्योंकि अधर्म के मूल रजोगुण और तमोगुण हैं। उनका नाम भी वह नहीं रहने देता। सात्त्विक पदार्थों के
सेवन से सत्त्व की वृद्धि होती है। उस सत्त्ववृद्धि के कारण सद्विद्या प्राप्त होती है। कृपानिधि श्रीकृष्ण ने सद्विद्या
प्राप्ति का यह साधन बतलाया। अब सात्त्विक पदार्थों के सेवन के सम्बन्ध में जो बताया है वे सात्त्विक पदार्थ
क्या हैं? उनका निरूपण भी इन लक्षणों में करता हूँ।
आगमोऽपः प्रजा देशः कालः कर्म च जन्म च।
ध्यानं मन्त्रोऽथ संस्कारो दशैते गुणहेतवः ॥ ४ ॥
गुणवृद्धि का कारण आगम अर्थात् शास्त्र है यह ध्यान में रखो। आपका अर्थ है जल और मनपसन्द स्थान
है देश। अब प्रजा का लक्षण सुनो। प्रजा का अर्थ है तीन प्रकार के लोग। जिसकी जैसी संगत होती है वैसा
लक्षण उसे प्राप्त होता है। काल का अर्थ है दिन के भाग। कर्म का अर्थ है वह क्रिया जो शरीर करता है। जन्म
का अर्थ है अच्छे प्रकार की दीक्षा। मंत्र का लक्षण अपनी रुचि के अनुसार। कर्त्ता को जिसमें आदरभाव दिखायी
देता है वह है संस्कार। इसके दस लक्षण हैं। अब गुणवृद्धि सम्बन्धी विचार सुनो। यहाँ प्रस्तुत सत्त्ववृद्धि के
साधकों के लिये निवृत्तिशास्त्र (वेदांत शास्त्र) प्रमुख है। वेदांत के उपनिषद शास्त्र का मथितार्थ ग्रहण करना
चाहिये। आपका अर्थ है जल की पवित्रता। गोदावरी, भागीरथी आदि जो पवित्र नदियाँ हैं उनका एक छींटा भी
तेरहवाँ अध्याय ३६३
अकस्मात् शरीर पर गिर जाय तो पाप निःशेष हो जाता है अथवा जिसके लिये ब्रह्मादिक देवताओं की भी लार
टपकती रहती है उस मेरी प्रतिमा का चरणामृत अथवा शालिग्राम शिला का तीर्थ भी सभी पापों का विनाश करता
है। जिससे सारे तीर्थ पावन होते हैं वह ब्राह्मणों का चरणतीर्थ स्वयं नारायण शिरसावंद्य करते हैं और ब्राह्मणों के
चरण अपने वक्षःस्थल पर धारण करते हैं। पानी कहीं का भी क्यों न हो ? जो पानी सद्गुरु के चरणों से लगा है
वह सकल तीर्थों से भी श्रेष्ठ है। वह सेवन करते ही तत्काल उद्धार करता है। सत्त्ववृद्धि का कारण उदक
(जल) है। वह इस तीर्थ से पुण्य पावन होता है और उसका सेवन करने से सत्त्ववृद्धि का स्वरूप अपने आप
प्रकट होता है। प्रजा का अर्थ है श्रेष्ठ लोग। साधु तथा बैरागी पुरुषों की सेवा करनी चाहिये, क्योंकि इससे जड़
जीवों का उद्धार होता है। सत्त्ववृद्धि का प्रमुख कारण सत्संगति है, यह समझ लो। इस सत्संगति का वर्णन
बारहवें अध्याय में हुआ है। अब देश का अर्थ है नैमिषारण्यादि पुण्यभूमि अथवा सत्पुरुषों द्वारा सिद्धि प्राप्त करने
के लिये स्थापित किया हुआ सिद्धिस्थान। वह स्थान निर्जन, एकान्त तथा ऐसा हो जहाँ बैठने से तत्काल सत्त्व
को अधिक से अधिक बल प्राप्त होता है। एकांत में आसन लगा कर बैठने का अभ्यास पूर्ण हो जाय और चिद्धन
अर्थात् परब्रह्म प्राप्त करने के प्रति रुचि उत्पन्न हो जाय तो यह सत्त्वगुण अपने आप बढ़ता है। उसी प्रकार
साधकों के लिये उत्तम समय है बाह्य मुहूर्त—भोर। यही समय पूरी तरह योग्य और अनिवार्य है। अथवा जिस
समय मन उद्वेगरहित तथा हर्षयुक्त हो वह काल भी उपयुक्त है। प्रेमपूर्ण अंतःकरण से कीर्तन श्रवण करने में जो
काल व्यतीत होता है, अथवा जयंती आदि अवसरों पर महापूजा करने में, एकादशी को जागरण करने में जो
काल व्यतीत होता है, वही समय की उत्तम सार्थकता है। हरिकीर्तन में गाने में अथवा नाचने में जो समय व्यतीत
होता है उस काल की महिमा का वर्णन मैं भी नहीं कर पाऊँगा। अभिमानरहित होकर कीर्तन करना, निर्लोभ से
गाना और नाचना इसमें जो समय व्यतीत होता है उस काल को मैं श्रीकृष्ण भी प्रणाम करता हूँ। उसकी महिमा
का वर्णन कौन करे ? जो कर्म आशारहित हो, फलरहित हो अथवा निष्काम कर्म हो उसी को कर्म कहना चाहिये
अथवा जो क्रिया उपकार के लिये की जाती है वही वास्तव में सात्त्विक कर्म है। गुरु से दीक्षा ग्रहण करने में
पुरुष को मानों एक नया जन्म ही मिलता है, इसे स्मरण रखो। उद्धव ! गुरु ही माँ-बाप हैं। उसका भी लक्षण
सुनो। सचमुच जन्म लेने वाले बालक को भी पाँच प्रकार के पिता होते हैं। एक जन्म देनेवाला, दूसरा उपनयन
करने वाला और तीसरा अन्न खिलाकर पोषण करने वाला। जो भय से छुड़ाता है, जो बन्धन से मुक्त करता है
और जो देह को मरने से बचाता है वह भी शास्त्रों के अनुसार पिता ही है। इसके अलावा एक पाँचवाँ पिता भी
है। वह पंचमहाभूतों का विनाश करता है, वह मृत्यु से छुड़ाता है और गर्भवास के दुःख का निवारण करता है
जिनके चरणों का दर्शन करने से संसार बन्धन पीड़ा नहीं दे सकता वह सद्गुरु पिता है। वह भाग्य के बिना नहीं
मिलता। जन्म लेने वाले बालक के लिये माता और पिता अलग-अलग रहते हैं। बाप वीर्य प्रदान करता है और
उस वीर्य को धारण कर उससे होने वाले गर्भ का पोषण करने का कार्य माँ का होता है। सद्गुरु उस प्रकार का
पिता नहीं है। अपना वीर्य प्रदान किये बिना और योनिद्वार से जन्म दिये बिना वह स्वयं माँ और बाप बनता है।
उदर से बाहर आने के बाद माँ के हृदय में पुत्रस्नेह उमड़ पड़ता है। लेकिन जो बाहर है उसे पेट में डालकर
गुरुमाता सच्ची आमीयता से महान बन गयी है। इसलिये शिष्य के लिये सद्गुरु ही सचमुच माता-पिता हैं। वही
अपनी ममता से उसका पोषण करता है और अभिन्न भाव के कारण गुरु शिष्य में एकत्व उत्पन्न होता है। इससे
पहले जिन चार पिताओं का वर्णन किया उन सबको सौतेला बाप समझो। माता और पिता जब अलग-अलग हैं
तो वे सगे कैसे हुए ? इसलिये जो दयालु सद्गुरु है वही सच्चे शिष्य का सगा पिता है। इसीलिये उन दोनों में
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थोड़ा भी विकल्प उत्पन्न नहीं होता। उस सद्गुरु से ही शैवी अथवा वैष्णवी दीक्षा प्राप्त होती है अथवा वह गुरु
आत्मज्ञान से चैतन्यघन अथवा निर्गुण का उपदेश करता है। अब दीक्षा का लक्षण सुनो। जो चारों प्रकार के
पुरुषार्थ और चारों मुक्ति प्रदान करती है और अविद्या की स्थिति को पूर्णतया विलुप्त करती है उसी का नाम
वात्सव में दीक्षा है। इस प्रकार हे उद्धव! दीक्षा रूप जन्म की कथा वास्तव में दीक्षा है। इस प्रकार हे उद्धव !
