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दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

७५ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
ग्रीव की कथा में दोनों ही तथ्य विद्यमान हैं।
एक बार कपोतराज सपरिवार गगन से उड़ता हुआ
देशान्तर जा रहा था। वन के मार्ग में व्याध के द्वारा तण्डुल
विकीर्ण करके जाल बिछाया गया था। जिह्वा की लोलुपता
और भूख की व्याकुलता से पारिवारिक कपोतराज के बार-बार
मना करने पर भी उन चावलों के दानों पर टूट पड़े और जाल
में बंध कर पश्चाताप करते हुए एक दूसरे को दोषारोपित करने
लगे। पुन' कपोतराज ने समझाया, अब दूसरी भूल करके अपने
प्राणों को सङ्कट में मत डालो। सब एक साथ जोर लगा कर
उड़ चलो, फिर क्या था वृद्ध के अनुशासन और उनकी प्रेरणा
से जाल सहित उड़ चले। कपोतराज उन सबको अपने मित्र
हिरण्यक मूषकराज के पास ले गया। जहाँ उसके जाल काटने
पर वे सब मुक्त हुए।
इस आख्यायिका में बिना खेतों के निर्जन वन में चावलों
का होना भय की आशंका का द्योतक है, कपोतराज-गुरु के
उपदेश को अनसुना करने का फल सब का बंध जाना है।
इन्द्रिय-दासता और अशास्त्रीय व्यवहार का दुष्परिणाम मृत्यु
को निमंत्रण है। गुरु की करुणा से तथा स्वयं संगठन से ही
पुनर्जीवन प्राप्ति सम्भव है। कोमल कमल बाल के विसन्तु तथा
जीर्ण शीर्ण घास को बँट कर रस्सी बना लेने पर मदोन्मत्त हाथी
को बांध लिया जाता है। 'संघ में शक्ति' का इससे बढ़कर दूसरा
दृष्टान्त क्या हो सकता है ? आप लोग तो सब परिचित ही हैं
कि भारतीयों ने संघ शक्ति से ही स्वतन्त्रता प्राप्त की थी।
फिर भी न जाने क्यों ? हम अपनी इन्द्रियों को शक्तियों को
यों ही व्यर्थ नष्ट करते रहते हैं, जिसे सञ्चित करके महान् शक्ति
अर्जित की जा सकती है। प्राचीन महर्षियों में यही विशेषता थी।
यहीं बैठे स्वर्ग की बातें जान लेते थे। महर्षि वशिष्ठ जी ने दिलीप
से कहा-"स्वर्ग की कामधेनु का तुम से अपमान हो गया है, जिसके

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ७६
कारण पुत्र नहीं हुआ है; अतः नन्दिनी की सेवा करो ।" यह
जादू मन की सङ्कल्प शक्ति का है । मन में बहुत शक्ति है किन्तु
व्यर्थ-चिन्तन से नष्ट होतो रहती है ।
ऐसे ही प्रत्येक इन्द्रियों में शक्ति है, उसे बचाओ, सुरक्षित
रक्खो, समय पर वही महाशक्ति का काम दे सकती है और
अहंकार की सारी कुप्रवृत्तियाँ नष्ट कर सकती हैं । 'समस्त सेना
ध्वंस कर डाली गई ।' महाशक्ति के निश्वास से निकले हुए गण
ही तो देवी जी की सेना बन गये । उन्होंने ही महिषासुर की
सेना का संहार किया-
निश्वासान् मुमुचे यांश्च युध्यमाना रणेऽम्बिका ।
त एव सद्य सम्भूता गणाः शत सहस्रशः ॥२/५२-५३
यही गण मन की संकल्प शक्ति से प्रकट होते हैं । दृढ़
संकल्प में बहुत शक्ति होती है । शुक्ल यजुर्वेद के प्रथम अध्याय
में 'शिव-संकल्पमस्तु' के छः मंत्र हैं । उन्हें ध्यान से पढ़ने पर
मन का रहस्य व्यक्त हो जाता है । जब सारी सेना नष्ट हो
जाती है; तब राजा भी अकेला लड़ने में असमर्थ हो जाता है ।
हमारे आसुरी भावों में जो कुप्रवृत्तियाँ उपद्रव करती हैं, उन्हें
ईश्वराराधन, दृढ़ वैराग्य, भक्तिभाव की पराकाष्ठा और दृढ़
संकल्प के द्वारा नष्ट किया जा सकता है । यही द्वितीय अध्याय
का सारांश है ।
'शुभं - भूयात्'
हे मात भवानी जग जननी, संकट हरणी मन भरने दो ।
हम सब माँ तेरे बालक हैं, हमें चरण तले निज रहने दो ॥
देव पड़े जब विपदा में, तब मिलकर शरण तेरी आये ।
चढ़ सिंह पीठ रण में गर्जी, फिर रूप वही दरसाने दो ॥

उत्तर चरित्र: शुम्भ-निशुम्भ वध एवं महासरस्वती चरित्र (अध्याय ५-१३)

