दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८१ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
रानी के संदेह को दूर करना है । आदेश का पालन करते हुए
मंत्री ने पाँच अपरिचित व्यक्तियों को लाकर राजा के समक्ष
उपस्थित किया । राजा ने उनसे वही प्रश्न पूछा-तुम लोग मेरी
आज्ञा से ही सभी कार्य व्यवहार करते हों या नहीं; निस्संकोच
कहिए । उन पाँचों में से एक ने भी राजाज्ञा के साथ सहमति
नहीं दी-वरन् किसी ने अपने पति को, किसी ने गुरुदेव को,
किसी ने अपने मालिक की आज्ञा में चलने को कहा । तब राजा
ने उन्हें बाहर निकलवा कर मंत्री से कहा-तुम और अधिक ऐसे
लोगों को लाओ, जो मेरी आज्ञा में हों । सुनकर मंत्री अपनी दस
पत्नियों को ले आया । पूछने पर उन्होंने उत्तर दिया-‘हमें राजा
की आज्ञा से क्या प्रयोजन ! अपने पति की आज्ञा से चलना है ।
तब मंत्री से पूछा-मंत्री ने भी मना कर दिया । रानी से पूछने
पर उसने कहा-‘महाराज ! मैं तो तुम्हारे कारण ही अशान्त
रहती हूँ । तुम्हारे बिना मेरा जीवन शान्त सुखमय रहता है,
क्योंकि तुम अपने आपको बिना मालिक के ही मालिक समझते
हो । सभी जनता को त्रास देते हो ।
आख्यान का राजा अहंकार है, रानी बुद्धि है, मन मंत्री
है, दस इन्द्रियाँ दस पत्नियाँ और पाँच व्यक्ति पञ्च महाभूत हैं ।
यह तो सच ही है कि यह अहंकार बहुत ही प्रबल शत्रु है-
“अहङ्कार विमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ।”
महामूर्ख अहंकार स्वयं अपने को कर्ता मान बैठता है,
क्योंकि बुद्धि मूर्च्छित हो जाती है । इसी दुष्ट के मरने पर परा-
भक्ति प्राप्त होती है । अहंकार के सम्बन्ध में महामुनि विद्यारण्य
जी ने अपनी अमर कृति ‘पञ्चदशी’ में इस प्रकार कहा है—
अहङ्कारः प्रभु सभ्याः विषया नर्तकी मतिः ।
ताल धारिण्यक्षाणि साक्षी सर्वावभासकः ॥
अर्थात् राजा अहंकार है, विषय सभासद, बुद्धि नर्तकी है,
इन्द्रियाँ वाद्य-वादिनी हैं और साक्षी आत्मा, प्रकाश देने वाला