दीक्षा रूप जन्म की कथा तुम्हें यथातथ्य बतलायी। अब ध्याननिष्ठ नाम से जो सात्त्विकता होती है उसके सम्बन्ध
में सुनो। वास्तव में जिसका शरीर सत्त्वोपाधिक और जिसका स्वरूप ज्ञानमय होता है वही श्रीविष्णु इन सात्विकों
का ध्येय है। उसका ध्यान करें। अथवा जो गौ के दुग्ध की तरह शुभ्र अथवा कर्पूर की तरह गौर वर्ण है उस
पंचमुखी श्रीशंकर का भवसागर के उस पार जाने के लिये ध्यान करना चाहिये। उस मूर्ति का ध्यान करने से
ध्येय, ध्यान और ध्याता यह सारा नष्ट हो जाता है और अंतःकरण में ज्ञानस्वरूप स्थापित हो जाता है। सात्विकता
का ध्यान यही है। जैसी दीक्षा वैसा ही ध्यान यही आगम शास्त्र का सिद्धान्त है और ज्ञानस्वरूप तक पहुँचना
यही उस ध्यान की परिणति है। जो ज्ञान का भण्डार है वही सद्गुरु का स्वरूप है। निरन्तर उसी का अनुसंधान
कर ध्यान करना चाहिये। पंचभूतात्मक देह का साँचा बना कर उसमें ब्रह्मरूपी रस उड़ेलने से सुन्दर गुरुस्वरूप
तैयार होता है। इसलिये दिन-रात उसी का ध्यान करना चाहिये। हे उद्धव! यही सात्त्विकों का ध्यान है यह
स्मरण रखो। अब मंत्रों का ग्रहण किस प्रकार होता है इसका भी निरूपण सुनो। जो सभी मंत्रों की माँ है, जो
ब्राह्मण को तत्काल द्विजता प्रदान करती है उस गायत्री के मंत्र को ग्रहण करने से ब्राह्मणों को ब्राह्मण होने का
अधिकार प्राप्त होता है। जो सभी मंत्रों का राजा है, जो ब्राह्मणों के हिस्से में आयी है, जिसके भय से मुझ
श्रीकृष्ण को भी ब्राह्मणों की पूजा करनी पड़ती है, वह गायत्री ब्राह्मणों को सहज ही प्राप्त हुई है। लोभ के कारण
उसकी उपेक्षा कर ब्राह्मण दरिद्र हो गये हैं। जो ब्राह्मण गायत्री पर निष्ठा रखता है उसके चरणों का मैं वंदन
करता हूँ। मंत्रों में गायत्री मंत्र श्रेष्ठ हैं ऐसा वेदों का प्रामाणिक मत है। गायत्री मंत्र का प्रवेश हुए बिना अन्य मंत्रों
का वेद में प्रवेश सम्भव ही नहीं था। मुख्यतयः सारे मंत्र गायत्री के पास एकजुट होकर निवास कर रहे हैं। यदि
गायत्री मंत्र का सम्बन्ध न हो तो ब्राह्मणों के मुख में वेद प्रवेश कर ही नहीं सकते। फिर दूसरे मंत्रों की बात क्या
करें ? सारांश वेदों के लिये गायत्री वंदनीय है। गायत्री मंत्र का एकमात्र गोपनीय तथ्य ज्ञानस्वरूप परब्रह्म ही है।
वह मंत्र ब्राह्मणों को ही सुलभ है। लेकिन वे भी उसका मर्म भूल गये। इस प्रकार गायत्री मंत्र पूर्ण रूप से
ब्रह्मस्वरूप है और सभी सिद्धियों को उत्पन्न करने वाला है। शैव अथवा वैष्णव मंत्रों को ग्रहण करने पर भी
गायत्री मंत्र से ही तत्काल सत्त्वशुद्धि होती है। सत्त्व की शुद्धि हो जाने के बाद सहस्रों शैव मंत्र अथवा वैष्णव
मंत्रों की प्राप्ति होती है और उस सत्त्वशुद्धि से ही साधकों को तत्काल आत्मदृष्टि प्राप्त होती है। हे उद्धव !
मंत्रग्रहण करने का यह सही ढंग है। अब संस्कार के बारे में सुनो। मन के संकल्प और विकल्प तोड़ने का प्रयत्न
जो उत्कट इच्छा और लगन से करता है उसमें वैसे तो संकप उत्पन्न ही नहीं होता और अगर हुआ भी तो उसे
वह वहीं कुचल देता है। वह सदा विचार दृष्टि से ही देखता रहता है इसलिये वह मन से भी स्वतंत्र रहता है।
परमात्मा निष्ठा के कारण वह मन को नियंत्रण में रखता है, उसे इधर-उधर भटकने नहीं देता। मन को
कुशलतापूर्वक स्मरण में ही फँसाये रखता है। वैराग्य के बल पर वह मन का दमन करता है और उसी के भय से
हरि का चिन्तन करता है। जिस प्रकार दासी स्वामी की किसी भी आज्ञा का उल्लंघन नहीं करती, उसी प्रकार
वह अपने मन को ईश्वरनाम स्मरण के अधीन कर देता है। इन्द्रिय अनेक प्रकार के पदार्थों को देखते रहते हैं
लेकिन मन किसी अन्य विषय को नहीं देखता। वह जागृत अवस्था में तथा स्वप्न में भी स्वाभाविक रूप से हरि
तेरहवाँ अध्याय ३६५
का स्मरण करता रहता है। मन जब इस प्रकार सुसंस्कारित हो जाता है तो वह प्रत्येक क्षण हरि का ही चिन्तन
करता है। श्वासोश्वास चलते समय भी 'परब्रह्म मैं ही हूँ' का ध्यान लगा रहता है। सहज ही भगवान के
नामस्मरण का आदर करने को आत्मसंस्कार कहते हैं। आत्मशुद्धि का जो प्रमुख कारण है उसे दस लक्षणों के
साथ बतलाया। साधक भी उसका सेवन करें इसलिये मैंने भी उसका अधिक स्पष्टीकरण किया। अब जिसके
कारण तमोगुण जोर से बढ़ता है उसके भी दस लक्षण हैं। उसका पूरी तरह त्याग करना चाहिये। उसका शास्त्र
आभिचारिक है। वह मार्ग वेदों द्वारा निषिद्ध माना गया है। उसमें दारू, मद्य, ताड़ी आदि का अनिवार्य रूप से
सेवन किया जाता है। जो इहलोक और परलोक में भ्रष्ट हुए रहते हैं, पाखंडी तथा बहुरूपिया होते हैं और मुण्डन
किये रहते हैं उनसे इनकी संगति रहती है और जहाँ वेदविधियों का विरोध होता है, द्वेष, जुआ अथवा परस्त्री
जैसे दुर्व्यसन हों वहीं इनकी बैठक होती है और उनका समय मध्यरात्रि का रहता है। उस समय उस कर्म का
विधि चलता है। उस कर्म का प्रारम्भ जारण, मारण, मोहन, स्तंभन, उच्चाटन अथवा वशीकरण रहता है। ये सब
तामस कर्म हैं। जन्म का अर्थ है दीक्षाग्रहण। इसलिये प्रेतभूत पिशाच विद्या से प्रेतभूतों की आराधना करने से
तामसों को भी प्रेत का ही जन्म प्राप्त होता है। जिसमें तामस गुण प्रमुख रूप से रहता है वह पुरुष क्रोधयुक्त
होकर निरन्तर शत्रु की ही टोह में रहता है और उसका विनाश करने के लिये प्रवृत्त रहता है। उसके मंत्र तामसी
होते हैं और देवता गूँगी, मैली (गन्दी), उच्छिष्ट चांडालिन अथवा प्रेतों की देवता कंकाली होती है और उनकी
मंत्रयोजना भी वैसी ही रहती है। पत्थर और मिट्टी से बना घर मेरा है, यह जमीन मेरी है यही लगन रहती है।
नींद में, स्वप्न में भी दीवारें उठाता रहता है, इतनी घर के प्रति आसक्ति रहती है। मकान बनाने की क्षमता भले
ही न हो लेकिन पत्थर मिट्टी आदि का संग्रह करता रहता है। किसी चिड़िया को भी वहाँ नहीं आने देता। जिस
देह के लिये घर बनाया जाता है उस देह को भी वह असह्य कष्ट देता रहता है। तामस संस्कारों के योग से घर
की आसक्ति के कारण वह लगभग पागल हुआ रहता है। घर के लिये वह मरने तक प्रयास करता रहता है। यही