७७ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
तृतीयोऽध्यायः
ध्यानम्
ॐ उद्यद्भानुसहस्र कान्तिमरुण क्षौमां शिरोमालिकाम्,
रक्तालिप्तपयोधरां जपवटीं विद्यामभीतिं वरम् ।
हस्ताब्जैर्दधतीं त्रिनेत्रविलसद्वक्त्रारविन्द श्रियं,
देवीं बद्धहिमांशु रत्नमुकुटां वन्देऽरविन्द स्थिताम् ।
उदयकालीन सहस्रों सूर्य की कान्ति के समान श्री अङ्गों
से कान्तिमान, रक्तिम वर्ण, रेशमी साड़ी से सुशोभित, गले में
मुण्डों की माला से अलंकृत, लाल रंग के चन्दन से चर्चितस्तन
शोभिता, कमल रूपी करों में जप माला, विद्या, अभय तथा वर
मुद्रा धारण किए हुए तीन नेत्रों से कमल मुख की शोभा वर्द्धिता,
मस्तक पर चन्द्रमा सहित मणि माणिक्यादि रत्न-जटित-मुकुट
धारिता, कमलासन विराजिता माँ जगम्दबे को मैं प्रणाम करता
हूँ ।
महात्मा मेधा ऋषि ने पराम्बा को प्रणाम करके कहा—
हे राजन् ! महिषासुर की सेना के समाप्त होने के पश्चात् सेना-
नायक क्रमशः माँ से युद्ध करने के लिए आगे बढ़े । ‘दम्भाहंकार
संयुक्ता’ की उक्ति के अनुसार अपने को बहुत बड़ा वीर समझ कर
लड़ने लगे । माँ ने चिक्षुर का संहार किया । चामर को सिंह ने
मार दिया । दुर्मुख और दुर्धर्ष भी दोनों माँ की तीक्ष्ण कृपाण से
मारे गये । यह देखते ही अपने को असहाय सा समझ कर जोर-
जोर से गर्जता हुआ महिषासुर माँ के सामने अस्त्र-शस्त्र बरसाने
लगा ।
तब माँ ने कहा—
गर्ज गर्ज क्षणं मूढ़ः, मधु यावत्पिबाम्यहम् ।
मया त्वयि हतेऽत्रैव गर्जिष्यन्त्याशु देवताः ॥ ३/३८
अरे मूर्ख ! जब तक मैं मधुपान करती हूँ, तब तक क्षण भर

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ७८
के लिए गर्ज ले। यहीं मेरे हाथ से तेरो मृत्यु हो जाने पर शीघ्र
ही देवता भी गर्जना करेंगे।
माँ ने मधु पान कर उससे युद्ध करना प्रारंभ कर दिया।
युद्ध में वह दैत्य कभो भैंसा, कभी सिंह, कभी हाथी का रूप
धारण करके लड़ रहा था। माँ ने भयंकर युद्ध किया और उसे
पैर से दबाया, जिससे रूपान्तर न कर सके, किन्तु पैरों से आधे
शरीर से निकलकर रूप बदल कर भागने लगा। तभी माँ ने
अपनी कठिन कृपाण से उसका शिरश्छेदन कर दिया।
पादेनाक्रम्य कण्ठे च शूलेनैनमताडयत्
ततः सोऽपि पदाऽऽक्रान्तस्तया निज मुखात्ततः ।
अर्ध निष्क्रान्त एवासीद् देव्या वीर्येण संवृत ।।
अर्ध निष्क्रान्त एवासौ युध्यमानो महासुरः ।
तया महासिना देव्या शिरश्छित्त्वा निपातितः ॥
ततो हा हा कृतं सर्वं दैत्यसैन्यं ननाश तत् ॥ ३/४०-४३
अब इस पर विचार करते हैं—महिषासुर - अस्मिता
देहाभिमान है; इसकी सेना कुप्रवृत्तियाँ हैं, सेनानायक रूप विद्या,
धन, अधिकार है। व्यक्ति इन्हीं चार का अभिमान करता है।
इन्हीं में दुर्धर्ष—दूसरों को पीड़ित करना, दुर्मुख—दूसरों को अप -
वचन कहना है। जब परा-विद्या की कृपा से साधक में यह
निश्चय हो जाता है कि; जीवन पानी के बुलबुले के समान क्षण
भंगुर है—
मत कर तू अभिमान, जगत में दो दिन का मेहमान
हिरणाकश्यपु सम वरदानी, रहे न रावण से अभिमानी।
अर्थात् जिस रूप, विद्या, धन, अधिकार को लेकर अभिमान
किया जाता है ये तो मिथ्या स्वप्नवत है। यह निश्चय ही बाध
कहलाता है और यही वध शब्द का भाव है—वध एव बाधा।
अब जब मिले हुए पदार्थ मिथ्या ही हैं, आने जाने वाले ही हैं,
घटने-मिटने छूटने वाले हैं, तब भला उनके मिलने पर इतराने

/loop at the TOP! That is ALSO a ९!
Wait, so in line 9 it is: भाग० ७/९ २३-२३ (or २३-२४? Wait, could it be 23-23? Yes, 23-23).
And in line 23 it is: ऋग्वेद मं० १ सूक्त ९/१! (A typo in the book for 90/6 or similar).

Wait, let's double check line 23:
Is it सूक्त ९/१?
Yes, ९/१!

Let's double check every single line carefully:

Line 1:
७६ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ

Line 2:
का क्या प्रश्न है ? भक्त प्रवर प्रह्लाद ने नृसिंह भगवान की

Line 3:
स्तुति में अपने पिता जी के अभिमान को दर्शाया-

Line 4:
दृष्टामया दिवि विभोऽखिल धिष्ण्यवाना पमायुः श्रियो
Wait, is there a space between धिष्ण्यवाना and पमायुः?
Yes, "धिष्ण्यवाना पमायुः".