उसका तामस संस्कार है और उसका संसार है सिर्फ मिट्टी। जिसके कारण तमोगुण बढ़ता है उनके ये दस लक्षण
हैं। अब राजस का स्वरूप सुनो। उसका स्वरूप इससे अलग रहता है। सत्त्वगुण को स्वीकार करना चाहिये और
तमोगुण का त्याग करना चाहिये। अब आगे से काटने वाले और पीछे से लात मारने वाले रजोगुण के बारे में
सुनो। जरा सुनो, चतुर और छिनाल औरत अपने पति को प्रसन्न रखती है और फिर उसे धोखा देकर व्यभिचार के
लिये बाहर जाती है। उसी प्रकार यह रजोगुण है। जिस प्रकार कोई अड़ियल टट्टू देखने में बहुत सुन्दर रहता है
लेकिन बीच रास्ते में अड़ जाता है और पैर आगे नहीं बढ़ाता बल्कि पीछे हटने लगता है, उसी प्रकार रजोगुण
की स्थिति है। वहाँ कल्पांत में भी त्याग की सम्भावना नहीं है। ऐसा मनुष्य केवल दांभिक भावना से ही धर्म
करता है और मन में काम के प्रति आसक्ति रहती है। साथ में चलने वाला चोर सर्वस्व लूटने के लिये चाकर
बनकर साथ-साथ दौड़ता रहता है। वही स्थिति रजोगुण की है। वह भी इच्छा का संसार बढ़ाता रहता है।
इसलिये मनुष्य काम की आसक्ति से धर्म करता है, किये हुए कर्म का निश्चयपूर्वक उपभोग करता है और इस
प्रकार स्वयं ही जन्म-मरण के भँवर में फँस जाता है। कल्पांत में भी उससे छूट नहीं पाता। सात्त्विक लोग मेरी
भक्ति से तर जाते हैं, तामस लोग मेरी विरोध भक्ति से तर जाते हैं। किन्तु राजस लोगों की जन्म-मरण की यात्रा
रजोगुण के कारण कभी समाप्त नहीं हो पाती। रजोगुण की बाढ़ जिसके कारण प्रबल होती है वे दस लक्षण तुम्हें
बताता हूँ। काम्य कल्पना पूरी तरह छोड़ देने के लिये यह निरूपण भी सुनो। राजस लोगों का शास्त्र केवल
प्रवृत्ति पर आधृत है। वह केवल वासनामय होता है। जिससे इहलोक में और परलोक में सुख मिले ऐसी ही
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चीजों के प्रति राजस व्यक्ति के मन में अत्यन्त आदरभाव रहता है। आप का अर्थ है केवल पानी। लेकिन यदि
उसमें इलायची और खस की सुगन्ध हो उसमें कपूर पड़ा हो और वह शीतल हो तो वह राजस व्यक्ति को
अत्यन्त प्रिय होगा। वह किसकी संगत करता है यह भी सुनो। राजा सरीखे लोग, सभापति, व्यवहार चतुर, लोगों
का मनोरंजन करने वाले तथा ऐसी ही प्रवृत्ति के लोग उसे अच्छे लगते हैं। राजदरवार में अथवा सभा में, चौपाल
में अथवा जहाँ बड़े व्यापारी लेन-देन करते हैं ऐसी दुकान में अथवा जहाँ मण्डप और वंदनवार लगे हों ऐसे
स्थान पर वह बड़े सम्मानपूर्वक जाकर बैठता है। जब घर में समय नहीं बीतता तो शहर के किसी अड्डे पर
जाकर बैठता है। अन्यथा शतरंज खेलने के लिये बड़े चाव से बैठ जाता है। अब रजोगुण का समय सुनो।
सूर्योदय होने के बाद का समय या शाम का समय राजसी है। यह समय उसे बहुत प्रिय है। राजस लोगों के
प्रत्येक कार्य में लालच भरा रहता है। धनधान्य प्राप्त करने के लिये वे धर्म करते हैं। पशु पुत्र हों यह उनकी सदा
की वासना होतीहै। इच्छारहित बात उनके स्वप्न में भी नहीं आती। राजसों की इच्छा प्रचण्ड रहती है। काम की
आसक्ति के कारण वे दीक्षा लेते हैं, उनका जन्म उसी के लिये होता है। उन्हें निरन्तर स्त्रियों की ही इच्छा लगी
रहती है। मंत्र लेते समय भी मन में कोई न कोई अभिलाषा अवश्य रहती है। जिससे मेरा सम्मान होगा, मेरी
प्रतिष्ठा बढ़ेगी और जिससे गुण अलौकिक प्रतीत होगा ऐसा मंत्र वह अत्यन्त आदरपूर्वक ग्रहण करता है। उसका
संस्कार तो अत्यन्त राजसी होता है। उसमें शारीरिक भोग के ही विलास होते हैं। बहुमूल्य सुगन्ध, साफ-सुथरे
वस्त्र उसे हमेशा अच्छे लगते हैं। उद्देश्य यही होता है कि मेरा लौकिक बढ़े और मुझे मंच पर आदर का स्थान
मिले बड़े-बड़े लोग मुझे प्रणाम करें और भरी सभा में मेरा सम्मान करें। हे उद्धव ! रजोगुण के जो दस लक्षण हैं
उनका यही स्वरूप है। इसीलिये राजस लोग जन्म-मरण के जंजाल से पूरी तरह कभी नहीं छूट पाते। सात्त्विक
पुरुष विवेक पर निष्ठा रखकर त्याग करता है, तामस व्यक्तिं कनक-कांता के लोभ में त्याग नहीं कर पाता। इन
तीन गुणों का लक्षण मैंने अनेक प्रकार से तुम्हें बताया। अब इन तीनों का साधारण स्वरूप भी तुम्हें बताता हूँ।
तत्तत्सात्त्विकमेवैषां यद् यद् वृद्धाः प्रचक्षते।
निन्दन्ति तामसंतत्तद् राजसं तदुपेक्षितम् ॥ ५॥
जिनकी बुद्धि विचारों से परिपक्व हुई है ऐसे बुजुर्ग जो आचरण करते हैं जिसकी लोग आदरपूर्वक स्तुति
करते हैं वे सचमुच सात्त्विक कार्य हैं ऐसा मेरा निश्चित मत है। विचारकों के उपदेशानुसार लोग जिन बातों की
निन्दा करते हैं, वह सब तमोगुण की पीड़ा है, ऐसा मेरा विचार है। जिसकी कोई स्तुति नहीं करता, निन्दा भी
नहीं करता, मन से उपेक्षा करते हैं वे कार्य सचमुच राजस हैं इसे ध्यान में रखो। उसकी बाधा अत्यन्त कठिन है।
जिस प्रकार विष मिलाया हुआ अन्न खाने में मधुर लगता है किन्तु उसमें मृत्यु छिपी होती है उसी प्रकार यह
राजस गुण है। उसका बन्धन बड़ा विचित्र होता है। राजस को उपदेश करते-करते वेद भी हार गये। उसे उपदेश
करने में ब्रह्मदेव भी थक गये। स्वयं मैं भी उसे उपदेश नहीं कर पाता। इसी लिये विचारकों ने रजोगुण की
उपेक्षा कर उसे फेंक दिया है। इसीलिये साधक को सात्त्विक का ही सेवन करना चाहिये। उस सात्त्विक सेवन
का सम्पूर्ण गुण मैं तुम्हें बताता हूँ, सुनो।
सात्त्विकान्येव सेवेत पुमान् सत्त्वविवृद्धये।
ततो धर्मस्ततो ज्ञानं यावत्स्मृतिरपोहनम् ॥ ६॥
सात्त्विक पदार्थों का सेवन करने से सचमुच सत्त्वगुण की वृद्धि होती है और पुरुषों में सत्त्वगुण की वृद्धि
तेरहवाँ अध्याय ३६७
होते ही उनकी प्रवृत्ति अपने आप ही धर्म की ओर होती है। धर्मप्रवृत्ति से मेरा भजन होता है और मेरी भक्ति का
उल्हास बढ़ते ही मैं भक्तों पर जब प्रसन्न हो उठता हूँ उस समय ज्ञान भी अपने आप ही प्रकट होता है।
'तत्वमसि' आदि जो वाक्य हैं उनका यही अर्थ है कि गुरु के द्वार से आकर ज्ञान की प्राप्ति होती है। तो फिर तुम
कहोगे कि फिर सत्त्वशुद्धि से किस हेतु से धर्मभक्ति करनी चाहिये ? तो उसका विचार भी सुनो। सत्त्वशुद्धि के