Line 5:
विभव इच्छति याञ्जनोऽयम् । येऽस्मत्पितु कुपितहास विजृम्भित
Wait, "याञ्जनोऽ

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ८०
तो धन चले जाने से त्यागी होने का अभिमान भी उससे कम
नहीं होता । भगवान् ने तो 'अहंकार विमूढात्मा' से इसी को
स्पष्ट किया है । यहाँ तक कि त्यागी का अभिमान भी जब घटने
लगता है तब निरभिमानी का वेश बनाकर अभिमान जिन्दा
रहना चाहता है, उसको दबाने का भाव भी बहुत अच्छा है ।
क्योंकि जब-जब इसको दम्भ की सहायता से दबाया जाता है,
तब-तब जितना अंश शेष रहता है, उतना ही वेश बदल कर
दूसरों को दबाना चाहता है । इसके बाध या बध का उपाय
कटिन कृपाण ही है । इसको गीता में-
‘असङ्ग शस्त्रेण दृढेन छित्त्वा’ से इसके बध का स्पष्ट साधन
कहा गया है । श्री मद्भागवत में इसके बहुत प्रयोग हैं-
एवं गुरुपासनयैक भक्त्या, विद्या कुठारेण शितेन धीर ।
विवृश्चजीवाशय अप्रमत्त, सम्पद्य चात्मानमथत्यजास्त्रम् ॥
भाग० ११/१२/२४
पराभक्ति (परा विद्या) द्वारा ज्ञान-कृपाण को गुरूपासना
की शाण से तीक्ष्ण धार करके जीव-भाव (अहंकार) को काटना
है । पराम्बा की चरण-शरण लिए बिना यह अहंकार नहीं मारा
जा सकता । इसके द्वारा ही जीव ईश्वर अंश होते हुये भी दुःखी
हो रहा है ।
इस दार्शनिकता को सहज समझने के लिए एक आख्यान
प्रस्तुत है । एक राजा अपने दरबार में अपनी रानी तथा मंत्रियों
सहित राज सिंहासन पर आरूढ़ था । राजा ने कहा-देखो
महारानी ! मेरे राज्य में सभी लोग मेरी ही आज्ञा से कार्य
करते हैं । एक भी व्यक्ति मेरी आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर
सकता । मेरे राज्य में देवता भी मेरी आज्ञा का पालन कर रहे
हैं । रानी ने व्यंगात्मक मुसकान बिबेर दी । राजा ने निश्चय
कराने के लिए मंत्री को आदेश दिया-जो कोई व्यक्ति जा रहा
हो, उसे मेरे पास लाओ और पूछो-मेरी आज्ञा में हैं या नहीं,

८१ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
रानी के संदेह को दूर करना है । आदेश का पालन करते हुए
मंत्री ने पाँच अपरिचित व्यक्तियों को लाकर राजा के समक्ष
उपस्थित किया । राजा ने उनसे वही प्रश्न पूछा-तुम लोग मेरी
आज्ञा से ही सभी कार्य व्यवहार करते हों या नहीं; निस्संकोच
कहिए । उन पाँचों में से एक ने भी राजाज्ञा के साथ सहमति
नहीं दी-वरन् किसी ने अपने पति को, किसी ने गुरुदेव को,
किसी ने अपने मालिक की आज्ञा में चलने को कहा । तब राजा
ने उन्हें बाहर निकलवा कर मंत्री से कहा-तुम और अधिक ऐसे
लोगों को लाओ, जो मेरी आज्ञा में हों । सुनकर मंत्री अपनी दस
पत्नियों को ले आया । पूछने पर उन्होंने उत्तर दिया-‘हमें राजा
की आज्ञा से क्या प्रयोजन ! अपने पति की आज्ञा से चलना है ।
तब मंत्री से पूछा-मंत्री ने भी मना कर दिया । रानी से पूछने
पर उसने कहा-‘महाराज ! मैं तो तुम्हारे कारण ही अशान्त
रहती हूँ । तुम्हारे बिना मेरा जीवन शान्त सुखमय रहता है,
क्योंकि तुम अपने आपको बिना मालिक के ही मालिक समझते
हो । सभी जनता को त्रास देते हो ।
आख्यान का राजा अहंकार है, रानी बुद्धि है, मन मंत्री
है, दस इन्द्रियाँ दस पत्नियाँ और पाँच व्यक्ति पञ्च महाभूत हैं ।
यह तो सच ही है कि यह अहंकार बहुत ही प्रबल शत्रु है-
“अहङ्कार विमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ।”
महामूर्ख अहंकार स्वयं अपने को कर्ता मान बैठता है,
क्योंकि बुद्धि मूर्च्छित हो जाती है । इसी दुष्ट के मरने पर परा-
भक्ति प्राप्त होती है । अहंकार के सम्बन्ध में महामुनि विद्यारण्य
जी ने अपनी अमर कृति ‘पञ्चदशी’ में इस प्रकार कहा है—
अहङ्कारः प्रभु सभ्याः विषया नर्तकी मतिः ।
ताल धारिण्यक्षाणि साक्षी सर्वावभासकः ॥
अर्थात् राजा अहंकार है, विषय सभासद, बुद्धि नर्तकी है,
इन्द्रियाँ वाद्य-वादिनी हैं और साक्षी आत्मा, प्रकाश देने वाला

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ८२
दीपक है। इसी प्रकार हमारे शरीर में अन्तःकरण और इन्द्रियों
की सभा लगी है। आत्मा साक्षी सबको प्रकाश दे रहा है।
योग योगेश्वर कृष्ण ने अहंकार की वीभत्सता एवं उससे
मुक्ति का कितना सुन्दर सहज उपाय बताया हैं, उन्हीं के शब्दों
में देखिए और आचरण कीजिए-
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् ।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्म भूयाय कल्पते ॥
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति ।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्‌भक्तिं लभते पराम् ॥
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्वतः।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ।
गीता १८/५३-५५
अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रहादि दोषों के
नाश होने पर पराभक्ति प्राप्त होती है, जिसमें कुछ चाह नहीं,
कोई अन्य राह है नहीं। सभी प्राणियों के प्रति भगवद् भाव
जागृत हो जाता है। तब इस भक्ति के द्वारा ही दिव्य ब्रह्मात्मैक्य
बोध होता है।
दुर्गा-सप्तशती में मध्यम चरित्र जवानी का है। जवानी
में ही अभिमान अपने पूर्ण यौवन पर होता है। इसके मद में हम
अपने भगवान् को भी अन्यायी तक कहने में नहीं चूकते, जबकि
भगवान् अपनी प्रिय सन्तान पर सदैव करुणा की वर्षा करते
रहते हैं। भगवान् कहते हैं 'सब पर मोरि बराबरी दाया', केवल
दया ही बराबर नहीं है, अपितु समस्त प्राणियों में मनुज अधिक
प्रिय है, उनके कथन पर दृष्टिपात कीजिए-
सब मम प्रिय, सब मम उपजाये,
सबसे अधिक मनुज मोहि भाये ।
और इनका कृतज्ञ होना चाहिये । कुशल सूत्रधार की तरह