बिना यदि श्रवण किया जाय तो वह बाजार के कोलाहल की तरह होता है। उससे कभी भी आत्मस्वरूप की
पहचान नहीं हो सकेगी। अन्धा बालक जिसके गर्भ से जन्म लेता है उसका स्तनपान करता रहता है लेकिन माँ
कैसी होती है उसे दिखायी ही नहीं देती। वैसी ही स्थिति उस उपदेश की रहती है। प्रत्येक इन्द्रिय को सजीवता
प्रदान कर भगवान सभी का पालन-पोषण करता रहता है लेकिन विषय में अन्धे लोग उसे नहीं देख पाते। उनकी
चित्त की शुद्धि न होने के कारण उन्हें कुछ भी नहीं दिखायी देता। बकरी के गले में चमड़ा लटकता रहता है उसे
झूठ ही 'स्तन' कहते हैं, उसी प्रकार सत्त्व की शुद्धि हुए बिना उपदेश भी व्यर्थ है। बहते जल पर अक्षर लिखने
से वे पानी की सतह पर अंकित नहीं हो पाते, उसी प्रकार आत्मज्ञान भी सत्त्वशुद्धि के बिना स्पष्ट रूप से प्रकट
नहीं हो पाता। पूर्णरूप से सत्त्वशुद्ध हुए बिना जिस प्रकार धर्मबुद्धि प्रकट नहीं होती, उसी प्रकार ग्रहण में जिस
प्रकार चन्द्रमा नहीं दिखाई देता उसी प्रकार आत्मज्ञान भी सिद्ध नहीं होता। हरिकथा श्रवण करने से जिसका कंठ
सूख जाता है, शरीर पर रोमांच उभर आते हैं, पसीना छूटने लगता है, रुलाई आने लगती है, लेकिन एक भी पैसा
खर्च करना होता है तो प्राण निकलने लगते हैं ऐसा जिसका आचरण होता है उसमें भी ब्रह्मज्ञान प्रकट नहीं होगा।
जब तक हृदय से लोभ नहीं छूटता तब तक सच्चा ज्ञान कैसे प्राप्त हो ? जब सत्त्वशुद्धि और धर्म ये दोनों स्पष्ट
दिखायी देने लगेंगे तभी वह आत्मज्ञान की प्रबल 'प्रेरणा से सही मार्ग पर लगेगा। उस मार्ग पर चलते रहने पर भी
यदि मेरी भक्ति साथ में हो तभी वह चोरों से बच पायेगा और झट मेरे पास आएगा। उस भक्ति की संगत न हो
तो आगे का राजमार्ग भी अपरिचित होने लगता है। तब काम-क्रोध विनाश करने के लिए प्रवृत्त हो उठते हैं और
विकल्परूपी भँवर डुबा देते हैं। अरे ! भाग्य के बिना मेरी भक्ति प्राणियों का संग नहीं करतीं। मेरी भक्ति की
संगत से मार्ग चलने पर किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं होता। मेरी भक्ति के साथ बड़े-बड़े वीर तथा प्रसिद्ध नौ
रणबाँकुरे होते हैं। वे युद्ध के लिये सदा तैयार होकर शत्रु का सामना करने के लिये तैयार रहते हैं। आत्मज्ञान के
योग से वे महान योद्धा बने हुए हैं। इसलिये मेरी भक्ति के बिना हजारों प्रकार से श्रवण, मनन करने पर भी मेरी
प्राप्ति नहीं होती। भजन से ही मेरी पूर्ण प्राप्ति होती है। अहो ! सभी प्राणिमात्र के प्रति भगवान की ही भावना
रखना यही मेरी श्रेष्ठ भक्ति है। वह स्वयं ही जब सहचरी हो जाती है तो काम, क्रोध, मोह, पीड़ा नहीं दे सकते।
बड़े जतन से उलटी गागर समुद्र में डुबोने से उसमें एक बूँद जल भी नहीं घुस पाता। वही बात महावाक्य की
है। इसलिये अत्यन्त आदर और धर्मशील बुद्धि से मेरा भजन करने से मैं प्रसन्न होता हूँ और मेरे प्रसाद से ही ज्ञान
प्रकाशित होता है। हे उद्धव ! ऐसा न कर यदि केवल अर्थ और स्वार्थ पर लोभदृष्टि रख कर मेरी सूखी भक्ति की
जाय तो उससे मैं लक्ष्मीपति प्रसन्न नहीं होता। जो धन, मन, शरीर, वाणी घिस कर मेरा भजन करता है उसे ही
जिस प्रकार चन्द्र किरणों से चकोर प्रसन्न होता है उसी प्रकार मैं प्रसन्न होता हूँ। वत्स के लिये गाय जिस प्रकार
स्नेहयुक्त होकर गोरस देती है, उसी प्रकार अत्यन्त सन्तोष से मैं भी प्रसन्न होता हूँ। मेरे उस प्रसाद से ही मेरा
ज्ञान भक्तों में प्रकट होता है। स्त्री यदि सद्गुणी, सुन्दर और पतिव्रता और लाडली हो तो पति उसे बिना माँगे सब
कुछ दे देता है, उसी प्रकार मैं अपने भक्तों पर प्रसन्न होता हूँ। मेरे ही प्रसाद से जो ज्ञान प्रकट होता है उसे ही
'श्रुति' और 'स्मृति' कहते हैं यह जान लो और सहज ही जिस प्रकार अविद्या का नाश होता है उसे 'अपोहन'
३६८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
कहते हैं। गुणों से देह उत्पन्न होता है और देह से ज्ञान उत्पन्न होता है, लेकिन उसी ज्ञान से गुणों का नाश होता
है। तुम कहोगे, लेकिन क्या देह का नाश नहीं होता? लेकिन तुम्हारी यह बात गलत है। क्या पक्षी स्वयं अपने
पंख तोड़ता है या नारियल नारियल को फोड़ता है? क्या व्याघ्र स्वयं ही अपने मांस को चखता है। यह जो कभी
न घटने वाली बात होगी तभी देह के ज्ञान से गुणों का और देह का विनाश होगा। यदि तुम्हारे मन में इस तरह
का विकल्प आ रहा हो तो उसका भी निराकरण करता हूँ।
वेणुसंघर्षजो वह्निर्दग्ध्वा शाम्यति तद् वनम्।
एवं गुणव्यत्ययजो देहः शाम्यति तत्क्रियः ॥७॥
संयोग से बाँस के जंगल में तेज हवा में बाँस एक दूसरे के घर्षण के कारण चिनगारी उत्पन्न होती है और
पूरा जंगल जल जाता है। जिस टुकड़े से अग्नि उत्पन्न होती है वह टुकड़ा भी जलकर स्वाहा हो जाता है। जंगल
में एक सीक भी शेष नहीं रह पाती और वह स्वयं भी राख होकर बुझ जाता है। उसी प्रकार वैराग्य के
अभ्यासरूपी वायु से त्रिगुणों का घर्षण होते ही वहाँ ज्ञानरूपी अग्नि उत्पन्न होता है जिससे अविद्यारूप जंगल
जल जाता है। वह हरिगुरु की कृपा से खौलता है, वृत्ति के रूप से प्रज्वलित होता है और दोनों देहों से लगे
गुणों को जलाने में प्रवृत्त होता है। तब आशा और तृष्णा के झुण्ड जल जाते हैं, काम-लोभरूपी सियार जल जाते
हैं, क्रोधरूप व्याघ्र की होली हो जाती है और मदरूपी हाथी भी जलने लगता है। स्नेह के कँटीले पौधे जल जाते
हैं, असत्यरूप बैर के काँटे जल जाते हैं, मोहरूप अजगर तो तत्काल ही जल जाता है और अंततः भयानक काल
भी जल जाता है। इतने में अहंकार रूप सुअर उठता है, कितना भी दौड़ाने पर भी वह नहीं मिलता। लेकिन वह
विकराल सुअर भी जल जाता है। ज्वालाग्नि चारों ओर फैल जाता है, बचने के लिये अणुमात्र स्थान भी नहीं
रहता। इस प्रकार अहंकाररूपी जंगली सुअर भागते-भागते जल जाता है और पूर्ण रूप से मर जाता है। अग्नि की
करनी बड़ी विचित्र है। वह स्वयं अपना भी दहन कर लेता है। इतना ही नहीं बल्कि वह दाहकशक्ति को भी
जलाकर अपने स्वस्वरूप में जाकर स्थिर हो जाता है। यह निरूपण सुनकर उद्धव को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने
कहा, लोगों पर यह कैसी संकट की घड़ी आयी है? ऐसा होते हुए, उसे छोड़ लोग विषय पर ही लुब्ध होते हैं
और मरते रहते हैं। सात्त्विक सेवन से सत्त्व की वृद्धि होती है और अलभ्य सिद्धि का लाभ होता है। लेकिन उस
सिद्धि को छोड़कर लोग विषय में ही रममाण होते हैं। इन लोगों में कितना अनर्थ मचा हुआ है। मन में इस
प्रकार की शंका उत्पन्न होने के कारण वह बड़ी जिज्ञासा से श्रीकृष्ण से पूछने लगा।
उद्धव उवाच
विदन्ति मर्त्याः प्रायेण विषयान् पदमापदाम।
तदापि भुञ्जते कृष्ण तत्कथं श्वखराजवत् ॥८॥
उद्धव ने कहा, "हे मुकुन्द! सर्वज्ञ गोविन्द! सुनो। विषय का संकट सर्वत्र बाधा उत्पन्न करता है यह सदा
सबको ज्ञात हो चुका है। जो विषयाधीन होता है वह सर्वत्र, सदा दीन-हीन ही बना रहता है। यह सब देखने
जानने पर भी उन्हें विषयों के प्रति कितनी आसक्ति है। लोग श्वान, गधा तथा बकरे की तरह विषय भोग करने
के लिये निर्लज्ज हो जाते हैं। अपने हित का कार्य न करके विषय की चाहत में ही क्यों नाचते रहते हैं? कुतिया
क्रोध से बिफरती रहती है फिर भी कुत्ता उसके पीछे-पीछे लगा रहता है और दुम हिलाकर उसे सूँघता रहता है।
वह लोगों की लज्जा भी नहीं करता। अन्धा, रोगग्रस्त, शरीर से पीप गलता हुआ, गले में चिन्तारूपी मटके का
तेरहवाँ अध्याय ३६९
किनारा फँसा हुआ, फिर भी वह कुतिया के पीछे कामासक्ति से लगा रहता है। कुतिया गुस्से में उस पर
चिल्लाती रहती है फिर भी कुत्ते को वह भला ही लगता है। उसके सारे प्राण कुतिया के पूँछ में लगे रहते हैं
इसलिये वह उसका पीछा करता रहता है। शरीर से शरीर सटते ही कुतिया उस पर चिल्लाती है और उसके पीछे
दौड़ती है फिर भी वह उसकी पूँछ नहीं छोड़ता। उसकी कामेच्छा बढ़ती रहती है। इतनी यातनाओं के बाद यदि
भोग मिला भी तो उस भोग में वह लड़खड़ा कर गिर पड़ता है। चारों ओर से लोग उसे दुत्कारने लगते हैं और
उसकी उपेक्षा करते हैं। निन्दा के पत्थर शरीर पर निरन्तर बरसते रहते हैं। मूर्ख लोग भी उस पर थूकते हैं। पुरुष
की भी वैसी ही अवस्था होती है फिर भी उसे काम ही अच्छा लगता है। श्वान का जुग जल्दी ही छूटता है
किन्तु मनुष्य का जुग कल्पांत में भी नहीं छूटता। स्त्री के लोभ में अत्यन्त लंपट होने के कारण वह अनेक प्रकार
के संकट सहता रहता है। अब गधे का भी हाल सुनो। गधी को दूर से देखते ही गधा चिल्लाता हुआ उसकी ओर
दौड़ता है। उसे जरा भी लज्जा नहीं होती। गधी आगे-आगे भागती रहती है और गधा लालच के कारण उसके
पीछे-पीछे दौड़ता रहता है। वह उसके मुँह पर दुलत्ती चलाती है लेकिन यह आगे ही बढ़ता जाता है। वह छाती
पर दुलत्ती चलाती है लेकिन वह उससे प्रेम ही करता है। इस प्रकार स्त्रियों के प्रति गधे जैसा आचरण करते
रहते हैं। अथवा पुरुषों की गति बकरे जैसी ही होती है। उसे मारने के लिये कसाई के पास लाया जाता है, फिर
भी उसका ध्यान बकरियों में ही लगा रहता है। अपनी ही जात बिरादरीवालों को मरता देखता रहता है लेकिन
उस दुःख से उसे पश्चात्ताप नहीं होता। मृत्यु के बिलकुल पास पहुँचने पर भी वे लोभ के कारण विषयसुखों की
ही इच्छा करते रहते हैं। मृत्यु की अन्तिम सीढ़ी बुढ़ापा सिर पर आ टपकता है फिर भी वह विषय की ही ओर
भागता रहता है। मृत्यु का स्मरण भी नहीं करता। कसाई बकरा काटने के लिये ले आता है, वह अपने साथियों
को कटते देखता रहता है लेकिन उसकी परवाह न कर खुशी-खुशी बकरियों के साथ रममाण होने के लिये
छटपटाता रहता है। बकरा, कुत्ता और गधा ये विषयी अवश्य हैं लेकिन वे केवल ऋतुकाल में ही विषयभोग के
लिये तैयार रहते हैं। लेकिन पुरुष हमेशा कामातुर रहता है। कुतिया गर्भवती रहती है उस समय कुत्ता भी संभोग
के लिये तैयार नहीं रहता। लेकिन पुरुष गर्भवती स्त्री के साथ भी संभोग करता है। गधा गधी के साथ लिपटता
जरूर है लेकिन वह उसे मोतियों के अलंकार नहीं पहनाता लेकिन मनुष्य को स्त्री की चाह इतनी अधिक होती
है कि वह उसके हर लाड़ पूरे करता है। उसकी वेणी के लिये फूलों के गजरे लाता है, उसके कुंकुम तिलक पर
रत्न की आभा सजाता है और नाक में मोतियों की नथ पहनाता है। यह मनुष्य जन्म की चाह है। प्रसूति का
समय निकट आता है और पेट फूला रहता है फिर भी कामांध और विवेकहीन दुष्ट ऐसी स्त्रियों के साथ रममाण
होते रहते हैं। अस्थि, मांस, विष्टा, मूत्र इत्यादिसे भरी होने पर भी लोग जानबूझ कर इतनी गन्दगी के प्रति क्यों
कामासक्त होते हैं? इन प्रश्नों का उत्तर श्रीकृष्ण तीन श्लोकों में दे रहे हैं। वे कहते हैं, उद्धव! ध्यान देकर
कामासक्ति के सम्बन्ध में विचार सुनो।
श्री भगवानुवाच
अहमित्यन्यथाबुद्धिः प्रमत्तस्य यथा हृदि।
उत्सर्पति रजो घोरं ततो वैकारिकं मनः ॥९॥
जो मोह मद से उन्मत्त विवेकहीन पुरुष होते हैं उनमें देहात्मवाद के कारण रजोगुण उत्पन्न होकर उससे
अभिमान उफनता है। जिस प्रकार मनुष्य मद्य प्राशन कर उन्मत्त हो जाने पर अपना हित भूल जाता है और फिर
३७० श्रीमद् एकनाथी भागवत
अनेक प्रकार के अनर्थ उत्पन्न कर आत्मघात करने के लिये भी प्रवृत्त हो जाता है उसी प्रकार रजोगुण के कारण
लंपट होने वाला पुरुष शुद्ध, बुद्ध तथा नित्यमुक्त होने में ही सच्चा कल्याण है यह भूलकर कामासक्त हो जाता
है। अभिमान रजोगुण में रंग जाने पर दुःखरूपी भीषण रजोगुण अपार बढ़ जाता है और उससे मन विकार के
वशीभूत हो जाता है।
रजोयुक्तस्य मनसः संकल्पः सविकल्पकः।
ततः कामो गुणध्यानाद् दुःसहः स्याद्धि दुर्मतेः॥१०॥
मन जब रजोगुण से भर जाता है, उस समय प्रचण्ड-संकल्प-विकल्प उत्पन्न होते हैं और एकान्त में
आसन डालकर ध्यानस्थ बैठने पर भी स्त्रियों का ही चिन्तन होता रहता है। रजोगुण से ही कामासक्ति उत्पन्न
होती है। दुष्ट वासना उत्पन्न होकर मन भी दुष्ट हो जाता है। इससे चित्त में काम के सिवा कोई दूसरी स्फूर्ति
उत्पन्न ही नहीं होती। जन में, वन में, एकान्त में, जागृति में, सुषुप्ती में, स्वप्न में, ध्यान में, मन में अथवा चिन्तन
में स्त्रियों के अतिरिक्त और किसी का स्मरण नहीं होता। सारा ध्यान स्त्री की कामेच्छा की ओर लगा रहता है।