८३ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
भगवान् अपने सभी पात्रों को उनकी योग्यतानुसार रूप, धन,
विद्या, अधिकार आदि प्रदान करते हैं फिर इनका अभिमान ही
क्या ? क्योंकि इनका हमारे साथ सम्बन्ध भी शाश्वत नहीं
है । यौवन के साथ-साथ रूप ढल जायेगा, शरीर में झुर्रियाँ
पड़ जायेगी, कटि झुक जायेगी, पैर थक जायेंगे, कल का सुन्दर
आज कुरूप हो जायेगा । सिद्धार्थ को तो ऐसे वृद्ध को देखकर
ही संसार से वैराग्य हो गया था । यहाँ सब कुछ मिलता है,
परन्तु क्या किसी दुकान पर बिना बुढ़ापे की जवानी मिलती है,
बिना रंज के सुख मिलेगा या बिना मरण के जीवन मिल
सकता है ? है कोई ऐसी दुकान, जहाँ सदा मुस्कान ही मिले
थकान न हो । विचारक निश्चित ही जानते हैं कि ये सब किसी
बाजार में कहीं भी नहीं मिल सकते । प्यारे ! अभिमान तो
दैवी गुणों का ह्रास करके आसुरी-भावों को भर देता है । कपाट
बन्द करने से एकान्त नहीं होता, ओठ बन्द कर लेने से मौन
नहीं होता, क्योंकि तब मनोराज्य और भी अधिक प्रबल होने
लगता है भीड़ में होने पर भी मानव एकान्त में हो सकता है ।
थोड़ा विचार कीजिए । आप सब लोग जो यहाँ कथा
सुन रहे हैं वे सब लोग एकान्त में ही हैं क्योंकि सब की वृत्ति
केवल कथा-श्रवण में ही लगी है । एकान्तवास और मौन का
अभिमान व्यर्थ है । रूप; धन, विद्या, अधिकार ये सब आपको
भगवान् से मिले हैं । इनका सदुपयोग कीजिए तो जीवन में
सफलता मिलेगी और यदि अभिमान करके दुरुपयोग किया तो
विफलता और कष्ट ही मिलेगा । मानस में धनुष-भंग के प्रकरण
में जो दोहा हैं कि अभिमानी राजाओं ने धनुष तोड़ना चाहा,
तो टूटा तो नहीं वरन् और भारी होता गया । इसका भाव यह
है कि जब हम धर्मानुष्ठान द्वारा अभिमान को मिटाना चाहते
हैं तो धर्मानुष्ठान करने का एक और अभिमान बढ़ जाता हैं ।
धन, परिवार; उपलब्ध सुविधायें एवं पदार्थादि दुख नहीं

[header] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ८४
देते, दुःख देता है उनका अभिमान । श्रीमद्भागवत के अन्तर्गत
शमीक ऋषि के पुत्र ने जब राजा को शाप दिया, तो ऋषि को
दुःख हुआ कि मैंने इस अपरिपक्व बुद्धि वाले को इतना सामर्थ्य
देकर ठीक नहीं किया; अन्यथा अहंता से अधिक क्षमता वाला
व्यक्ति उसका दुरुपयोग कर बैठेगा, जो समाज के लिये घातक
होता है ।
दान देने वाले को यह भी देखना चाहिए कि दान लेने
वाले में मेरे द्वारा दिये गये दान को पचाने की शक्ति भी है या
नहीं; यह याचक, रोगी, शिष्य सभी पर समान रूप से चरितार्थ
है । इन्द्र जब उसका कवच दान लेकर चलने लगा तो उसके
पाँव जमीन से उठे नहीं; तो आकाश वाणी हुई—इतना बड़ा
दान लिए जा रहे हो उसके बदले कुछ दिया क्यों नहीं ? तब
इन्द्रदेव ने एक शक्ति दी, जिसका प्रयोग घटोत्कच्छ पर किया
गया था ।
महाभारत के युद्ध के प्रारम्भ में दोनों सेनायें आमने
सामने खड़ी हैं और भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को गीतोपदेश दे
रहे थे; तब दुर्योधन ने भीष्म पितामह से कहा "देखिए, वह
चरवाहा कृष्ण अर्जुन के कान भर रहा है, शीघ्र आक्रमण कर
दीजिए । पितामह ने कहा-"भगवान् कान नहीं भर रहे हैं,
वरन् अर्जुन को दिव्य-संदेश दे रहे हैं; जिसका एक शब्द भी
जीवन में उतर जाये तो जीवन धन्य हो जाये परन्तु इस दिव्य-
सन्देश के योग्य-पात्र एकमात्र अर्जुन ही है । जब तक श्री कृष्ण
की इच्छा नहीं होती, तब तक मेरे चाहने पर भी युद्ध प्रारम्भ
नहीं हो सकता । अरे ! यह युद्ध तो श्री कृष्ण का एक खेल तमाशा
है । यदि उस दिव्य संदेश को सुन सको तो सुनो, अन्यथा चुपचाप
खड़े रहो ।
मूढ़ भाव (तमोगुण) में मानव सोता है, रजोगुण से कर्म
प्रवृत्त होता है सतोगुण में भगवान् की ओर उन्मुख होता है तथा