उसके हावभाव, उसके मनोहर विलास, उसका सुन्दर लावण्य, और उसका सुरस रस इसमें ही मन लिप्त रहता
है। रतिसुख, तथा स्त्री की क्रीड़ा का महत्त्व बढ़ाकर उससे काम जिस प्रकार बढ़ जाता है उस पर किसी का बस
नहीं चलता। धन, धान्य, पुत्र आदि का सुख मिले, इहलोक तथा परलोक का सुख प्राप्त हो, ऐसी रजोगुण की
उत्कट इच्छा रहती है।
करोति कामवशः कर्माण्यविजितेन्द्रियः।
दुःखोदर्काणि सम्पश्यन् रजोवेगविमोहितः॥११॥
जब रजोगुण का आवेश उत्पन्न होता है, उस समय कामरूप-ग्रह अद्भुत ढंग से बिफरता है और जो पुरुष
काम से ग्रस्त होता है वह सदा काम का ही दास बन जाता है। जिसके मन में विचार नहीं है वह काम का जर
खरीद गुलाम बनकर रहता है। काम उसे जैसे नचाता है उसी के अनुसार वह नाचता रहता है। काम का दास हो
जाने पर उसका दुःख प्रतिदिन बढ़ता ही जाता है, सकाम कर्म करना ही उसे अनिवार्य हो जाता है और वह
अत्यन्त अहंकारी हो जाता है। रजोगुण के कारण वह मोह में लिप्त रहता है इसलिये वह इन्द्रियों पर विजय न
प्राप्त करने वाला तथा अयोग्य बना रहता है। वह जन्म-मरण के अधीन रह कर तदनुसार सारे कर्म करता है।
रजोगुण की पीड़ा अत्यन्त भयंकर है। उसने सारे लोगों को विषयांध कर दिया है। उद्धव! रज पर लुब्ध होने
वाले लोग अत्यन्त मूर्ख होते हैं, यह प्रसिद्ध ही है। रजोगुण से बद्ध होने पर महामोह का प्रवेश होता है तब भ्रम
की आँधी चलती है और तमोगुण चारों ओर फैलता है। उद्धव! प्राणियों की बुद्धि सचमुच ऐसी होती है इसे
ध्यान में रखो। इसीलिये वे काम का सेवन करते हैं। विषयों से उन्हें विरक्ति नहीं होती। अब शायद तुम सोचोगे
कि तब तो तरने का कोई उपाय ही नहीं रहा और प्राणियों को सद्गति भी मिलने से रही। यह विषयासक्ति
अनिवार्य है। जीव का तो अविद्या और विषय से सम्बन्ध रहता है। उनकी पीड़ा बहुत बड़ी होती है। अविद्या का
सम्बन्ध अनादिसिद्ध है। इसके कारण अनेक प्रकार की कल्पनाएँ उठती हैं। अंतःकरण भी अनादि है और उसकी
पूर्णता भी क्रमानुसार होती रहती है। इससे विषयबुद्धि भी दृढ़ हो जाती है और त्याग·बिलकुल नहीं होता।
अंतःकरण सत्त्व से उत्पन्न होता है यह सत्य है किन्तु यह कार्य माया का है इसे ध्यान में रखो। सुखभोग की
आदत से जहाँ रजोगुण उफन उठेगा तो उसे कौन रोक पायेगा? जो विचारी पुरुष होते हैं वे भी विषय के अधीन
तेरहवाँ अध्याय ३७१
हुए रहते हैं। इसलिये इस लोक में विषय का त्याग नहीं हो पाता। उद्धव ! तुम्हारी शंका यही थी न ? तो उसका
भी उपाय सुनो। जो विचारशील लोग हैं उनके मन में विषय वासना उत्पन्न ही नहीं होती। लेकिन इस पर भी
यदि कभी ऐसा हुआ तो उन्हें अभ्यास करना चाहिये।
रजस्तमोभ्यां यदपि विद्वान् विक्षिप्तधीः पुनः।
अतन्द्रितो मनो युञ्जन् दोषदृष्टिर्न सज्जते ॥ १२ ॥
रज और तम ये गुण यदि बुद्धि पर अपना प्रभाव जमाने में सफल हो जाएँ तो ज्ञाता को आलस छोड़ कर
अपने मन को नियंत्रण में रखना चाहिये। स्त्री का शरीर हड्डियों और मांस का बना विष्ठामूत्र का भण्डार है और
उसके सम्बन्ध में विचार करने पर भी घृणा हो आती है। उसका भोग तो नरक की यातना के समान है। इस
प्रकार स्त्री भोग के दोष बता देने से मन विषयों से तत्काल दूर कर नियमों के नियंत्रण में रखना चाहिये। ऐसा
करने से भी मन नियमों के बन्धन में नहीं बँध पाता। अभ्यास करने वालों को इसमें बड़ी कठिनाई होती है।
अर्थात् साधारण लोग तो इसमें असमर्थ ही होते हैं। तो भाई ! ध्यान से सुनो। तो जिससे मन नियंत्रित हो सके
ऐसा मनोनिग्रह का लक्षण और साधन बताता हूँ।
अप्रमत्तोऽनुयुञ्जीत मनो मय्यर्पयञ्छनैः।
अनिर्विण्णोयथाकालं जितश्वासो जितासनः ॥ १३ ॥
आलस और निद्रा का त्याग कर जो सावधान चित्त से ब्रह्मसाधना करता है, वही सचमुच मेरे चित्स्वरूप
के अभ्यास में लग जाता है। इसमें पहला काम है आसन स्थिर करने का अभ्यास। मूलबंध व्यवस्थित
नियमानुसार करने में आसन स्थिर होता है। आसनजय साध्य होते ही वह सहज ही योगमार्ग पर लग जाता है
और अधिक अभ्यास करने पर प्राण और अपान की स्थिति भी सामान्य होने लगती है। विषय मन के अधीन
रहते हैं, मन वायु के वश में रहता है इसलिये अभ्यास से वायु को ही वश में कर लेने से मन अपने आप स्थिर
हो जाता है। इस प्रकार जो धीरे-धीरे अभ्यास कर समय को सार्थक करता है वह विरक्त भले ही न हो लेकिन
महान सामर्थ्यवान बनकर परमार्थ के प्रति अत्यन्त व्याकुल रहता है। हरिचिंतन में मन को एकाग्र करने से प्राण
और अपान ये दोनों वायु एकरूप हो जाते हैं। यही वायु की परिपूर्ण विजय है। उसे साधने से योगसाधन सहज
ही साध्य हो जाता है। तब प्राणापान की समझोड़ी छः चक्र के परदे फाड़ देती है। तब चित्त विषयों को छोड़
देता है और विषय भी चित्त को छोड़ देते हैं। इस प्रकार इस अभ्यास के मार्ग से वासनायुक्त इच्छा का सम्बन्ध
ही टूट जाता है। इसी मार्ग से मैंने सनकादिकों को आत्मज्ञान की ओर प्रवृत्त किया।
एतावान् योग आदिष्टो मच्छिष्यैः सनकादिभिः।
सर्वतोमन आकृष्यमय्यद्धाऽऽवेश्यते यथा ॥ १४ ॥
देखो। इसी उपदेश से मेरे शिष्य सनकादिक आदि ने अपने अभ्यास के सामर्थ्य से अलौकिक आत्मज्ञान
का सुख प्राप्त किया। ऐसा वह कौन-सा उपदेश है ? वह चित्त और विषय के सम्बन्ध को तोड़ने के बारे में है।
यही बात उन्हें बताकर मैंने उन्हें आत्मज्ञान के अभ्यास की ओर लगाया। मन जहाँ भी कहीं जाये वहाँ परब्रह्म ही
भरा हुआ है यही भावना धारण करने की आदत लग जाने के कारण सनकादिक ब्रह्मस्वरूप हो गये। चित्त का
विषयों से वियोग कराना यही योग सनकादिकों ने साध्य किया। उन्हें इसका उपदेश करने के लिये मैं श्रीकृष्ण
३७२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
ही उपदेशक बना। उद्धव ने यह श्रवण करते ही मन में विचार करना शुरू किया कि मैं तो श्रीकृष्ण को छोड़कर
कभी रहा नहीं, फिर इन्होंने सनकादिकों को उपदेश कब किया ? सनकादिक तो बहुत पहले ही ब्रह्मस्वरूप हो
चुके हैं और कृष्ण तो इस काल के देवकी का बेटा है। उसको यह गुरुत्त्व कैसे प्राप्त हुआ ?