८५ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
निरुद्ध अवस्था में शान्त हो जाता है । पहले सम्पूर्ण इन्द्रियों में
बिखरी हुई शक्तियों को एकत्रित करो, तब ज्ञान की बातें समझ
में आयेंगी । संकल्प में बहुत बड़ी शक्ति होती है किन्तु जब तक
वह प्रकट नहीं होती, तब तक उसका लाभ नहीं मिल पाता है ।
अधिक उहात्मक कल्पनाओं में विचरण करने वालों का मन
बिखर जाता है । कुछ देर तक मन को शान्त करके देखो, तो पता
चलेगा, उसमें कितनी अपार शक्ति है ? जब हम इन्द्रियों से
संयम से कार्य लेते हैं, तब उनकी शक्ति बढ़ती है । शान्त मनः
स्थिति को ही स्थित प्रज्ञ कहते हैं । तभी सच्चे अर्थों में माँ की
कृपा से ही अभिमान के महिषासुर का वध होता है । कुप्रवृत्तियों
की दैत्य सेना हा हा कार करती हुई पलायन करती है ।
महर्षियों सहित इन्द्रियों के देवता माँ भगवतीकी स्तुति करने
लगते हैं—
माँ की स्तुति
दरबार तुम्हारा देख लिया, माँ प्यार तुम्हारा देखेंगे ।
अपना बनाकर तुमको देख लिया, आँखों में बसाकर देखेंगे ॥
तेरे प्यार में लाखों भक्त लुटे, लुटकर ही उन्हें कुछ पाना है।
तेरे प्यार में जो मिट जाते हैं, वह हम भी नजारा देखेंगे ॥
तेरे प्यार में क्या-क्या जादू है, अब तक तो कोई ना जान सका ।
जो जान गया वह मान गया, माँ हम भी मनाकर देखेंगे ॥
चरणों में तुम्हारे आ बैठा, हाथों का सहारा दे देना ।
शरणागत को वरदान मिले, माँ हार बना कर देखेंगे ॥

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ८६
चतुर्थोऽध्यायः
ॐ कालाभ्राभां कटाक्षैररि कुल भयदां, मौलिबद्धेन्दुरेखाम्,
शंखं चक्रं कृपाणं त्रिशिखमपि करैरुद्वहन्तीं त्रिनेत्राम् ।
सिंह स्कन्धाधिरूढां त्रिभुवनमखिलं तेजसा पूरयन्तीम्,
ध्यायेद्दुर्गा जयाख्यां त्रिदश परिवृतां सेवितां सिद्धिकामैः ॥
इच्छा-पूर्ति-हेतु सेवा में संलग्न पुरुषों तथा देवताओं से
से घिरी हुई (जया नाम वाली) दुर्गा को नमस्कार है। काले
मेघ की कान्ति के समान श्यामाङ्गा, कटाक्षों से शत्रु-समूह के
लिए भय दायिनी, ललाट पर चन्द्र-धारिणी, हाथों में शङ्ख, चक्र,
कृपाण और त्रिशूल धारिणी, त्रिनेत्रा, सिंह स्कन्धारूढ़ा, अपने तेज
से तीनों लोकों को व्याप्त करने वाली माँ दुर्गे का ध्यान करना
चाहिए ।
इस अध्याय में स्तुति की गई है—'स्तवनं स्तुतिः' कर्ता में
प्रत्यय का अर्थ है—अपनी भाषा में अपने भावों को अपने इष्ट-
देव के सामने बड़े प्रेम से निवेदन करना । स्तूयतेऽनेनेति स्तोत्रम्,
जो दूसरों की कृति पढ़े वह स्तोत्र है और जो अपने प्रियतम के
प्रति कृतज्ञता अर्पित करते हुए कुछ मांगना हो, तो वह प्रार्थना
कहलाती है । ये सभी भावों की गरिमा से परिपूर्ण होनी चाहिए ।
हृदय का स्नेह-प्रेम ही अहङ्कार को गला देता है । जैसे लाख -
(चपड़ा) कठोर होती है, किन्तु अग्नि से सम्पर्कित होते ही पिघल
जाती है, तब मुहर लगाई जाती है । तत्पश्चात् कपड़ा भले ही
फट जाय, किन्तु मुहर नहीं मिटती है । वस्तुतः महत्त्व भी मुहर
का है, वही प्रामाण्य आधार है । इसी प्रकार पिघले हृदय से
अपने इष्टदेव के सामने उसके नाम रूप गुणों की मुहर लगानी
चाहिए । यही स्तुति है—प्रियतम मिलन की तीव्र उत्कण्ठा,
बेचैनी ही जीवन में रस लाती है—
मिलता है सच्चा सुख केवल,
जगदम्बे तुम्हारे चरणों में ।