उद्धव उवाच
यदा त्वं सनकादिभ्यो येन रूपेण केशव ।
योगमादिष्टवानेतद्रूपमिच्छामि वेदितुम् ॥ १५ ॥
यही बात मन में लाकर उद्धव ने पूछा, "हे श्रीकृष्ण ! तुमने सनकादिक को कब उपदेश किया ? क्या इस
समय मैं तुम्हारे पास नहीं था ? भगवान ! तुमने इसी रूप में उन्हें उपदेश किया था या किसी अन्य रूप में ? यह
बात जानने की मेरी इच्छा है। वह कौन सा काल था ? समय क्या था और उन्होंने प्रश्न किस प्रकार किया था ?
आप मुझे पूरी तरह सुनाइये।" उद्धव का यह प्रश्न सुनकर श्रीकृष्ण भावविह्वल हो गये और अपनी हंसा की
कथा स्वयं ही सुनाने लगे।
श्रीभगवानुवाच
पुत्रा हिरण्यगर्भस्य मानसाः सनकादयः ।
पप्रच्छुः पितरं सूक्ष्मां योगस्यैकान्तिकीं गतिम् ॥ १६ ॥
महाप्रसिद्ध सनत्कुमार ब्रह्मदेव के मानसपुत्र हैं। उन्होंने सत्यलोक में एक अत्यन्त गहन प्रश्न पूछा था। वह
प्रश्न यह था कि योग की गति अत्यन्त सूक्ष्म है और आत्मस्वरूप की स्थिति समझना अत्यन्त कठिन है। वह
किस प्रकार समझ में आयेगी ? ऐसा विकट प्रश्न उन्होंने अपने पिता से पूछा।
सनकादय ऊचुः
गुणेष्वाविशते चेतो गुणाश्चेतसि च प्रभो ।
कथमन्योन्यसंत्यागो मुमुक्षोरतितितीर्षोः ॥ १७ ॥
सनकादिक ने पूछा, चित्त स्वभाव धर्म के अनुसार सदा विषयों में आसक्त रहता है इसलिये वह हमेशा
विषयों में ही उलझा रहता है। उसी प्रकार विषय भी चित्त में प्रवेश कर वासना के रूप में उससे चिपके रहते हैं।
इसलिये वे वहाँ से निकल नहीं सकते। फल और काल इन दोनों के न रहने पर भी आम मधुर ही होते हैं। उसी
प्रकार विषय जब एक बार चित्त में प्रवेश कर जाते हैं तो वहाँ से कभी नहीं निकल पाते। विवाहिता स्त्री अपने
मैके जाती है लेकिन वह मन से दूर नहीं जाती, उसी प्रकार विषय भी चित्त से चिपक कर बैठा रहता है।
इसलिये चित्त और विषय का परस्पर बिछोह मुमुक्षुओं के लिये कैसे संभव है ? इसका कोई उपाय हो तो स्वामी
सविस्तार बतायें।
श्रीभगवानुवाच
एवं पृष्टो महादेवः स्वयम्भूभूर्तभावनः ।
ध्यायमानः प्रश्नबीजं नाभ्यपद्यत कर्मधीः ॥ १८ ॥
जिसे अग्रपूजा का सम्मान प्राप्त है, समस्त देवताओं में जिसकी महिमा श्रेष्ठ है उस ब्रह्मदेव को श्रेष्ठ
कहने का कारण उसकी महानता ही है। जो स्वयं चराचर सृष्टि का निर्माण करता है, जो वेदों का
तेरहवाँ अध्याय ३७३
निवासस्थान है, उस ब्रह्मदेव को उसके श्रेष्ठपुत्र ने यह अत्यन्त गहन प्रश्न पूछा। लेकिन उस प्रश्न का
यथोचित उत्तर किस प्रकार दिया जाय यह ब्रह्मदेव की समझ में नहीं आया। कर्म के योग से उसकी बुद्धि
मन्द हो गयी थी। ज्ञानोपदेश किस प्रकार किया जाय यह उसकी समझ में नहीं आ रहा था। प्रश्न तो अत्यन्त
गहन था। ब्रह्मदेव मानों पागल से हो गये। तब वे मेरा चिन्तन करने लगे। सत्यलोक में सबके सामने
सनकादिक ने जो प्रश्न किया वह मेरी समझ में नहीं आया यह भी वे नहीं कह पा रहे थे और न उसका
उचित उत्तर ही दे पा रहे थे। इस प्रकार ब्रह्मदेव के सामने बहुत बड़ा संकट उत्पन्न हो गया। उन्होंने मुझ
ज्ञानश्रेष्ठ का चिन्तन किया।
स मामचिन्तयद् देवः प्रश्नपारतितीर्षया।
तस्याहं हंसरूपेण सकाशमगमं तदा॥१९॥
पुत्रों का अज्ञान दूर करने के लिये और उनके प्रश्न का उत्तर जानने के लिये ब्रह्मदेव मेरा स्मरण करने
लगे, तो मेरा हृदय भी व्यथित हो उठा। ब्रह्मदेव मेरा ही बेटा है। उसकी दृष्टि पर कर्म की जड़ता से अज्ञान
का परदा आ गया था उसे तत्काल दूर करने के लिये मैं हंस बना। वर्ण अथवा व्यक्ति को जो स्पर्श भी नहीं
करता वह मैं श्वेत वर्ण हूँ तथा स्वयं प्रकाश हूँ। ब्रह्मदेव के पुत्रों को उपदेश करने के लिये ही मैं स्वयं
राजहंस बना। ब्रह्मदेव सृष्टि निर्माण कार्य में जुटा हुआ था इसलिये कर्म से उसकी बुद्धि जड़ हो गयी और
वह आत्मज्ञान की सिद्धि भूल गया। मैं कर्म का अधिकारी हूँ यह जब कोई कहता है तभी वह देहधारी हो
जाता है। परमार्थ के नगर में वह कभी बाह्य स्वरूप से प्रवेश नहीं करेगा। 'न कर्मणा न प्रजया'-ब्रह्मप्राप्ति
कभी कर्म से नहीं होती और न ही पुत्र के द्वारा होती है, यह वेदोक्ति है। इस प्रकार श्रुति कर्म का निषेध कर
उसका त्याग कराती है। उसी कर्म से ब्रह्मप्राप्ति होगी वह कहने वाले लोग ज्ञानी होते हुए भी अज्ञानी हैं। मैंने
ब्रह्मदेव को उपदेश किया ही था लेकिन वह कर्म से जड़ हो गया। कर्म से वह केवल कर्मठ हो गया है, उसे
मुक्ति कैसे प्राप्त हो ? त्रिभुवन में अदृष्ट का सबसे बड़ा ज्ञाता होते हुए भी ब्रह्मदेव जब कर्म की जड़ता से
विषयी बना तो दूसरों की क्या बात की जाय ? इसमें बड़े-बड़े ज्ञानी भी फँस गये। पुत्रों के प्रश्न का उत्तर देने