८७ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
चाहें मुझे अग्नि में जलना हो,
चाहे काँटों में मुझे चलना हो ।
चाहे छोड़ के देश निकलना हो,
रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में ।
चाहे संकट ने मुझे घेरा हो,
चाहे चारों ओर अंधेरा हो ।
पर मन ना मेरा डगमग हो,
रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में ।
ओठों पर तुम्हारा नाम रहे,
तेरी याद सुबह और शाम रहे ।
तेरी याद में आठों याम रहे,
रहे ध्यान तुम्हारे चरणों में ।
जब समस्त विकारों (निशाचरों से हीन) से रहित पवित्र
हृदय दैवी गुणों से भर जाता है तभी स्तुति होती है । महिषासुर
आदि दैत्यों के मारे जाने पर देवों द्वारा स्तुति की जाने का यही
अर्थ है । स्तुति के भाव ये हैं-‘देव्या ययेति’ सभी देवों की शक्ति
मिलकर एक महाशक्ति स्वरूपा-ऋषि-महात्माओं द्वारा वन्दिता
जगदम्बा को हम बड़े प्रेम भाव से नमस्कार करते हैं । नमस्कार
का अर्थ समर्पित होता है; आप हम लोगों का कल्याण करें ।
‘यस्या प्रभावमतुलं’ वाणी से परे परम तत्व का प्रतिपादन करने
में शेष जी तथा ब्रह्मादि देवता भी असमर्थ हैं अर्थात् ब्रह्मा बुद्धि
के देवता हैं और परम तत्व बुद्धि से परे है । भगवान् शिव
अहङ्कार के देवता हैं और परम तत्त्व अन्तःकरण का प्रकाशक है
तो प्रकाश्य सभी इन्द्रियाँ तथा उन पर बैठे हुए देवता हैं; वे
सभी प्रकाशक का वर्णन नहीं कर सकते –
चक्षुषः चक्षुः श्रोत्रस्य श्रोत्रम्’ वाला तत्व यहाँ प्रतिपाद्य
है ।
ये आँखें तुम को क्या देखें, सब आँखें तुमसे रोशन हैं ।

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ८८

विषय करण सुर जीव समेता । सकल एक ते एक सचेता ।
(मानस)
इसी परम तत्व के लिए यहाँ संकेत है ।
महिषासुर के मरने पर देवों ने माँ जगदम्बे की स्तुति की
है, क्योंकि महिष-भैंसा और गधा दोनों किसी दूसरे की नहीं
सुनना चाहते हैं, अपने में चोट लगने की चिन्ता नहीं, टूट जाये
पर झुकेंगे नहीं । अतः इनके नष्ट होने पर ही दैवी गुण विकसित
होते हैं तभी स्तुति होती है कि जो ऐसे असुर हैं उनके लिए
आप दरिद्रता रूप से अनुभव की जाती है और जो सत्पुरुष
श्रद्धालु हैं; उन्हें आप लक्ष्मी रूप में, बुद्धि रूप तथा लज्जा रूप
से अनुभव में आती है---भाव यह है कि शक्ति तो एक ही है;
किन्तु अपनी सद्भावना के अनुसार दर्शन होते हैं-
जाकी रही भावना जैसी । प्रभु मूरत देखी तिन तैसी ॥
(मानस)
सज्जनों को कुकर्म करने से लज्जा रूप होकर तुम्हीं
बचाती हो और सत्कर्म करने के लिए सद्बुद्धि बनकर प्रेरित
करती हो ॥ ५ ॥
इसी से आप अवर्णनीय हैं, वाणी, मन, से अतीत अगोचर
हैं । आप ही जगत की कारण हैं, क्योंकि ब्रह्म तो उपादान
कारण हो ही नहीं सकता । अतः माया रूप से तुम ही मूल कारण
हो । यद्यपि त्रिगुणात्मिका रूप हो, तथापि गुणों के दोष से रहित
हो, क्योंकि गुणों की साक्षी होने से सम्बन्ध नहीं है । सभी देवों
की आप ही आश्रय हैं । आप आदि भूत अव्याकृता परा प्रकृति
है ॥ ७ ॥ देवताओं की तृप्ति रूप स्वाहा तथा पितरों की तृप्ति
रूप से स्वधा आप ही हैं ॥ ८ ॥
मुक्ति का साधन खोजने वाले, निर्दोष, पवित्र हृदय वाले
जितेन्द्रिय, तत्वग्राही मुमुक्षु महात्माओं के लिए आप परा विद्या
हैं ॥ ६ ॥ आप शब्द स्वरूपा हैं, पवित्र ऋक्-यजु एव उद्गीथ

८६ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
वाले सामवेद की आधार आप ही हैं। यहाँ स्तुति में प्रतिपाद्य
तत्व की ओर संकेत है—“वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः” सभी वेदों का
प्रतिपाद्य तत्व 'अहं' आत्मा ही है। आप ही त्रयी-तीनों वेद
स्वरूपा एवं सर्व ऐश्वर्य सम्पन्ना हो तथा जगत पालन हेतु वार्ता-
(खेती बाड़ी) आप ही हैं, त्रिताप (दैहिक, दैविक, भौतिक)
विनाशिनी भी आप ही हैं ॥ १० ॥ सर्व-शास्त्र मर्मज्ञ के लिए
आप ही धारणा-शक्ति मेधा हैं। आप अनासक्त होकर सभी का
पालन करती हैं।
दुर्गा शब्द पारिभाषिक है-
मन्त्राणां मातृका देवी शब्दानां ज्ञान रूपिणी ।
ज्ञानानां चिन्मयातीता शून्यानां शून्य साक्षिणी ।
यस्या परतरं नास्ति सैषा दुर्गा प्रकीर्तिता ।
तां दुर्गा दुर्ग मां देवीं दुराचार विघातिनीम् ।
नमामि भवभीतोऽहं संसारार्णव तारिणीम् ॥
देव्यथर्व शीर्ष २४-२५
इस संसार को सागर या समुद्र इसलिए कहा गया है कि
इसमें अगाध अथाह जलराशि होने पर भी यह किसी प्यासे की
प्यास नहीं बुझा सकता। यही दशा संसार की है, असंख्य सुख-
सुविधा की सामग्री होते हुए भी किसी की प्यास की
(अभिलाषाओं एवं कामनाओं की) तृप्ति नहीं हो सकती है।
प्रत्येक पदार्थ पैदा होता है कुछ क्षणों के बाद समाप्त हो जाता
है—“भवन्तीति भूतानि” ऐसा भव-संसार क्षार जल से युक्त ही
नहीं अपितु विषय-विष से परिपूरित सागर है जिसमें मनोराज्य
की उत्ताल तरङ्गें उद्वेलित होती रहती हैं। इस भवसागर को
पार कराने वाली ब्रह्म विद्या ही है। इसी का नाम दुर्गा है-
सभी मंत्रों में मातृका, मूल अक्षरों में, शब्दों में अर्थ रूप से,
ज्ञान में चिन्मयातीता एवं शून्यों में उनकी साक्षीरूपा श्रेष्ठ देवी
दुर्गा जी हैं। पापियों को दण्डित करने वाली, सज्जनों को तारने