में ब्रह्मदेव का ज्ञान भी उज्ज्वल होगा इसलिये मैंने भी सत्यलोक में प्रवेश किया। प्रश्न करने वाले सनकादिक
और वक्ता ब्रह्मदेव लेकिन जब दोनों ही संकट में फँसे तो मैं वहाँ अवतीर्ण हुआ। दूध को खराब न होने देते
हुए हंस जिस प्रकार दूध और पानी अलग-अलग कर देता है उसी प्रकार सार और असार को चुनने वाला मैं
ज्ञान से चतुर राजहंस हूँ। संचित पुण्य के सिवा अथवा दैवी विमान से स्वयं प्रवास किये बिना किसी का
सत्यलोक में प्रवेश सम्भव नहीं है। लेकिन मैं पाप-पुण्य से परे हूँ। मेरे लिये पाप-पुण्य की आवश्यकता नहीं
है। फिर भी मैं पंखों से या पैरों से चलकर कहीं भी, कभी भी जा सकता हूँ। उस सत्यलोक में मैं हंसरूप में
आया। मुझे देखकर सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ।
दृष्टा मां त उपव्रज्य कृत्वा पादाभिवन्दनम्।
ब्रह्माणमग्रतः कृत्वा पप्रच्छुःको भवानिति ॥२०॥
केवल ब्रह्मस्वरूप मेरी श्रेष्ठ मूर्ति है, मुझे हंसरूप में आते देख देवतागण मेरे स्वागत में खड़े हो गये और
मुझे साष्टांग दण्डवत किया। ब्रह्मलोक में वेद जहाँ मूर्तिमंत होते हैं वहाँ पुण्य भी मूर्तिमंत रहता है, सत्यलोक में
सत्य मूर्तिमंत रहता है और तप आदि भी वहाँ मूर्तिमंत रहते हैं। उन सबकी उपस्थिति में 'तुम कौन ?' ऐसा प्रश्न
३७४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
यदि ब्रह्मदेव मुझसे पूछते तो इसमें उनकी अज्ञानता प्रकट होती इसलिये वह मौन ही रहा और ब्रह्मदेव को आगे
कर उन सनकादिकों ने मुझसे पूछा, 'आप कौन हैं? कहाँ से आये हैं?'
इत्यहं मुनिभिः पृष्टस्तत्वजिज्ञासुभिस्तदा ।
यदवोचमहं तेभ्यस्तदुद्धव निबोध मे ॥ २१ ॥
उन्होंने ब्रह्मदेव से जो प्रश्न किया था उसका अर्थ मेरी समझ में आ सके इसलिये उन्होंने पूछा, "आप कौन
हैं?" वे अत्यन्त चतुर और जिज्ञासु थे। तिस पर स्थूलदेह, लिंगदेह और कारणदेह इसके अतिरिक्त जो भी वस्तु
है वह चैतन्यस्वरूप है यह बतलाने के लिये मैंने उस प्रश्न का खण्डन तीन श्लोकों में किया। उनके प्रश्नों का
खण्डन कर मैंने नित्यानित्य विवेक का ज्ञान उन्हें प्रदान किया। उसी निरूपण को तुम सुनो। उद्धव! मैं तुम्हें
सनकादिकों के ही समान मानता हूँ। इसलिये उन्हें जो ज्ञान दिया वह तुम्हें भी दूँगा सुनो। वह ज्ञान अत्यन्त श्रेष्ठ
होते हुए अत्यन्त प्राचीन है। इसलिये ध्यानपूर्वक सुनो। यह सुनकर उद्धव ने मन के कर्णों का विस्तार कर दिया।
स्थूलदेह और सूक्ष्मदेह को पीछे छोड़ उद्धव सर्वांग से कर्णरूप हो गया। इसलिये श्रीकृष्ण ने स्वयं ही उसे गुप्त
ज्ञान दिया। जैसे मन्दिर में रत्नों की खान मिले, उसमें पारस मिले और उस पारस से अमृत की धारा फूट पड़े,
उसी प्रकार उद्धव का भाग्योदय हुआ। श्रीमद्भागवत की कथा सुनाने के लिये श्रीकृष्ण जैसा वक्ता मिला और
हंसगीत की कथा श्रीकृष्ण बड़े चाव से सुनाने लगा। अहो! सनकादिकों का हिस्सा श्रीकृष्ण स्वयं ही उद्धव के
हाथ में दे रहे थे, ऐसे भाग्य का किन शब्दों में वर्णन किया जाय? वक्ता स्वयं ही ब्रह्मस्वरूप हो, वह भी ब्रह्मकथा
का ही उपदेश करेगा। तब सहज ही परब्रह्म गुरु बन गये। उद्धव कैसा भाग्यवान था? इसलिये आत्मभाग्य से
भाग्यवान तथा संसार में प्रसिद्ध एक उद्धव ही है। जिसके लिये स्वयं ज्ञानसमर्थ जगन्नाथ प्रसन्न हुआ।
हंस उवाच
वस्तुतो यद्यनानात्वमात्मनः प्रश्न ईदृशः।
कथं घटेत वो विप्रा वक्तुर्वा मे क आश्रयः ॥ २२॥
परमात्मा सर्वत्र एक ही है। उसमें 'मैं' और 'तुम' का सन्देह नहीं है। 'तुम कौन' यह जो प्रश्न है वह
केवल शब्दों का अपव्यय है। आपने जो प्रश्न किया उसका उत्तर देने के लिये वक्ता के पास शब्द ही नहीं है।
वास्तव में 'मैं' और 'तुम' है ही नहीं इसलिये आपका प्रश्न मिथ्या है। नाम, रूप, वर्ण, व्यक्ति यह सब कुछ भी
नहीं है। 'अपना' और 'पराया' जैसी कोई जाति नहीं है। इसलिये हे विप्र ! आपके भाषण में सत्यत्त्व हो ही नहीं
सकता। चारों पुरुषार्थ पूर्ण करने वालों में ब्राह्मण विख्यात है। लेकिन विप्र हो! आपके लिये ज्ञान का प्रश्न ही
उपस्थित नहीं होता। अगर अनेकत्व हो तभी ऐसा प्रश्न सम्भव होगा। आत्मा के लिये ऐसा प्रश्न नहीं किया जा
सकता। आत्मा के लिये ऐसा प्रश्न उपस्थित ही नहीं होता। देह के लिये वह लागू ही नहीं होता।
पञ्चात्मकेषु भूतेषु समानेषु च वस्तुतः।
को भवानिति वः प्रश्नो वाचारम्भोह्यनर्थकः ॥ २३ ॥
क्योंकि ब्रह्मदेव से लेकर मशक तक देह के रूप में जो कुछ भी है वह पंचभूतात्मक है। इसलिये 'तुम
कौन' कहने में कोई अलग बात नहीं दिखायी देती। कड़ा, कुंडल, मुकुट, माला, अँगुठियाँ, कमरपट्टा अथवा
अन्य अलंकार देखने पर उसमें सुवर्ण के अतिरिक्त अन्य कुछ दिखायी नहीं देता। अथवा गाजर, मटका, सुराही,