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ६०
वाली आप ही हैं। इसी दुर्गा देवी को यहाँ नौका बताया गया
गया है। आप ही विष्णु प्रिया लक्ष्मी तथा शिव प्रिया गौरी
हैं। अ. ४-११ ।।
मदिर-मदिर मुस्कानमयी चन्द्रानना पराम्बा पर भी महा-
मूर्ख महीष को क्रोध आया। उस पापी का उद्धार करने के कारण
ही उसी मुख को क्रोधावेश से कराल काल सम रौद्र करके
उसका उद्धार कर दिया। आप अपनी करुणामयी प्रसन्नता से
संसार का संरक्षण करती है, पालन करती है एवं क्रोधित होने
पर दैत्यों का सर्वनाश कर देती है, यह भी आपकी करुणा ही
है। १४।। आपके कृपा-पात्र जन ही सम्मान, धन और यश
पाते हैं, वे धन्य हैं। वस्तुतः भौतिक सम्पत्ति तथा तीनों एषणाओं
की उपलब्धि नाशमान होने के कारण क्षणिक है। अतः उनकी
प्राप्ति हो जाने पर भी सन्त-जन उन्हें धन्य नहीं कह सकते ।
भगवद्-भक्ति सम्पन्न पुरुष ही धन्य हैं—
सो कुल धन्य उमा सुन, जगत पूज्य सुपुनीत ।
श्री रघुवीर परायण जेहि, नर उपज विनीत ॥ मानस से स्पष्ट है
इसके अतिरिक्त यह भी कहा गया है-
कुलं पवित्रं जननी कृतार्था, वसुन्धरा पुण्यवती च तेन ।
अपार सेवित सुख सागरेऽस्मिन्, लीना परे ब्रह्मणि यस्य चेताः ॥
जो व्यक्ति अपार सुखों से सेवित इस संसार में अपने
चित्त को ब्रह्म में लीन किये हुये हैं, ऐसे महापुरुषों से ही कुल
पवित्र होता है, ऐसे पुत्र की सौभाग्यवती माता का जीवन
सार्थक है, और उसी से यह वसुओं को धारण करने वाली
वसुन्धरा-धरती माँ पुण्यवती है अतः ऐसे व्यक्ति ही धन्य हैं।
हे देवी ! आपकी कृपा प्राप्त सज्जन श्रद्धालु जन
धर्माचरण करके स्वर्ग प्राप्त करते हैं । हे माँ दुर्गे ! स्मरण
मात्र से सभी प्राणियों का दुःख हरण करने वाली आप ही हैं,

६१ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
और स्वस्थचित्त से कृतज्ञता पूर्वक स्मरण करने वाले पुरुषों का
सद्बुद्धि-देने वाली आप ही हैं । दया से आर्द्र-चित्त वाली सदैव
अपने भक्तों का उपकार करने वाली उनके दुःख, दारिद्र एवं
भयनाशिनी तुम ही हो । माँ के दो विशेषण बड़े मधुर एवं
यथार्थ हैं-(१) करुणा पूरित नयना (२) सदाऽऽर्द्रचित्ता ।
अर्थात् अपने प्यारे पुत्र के लिये जिनके नेत्रों में सदा
करुणा भरी रहती है और हृदय स्नेह से सदैव सिक्त (गीला)
रहता हैं । भक्त और अभक्त दोनों के लिये माँ सदा करुणा ही
बरसाती है, क्योंकि उनका क्रोध भी मुक्ति-प्रदायक है । १७ ॥
निर्वाण दायक क्रोध जाका (मानस)
हे देवि ! दुष्टों के दलन से जगत को सुख मिले और
उन्हें स्बर्ग मिले; इसी उद्देश्य से आप उनका संहार करती हैं ।
यह भी आपकी करुणा ही हैं कि अस्त्र-शस्त्रों का उन पर
प्रयोग करके उन्हें पवित्र करती हो, अन्यथा अपनी दृष्टिमात्र से
भस्मीभूत कर सकती हों । १६ ।
हे माँ ! यह आपके दिव्य-मुख-दर्शन का हो पुण्य फल
है जो आपकी तलवार की चमचमाहट तथा त्रिशूल की अनुपम
प्रभा से उनकी आँखें नहीं फूटी। हे देवी ! दुष्टों की दुष्टता
दूर करना और अनुपमेय बल तथा पराक्रम का उन्हें प्रदर्शन
करा देना ही आपका उनसे युद्ध करने का प्रयोजन है ।
हे वरदायिनी ! आपका पराक्रम अतुलनीय है, मनोहर
अनिन्द्य रूप हैं । धन्य हैं आप, जिनके हृदय में करुणा और
कृपा का अपार सागर तरङ्गयित है और युद्ध में दुष्टों के लिये
दग्ध करने वाली अपार ज्वाला ज्वलित रहती है । ये दोनों
बातें एक साथ आप में ही हैं । एक कुम्हार घड़े में भीतर हाथ
लगाकर बाहर दूसरे हाथ से जोर से थपकी की चोट से ठोकता
है जिससे घड़ा सुन्दर, सुघड़ एवं संस्कार युक्त बन जाता है ।
इसी प्रकार आप भी दोनों कार्य एक साथ ही करती हैं ।

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ६२
हे माँ ! शत्रुनाश करके आपने संसार की रक्षा की,
दुष्टों को स्वर्ग में वास दिया, और हम लोगों को उनसे निर्भय
बना दिया । आपको बारम्बार नमस्कार है । आप शूल से,
तलवार से, घण्टा ध्वनि से, धनुष की टंकार से, चारों दिशाओं
में हमारी रक्षा करें । २६ ।
इस प्रकार देवताओं ने पराम्बा की बड़े प्रेम से स्तुति की-
अब तुम्हारे हो चुके माँ, अब शरण में ले लो हमें ।
सर्वस्व अपना खो चुके हैं, माँ शरण में ले लो हमें ॥
जप-जोग ईश आराधना, तप नियम की जो साधना ।
सबसे विरक्त अब हो चुके हैं, माँ शरण में ले लो हमें ॥
निज बात पीड़ाओं से भरी, करुणार्द्र होकर तुमसे कही,
चरणों में गिरे, बहुत रो चुके हैं, माँ शरण में ले लो हमें ॥
माँ शरण में ले लो हमें ॥
पराम्बा ने देवों की स्तुति से प्रसन्न होकर वरदान
माँगने को कहा । तब देवताओं ने कहा-माँ ! हमारा यही
मनोरथ था कि संसार में आसुरी भाव नष्ट हो जायें । जब
व्यष्टि या समष्टि में दैवि गुणों का ह्रास और आसुरी भावों
का विकास हो जाता है । तब अम्युदय और नि श्रेयस दोनों
की हानि होती है । आपने कृपा करके विश्व का कल्याण किया
है । अब जब-जब ऐसी संकटमयी अवस्था आवे तो हमारे
स्मरण-मात्र से आप दर्शन देकर संकट दूर करें । यही
अभीष्ट है ।
इन स्तोत्रों को जो पढ़ेंगे उन्हें सब प्रकार की सुख-
सम्पत्ति की प्राप्ति होगी, प्रसन्न होकर आप हमें यही वरदान
दें । तथास्तु कहकर माँ जगदम्बे अन्तर्धान हो गईं ।
जब कोई न हो तेरा, तब माँ की शरण ले लेना ॥ १
संसार के जीवों पर कभी, आशा न किया करना ।
जब कोई न हो तेरा, तब माँ का नाम लिया करना ॥ २

६३ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
जीवन के सागर में तूफान भी आते हैं,
जो माँ के सहारे हैं वे ही बच पाते हैं।
वे आप ही आयेंगी, बस तुम याद किया करना ॥ ३
हे भक्त ! तू दुःख में न रो, माँ तुझ से दूर नही है,
भक्तों का दुखी होना, माता को मंजूर नहीं है ।
है भक्तों की रखवाली, तुम उनकी शरण लिया करना ॥ ४॥

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ६४
पञ्चमोऽध्याय
ध्यानम्-ॐ घण्टाशूलहलानि शंख मूसले चक्रं धनुः सायकम्
हस्ताब्जैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशु तुल्य प्रभाम् ।
गौरी देह समुद्भवां त्रिजगतामाधार भूतां महा-
पूर्वामत्र सरस्वती मनुभजे शुम्भादि दैत्यार्दिनीम् ॥
जिनके कर कमल घण्टा, शूल, हल, शङ्ख, मूसल, चक्र,
धनुष और बाण से सुशोभित है, शरद कालीन दुग्ध धवल
ज्योत्स्ना से ज्योतित चन्द्रमा के समान जिनकी मनोहर कान्ति
है, जो तीनों लोकों की आधार हैं जो शुम-निशुम्भादि दैत्य
संहारिणी हैं, माँ गौरी-पार्वती के शरीर से जिनका प्राकट्य
हुआ है उन महा सरस्वती देवी को मैं निरन्तर प्रणाम करता हूँ,
आराधना करता हूँ ।
विनियोगः-ॐ अस्य श्री उत्तरचरित्रस्य रुद्र ऋषिः,
महासरस्वती देवता, अनुष्टुप्छन्द-भीमा शक्ति, भ्रामरी
बीजम्, सूर्यस्तत्त्वम्, सामवेद स्वरूपम् महासरस्वती प्रीत्यर्थे
उत्तर चरित्र पाठे निनियोगः ॥
यह उत्तर-तृतीय चरित्र है । जीव में राग-द्वेष, अस्मिता
अविद्या, क्लेशों के कारण ही दुःख आता है । वह नित्य मुक्त
होने पर भी बन्धन का अनुभव करता है । प्रथम चरित्र में
राग-द्वेष का नाश हुआ है । द्वितीय चरित्र में अनन्त कुप्रवृत्तियों
सहित अस्मिता (अहङ्कार) का विनाश हुआ । अविद्या से ही यह
प्रपञ्च प्रतीत हो रहा है । अविद्या के कारण ही जीव-सृष्टि
है, जिसमें काम, क्रोध, लोभ, मोह जैसे प्रबल विकार उदय होते
हैं । संसार या जीव-सृष्टि का अर्थ "मेरा-तेरा" है । यही मेरा-
तेरा ही दुःखद है । इसे यों समझिये—धन बाहर है, बैंक में है,
उसके प्रति ममता होने के कारण उसके जाने पर दुःख होता